सोमवार, 4 मई 2026

अर्जक आंदोलन

 

रामस्वरूप वर्मा और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मानवतावाद की मशाल बना अर्जक आंदोलन


अर्जक संघ ने तीन बड़े परिवर्तन किए: ब्राह्मणवादी विवाह के स्थान पर अर्जक विवाह, मरने पर होने वाले ब्रह्मभोज के स्थान पर शोक सभा का विकल्प दिया और ब्राह्मणवादी तीज-त्यौहारों के स्थान पर 11 प्रमुख पर्व मनाने पर जोर दिया। ये पर्व हैं: गणतन्त्र दिवस- 26 जनवरी, उल्लास दिवस-1 मार्च, चेतना दिवस- 14 अप्रैल, मानवता दिवस- बुद्धजयन्ती, समता दिवस- 1 जून, अर्जक संघ की स्थापना पर, स्वतन्त्रता दिवस- 15 अगस्त, शहीद दिवस- 5 सितम्बर, जगदेव बाबू के शहादत की याद में,  लाभ दिवस- 1 अक्टूबर, फसल आने की खुशी में, एकता दिवस- 13 अक्टूबर पटेल के जन्मदिन पर,  शक्ति दिवस- 25 नवम्बर, जोतिबा फुले के जन्मदिन पर,  विवेक दिवस- 25 दिसम्बर, रामास्वामी नायकर के निधन पर।




उन्नीस सौ पचास और साठ के दशकों में चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की ब्राह्मणवाद-विरोधी वैचारिकी ने हिन्दी क्षेत्र में जो क्रान्तिकारी दस्तक दी, रामस्वरूप वर्मा उसी की उपज थे। रामस्वरूप वर्मा का जन्म 22 अगस्त 1923 को ग्राम गौरीकरन, जिला कानपुर देहात में हुआ। उनके पिता वंश गोपाल किसान थे। उन्होंने 1949 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और बाद में कानून की डिग्री अर्जित की। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा भी उत्तीर्ण की, पर साक्षात्कार में शामिल नहीं हुए। वे सरकारी अधिकारी या वकील बनकर जीवन-यापन करना नहीं चाहते थे, बल्कि वे किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने के लिए राजनीति में आ गए। वे उस समय के सबसे चर्चित और लोकप्रिय समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आए, और उनकी सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। वे कई बार उत्तर प्रदेश विधनसभा के सदस्य निर्वाचित हुए, और एक बार 1967 में उत्तर प्रदेश सरकार में वित्त मन्त्री भी हुए।

इसी काल में, जैसा कि माता प्रसाद ने लिखा है,- ‘आगे चलकर उनकी सोच बनी कि सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं प्राप्त की जा सकती। इसलिए सामाजिक-आर्थिक क्रान्ति के लिए 1 जून 1968 को उन्होंने ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। इससे समाजवादी, सोशलिस्ट पार्टी के ब्राह्मणवादी तत्व उनके विरोधी हो गए। उनकी मांग थी कि वर्माजी या तो अर्जक संघ में रहें या समाजवादी पार्टी में। इसी विरोध के फलस्वरूप उन्हें 1969 के विधनसभा के चुनाव में पार्टी का सिम्बल देने में जानबूझकर विलम्ब किया गया। इसलिए वे निर्दलीय चुनाव लड़कर विधनसभा में आए।

किन्तु बहुजन चिन्तक मुद्राराक्षस के अनुसार, डा. राममनोहर लोहिया के साथ रामस्वरूप वर्मा के गहरे मतभेद हो गए थे, जिसके कारण उन्होंने स्वयं ही पार्टी छोड़ दी थी। ये मतभेद जिन मुद्दों पर हुए थे, उसका वर्णन मुद्राराक्षस ने अपने एक लेख में इस प्रकार किया है-

