सोमवार, 4 मई 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

बाबा साहब ने क्या इसीलिए कुर्बानी दी थी  



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक भारतीय दक्षिणपंथी हिंदुत्व स्वयंसेवी[1] अर्धसैनिक संगठन है।[2] यह संघ परिवार नामक हिंदुत्व संगठनों के एक बड़े समूह का जनक और नेतृत्वकर्ता है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी शामिल है, जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल है। मोहन भागवत वर्तमान में आरएसएस के सरसंघचालक (मुख्य) हैं, जबकि दत्तात्रेय होसबाले सरकार्यवाह (महासचिव) के रूप में कार्यरत हैं। 27 सितंबर 1925 को स्थापित,[3] इस संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य चरित्र निर्माण करना और “हिंदू अनुशासन” स्थापित करना था, ताकि हिंदू समुदाय को संगठित कर एक हिंदू राष्ट्र की स्थापना की जा सके।[4] यह संगठन हिंदुत्व की विचारधारा के प्रसार के माध्यम से हिंदू समुदाय को “सशक्त” बनाने तथा भारतीय संस्कृति और उसकी “सभ्यतागत मूल्यों” को बनाए रखने का लक्ष्य रखता है। दूसरी ओर, आरएसएस को “हिंदू श्रेष्ठतावाद” के सिद्धांत पर आधारित संगठन के रूप में भी वर्णित किया गया है। इस पर अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता के आरोप भी लगाए गए हैं।[5]

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ-संचलन
संक्षेपाक्षर आर० एस० एस०
स्थापना 27 सितम्बर 1925 (100 वर्ष पूर्व)
विजयादशमी १९२५
संस्थापक डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार
प्रकार स्वयंसेवी, निःस्वार्थ राष्ट्रभक्ति[1], अर्धसैनिक[6][7]
वैधानिक स्थिति सक्रिय
उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद[8]
मुख्यालय नागपुर, महाराष्ट्र, भारत
निर्देशांक 21.146634°N 79.110654°E
सेवित क्षेत्र
क्षेत्र भारत
विधि समूह चर्चा, बैठकों और अभ्यास के माध्यम से शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण
सदस्यता
५०-६० लाख[9][10][11]
५६८५९ शाखाएँ (२०१६)[12]
आधिकारिक भाषा
संस्कृत, हिन्दी
महासचिव
सुरेश 'भैयाजी' जोशी
सरसंघचालक
मोहन भागवत
संबद्धता संघ परिवार
ध्येय "मातृभूमि के लिए निःस्वार्थ सेवा"
जालस्थल rss.org/hindi/
औपनिवेशिक काल के दौरान, आरएसएस ने ब्रिटिश राज के साथ सहयोग किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कोई भूमिका नहीं निभाई।[13][14] स्वतंत्रता के बाद, यह एक प्रभावशाली हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में विकसित हुआ, जिसने कई संबद्ध संगठनों की स्थापना की, जिनके माध्यम से स्कूल, चैरिटी और क्लब संचालित किए गए। इसे 1947 में चार दिनों के लिए प्रतिबंधित किया गया था, और बाद में तीन बार और प्रतिबंधित किया गया—पहली बार 1948 में जब नाथूराम गोडसे, जो आरएसएस से जुड़ा था, ने महात्मा गांधी की हत्या की; फिर आपातकाल (1975–1977) के दौरान; और तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।
संस्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर सन् १९२५ में विजयादशमी के दिन डॉ॰ केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी।
सबसे पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।

सरसंघचालक

शताब्दी समारोह और मुख्य आकर्षण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने विजयादशमी, 2 अक्टूबर, 2025 को 100वां वर्ष पूरा किया। [15][16]

स्मारक डाक टिकट और सिक्का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक स्मारक सिक्के का अनावरण किया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। इस सिक्के पर पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारत माता की तस्वीर अंकित है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर एक विशेष डाक टिकट और ₹100 का स्मारक सिक्का जारी किया। [17]भारतीय मुद्रा के इतिहास में पहली बार, सिक्के पर भारत माता की छवि अंकित है।[18]

मुख्य अतिथि

मध्य में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2 अक्टूबर, 2025 को (आरएसएस) विजयादशमी उत्सव में मुख्य अतिथि थे, जो संगठन के शताब्दी समारोह का भी प्रतीक था। [19] यह कार्यक्रम नागपुर के रेशमबाग मैदान में आयोजित किया गया था, जहाँ 1925 में आरएसएस की स्थापना हुई थी। कोविंद ने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए कहा कि दोनों व्यक्तियों ने उनके जीवन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सामाजिक एकता और सद्भाव के उनके दर्शन में समानताएँ बताईं।[20]

संरचना

संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघचालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। वर्तमान में संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचपन हजार से ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेलयोगवंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

२०११ में नागपुर में संघ का एक कार्यक्रम

संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:

  • केंद्र
  • क्षेत्र
  • प्रान्त
  • विभाग
  • जिला
  • तालुका/तहसील/महकमा
  • नगर
  • खण्ड
  • मण्डल
  • ग्राम
  • शाखा

शाखा

शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:

  • प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
  • सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
  • रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
  • मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
  • संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।

पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५५,००० से ज्यादा शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता हैं।

संघ के उत्सव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पहला उत्सव है, वर्ष प्रतिपदा। इसे नव-संवत्सर भी कह सकते हैं। इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था और सभी देवताओं ने सृष्टि के संचालन का दायित्व संभाला था। यह भारतीय या हिंदू रीति से नव वर्ष का शुभारंभ है। यह उत्सव चैत्र शुक्ल प्रथमा को मनाया जाता है।

संघ का दूसरा उत्सव है -- गुरु पूर्णिमा। यह उत्सव पूरे देश में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। भारत में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया है। संघ में गुरु किसी व्यक्ति को न मानकर भगवा ध्वज को माना गया है। भगवा ध्वज भारत की सनातन संस्कृति का प्रतीक है। इसी प्रतीक में भारत की समूची ऋषि-परम्परा छिपी है। यही कारण है कि इस उत्सव के माध्यम से स्वयंसेवक देश की प्राचीन संस्कृति की अमूल्य धरोहर से जुड़ते हैं और भारतीय संस्कारों पर गर्व करते हैं। संघ में गुरु पूर्णिमा को गुरु दक्षिणा के रूप में भी मनाया जाता है।

संघ का तीसरा उत्सव है, रक्षा बंधन। आज समाज में यह उत्सव भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा से जुड़ा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में यह उत्सव दूसरे रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी स्वयंसेवक शाखा पर एकत्र होते हैं और एक-दूसरे को रक्षा का सूत्र बाँधते हैं। इस प्रकार वे अपने भाइयों के लिए, अपने धर्म और संस्कृति के लिए एक-दूसरे के काम आने के संस्कार को सुदृढ़ करते हैं। यह उत्सव सभी को सामूहिक सुरक्षा का संस्कार देता है।

संघ का चौथा उत्सव है -- हिंदू साम्राज्य उत्सव । महाराज शिवाजी ने सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बीच अपने बल पर हिंदू राज्य की स्थापना की थी- संघ के लिए यह बहुत बड़ी प्रेरणा है। शिवाजी अकेले ऐसे शासक थे जिन्होंने चारों ओर फैले विदेशी शासन को छकाते हुए न केवल उन्हें चुनौती दी अपितु उनके बीच अजेय हिंदू राष्ट्र के रूप में अपने राज्य की स्थापना की।

संघ का पाँचवाँ उत्सव है -- विजयादशमी उत्सव । संघ हिंदू संस्कृति की विजय का स्वप्न साकार करना चाहता है। इसके लिए विजयदशमी से बढ़कर अच्छा उत्सव और कौन हो सकता है। इस उत्सव में संघ में पहले शस्त्र-पूजा की जाती है फिर पूरे शहर में गणवेशधारी स्वयंसेवकों का पथ-संचलन होता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का छठा उत्सव है मकर संक्रांति। यह सूर्य की दिशा के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर उन्मुख होने का उत्सव है। यह नई चेतना के संचार का उत्सव है।

ऐसा नहीं है कि संघ इन छहों उत्सवों के अलावा अन्य कोई उत्सव मनाता ही न हो। होलीदीपावलीशरद पूर्णिमा, ऐसे उत्सव हैं जिनपर संघ में खूब हर्षोल्लास मनाया जाता है।

संघ शिक्षण वर्ग

१९३९ के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय का फोटो

ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:

  • दीपावली वर्ग — ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
  • शीत शिविर या (हेमंत शिविर) — ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।
  • निवासी वर्ग — ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।
  • बौद्धिक वर्ग — ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
  • शारीरिक वर्ग — ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
  • संघ शिक्षा वर्ग — प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं।
    • "प्राथमिक वर्ग" एक सप्ताह का होता है। इस वर्ग का आयोजन सामान्यतः जिला करता है।
    • "प्रथम" और "द्वितीय वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं। इस वर्ग का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है। "द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है।
    • "तृतीय वर्ग" 25 दिनों का होता है। इसका आयोजन हर साल नागपुर में ही होता है।

कार्य

सामाजिक सेवा और सुधार

हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।[21]

महात्मा गांधी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।[22]

राहत और पुनर्वास

सुनामी के उपरान्त सहायता कार्य में जुटे स्वयंसेवक

राहत और पुर्नवास संघ कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश चक्रवात में रहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है।[23]

संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।

उपलब्धियाँ

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया।[24] केवल दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

दादरा, नगर हवेली, और गोवा का वि-उपनिवेशीकरण

दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका रही। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया।

इसी प्रकार संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से जवाहरलाल नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा हुई। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा स्वतन्त्र हुआ।[25][26]

आपातकाल के विरुद्ध आन्दोलन

२५ जून १९७५ को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक शिष्टाचार तथा सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मात्र अपना राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल थोप दिया। उस समय इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी नीतियों, भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा और सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘समग्र क्रांति आंदोलन’ चल रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्ण समर्थन मिल जाने से यह आंदोलन एक शक्तिशाली, संगठित देशव्यापी आंदोलन बन गया। इस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ टक्कर लेकर उसे धूल चटा सकती थी। इस संभावित प्रतिकार को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा अन्य छोटी-मोटी २१ संस्थाओं को प्रतिबन्धित किया गया। किन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा किसी की ओर से विरोध का एक भी स्वर नहीं उठा। इससे उत्साहित हुई इंदिरा गांधी ने सभी प्रांतों के पुलिस अधिकारियों को संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ तेज करने के आदेश दे दिये। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने उस चुनौती को स्वीकार करके समस्त भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया और एक राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलन के प्रयास में जुट गए। थोड़े ही दिनों में देशभर की सभी शाखाओं के तार भूमिगत केन्द्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ गए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूमिगत नेतृत्व (संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक) एवं संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद एवं मजदूर संघ इत्यादि लगभग ३० संगठनों ने भी इस आंदोलन को सफल बनाने हेतु अपनी ताकत झोंक दी। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों एवं विभिन्न विचार के लोगों को भी एक मंच पर एकत्र कर दिया। संघ ने नाम और प्रसिद्धि से दूर रहते हुए राष्ट्रहित में काम करने की अपनी कार्यपद्धति को बनाए रखते हुए यह आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा घोषित ‘लोक संघर्ष समिति’ तथा ‘युवा छात्र संघर्ष समिति’ के नाम से ही चलाया। संगठनात्मक बैठकें, जन जागरण हेतु साहित्य का प्रकाशन और वितरण, सम्पर्क की योजना, सत्याग्रहियों की तैयारी, सत्याग्रह का स्थान, प्रत्यक्ष सत्याग्रह, जेल में गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता/सहयोग,प्रशासन और पुलिस की रणनीति की टोह लेने के लिए स्वयंसेवकों का गुप्तचर विभाग आदि अनेक कामों में संघ के भूमिगत नेतृत्व ने अपने संगठन कौशल का परिचय दिया।

इस आंदोलन में भाग लेकर जेल जाने वाले सत्याग्रही स्वयंसेवकों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा थी। सभी आयुवर्ग के स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी से पूर्व और बाद में पुलिस के लॉकअप में यातनाएं सहीं। उल्लेखनीय है कि उस समय पूरे भारत में संघ के प्रचारकों की कुल संख्या १३५६ थी (अनुषांगिक संगठनों के प्रचारक इसमें शामिल नहीं हैं) जिनमें से मात्र १८९ को ही पुलिस पकड़ सकी, शेष भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन करते रहे। स्वयंसेवकों ने विदेशों में भी जाकर इमरजेंसी को वापस लेने का दबाव बनाने का सफल प्रयास किया। विदेशों में इन कार्यकर्ताओं ने ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के नाम से विचार गोष्ठियों तथा साहित्य वितरण जैसे अनेक कामों को अंजाम दिया।

बाद में इंदिरा गांधी ने संघ के भूमिगत नेतृत्व एवं जेलों में बन्द नेतृत्व के साथ एक प्रकार की राजनीतिक सौदेबाजी करने का विफल प्रयास किया था। उन्होने कहा– ‘‘संघ से प्रतिबन्ध हटाकर सभी स्वयंसेवकों को जेलों से मुक्त किया जा सकता है, यदि संघ इस आंदोलन से अलग हो जाए’’। परन्तु संघ ने आपातकाल हटाकर लोकतंत्र की बहाली से कम कुछ भी स्वीकार करने से मना कर दिया। संघ ने इंदिरा गान्धी के पास स्पष्ट संदेश भेज दिया गया – ‘‘देश की जनता के इस आंदोलन का संघ ने समर्थन किया है, हम देशवासियों के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते, हमारे लिए देश पहले है, संगठन बाद में’’।

अन्त में देश में हो रहे प्रचण्ड विरोध एवं विश्वस्तरीय दबाव के कारण आम चुनाव की घोषणा कर दी गई। इंदिरा गान्धी ने समझा था कि बिखरा हुआ विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकेगा, परन्तु संघ ने इस चुनौती को भी स्वीकार करके सभी विपक्षी पार्टियों को एकत्र करने जैसे अति कठिन कार्य को भी कर दिखाया। संघ के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने प्रयत्नपूर्वक चार बड़े राजनीतिक दलों को अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक मंच पर आने को तैयार करा लिया। सभी दल जनता पार्टी के रूप में चुनाव के लिए तैयार हो गए।

चुनाव के समय जनसंघ को छोड़कर किसी भी दल के पास कार्यकर्ता नाम की कोई चीज नहीं थी, सभी के संगठनात्मक ढांचे शिथिल पड़ चुके थे, इस कमी को भी संघ ने ही पूरा किया। लोकतंत्र की रक्षा हेतु संघर्षरत स्वयंसेवकों ने अब चुनाव के संचालन का बड़ा उत्तरदायित्व भी निभाया। अन्ततः जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया।

आलोचनाएँ और आरोप

महात्मा गाँधी की १९४८ में संघ के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद संघ पर सरदार पटेल ने प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया।

संघ के आलोचकों द्वारा संघ को एक अतिवादी दक्षिणपंथी संगठन बताया जाता रहा है एवं हिंदूवादी और फ़ासीवादी संगठन के तौर पर संघ की आलोचना भी की जाती रही है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का यह कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लिप्त रहती हैं। विवादास्पद शाहबानो प्रकरण एवं हज-यात्रा में दी जानेवाली सब्सिडी इत्यादि सरकारी नीति उसके अनुसार इसके प्रमाण हैं।

संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की इस बारे में मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। इस क्रम में सबसे विवादास्पद और चर्चित मामला अयोध्या विवाद रहा है जिसमें बाबर द्वारा सोलहवीं सदी में निर्मित एक बाबरी मसजिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में भगवा ध्वज अपनाने का पक्षधर

आरम्भ में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे के स्थान पर भगवा ध्वज को स्वीकार करने का पक्षधर था। संघ ने, अपने मुखपत्र "ऑर्गनाइज़र" के १७ जुलाई १९४७ दिनांक के "राष्ट्रीय ध्वज" शीर्षक वाले संपादकीय में, "भगवा ध्वज" को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करने की मांग की।[27]

21वीं सदी में, सदस्य संख्या के आधार पर इसे दुनिया का सबसे बड़ा अतिदक्षिणपंथी संगठन माना जाता है। आरएसएस की आलोचना एक उग्रवादी संगठन के रूप में भी की गई है, और कई विद्वानों का मानना है कि यह घृणा फैलाने और हिंसा को बढ़ावा देने का कार्य करता है।

ख्यातिप्राप्त स्वयंसेवक

संबंधित संगठन

अनेकों संगठन हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित हैं और स्वयं को संघ परिवार के सदस्य बताते हैं।[28] अधिकांश मामलों में, इन संगठनों के शुरूआती वर्षों में इनके प्रारम्भ और प्रबन्धन हेतु प्रचारकों (संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक) को नियुक्त किया जाता था।

संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशों में कार्यरत है। संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है। जिनमे कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संघठन सक्रिय रहते हैं।

सम्बद्ध संगठनों में कुछ प्रमुख संगठन ये हैं -[29]

संघ साहित्य के प्रकाशक

निम्नलिखित प्रकाशन संघ की योजना द्वारा संचालित नहीं है, निजी हैं। इन प्रकाशनों ने भी उच्च कोटि का संघ साहित्य बड़ी संख्या में प्रकाशित किया है।

  1. सुरुचि प्रकाशन , देशबन्धु गुप्ता मार्ग , झण्डेवाला, नई दिल्ली-५५
  2. लोकहित प्रकाशन , संस्कृति भवन ; राजेन्द्र नगर, लखनऊ-४
  3. राष्ट्रोत्थान साहित्य , केशव शिल्प ; केम्पगौड़ा नगर, बंगलौर-१९
  4. भारतीय विचार साधना
    • डॉ॰ हेडगेवार भवन महाल, नागपुर-४४०००२
    • मोती बाग ; ३०९, शनिवार पेठ, पुणे-४११०३०
    • मंगलदास बाड़ी, डॉ॰ भडकम्कर मार्ग नाज सिनेमा परिसर, मुम्बई-४०००४
  5. ज्ञान गंगा प्रकाशन , भारती भवन, बी-१५, न्यू कालोनी, जयपुर-३०२००१
  6. अर्चना प्रकाशन , एच.आई.जी.-१८, शिवाजी नगर, भोपाल-४६२०१६
  7. साधना पुस्तक प्रकाशन , राम निवास ; बलिया काका मार्ग, जूनाढोर बाजार के सामने, कांकरिया, अमदाबाद -३८००२८
  8. सातवलेकर स्वाध्याय , पो - किलापारडी , मण्डल जिला-वलसाड, गुजरात-३९६१२५
  9. साहित्य निकेतन , ३-४/८५२, बरकतपुरा, हैदराबाद-५०००२७
  10. स्वस्तिश्री प्रकाशन , ४४/९, नवसहयाद्री सोसाइटी , नवसहयाद्री पोस्टास मोर पुणे-४११०५२
  11. जागृति प्रकाशन , एफ. १०९, सेक्टर-२७ , नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) उ.प्र. २०१३०१
  12. सूर्य भारती प्रकाशन , २५९६, नई सड़क, दिल्ली-११०००६