‘मेरी भेंट, वर्माजी से दिल्ली में डा. राममनोहर लोहिया के गुरुद्वारा रोड स्थित बंगले में एक दोपहर के समय ठीक तब हुई थी, जब वे रामचरितमानस को लेकर डा. लोहिया से बेहद उत्तेजक बहस कर रहे थे। डा. लोहिया की पसन्दीदा किताब थी रामचरितमानस, वे मनुस्मृति को भी उतना ही ज्यादा पसन्द करते थे। मनुस्मृति और रामचरितमानस पर मैं भी उनसे भिड़ चुका था। वे हिन्दुत्व को भी लगभग गांधी के नजरिए से देखते थे। उन्हें हिन्दुओं में कुछ ऐसा तो जरूर दिखता था, जिसमें सुधर-संशोधन किया जाए, लेकिन हिन्दुत्व को खारिज करना उन्हें पसन्द नहीं था, और रामस्वरूप वर्मा भारतीय समाज में क्रान्तिकारी और बुनियादी परिवर्तन के लिए हिन्दुत्व से मुक्ति को जरूरी मानते थे। डा. लोहिया को हिन्दुत्व को खारिज किया जाना कतई पसन्द नहीं था। इन्हीं मुद्दों पर डा. लोहिया का वर्माजी से भारी विवाद हुआ और यही विवाद डा. लोहिया की पार्टी से वर्माजी के अलगाव का कारण बना। वर्माजी इस मुद्दे पर कितने सही थे, दूसरा बड़ा सुबूत यही है कि लोहिया के रिश्ते तत्कालीन जनसंघ से बहुत गहरे हो गए थे। उनके हिन्दुत्व-प्रेम का ही परिणाम था कि उन्होंने जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय के संसदीय सीट के लिए हुए चुनाव में उपाध्याय के पक्ष में प्रचार किया था और उनके महत्वपूर्ण साथी जार्ज फर्नाण्डीज जैसे लोग सीधे भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए थे।’

डा. लोहिया के साथ वर्माजी के इन मतभेदों का समर्थन प्रोफेसर जयराम प्रसाद ने भी किया है। वे अपने लेख में लिखते हैं- ‘रामस्वरूप वर्मा कई मायने में डा. लोहिया से भी आगे थे। डा. लोहिया पंच कन्याओें में क्रान्तिकारिता ढूंढ़ रहे थे और तुलसीदास के रामचरितमानस में भी समन्वयवादी भावना ढूंढ़ रहे थे, उससे हटकर वर्माजी ने कहा कि इस समन्वयवाद में आदर्श है, सच्चाई नहीं।’

वस्तुतः अर्जक संघ की स्थापना ही रामस्वरूप वर्मा को डा. लोहिया और उनकी सोशलिस्ट पार्टी की वैचारिकी से अलग करती थी। वर्माजी जिस सांस्कृतिक विप्लव के लिए कार्य करना चाहते थे, वह कार्य सोशलिस्ट पार्टी में रहकर नहीं हो सकता था। असल में ‘अर्जक संघ’ के उद्देश्य राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक थे, और इतने क्रान्तिकारी थे कि उससे लोहिया जैसे समाजवादियों की सहमति नहीं हो सकती थी। भारत में समाजवादी आन्दोलन ब्राह्मणवाद का विरोधी नहीं था। जिस तरह भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन मार्क्स और लेनिन से अनुप्राणित था, उस तरह समाजवादी आन्दोलन उनसे प्रभावित नहीं था। उनके प्रेरणा-स्रोत अन्य लोग भी थे, जिनमें विवेकानन्द और गांधी के साथ-साथ वेद और तुलसीदास भी थे। इसलिए भारत के समाजवादी नेता वर्ग-संघर्ष के खिलाफ थे। शायद यही कारण था कि वे बहुत जल्दी गांधीवाद की ओर अग्रसर भी हो गए थे, जिनमें आचार्य नरेंन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण और डा. राममनोहर लोहिया भी शामिल थे। ‘अर्जक संघ’ के प्रेरणा-स्रोत कार्ल मार्क्स और लेनिन के साथ-साथ ज्योतिबा फुले, डा. आंबेडकर और पेरियार रामास्वामी नायकर जैसे ब्राह्मणवाद-विरोधी नायक भी थे।

महाराज सिंह भारती के शब्दों में ‘अर्जक संघ’ के उद्देश्य ये थे- ‘अर्जक संघ, सबको अपने विचार रखने, कहने, लिखने और बदलने की पूर्ण स्वतन्त्रता है, यह मानकर चलता है। अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत होते हुए भी, अर्जक संघ ईश्वर की भांति आत्मा पर भी कोई बहस नहीं चलाना चाहता। परन्तु पुनर्जन्म को डंके की चोट पर नकारता है, क्योंकि पिछले जन्म को ही लुटेरी हिन्दू संस्कृति ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के द्वारा शोषण का आधार बना रखा है। जब प्रत्येक शोषित अपने पिछले जन्मों के पाप की सजा भोग रहा है, तो वह अपने कष्टों के लिए किसी व्यवस्था या व्यक्ति को कैसे दोषी ठहरा सकता है? पुनर्जन्म लुटेरे हिन्दुओं के हाथ में एक ऐसा हथियार है, जिसके द्वारा लुटेरे दिन-दहाड़े कमेरे हिन्दुओं को लूटते हुए भी कमेरों को उन्हीं की दृष्टि में पिछले जन्म का कार्य बनाकर स्वेच्छा से उनके जीवन को जेलखाने का जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर देता है।’

अर्जक संघ ने तीन बड़े परिवर्तन किए: ब्राह्मणवादी विवाह के स्थान पर अर्जक विवाह, मरने पर होने वाले ब्रह्मभोज के स्थान पर शोक सभा का विकल्प दिया और ब्राह्मणवादी तीज-त्यौहारों के स्थान पर 11 प्रमुख पर्व मनाने पर जोर दिया। ये पर्व हैं: गणतन्त्र दिवस– 26 जनवरी, उल्लास दिवस-1 मार्च, चेतना दिवस– 14 अप्रैल, मानवता दिवस– बुद्धजयन्ती, समता दिवस– 1 जून, अर्जक संघ की स्थापना पर, स्वतन्त्रता दिवस– 15 अगस्त, शहीद दिवस– 5 सितम्बर, जगदेव बाबू के शहादत की याद में,  लाभ दिवस– 1 अक्टूबर, फसल आने की खुशी में, एकता दिवस– 13 अक्टूबर पटेल के जन्मदिन पर,  शक्ति दिवस– 25 नवम्बर, जोतिबा फुले के जन्मदिन पर,  विवेक दिवस– 25 दिसम्बर, रामास्वामी नायकर के निधन पर।

मुद्राराक्षस के अनुसार, वर्माजी पूरी तरह हिन्दुत्व के विरुद्ध अभियान चला रहे थे। उनकी सभा में कोई कंठी पहने, हाथ में रंगीन धगा, कलावा लपेटे या तिलक छाप आदमी उन्हें दिख जाता था, तो वे तुरन्त ललकारते थे कि इन हिन्दू निशानियों को त्याग दो। उनकी सभा में ‘मारेंगे मर जायेंगे, हिन्दू नहीं कहलायेंगे’ का जोरदार नारा लगता था।

सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर वर्मा जी ने 1972 में ‘समाज दल’ का गठन किया। माताप्रसाद के अनुसार- ‘उसी समय बिहार में जगदेव बाबू ने शोषित दल’ का गठन किया था। दोनों नेताओं के सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण समान थे। इसलिए दोनों दलों का राजनीतिक विलय हो गया। पार्टी का नाम  ‘शोषित समाज दल’ हुआ। इसके अध्यक्ष रामस्वरूप वर्मा हुए और महामन्त्री जगदेव बाबू। बाद में समता दल और रिपब्लिकन पार्टी उत्तर प्रदेश का भी इसमें विलय हो गया।’