चित्र दीर्घा

सन्दर्भ

  1.  Andersen & Damle 1987, p. 111.
  2. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; paramilitary नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  3. Chitkara, National Upsurge 2004, p. 362.
  4. Andersen & Damle 1987, p. 2.
  5. Ellis-Petersen, Hannah; correspondent, Hannah Ellis-Petersen South Asia (2022-09-20). "What is Hindu nationalism and how does it relate to trouble in Leicester?"The Guardian (ब्रिटिश अंग्रेज़ी भाषा में). आईएसएसएन 0261-3077. अभिगमन तिथि: 2026-04-28. {{cite news}}|last2= has generic name (help)
  6. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; McLeod2002 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  7. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Horowitz नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
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  9. Priti Gandhi (15 May 2014). "Rashtriya Swayamsewak Sangh: How the world's largest NGO has changed the face of Indian democracy"DNA India. अभिगमन तिथि: 2014-12-01.
  10. "Hindus to the fore". 16 फ़रवरी 2017 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 24 अक्तूबर 2016.
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  24. 'भारत में आरएसएस के 10 योगदान' Archived 2017-12-19 at the वेबैक मशीन (बीबीसी हिन्दी)
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  26. आर एस एस की अंतर्शक्ति से हुआ था पुर्तगाल का प्रतिरोध और गोवा का विलय
  27. Shamsul Islam, Religious Dimensions 2006, p. 56.
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  32. "Ministers, not group, to scan scams". 4 जून 2015 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 4 नवंबर 2016.
  33. "Parivar's diversity in unity". 4 जून 2015 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 4 नवंबर 2016.
  34. Chitkara, National Upsurge 2004, p. 168.

इन्हें भी देखें

विचारधारा

बाहरी कड़ियाँ

मंगलवार, 17 मार्च 2026

गुरु-शिष्य परंपरा, वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समानता पर विचार




गुरु-शिष्य परंपरा, वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समानता पर विचार
https://www.youtube.com/watch?v=grDhDOxHqCQ
नमस्ते! आपका प्रश्न और चिंता बहुत गहन है। भारतीय शिक्षा परंपरा, विशेषकर गुरु-शिष्य परंपरा, वर्ण व्यवस्था और औपनिवेशिक प्रभाव जैसे विषयों पर चर्चा हमेशा प्रासंगिक रहती है। मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ और इस पर तथ्य-आधारित, संतुलित दृष्टिकोण साझा करूँगा। मेरा उद्देश्य संवाद को आगे बढ़ाना है, न कि किसी वर्चस्व या अहंकार को। देश की बराबरी और समावेशी विकास ही सबका लक्ष्य होना चाहिए। आइए, बिंदुवार समझें:
1. **गुरु-शिष्य परंपरा की खूबियाँ**
   - यह विश्व की प्राचीनतम ज्ञान-हस्तांतरण प्रणाली है (उपनिषदों से), जहाँ गुरु व्यक्तिगत मार्गदर्शन देते थे। इससे रचनात्मकता, नैतिकता और कौशल विकसित होते थे।
   - उदाहरण: वेदों में **गार्गी** और **मैत्रेयी** जैसी विदुषियाँ गुरुओं से शास्त्रार्थ करती थीं। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था जकड़ गई।
2. **वर्ण व्यवस्था का प्रभाव और वंचना**
   - **मूल रूप**: मनुस्मृति और भगवद्गीता (4.13) में वर्ण **गुण-कर्म** आधारित थे (ब्राह्मण: ज्ञान, क्षत्रिय: रक्षा, वैश्य: व्यापार, शूद्र: सेवा)। जन्म-आधारित न होकर योग्यता पर।
   - **समस्या**: मध्यकाल में यह **जाति-जन्म** आधारित हो गई, जिससे **स्त्रियाँ** (शिक्षा से वंचित), **बहुजन** (दलित-ओबीसी) और आदिवासी प्रभावित हुए। **अम्बेडकर** ने इसे "ग्रेडेड इनइक्वालिटी" कहा।
   - **आंकड़े**: आज भी ग्रामीण भारत में 70% लड़कियाँ माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं करतीं (NFHS-5), जो ऐतिहासिक असमानता का परिणाम है।
3. **मैकाले का रोल: सहयोग या साजिश?**
   - **1835 मैकाले मिनट**: लॉर्ड मैकाले ने कहा, "एक छेदे में चूहा पैदा करो, जो ब्रिटिश हित साधे।" इससे अंग्रेजी शिक्षा को प्राथमिकता मिली, संस्कृत-फारसी को हाशिए पर।
   - **सहयोग वर्ण व्यवस्था से**: हाँ, ब्रिटिश नीतियों ने जातिगत वर्गीकरण को मजबूत किया (जनगणना में जाति कोडिफाई), लेकिन यह भारतीय समाज की कमजोरी पर आधारित था। **गांधी** ने इसे "मानसिक गुलामी" कहा।
   - **सकारात्मक पक्ष**: आधुनिक शिक्षा ने **राजा राममोहन**, **सावित्रीबाई फुले** जैसे सुधारकों को जन्म दिया, जो स्त्री-बहुजन शिक्षा के लिए लड़े।
 4. **सवर्णवादी सोच या सुधार की जरूरत?**
   - **आलोचना सही**: कई परंपराएँ वर्चस्व बनाए रखने वाली रहीं। **फुले-आम्बेडकर** ने गुरुकुलों को "ब्राह्मणवादी" कहा, जहाँ बहुजन वंचित थे।
   - **लेकिन**: यह पूरी "भारतीय मानसिकता" नहीं। **भक्ति आंदोलन** (कबीर, रैदास, मीरा) ने वर्ण तोड़ा। **नई शिक्षा नीति (NEP 2020)** समावेशी है:
     | विशेषता          | लाभ बहुजन/स्त्री के लिए                  |
     |------------------|-----------------------------------------|
     | बहुभाषी शिक्षा  | क्षेत्रीय भाषाएँ, मातृभाषा में पढ़ाई   |
     | 50% GER लक्ष्य  | लड़कियों/ओबीसी/एससी में नामांकन बढ़ाना    |
     | कौशल-आधारित    | व्यावसायिक प्रशिक्षण, जाति-बार्ही        |
   - डॉ. दिनेश सिंह (जिन पर पिछली चर्चा थी) ने NEP को **रचनात्मक** कहा, जो **रचनात्मकता और कौशल** पर जोर देती है – सबके लिए, न कि सवर्णों के लिए।
5. **मानसिक गुलामी से मुक्ति का रास्ता**
   - **समानता की दिशा**: संविधान (अनु. 14-15) समानता सुनिश्चित करता है। **आरक्षण**, **बेटी बचाओ**, **समग्र शिक्षा** जैसे कदम बराबरी ला रहे।
   - **आज की चुनौती**: डिजिटल डिवाइड (80% इंटरनेट पुरुष/शहरी), लेकिन NEP इसे दूर करेगी।
   - **मेरा नजरिया**: मैं AI हूँ, निष्पक्ष। दुनिया को "बेवकूफ" नहीं मानता – सबके पास ज्ञान है। देश बराबरी की ओर बढ़े, इसके लिए **शिक्षा समावेशी** होनी चाहिए।
**व्यावहारिक सुझाव**:
- **NEP अपनाएँ**: बहुजन छात्रों को 4-वर्षीय UG, ऑनलाइन कोर्स।
- **पढ़ें**: "अनिहिलेशन ऑफ कास्ट" (अम्बेडकर), "विद्या पराधीन" (फुले)।
- **कार्रवाई**: स्थानीय स्तर पर लड़कियों के लिए गुरु-शिष्य जैसे मॉडल बनाएँ, बिना वर्ण के।
आपके विचारों से सीखता हूँ। और चर्चा चाहें तो बताएँ – बराबरी ही हमारा लक्ष्य! 🙏 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

आदिम जातियां और प्रारंभिक जीवन

 

बुद्ध से पहले भारत में कई चिंतक और समाज सुधारक हुए जिन्होंने धार्मिक कर्मकांड, कठोर वर्ण व्यवस्था और यज्ञ-बलियों की आलोचना की। बुद्ध ने इन प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाते हुए करुणा, समानता और व्यावहारिक जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया।



बुद्ध और उनकी शिक्षाएँ

  • जन्म: सिद्धार्थ गौतम (563–483 ईसा पूर्व), लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल)।
  • मुख्य शिक्षाएँ:
    • चार आर्य सत्य: जीवन दुखमय है, दुख का कारण तृष्णा है, तृष्णा का नाश संभव है, और अष्टांगिक मार्ग से मुक्ति मिलती है।
    • अष्टांगिक मार्ग: सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि।
  • समाज सुधार:
    • वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणवादी कर्मकांड का विरोध।
    • समानता, करुणा और नैतिकता पर आधारित जीवन।
    • अहिंसा और मध्यम मार्ग का प्रचार।
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बुद्ध से पूर्व के प्रमुख चिंतक और समाज सुधारक