अर्जक संघ शारीरिक श्रम को उत्तम मानने वाली सभी जातियों का संगठन था। उनके अनुसार, उत्पादन से जुड़ीं जातियां अर्जक और अनुत्पादक जातियां अनर्जक हैं। रामस्वरूप वर्मा ने अपने अर्जक-विचारों को प्रसारित करने के लिए, ‘अर्जक संघ’ के गठन के अगले वर्ष 1 जून 1969 को साप्ताहिक ‘अर्जक’ अखबार का प्रकाशन आरम्भ किया। इस अखबार के माध्यम से उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक जन-युद्ध छेड़ दिया। उस युग के अनेक बहुजन लेखकों को इसने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए मंच उपलब्ध कराया। उनकी विचारधरा ने समतामूलक समाज के निर्माण में क्रान्तिकारी भूमिका निभाई, और यह शीघ्र ही हिन्दी क्षेत्र में लोकप्रिय भी हो गया। रामस्वरूप वर्मा के सभी विचारोत्तेजक लेख ‘अर्जक’ में छपे, जिनका बाद में पुस्तकों के रूप में प्रकाशन हुआ। उनकी अर्जक विचारधरा या अर्जकवाद वास्तव में नवजागरण या ज्ञानोदय था, जो ब्राह्मणों की प्रतिक्रान्ति के युग में एक जरूरी आन्दोलन था।

ब्राह्मणों का पुनर्जागरण वास्तव में मुस्लिम काल में ही शुरु हो गया था, जो ब्रिटिश काल में भी जारी रहा, और आज भी जारी है। भारत में ब्राह्मण लेखकों ने जिसे नवजागरण कहा, वह हिन्दुत्व का ही पुनर्जागरण था। नवजागरण का काम भारत में बहुजन नायकों ने किया, जिन्होंने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में नए मूल्यों का निर्धरण किया। रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के माध्यम से इस ज्ञानोदय को नए तर्कों से आगे बढ़ाया।


अर्जक संघ के प्रस्ताव

अर्जक संघ की उत्तर प्रदेश शाखा के तीन महासम्मेलन हुए। पहला सम्मेलन 1971 में लखनऊ में,  दूसरा 1972 में कानपुर में और तीसरा 1979 में इलाहाबाद में। इन सम्मेलनों में कुल मिलाकर आठ प्रस्ताव पास किए गए थे। ये सभी प्रस्ताव धर्मिक और सांस्कृतिक थे। इनमें चार प्रस्ताव अत्यन्त क्रान्तिकारी थे। पहला यह कि अर्जक संघ इन्सान-इन्सान की बराबरी का सिद्धांत स्वीकार करता है। वह मानता है कि देश में फैली गैर-बराबरी का मूल कारण ब्राह्मणवाद की नींव की ईंटें, पुनर्जन्म और भाग्यवाद हैं। उसकी दृष्टि में जाति-पांति, छुआछूत, ऊंच-नीच और गरीब-अमीर की भावनाएं इसी ब्राह्मणवाद की देन हैं। प्रस्ताव के अनुसार, ‘आज सारी दुनिया के सामने यह सच्चाई उभर कर आ गई है कि जाति-पांति, ऊंच-नीच, छुआछूत और अमीर-गरीब भाग्य के कारण नहीं, बल्कि तिकड़मी समाज-शत्रुओं की देन है।

सम्मेलन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पदार्थ से निर्मित इस विश्व में पुनर्जन्म सम्भव नहीं, जैसे सारी नदियां समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त कर देती हैं, वैसे ही सारे जीव मरने के बाद पदार्थ में विलीन हो जाते हैं, जिससे उनके दुबारा पैदा होने का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः जब पुनर्जन्म ही नहीं, तो भाग्य कहां से आया?’ इसलिए सम्मेलन में पुनर्जन्म के मिथ्या सिद्धान्त को पोषण करने वाले संस्कार, जैसे पालागन या पैर छूना, कथा- भागवत, पाठ, तीर्थ, जाप आदि कर्मों को समाप्त करने का भी संकल्प लिया गया।

दूसरे प्रस्ताव में ‘बराबर बैठो और बराबर बैठाओ’ का संकल्प लिया गया। इसके अन्तर्गत कहा गया कि ब्राह्मणवाद में पाखाना खाने वाली गाय पवित्र है और भंगी अपवित्र है। इन्सान का कहीं ऐसा अपमान नहीं हुआ, जैसा भारत में देखा जाता है। इसी प्रकार निम्न जातियों का भी नाम बिगाड़कर पुकार कर उनका अपमान किया जाता है। इस असभ्यतापूर्ण गैर-बराबरी के व्यवहार को समाप्त जरूरी है।