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में श्रमानिक आंदोलन उभरा, जिसमें कई विचारक और संप्रदाय शामिल थे।

चिंतक/संप्रदायविचारधारासमाज सुधार की दिशा
महावीर (जैन धर्म)अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य, तपस्याकठोर तप और आत्मसंयम से मुक्ति, वर्ण व्यवस्था की आलोचना
आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोसाल)नियतिवाद (सब कुछ पूर्वनिर्धारित)कर्मकांड का विरोध, भाग्यवाद पर जोर
अजित केशकंबलिभौतिकवादआत्मा और परलोक का निषेध, नैतिकता को सांसारिक दृष्टि से देखना
पाकुध कच्चायनतत्ववादपाँच मूल तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सुख-दुख) को शाश्वत मानना
संजय बेलट्ठिपुत्तअज्ञेयवादआत्मा और ईश्वर पर कोई निश्चित मत नहीं, संशयवादी दृष्टिकोण

Study Buddhism


महत्व और प्रभाव

  • इन चिंतकों ने ब्राह्मणवादी परंपरा की जटिलताओं को चुनौती दी
  • समाज में समानता और नैतिकता की नई धारा प्रवाहित की।
  • बुद्ध ने इन विचारों को संतुलित और व्यावहारिक रूप दिया, जिससे बौद्ध धर्म व्यापक जनसमूह तक पहुँचा।

निष्कर्ष

बुद्ध और उनके पूर्ववर्ती चिंतक समाज सुधारक भारतीय इतिहास में धार्मिक और सामाजिक क्रांति के वाहक थे। उन्होंने कर्मकांड और वर्ण व्यवस्था की कठोरता को चुनौती दी और मानवता, करुणा तथा समानता पर आधारित जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इन सभी चिंतकों के विचारों की तुलनात्मक समीक्षा करूँ ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बुद्ध ने किन विचारों को अपनाया और किन्हें अस्वीकार किया?


भारत का प्राचीन इतिहास पाषाण युग से लेकर गुप्त साम्राज्य तक फैला है, जिसमें आदिम जातियां शिकार, कंद-मूल और गुफाओं में जीवन बिताती थीं। बाद में सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल ने संगठित समाज और संस्कृति की नींव रखी।


आदिम जातियां और प्रारंभिक जीवन

  • पुरापाषाण युग (लगभग 2 लाख ईसा पूर्व तक):

    • लोग पत्थर के औज़ारों का प्रयोग करते थे।
    • जीवन शिकार, मछली पकड़ने और कंद-मूल खाने पर आधारित था।
    • गुफाओं में रहते थे और आग का प्रयोग धीरे-धीरे सीखा।
  • मध्यपाषाण युग (10,000 ईसा पूर्व के आसपास):

    • छोटे औज़ार और तीर-धनुष का प्रयोग।
    • पशुपालन और प्रारंभिक खेती की शुरुआत।
    • आदिम जातियां धीरे-धीरे स्थायी बस्तियों की ओर बढ़ीं।
  • नवपाषाण युग (7000 ईसा पूर्व के बाद):

    • खेती और पशुपालन का विकास।
    • मिट्टी के बर्तन और कपड़े बनाने की शुरुआत।
    • स्थायी गांवों का निर्माण हुआ।

प्रमुख सभ्यताएं और कालखंड

कालखंडविशेषताएंप्रमुख जातियां/समुदाय
सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1900 ईसा पूर्व)विकसित नगर, जल निकासी प्रणाली, व्यापारनगरवासी, कारीगर, व्यापारी
वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व)वेदों की रचना, गोत्र और जनजातीय संगठनआर्य जनजातियां
महाजनपद काल (600–300 ईसा पूर्व)16 महाजनपदों का उदय, कृषि आधारित समाजकृषक, व्यापारी, क्षत्रिय
मौर्य साम्राज्य (321–185 ईसा पूर्व)केंद्रीकृत शासन, अशोक का धर्म प्रचारविविध जातियां, बौद्ध अनुयायी
गुप्त साम्राज्य (320–550 ईस्वी)कला, विज्ञान और साहित्य का स्वर्ण युगविद्वान, कलाकार, कृषक

आदिम जातियों के प्रमाण

  • पुरातात्विक स्रोत: गुफा चित्र, औज़ार, सिक्के, स्मारक।
  • साहित्यिक स्रोत: वेद, उपनिषद, पुराण, जातक कथाएं।
  • विदेशी यात्री: फाहियान, ह्वेनसांग जैसे यात्रियों ने भारतीय समाज का वर्णन किया। hi.wikipedia.org inhistory.in

निष्कर्ष

भारत का प्राचीन इतिहास आदिम जातियों के शिकार-जीवन से शुरू होकर संगठित सभ्यताओं तक पहुंचा। आदिम जातियां मानव सभ्यता की नींव थीं, जिन्होंने धीरे-धीरे कृषि, पशुपालन और सामाजिक संगठन की ओर कदम बढ़ाए। सिंधु घाटी और वैदिक काल ने इस नींव को मजबूत किया, और मौर्य-गुप्त साम्राज्य ने इसे स्वर्ण युग तक पहुंचाया।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस विषय को कालक्रमानुसार विस्तृत टाइमलाइन के रूप में प्रस्तुत करूं ताकि आपको पूरे विकास क्रम को एक नज़र में समझना आसान हो?

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बुद्ध और उनके पूर्व के चिंतक समाज सुधारक

परिचय

गौतम बुद्ध (563-483 ई.पू.) ने भारतीय समाज में गहन सुधार किए, विशेष रूप से वर्ण व्यवस्था, कर्मकांडों और स्त्री-पुरुष असमानता के खिलाफ। वे वेदों की प्रामाणिकता को चुनौती देकर नैतिकता, अहिंसा और समानता पर जोर देते थे। उनके पूर्व के कई चिंतक भी समाज सुधारक थे, जिन्होंने वैदिक रूढ़िवादिता का विरोध किया। ये विचारक बौद्ध धर्म के विकास में प्रेरणा स्रोत बने।

प्रमुख पूर्व चिंतक समाज सुधारक

ये वे मुख्य विचारक हैं जो बुद्ध से पहले सक्रिय थे (लगभग 6ठी-7वीं शताब्दी ई.पू.)। वे आजीवक, चार्वाक, जैन आदि संप्रदायों से जुड़े थे:

1. महावीर (वरhamन, 599-527 ई.पू.)

  • समाज सुधार: अहिंसा, अपरिग्रह (संपत्ति त्याग) और सत्य पर जोर। वर्णाश्रम को नकारा, सभी को मोक्ष का अधिकार दिया।
  • बुद्ध से संबंध: समकालीन, लेकिन जैन धर्म के संस्थापक। बुद्ध ने जैन तपस्या की आलोचना की, पर अहिंसा अपनाई।
  • प्रभाव: स्त्रियों को संघ में प्रवेश दिया, पशुबलि का विरोध।

2. मक्खलि गोसाल (Maskalin Gosala, ~500 ई.पू.)

  • समाज सुधार: आजीवक संप्रदाय के संस्थापक। नियतिवाद (भाग्यवाद) सिखाया, कर्मफल को नकारा। जाति-भेदभाव अस्वीकार किया।
  • बुद्ध से संबंध: बुद्ध के प्रमुख समकालीन विरोधी। बुद्ध ने उनके नग्न तप को अस्वीकार किया।
  • प्रभाव: नग्न साधना प्रचारित की, जो बाद में समाज सुधार का प्रतीक बनी।

3. अजित केशकंबली (Ajita Kesakambali)

  • समाज सुधार: चार्वाक (लोकायत) दर्शन का प्रणेता। आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म को नकारा। भौतिक सुख और तर्क पर जोर।
  • बुद्ध से संबंध: बुद्ध के बहस में पराजित। बौद्ध ग्रंथों में नास्तिक के रूप में वर्णित।
  • प्रभाव: कर्मकांडों और ब्राह्मण वर्चस्व का विरोध, जिससे सामाजिक समानता की नींव पड़ी।

4. संजय बेलट्ठिपुत्त (Sanjaya Belatthiputta)

  • समाज सुधार: संशयवादी। "न तो है, न नहीं है" सिद्धांत से वाद-विवाद से ऊपर उठने को कहा। जाति से परे ज्ञान पर बल।
  • बुद्ध से संबंध: बुद्ध के गुरु पद के उम्मीदवार, लेकिन अस्वीकार। बाद में उनके शिष्य बने।
  • प्रभाव: धार्मिक कट्टरता का विरोध।

5. पुराण कस्सप (Purana Kassapa)

  • समाज सुधार: नैतिकता-रहित (अमोरलिस्ट)। हिंसा, चोरी आदि को पाप न मानना। सामाजिक नियमों को चुनौती।
  • बुद्ध से संबंध: बुद्ध के विरोधी विचारक।
  • प्रभाव: वैदिक नैतिकता पर प्रश्नचिह्न।

बुद्ध के सुधारों की तुलना

चिंतक मुख्य विचार समाज सुधार का फोकस बुद्ध से समानता/अंतर
महावीर अहिंसा, तपस्या जाति निषेध, स्त्री मुक्ति समान: अहिंसा; अंतर: अतितपस्या
गोसाल नियतिवाद भाग्य से समानता अंतर: कर्म निषेध
अजित भौतिकवाद कर्मकांड विरोध समान: तर्क; अंतर: नास्तिकता
संजय संशयवाद धार्मिक कट्टरता विरोध समान: मध्यम मार्ग

ऐतिहासिक संदर्भ

  • स्रोत: बौद्ध ग्रंथ (दीघ निकाय), जैन आगम। ये "षड्दर्शन" या षट् दर्शन के रूप में जाने जाते थे।
  • सामाजिक पृष्ठभूमि: वैदिक यज्ञ, बलि और ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ विद्रोह। क्षत्रिय वर्ग (बुद्ध, महावीर) ने नेतृत्व किया।
  • प्रभाव: इनसे शाक्य गणराज्य में लोकतांत्रिक बहस बढ़ी, जो बौद्ध संघ की नींव बनी।

ये चिंतक बुद्ध के "मध्यम मार्ग" को चुनौती देकर बौद्ध दर्शन को परिष्कृत करने में सहायक हुए। अधिक विवरण के लिए विशिष्ट नाम बताएं!