तीसरा संकल्प में कहा गया, ‘जिससे मानव समाज कायम रहे और तरक्की करे, वही धर्म है।’ उसके अनुसार, मानव-संहार का समर्थन करने वाला कोई भी सिद्धान्त धर्म नहीं हो सकता, और जो मानव-मानव की बराबरी के सिद्धान्त को न स्वीकार करे, वह भी धर्म नहीं हो सकता। प्रस्ताव में स्वीकार किया गया कि 18 वर्ष की अवस्था प्राप्त प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म छोड़ने और दूसरा धर्म ग्रहण करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। सम्मेलन ने यह भी मांग की कि केन्द्र सरकार को अविलम्ब धर्म ग्रहण विधेयक लाकर उसे कानून का रूप देना चाहिए।

चौथे प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश सरकार के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली ‘हमारे पूर्वज’ और अन्य पाठ्य पुस्तकों को कोर्स से हटाने की मांग की गई थी, जिसमें पुनर्जन्म, भाग्यवाद, जाति-पांति और ऊंच-नीच की शिक्षा दी जा रही थी। सम्मेलन की राय में ब्राह्मणवाद की यह शिक्षा भारत के संविधन के विरुद्ध थी। इसमें शिक्षा को केन्द्रीय विषय के रूप में रखने और समान शिक्षा पद्धति लागू करने की मांग थी।


हिन्दू साम्प्रदायिकता की तह में जाने की पहल

डा. आंबेडकर ने 1927 के ‘मूक नायक’ में अग्रलेख लिखा था: मूल खोजो विवाद मिटेगा। इस लेख में उन्होंने समस्या के मूल को खोजने पर जोर दिया था। इसी का अनुसरण करते हुए रामस्वरूप वर्मा ने ‘समस्याओं के तह तक जाने की पहल’ शीर्षक से एक लम्बा और महत्वपूर्ण लेख लिखा। हालांकि यह उनका राजनीतिक लेख है, जो कांग्रेस की ब्राह्मणवादी संस्कृति को उघाड़ता है, परन्तु इसमें समस्या के मूल को जिस बेबाकी से खोजा गया है, वह हमें आंबेडकर के समाजवादी चिन्तन की याद दिलाता है। उन्होंने लेख के आरम्भ में ही भारत की राजनीति में ब्राह्मणवाद को स्थापित करने के लिए गांधी और कांग्रेस पार्टी को उत्तरदायी माना है। उन्होंने साफ-साफ कहा-

‘मोहनदास कर्मचन्द गांधी की प्रार्थना सभाएं, वैष्णव धर्म और रामराज्य के गुणगान करने वाले गीतों से आरम्भ होती थी। कांग्रेस में जब से गाधीजी ने वैष्णव धर्म का प्रचार आरम्भ किया, मुहम्मद अली जिन्ना आदि अल्पसंख्यक नेता और रामास्वामी नायकर जैसे समाज-सुधारक तथा पदार्थवादी दर्शन को मानने वाले भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारी नेता कांग्रेस से दूर होते गए। ब्राह्मणवादियों की बड़ी परेशानी अल्पसंख्यक तथा दलित आदिवासी की संख्या रही है, जिन्हें वे म्लेच्छ और अछूत समझते हैं। 30 प्रतिशत मुसलमान और 24 प्रतिशत दलित-आदिवासी मिलकर बहुमत हो जाता है। ब्राह्मणवाद को फलने-फूलने के लिए शासन-प्रशासन पर अधिकार बनाए रखना आवश्यक है। 1939 के प्रदेश चुनावों में मुस्लिम लीग से समझौता करके कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, पर सरकार बनाने में मुस्लिम लीग को साझा नहीं किया गया था। फलस्वरूप पाकिस्तान की मांग सामने आई। पाकिस्तान का भूत मुसलमानों के मन में समा चुका था। पाकिस्तान भी न बने और मुसलमान भी शान्त रहें, इसके लिए जिन्ना ने अखण्ड भारत का प्रथम प्रधानमन्त्री बनना चाहा था। परन्तु पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यह कहकर कांग्रेस की ओर से इन्कार कर दिया कि हिन्दू किसी मुस्लिम को प्रधनमन्त्री सहन नहीं करेगा। फलतः, पाकिस्तान बन गया, और वैष्णव धर्म या ब्राह्मणवाद के पनपने का रास्ता खुल गया।’