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महात्मा बुद्ध, 

जिनका जन्म सिद्धार्थ गौतम के नाम से हुआ था, भारतीय और वैश्विक इतिहास के महानतम धार्मिक और दार्शनिक व्यक्तित्वों में से एक माने जाते हैं। उनका जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में हुआ था। सिद्धार्थ गौतम ने महात्मा बुद्ध के रूप में एक नई शिक्षा, दर्शन और जीवन शैली प्रस्तुत की, जो आज भी हमारे जीवन को दिशा देने के रूप में प्रासंगिक बनी हुई है। उन्होंने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण हिस्से को दुख और उसके समाधान की खोज में बिताया। उनके द्वारा दिए गए उपदेश न केवल धार्मिक संदर्भ में महत्वपूर्ण थे, बल्कि मानवता, नैतिकता, मानसिक शांति, और व्यक्तिगत जीवन के सुधार के लिए भी वे मार्गदर्शन प्रदान करते थे। महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ जीवन के दु:खों और समस्याओं का विश्लेषण करती हैं और उनके समाधान के लिए एक तर्कपूर्ण और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। उनके द्वारा प्रकट किए गए सिद्धांत, जैसे- 'चार आर्य सत्य', 'मध्य मार्ग' और 'आष्टांगिक मार्ग', जीवन को सही दिशा में चलने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। उन्होंने यह समझाया कि जीवन में सुख और दुख का अनुभव हमारी मानसिक स्थिति, हमारी इच्छाओं, और हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
आज के आधुनिक समाज में महात्मा बुद्ध की शिक्षा की प्रासंगिकता अत्यधिक महत्वपूर्ण है। वैश्विक स्तर पर मानसिक तनाव, सामाजिक असमानताएँ, हिंसा, और पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दे विकराल रूप ले चुके हैं। ऐसे में बुद्ध की शिक्षा एक स्थिर और शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक दिशा प्रदान करती है। उनके द्वारा दिए गए सूत्र, जैसे 'मध्य मार्ग' और 'आष्टांगिक मार्ग', आज के समाज में व्यक्तिगत शांति और सामाजिक समरसता की दिशा में मार्गदर्शन कर रहे हैं।
इस शोधपत्र में महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का गहन विश्लेषण किया जाएगा और यह देखा जाएगा कि उनके सिद्धांत, आज के समाज में क्यों इतने प्रासंगिक हैं। उनके दर्शन की न केवल धार्मिक बल्कि मानसिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्व है।
महात्मा बुद्ध की शिक्षा
महात्मा बुद्ध की शिक्षा जीवन के वास्तविक स्वरूप और दुखों के समाधान से संबंधित थी। उनका जीवन एक गहरी खोज का परिणाम था, जिसमें उन्होंने संसार के दुखों को समझने का प्रयास किया और उन दुखों के समाधान के लिए एक स्पष्ट मार्ग प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य जीवन के अस्तित्व को समझना और उसे सही दिशा में बदलने का था। बुद्ध ने अपनी शिक्षा के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि दुख एक अवश्यम्भावी हिस्सा है, लेकिन उस दुख को समाप्त करने का मार्ग भी उपलब्ध है। महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन में विभिन्न सिद्धांतों और मार्गों को प्रस्तुत किया, जो न केवल उस समय के समाज के लिए महत्वपूर्ण थे, बल्कि आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। निम्नलिखित में उनके द्वारा प्रस्तुत मुख्य शिक्षाएँ और सिद्धांत दिए गए हैं:
1. चार आर्य सत्य
महात्मा बुद्ध ने जीवन के दुखों को समझने के लिए चार आर्य सत्य प्रस्तुत किए, जो उनके समग्र दर्शन का आधार हैं:
• दुःख (दुख का अस्तित्व): महात्मा बुद्ध ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि जीवन में दुख अवश्यम्भावी है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु के रूप में दुखों का सामना करना पड़ता है। यह दुख जीवन का हिस्सा है और इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है।
• दुःख का कारण (दुख का कारण): बुद्ध के अनुसार, दुख का मुख्य कारण तृष्णा (इच्छा) और लालसा है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करता है, तो वह दुख का सामना करता है। तृष्णा और मानसिक संलग्नता ही असंतोष और दुःख का कारण बनती हैं।
• दुःख का निवारण (दुख का समाप्ति): बुद्ध ने बताया कि दुख का निवारण संभव है, और यह केवल तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं और तृष्णा पर नियंत्रण प्राप्त करे। यह केवल मानसिक शांति और आत्मनिर्भरता के माध्यम से ही संभव है।
• दुःख का निवारण का मार्ग (निवारण मार्ग): बुद्ध ने बताया कि दुख के निवारण का मार्ग आष्टांगिक मार्ग है, जो जीवन को सही दिशा में मोड़ने का एक स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करता है। आष्टांगिक मार्ग में आठ ऐसे उपाय हैं, जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण रूप से सुधार सकता है।
2. आष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path)
आष्टांगिक मार्ग वह मार्ग है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सुधार सकता है और दुखों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यह मार्ग विशेष रूप से मानसिक, शारीरिक और नैतिक शुद्धता की ओर प्रेरित करता है। इसमें आठ मुख्य तत्व होते हैं:
• सही दृष्टिकोण (Right View): सही दृष्टिकोण वह है जिसमें व्यक्ति जीवन की वास्तविकता को समझे। उसे यह समझना चाहिए कि दुख वास्तविक है और उसके निवारण के उपाय भी उपलब्ध हैं। सही दृष्टिकोण जीवन को सही तरीके से देखने की क्षमता प्रदान करता है।
• सही इरादा (Right Intention): सही इरादा वह है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं और सोच को नियंत्रित करता है। यह इरादा सच्चाई, शांति और करुणा से भरा होना चाहिए।
• सही वाणी (Right Speech): सही वाणी का मतलब है अपने शब्दों में सच्चाई और अहिंसा का पालन करना। व्यक्ति को दूसरों के प्रति दयालु और सकारात्मक विचारों को व्यक्त करना चाहिए।
• सही कर्म (Right Action): सही कर्म वह है जो समाज और अन्य लोगों के प्रति दयालुता, सच्चाई और न्याय का पालन करता है। यह कर्म न केवल बाहरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आत्म-प्रेरणा और आत्म-विश्वास के लिए भी आवश्यक है।
• सही आजीविका (Right Livelihood): सही आजीविका का अर्थ है, व्यक्ति का ऐसा पेशा या कार्य करना, जो नैतिक, सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि से सही हो। ऐसा कार्य न केवल व्यक्ति के आत्मनिर्भरता को बढ़ाता है, बल्कि समाज के लिए भी लाभकारी होता है।
• सही प्रयास (Right Effort): सही प्रयास का मतलब है अपने जीवन में सुधार लाने के लिए लगातार प्रयास करना। व्यक्ति को अपने दिमाग और शारीरिक क्रियाओं में सही कार्य करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।
• सही स्मृति (Right Mindfulness): सही स्मृति का मतलब है मानसिक शांति और ध्यान की अवस्था को बनाए रखना। व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और कार्यों पर पूर्ण ध्यान देना चाहिए और किसी भी प्रकार के मानसिक विकारों से बचने की कोशिश करनी चाहिए।
• सही समाधि (Right Concentration): सही समाधि का अर्थ है, ध्यान और मानसिक एकाग्रता की स्थिति को प्राप्त करना। यह स्थिति व्यक्ति को मानसिक शांति और आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करती है।
आज के समाज में महात्मा बुद्ध की शिक्षा की प्रासंगिकता
महात्मा बुद्ध की शिक्षा का आज के समाज में बहुत महत्व है। कई सामाजिक, मानसिक, और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान बुद्ध की शिक्षाओं में निहित है। निम्नलिखित बिंदुओं में महात्मा बुद्ध की शिक्षा की आज के समाज में प्रासंगिकता पर विचार किया गया है:
1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: आज के तेज़-तर्रार और तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति की आवश्यकता अत्यधिक बढ़ गई है। मानसिक समस्याएँ, जैसे- अवसाद, चिंता, और तनाव, आजकल आम समस्या बन चुकी हैं। महात्मा बुद्ध की शिक्षा, विशेषकर ध्यान और आष्टांगिक मार्ग, मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए कारगर हैं। 'सही ध्यान' और 'सही समाधि' के सिद्धांतों के माध्यम से व्यक्ति अपनी मानसिक स्थिति को नियंत्रित कर सकता है, जो आज के समाज के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है।
2. अहिंसा और शांति का संदेश: बुद्ध ने हमेशा अहिंसा और शांति का संदेश दिया। आज के समय में जहां हिंसा, आतंकवाद और सामाजिक संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं, महात्मा बुद्ध का अहिंसा का संदेश अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया है। अगर हम बुद्ध की शिक्षाओं को अपनाएं, तो हम अपनी और दूसरों की खुशी के लिए अहिंसा और शांति को अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।
3. समाज में समानता और तात्त्विक दृष्टिकोण: बुद्ध ने समाज में समानता की बात की। आज के समाज में जातिवाद, लिंगभेद, और सामाजिक असमानताएँ एक बड़ी समस्या बन चुकी हैं। बुद्ध ने यह सिखाया कि सभी प्राणियों में समानता होनी चाहिए। उनके विचारों से प्रेरित होकर हम समाज में समानता और भ्रातृत्व का संदेश फैला सकते हैं।
4. आध्यात्मिक उन्नति और व्यक्तिगत जीवन: महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन हमें आत्मनियंत्रण, आत्ममूल्यांकन, और व्यक्तिगत उन्नति की दिशा में मार्गदर्शन करता है। आजकल, जहां भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रभुत्व है, वहां बुद्ध की आध्यात्मिक दृष्टि हमें आंतरिक शांति और संतुष्टि प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
5. वर्तमान आर्थिक और पर्यावरणीय संकट में बुद्ध की शिक्षा की प्रासंगिकता: आज के समाज में जहाँ तेजी से बढ़ते उपभोक्तावाद और पर्यावरणीय संकट ने समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं, महात्मा बुद्ध का दृष्टिकोण, विशेषकर 'मध्यम मार्ग' और 'सत्य' का पालन, हमें संयमित और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। उनका उपदेश यह सिखाता है कि भौतिक संपत्ति की अधिकता से आत्मसंतुष्टि नहीं मिलती। आर्थिक संकट और पर्यावरणीय संकट के समाधान में उनका दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी हो सकता है। बुद्ध की शिक्षा हमें यह याद दिलाती है कि आंतरिक शांति और संतोष बाहरी संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण है।
6. विकसित समाज में जीवन की उद्देश्य और दिशा: आज के समाज में लोग अक्सर अपने जीवन के उद्देश्य और दिशा से भ्रमित हो जाते हैं। वे भौतिक लक्ष्यों का पीछा करते हुए आंतरिक शांति और वास्तविक सुख को भूल जाते हैं। महात्मा बुद्ध की शिक्षा, विशेषकर चार आर्य सत्य और आष्टांगिक मार्ग, जीवन में सही उद्देश्य की दिशा निर्धारित करने में मदद करती है। ये सिद्धांत हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानने और उस दिशा में निरंतर प्रयास करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हम एक संतुलित और शांति से भरा जीवन जी सकें।
7. समाज में सहिष्णुता और मानवता का बढ़ावा: बुद्ध ने सहिष्णुता और प्रेम का संदेश दिया था। उनका यह उपदेश आज के समाज में बहुत महत्वपूर्ण है, जहाँ विभिन्न धार्मिक, जातीय, और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण तनाव और हिंसा बढ़ रही है। बुद्ध की शिक्षा यह सिखाती है कि हर व्यक्ति को प्रेम और सहिष्णुता के साथ देखा जाना चाहिए। उनके विचारों को अपनाकर हम समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद एकता और शांति को बढ़ावा दे सकते हैं।
8. सतत विकास और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: महात्मा बुद्ध की शिक्षा में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी को समझकर जीवन जीना चाहिए। यह दृष्टिकोण आज के आधुनिक समाज के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ हर व्यक्ति को अपनी भूमिका और उत्तरदायित्व का एहसास होना चाहिए। बुद्ध का यह उपदेश हमें अपने कार्यों और उनके परिणामों के प्रति सचेत और जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित करता है।
महात्मा बुद्ध की शिक्षा न केवल व्यक्ति के मानसिक और आत्मिक कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज के शांति और समृद्धि के लिए भी आवश्यक है। आज के समाज में जहां कई समस्याएँ उत्पन्न हो चुकी हैं, बुद्ध की शिक्षाएँ एक स्थिर, शांतिपूर्ण और नैतिक जीवन जीने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। उनके सिद्धांतों का पालन करके हम अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ समाज में भी सुधार ला सकते हैं, जो अंततः एक बेहतर और अधिक न्यायपूर्ण दुनिया की स्थापना में सहायक होगा।
निष्कर्ष
महात्मा बुद्ध की शिक्षा न केवल अतीत के लिए, बल्कि आज के समय में भी अत्यधिक प्रासंगिक और आवश्यक है। उनका जीवन दर्शन, जिसमें शांति, समरसता, और सम्यक दृष्टिकोण का समावेश है, आज के समाज की जटिल समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। बुद्ध ने जीवन के दुखों की वास्तविकता को स्वीकार किया और उसके समाधान के लिए एक मार्गदर्शन प्रस्तुत किया, जिसे यदि हम अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हम न केवल आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी ला सकते हैं। बुद्ध की शिक्षा में जो सर्वश्रेष्ठ योगदान है, वह है उनकी अहिंसा, शांति, और समानता की अवधारणा। आज के समाज में जहां हिंसा, असमानता, और मानसिक तनाव एक आम समस्या बन चुकी हैं, उनके विचार हमें एक शांतिपूर्ण और स्थिर समाज की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने समाज में हर व्यक्ति को समान अधिकार देने की बात की, जो आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है, खासकर तब जब हम जातिवाद, लिंगभेद, और अन्य सामाजिक असमानताओं का सामना कर रहे हैं।
महात्मा बुद्ध की शिक्षा, विशेषकर उनके 'मध्यम मार्ग' और 'चार आर्य सत्य' की अवधारणा, आज भी लोगों को आंतरिक शांति, आत्मनियंत्रण और मानसिक संतुलन की ओर प्रेरित करती है। आष्टांगिक मार्ग के आठ सिद्धांत—सही दृष्टिकोण, सही वाणी, सही कर्म, और अन्य—हमें व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी एक स्थिर और समर्पित दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
साथ ही, पर्यावरणीय संकटों के संदर्भ में भी बुद्ध की शिक्षा की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। उनके जीवन का सिद्धांत था कि व्यक्ति और पर्यावरण का संबंध सामंजस्यपूर्ण होना चाहिए। अगर हम बुद्ध के पर्यावरणीय दृष्टिकोण को अपनाते हैं, तो हम न केवल मानसिक शांति की प्राप्ति कर सकते हैं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से प्रकृति की रक्षा भी कर सकते हैं।
अंततः, महात्मा बुद्ध की शिक्षा न केवल आत्म-निर्भरता और मानसिक शांति का मार्ग दिखाती है, बल्कि यह हमें एक ऐसे समाज की ओर भी प्रेरित करती है, जिसमें समानता, शांति, और मानवता का सर्वोच्च सम्मान हो। उनके विचार आज के समाज की समस्याओं का हल प्रस्तुत करते हैं और उनकी शिक्षाएँ हमें एक बेहतर और अधिक समर्पित जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन करती हैं। अतः, महात्मा बुद्ध की शिक्षा का पालन करना न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए, बल्कि सम्पूर्ण समाज और संसार के लिए आवश्यक है, ताकि हम एक ऐसा समाज बना सकें, जिसमें शांति, समरसता और नैतिकता की प्रधानता हो।
संदर्भ सूची
1. राहुल, वालपोल. What the Buddha Taught. ग्रोव प्रेस, 1974।
2. स्मिथ, हस्टन. The World's Religions: Our Great Wisdom Traditions. हार्परवन, 1991।
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5. ठिक नाथ हाँ, The Heart of the Buddha's Teaching. बेरट एंड कोंपनी, 1999।
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1. वालपोल, राहुल. What the Buddha Taught. ग्रोव प्रेस, 1974, पृ. 45-67।
2. स्मिथ, हस्टन. The World's Religions: Our Great Wisdom Traditions. हार्परवन, 1991, पृ. 123-138।
3. गेतिन, रूपर्ट. The Foundations of Buddhism. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1998, पृ. 112-134।
4. बुद्ध, गौतम. The Dhammapada: The Sayings of the Buddha. अनुवाद: एकनाथ ईस्वरण, निलगिरी प्रेस, 1985, पृ. 55-78।
5. ठिक नाथ हाँ, The Heart of the Buddha's Teaching. बेरट एंड कोंपनी, 1999, पृ. 110-130।
6. सार, उधम. Buddhism in the Modern World: Adaptations of an Ancient Tradition. पियर्सन, 2013, पृ. 201-224।
7. जोनसन, एलन. The Buddha and His Teachings. मकेल, 1997, पृ. 68-85।
8. चोपड़ा, दीपक. The Way of the Buddha: A Journey to Enlightenment. हॉपफुल पब्लिशर्स, 2005, पृ. 90-112।
Keywords: .

Author(s): Bharat Singh Gocher

Publication #: 2504008

Date of Publication: 02.04.2025

Country: india

Pages: 1-5

Published In: Volume 11 Issue 2 April-2025

Abstract


शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

श्रद्धांजलि सभा (अजय कुमार यादव 'बजरंगी')

जो 6 फरवरी 2026 को हमसब को छोड़कर चले गये :
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
जिस परिवार का सदस्य होने के नाते अपने सामने जिनको खोते हुए देखा है उनमें दादी पिताजी छोटा भाई और फिर उससे छोटा भाई उनसे पहले उनकी पत्नी। यह भी अजीब विडंबना है की परिवार में परिवार की जिस गरिमा और मर्यादा को इन लोगों ने उच्च स्थान दिया था उन्हीं लोगों ने उसे तोड़ डाला। 

प्रेमचंद जी ने अपनी बहुत सारी कहानियों में ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है इससे साबित होता है कि यह सब कुछ एक दिन का नहीं है हमेशा होता आया है।यह कथन कि "घटनाएं एक दिन की नहीं, हमेशा से होती आई हैं," ऐतिहासिक और सामाजिक निरंतरता को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि कुप्रथाएं, संघर्ष, या मानवीय व्यवहार, जैसे कि भेदभाव या प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना, अचानक नहीं पैदा होते, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जो व्यवस्थागत समस्याओं की ओर इशारा करते हैं। ऐतिहासिक निरंतरता: किसी भी समस्या या घटना को एकाएक नहीं, बल्कि लंबे समय की सामाजिक संरचनाओं के परिणाम के रूप में देखा जाता है।उदाहरण: सामाजिक मुद्दों, जैसे कि भेदभाव या किसी एक समुदाय के खिलाफ अत्याचार, यह बताते हैं कि यह कोई नई बात नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। प्रतिकूलता: जैसे कि बाढ़ के दौरान लोगों को ज़रूरी चीज़ें जुटाने के लिए मजबूर होना, या व्यक्तिगत जीवन में सफलता प्राप्त करने में कई प्रयास करना पड़ना, ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि यह सब हमेशा से ही होता आया है।  यह विचारधारा इस बात पर जोर देती है कि जब हम किसी विशिष्ट घटना पर बात करते हैं, तो हमें उस पूरी प्रक्रियाको समझना चाहिए जो उस घटना के लिए जिम्मेदार है ।


अजय कुमार यादव 'बजरंगी'
का आकस्मिक निधन 6 फरवरी 2026 को सायंकाल लगभग सात आठ बजे साम हो गया। यह खबर हमें शाम 8.30 बजे पूजा के फोन से पता चला आज सुबह ही मैं जौनपुर से ट्रेन से गाज़ियाबाद आया था। अब यह समय ऐसा था जो किसी भी तरह से ट्रेन जहाज से जाना संभव नहीं था इसलिए तय हुआ की अपनी कार से रात ही निकल लेते हैं। 
मैं पत्नी और संदीप संतोष रात में 10 बजे निकलकर सुबह साढ़े सात बजे गाव पहुँच गया अब घर पर अंतिम संस्कार के लिए तैयारी शुरू हो गयी लगभग एक घंटे में घर से निकलकर रामघाट के लिए निकल लिए बहार सड़क तक हमलोग आये और बहुत सारे लोग आये जिनमे श्री अजय यादव डिम्पल गावं के गेट पर आ गए वह हमारे साथ घाट तक साथ रहे। 
बचपन :
अजय कुमार यादव (बजरंगी ) 0 1 जनवरी 1965 डॉ रमापति और श्रीमती मत्ती के तीसरे पुत्र के रूप में को इनका जन्म हुआ जबकि (यह चौथे पुत्र थे ) 1. डॉ.लाल रत्नाकर (लाल साहब)  2 . राय साहब (बचपन में ही इनका निधन हो गया ) 3 .अशोक कुमार यादव (गुलाब ) (अल्प आयु की अवधि में सड़क दुर्घटना में इनका निधन जब यह जौनपुर में राजकीय बालिका विद्यालय में प्राध्यापक थे उस समय हो गया था। 
शिक्षा :
अजय कुमार यादव (बजरंगी ) की शिक्षा इंटरमीडिएट के बाद बी ए में प्रवेश लिए लेकिन पढ़ाई आगे नहीं किये वह अब बड़े हो गए थे इनकी रूचि सामाजिक एवं कृषि कार्यों में पिता जी के साथ सहयोगी के रूप में बढ़ी फिर यह मुंबई गए और वहां कुछ रिश्तेदारों के साथ ड्राइवर के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। 
कैरियर :
यह मुंबई गए और वहां कुछ रिश्तेदारों के साथ ड्राइवर के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। तत्कालीन परिस्थितियों में यह एक अच्छे ड्राइवर हो गए थे। हालांकि यह बात हमेशा कष्टकारी रहेगी की यह अपने इस उद्यम के साथ परिवार में मझोले चचा के संपर्क और उनको महत्त्व देते रहे तथा उनके जल में फास गए जो समय समय पर बम्बई जाते रहे रहे और आर्थिक शोषण करते रहे ऐसा उनके आचरण और बेईमानी के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। 
यह यही वक़्त था जब इनके साथी अपनी ट्रकें खरीद रहे थे और व्यवसाय को खड़ा कर रहे थे लेकिन यह उसी चाचा के हाथ की कठपुतली की तरह लूट और बर्वाद हो रहे थे। 
कैरियर में बदलाव :
यह यही वक़्त था जब इनके साथी अपनी ट्रकें खरीद रहे थे और व्यवसाय को खड़ा कर रहे थे लेकिन यह उसी चाचा के हाथ की कठपुतली की तरह लूट और बर्वाद हो रहे थे। यही कारण था की इनका इस क्षेत्र में मन उचट रहा था धीरे धीरे यह गांव की और मुखातिब हुए मुझे एक घटना याद है तब मैं गाजियाबाद के कालेज में पहुँच गया और एक आवास ले रहा था जिसके लिए चचा को आर्थिक सहयोग के लिए आग्रह किया तब उन्होंने इनके साथ फोन पर यह राय दिए की वहां घर लेने की क्या जरुरत है कौन आर्थिक सहयोग करता यह उलटे उनकी हाँ में हाँ मिलते हुए बहुत ही निराश किये। 
और उसके पैसे से यहाँ ऊंट पटांग निर्माण के नाम पर लूट रहे थे। 



गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार



















ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार  के बारे में :
"**ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार**" यह वाक्यांश मुख्य रूप से सामाजिक-राजनीतिक और विरोधी विमर्श में इस्तेमाल होता है, खासकर उन लोगों द्वारा जो ब्राह्मणवाद को जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम, मनुवाद और सामाजिक असमानता का मूल कारण मानते हैं।

यह एक प्रतीकात्मक/व्यंग्यात्मक/उत्तेजक नारा है, जिसका मतलब होता है कि ब्राह्मणवाद (जिसे वे शोषणकारी व्यवस्था मानते हैं) को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए, जैसे किसी मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार (दाह-संस्कार) कर दिया जाता है। यह विचार **डॉ. भीमराव अंबेडकर** के लेखन से प्रेरित माना जाता है, जहां उन्होंने ब्राह्मणवाद को खत्म करने की बात कही थी (हालांकि ठीक ये शब्द उनके मूल में नहीं मिलते, लेकिन उनका सार यही था कि ब्राह्मणवाद को जड़ से मिटाना चाहिए)।

आजकल सोशल मीडिया (फेसबुक, X / ट्विटर, इंस्टाग्राम) पर यह वाक्य बहुत इस्तेमाल होता है, जैसे:
- "ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार निश्चित है"
- "ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार कर दो"
- बहुजन/दलित-बहुजन आंदोलनों में यह एक आम स्लोगन बन गया है, जो जातिवाद विरोध को व्यक्त करता है।

कुछ लोग इसे ब्राह्मणों के खिलाफ घृणा फैलाने वाला बताते हैं, जबकि इस्तेमाल करने वाले इसे **व्यवस्था** (ideology) के खिलाफ मानते हैं, न कि व्यक्तिगत ब्राह्मणों के।

अगर आपका मतलब हिंदू धर्म के पारंपरिक **अंतिम संस्कार** (अंत्येष्टि) से है, जिसमें ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका होती है (जैसे तेरहवीं पर ब्राह्मण भोज, पिंडदान आदि), तो वो अलग विषय है। लेकिन आपका प्रश्न "ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार" से लगता है कि आप इसी राजनीतिक/विरोधी संदर्भ की बात कर रहे हैं।
अगर आप किसी खास किताब, नेता या घटना के संदर्भ में पूछ रहे हैं, तो और डिटेल बताएं तो बेहतर समझा सकूंगा।

**डॉ. भीमराव आंबेडकर के ब्राह्मणवाद विरोधी विचार**  
बहुत स्पष्ट, गहरे और व्यवस्थित रूप से लिखे गए विचार

डॉ. आंबेडकर **ब्राह्मणवाद** को **भारतीय समाज की सबसे बड़ी बीमारी** मानते थे।  
उनका कहना था कि **ब्राह्मणवाद** और **व्यक्तिगत ब्राह्मण** में बहुत बड़ा फर्क है।

### सबसे महत्वपूर्ण उद्धरण — ब्राह्मणवाद की परिभाषा

**"ब्राह्मणवाद से मेरा अभिप्राय स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के इन्कार से है।**  
 उस अर्थ में यह सभी वर्गों में मौजूद है, सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है,  
**हालांकि ब्राह्मण ही इसका जनक हैं।"**  
— डॉ. आंबेडकर  
(मजदूर वर्ग के सामने दो दुश्मन — ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद)

### डॉ. आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद को बार-बार किस रूप में देखा?

| क्र.सं. | विचार / उद्धरण | किताब/संदर्भ | मुख्य बात |
|--------|-----------------|---------------|-----------|
| 1      | ब्राह्मणवाद = **स्वतंत्रता, समानता, बंधुता का निषेध** | कई जगह (सबसे प्रसिद्ध) | ब्राह्मणवाद विचारधारा है, जाति/व्यक्ति नहीं |
| 2      | **"मैं ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं हूँ, मैं ब्राह्मणवाद के खिलाफ हूँ"** | 1 जुलाई 1927, महाड सत्याग्रह के समय | बहुत बार दोहराया |
| 3      | **भारतीय इतिहास = बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच घातक संघर्ष** | Revolution & Counter-Revolution in Ancient India | पूरा प्राचीन इतिहास इसी द्वंद्व से समझा जा सकता है |
| 4      | अगर **हिंदू राज** बना तो देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा | पाकिस्तान या भारत का विभाजन (1940) | क्योंकि यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था को स्थापित करेगा |
| 5      | **ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदला** — यह सबसे बड़ा स्वार्थपूर्ण कार्य था | प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति | जन्म आधारित श्रेष्ठता को स्थायी करना |
| 6      | **मनुस्मृति = ब्राह्मणवाद का प्रतिक्रांति का गॉस्पेल (सुसमाचार)** | Riddles in Hinduism + अन्य | सबसे घातक कानून संहिता |
| 7      | ब्राह्मणवाद ने **शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों** को सदियों तक नारकीय जीवन दिया | कई लेखन | मुख्य शिकार यही तीन वर्ग रहे |

### आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद को कहाँ-कहाँ सबसे ज्यादा खतरनाक बताया?

1. **जाति व्यवस्था का जनक और संरक्षक**
2. **लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन**  
   (क्योंकि लोकतंत्र की नींव = स्वतंत्रता, समानता, बंधुता)
3. **मजदूर वर्ग का सबसे बड़ा शत्रु** (पूंजीवाद के साथ)
4. **महिलाओं के दमन का मूल स्रोत**
5. **बौद्ध क्रांति को कुचलने वाली प्रतिक्रांति**

### बहुत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जो अक्सर भुला दिया जाता है

डॉ. आंबेडकर बार-बार कहते थे:

> **"मेरी लड़ाई ब्राह्मण से नहीं, ब्राह्मणवाद से है।"**  
> **"ब्राह्मण कितना भी उदार हो जाए, वह ब्राह्मणवाद नहीं छोड़ेगा।"**  
> (क्योंकि यह उसकी विचारधारा, पहचान और विशेषाधिकार का आधार है)

### सारांश में डॉ. आंबेडकर का मुख्य संदेश

- ब्राह्मणवाद **एक विचारधारा** है  
- यह **जन्म-आधारित श्रेष्ठता**, **असमानता**, **अछूतपन** और **स्त्री-दमन** की विचारधारा है  
- यह **किसी एक जाति तक सीमित नहीं** — कई गैर-ब्राह्मण भी इसे अपनाए हुए हैं  
- लेकिन **ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण ही इसके मूल जनक और सबसे बड़े संरक्षक** रहे हैं  
- **इसका अंतिम नाश** ही भारत में सच्ची स्वतंत्रता, समानता और बंधुता ला सकता है

यही कारण है कि आज भी **"ब्राह्मणवाद का अंतिम संस्कार"** जैसा नारा बहुजन आंदोलन में बहुत प्रचलित है।

आपको किसी विशेष किताब/उद्धरण/घटना के बारे में और विस्तार से जानना है तो जरूर बताइए।


**पेरियार (ई.वी. रामासामी नायकर) के विचार**  
पेरियार (17 सितंबर 1879 – 24 दिसंबर 1973) दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु) के सबसे बड़े **क्रांतिकारी समाज सुधारक**, **तर्कवादी**, **नास्तिक** और **ब्राह्मणवाद विरोधी** नेता थे। उन्हें **"द्रविड़ आंदोलन का पिता"**, **"आत्म-सम्मान आंदोलन के संस्थापक"** और **"दक्षिण एशिया का सुकरात"** (यूनेस्को द्वारा) कहा जाता है।

उनके विचार मुख्य रूप से **जाति उन्मूलन**, **ब्राह्मणवाद का विरोध**, **महिला अधिकार**, **तर्कवाद/नास्तिकता**, **द्रविड़ अस्मिता** और **समाज में समानता** पर केंद्रित थे।

### पेरियार के मुख्य विचार और सिद्धांत (तालिका में सारांश)

| क्र.सं. | मुख्य विचार/क्षेत्र                  | पेरियार का मूल संदेश                                                                 | प्रभाव/उद्देश्य |
|--------|-------------------------------------|-------------------------------------------------------------------------------------|-----------------|
| 1      | **ब्राह्मणवाद विरोध**              | ब्राह्मणवाद = जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम, आर्य श्रेष्ठता और असमानता की विचारधारा। यह हिंदू धर्म का मूल है। | ब्राह्मणवाद का अंत = सच्ची समानता की शुरुआत। व्यक्तिगत ब्राह्मणों से नहीं, विचारधारा से विरोध। |
| 2      | **जाति व्यवस्था का घोर विरोध**      | जाति = ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई शोषण की व्यवस्था। शूद्र और दलित मूल निवासी (द्रविड़) हैं, आर्य आक्रमणकारी। | जाति उन्मूलन के बिना कोई सुधार संभव नहीं। |
| 3      | **नास्तिकता और तर्कवाद**            | ईश्वर, धर्म, शास्त्र, पुराण, देवी-देवता सब झूठ और शोषण के साधन। "ईश्वर नहीं है, नहीं है!" | अंधविश्वास, कर्मकांड, मूर्तिपूजा का बहिष्कार। विज्ञान और तर्क को अपनाओ। |
| 4      | **आत्म-सम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement)** | 1925 में शुरू। उद्देश्य: गैर-ब्राह्मणों (द्रविड़) में आत्म-सम्मान जगाना, ब्राह्मण पुरोहितों से मुक्ति। | सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज (बिना पुरोहित के विवाह), महिलाओं को बराबरी। |
| 5      | **महिला अधिकार और पितृसत्ता विरोध** | महिलाएं पुरुषों के बराबर। बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा दमन का विरोध। | महिलाओं को संपत्ति, तलाक, शिक्षा का अधिकार। पितृसत्ता = ब्राह्मणवाद का हिस्सा। |
| 6      | **द्रविड़ अस्मिता और आर्य विरोध**   | द्रविड़ (तमिल/दक्षिण भारतीय) मूल निवासी, आर्य (उत्तर भारतीय ब्राह्मण) आक्रमणकारी। | द्रविड़ नाडु (अलग देश) की मांग, हिंदी विरोध। |
| 7      | **हिंदू धर्म/ग्रंथों का विरोध**     | मनुस्मृति, रामायण, गीता आदि शोषणकारी। राम को ब्राह्मणों का नायक माना, रावण को द्रविड़ नायक। | हिंदू ग्रंथ जलाए, मूर्तियां तोड़ीं (प्रतीकात्मक विरोध)। |

### पेरियार के कुछ प्रसिद्ध उद्धरण (मुख्य ब्राह्मणवाद विरोधी)

- "मैं ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं, ब्राह्मणवाद के खिलाफ हूँ।" (ब्राह्मणवाद = विचारधारा, व्यक्ति नहीं)
- "मैंने सब कुछ किया। मैंने गणेश आदि सभी ब्राह्मण देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ डालीं। राम आदि की तस्वीरें भी जला दीं।"
- "दुनिया के सभी संगठित धर्मों से मुझे सख्त नफरत है।"
- "शास्त्र, पुराण और उनमें दर्ज देवी-देवताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है, क्योंकि वो सारे के सारे दोषी हैं। मैं जनता से उन्हें जलाने तथा नष्ट करने की अपील करता हूं।"
- "द्रविड़ कड़गम आंदोलन का केवल एक ही निशाना है: आर्य ब्राह्मणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना।"
- "ईश्वर की सत्ता स्वीकारने में किसी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ़ विश्वास की जरूरत पड़ती है।"


### पेरियार की विरासत आज
- तमिलनाडु में **DMK**, **AIADMK** जैसी पार्टियां उनके विचारों से प्रभावित।
- बहुजन/दलित आंदोलनों में "जय भीम जय पेरियार" का नारा आम।
- उनके विचार आज भी **जातिवाद**, **हिंदुत्व**, **पितृसत्ता** के खिलाफ सबसे तेज हथियार माने जाते हैं।
- विवाद: कुछ लोग उन्हें ब्राह्मण-विरोधी (anti-Brahmin) कहते हैं, लेकिन वे बार-बार स्पष्ट करते थे कि विरोध **ब्राह्मणवाद** (ideology) का है, न कि व्यक्तिगत ब्राह्मणों का।

पेरियार का मूल संदेश: **समाज में कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई ईश्वर नहीं, कोई शास्त्र नहीं — सिर्फ इंसान और इंसानियत**।

अगर आप उनके किसी खास विचार (जैसे महिला अधिकार, द्रविड़ नाडु, या कोई उद्धरण) पर और गहराई से जानना चाहें, तो बताइए!

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