गांधी और ब्राह्मणों की साजिश का इतना बेबाक पर्दाफाश जयप्रकाश नारायण और डा. लोहिया जैसे समाजवादियों ने कभी नहीं किया। वर्माजी ने हिन्दू साम्प्रदायिकता की व्याख्या करते हुए आगे कहा, हिन्दू साम्प्रदायिकता का नेतृत्व सदैव ब्राह्मणों के हाथों संचालित हुआ है। ब्राह्मण पक्ष का हो, या विपक्ष का, इस खेल को मिलकर खेलता है। विपक्ष के ब्राह्मण, गैर ब्राह्मण हिन्दुओं को लेकर हिन्दू साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं और ब्राह्मणों का बहुमत काग्रेस में रहकर धर्मनिरपेक्षता की बात करता है। इसलिए हिन्दू साम्प्रदायिकता से डरकर अल्पसंख्यक वर्ग कांग्रेस के साथ रहता है। आज कांग्रेस के स्थान पर अगर आप भारतीय जनता पार्टी को रख लें, तो देखेंगे कि कांग्रेस के सारे ब्राह्मण भाजपाई बनकर हिन्दुत्ववादी हो गए हैं, और मुसलमान उनसे भयानक रूप से आतंकित हैं। वर्माजी ने सही पकड़ा था।

‘जितना भी देश साम्प्रदायिकता की आग में फंसता जायेगा, ब्राह्मणवाद शक्तिशाली होता जायेगा। शासन और प्रशासन के लिए 95 प्रतिशत ब्राह्मण कांग्रेस में रहकर साम्प्रदायिकता को देश के लिए घातक कहता रहेगा, जैसा कि आज भाजपा कहती है परन्तु सरकारी भूमि पर हजारों मन्दिर बनवा देना, संस्कृत भाषा को पढ़ाना अनिवार्य करके आकाशवाणी से समाचार तक संस्कृत में सुनाने लगना,  सरकारी खर्च पर ब्राह्मण उद्घाटन, भूमि-पूजा आदि कर्मकाण्ड करेंगे और 5 प्रतिशत ब्राह्मण हिन्दू साम्प्रदायिकता का नेतृत्व करते हुए गैर-ब्राह्मण हिन्दुओं को संगठित करेगा। ब्राह्मण का सत्ता और प्रशासन पर अधिकार भी बना रहा और हिन्दू साम्प्रदायिकता का नेतृत्व तो धर्मिक कारणों से कोई हिन्दू ले ही नहीं सकता।’

वर्माजी ने ब्राह्मण के खेल को अच्छी तरह समझ लिया था। इसलिए उन्होंने सटीक विश्लेषण किया कि धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता दोनों का नेतृत्व ब्राह्मण के हाथ में है। उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता फैलाने वाली कोई भी पार्टी हो, बिना ब्राह्मण के सफल नहीं हो सकती। उनके अनुसार हिन्दू साम्प्रदायिकता का लाभ ब्राह्मणों को होता है, और हानि गैर-ब्राह्मण हिन्दुओं को होती है।


कांग्रेस का रामराज्य

गांधी भारत में रामराज्य लाना चाहते थे। और, कांग्रेस ने भारत के स्वतन्त्र होते ही नेहरू को भारत का पहला प्रधनमन्त्री बनाकर और राज्यों के मुख्यमंत्री पदों पर ब्राह्मणों की प्रथम नियुक्त करके रामराज्य की शुरूआत कर दी। रामराज्य क्या है और ब्राह्मण इसे क्यों पसन्द करते हैं? इस विषय पर रामस्वरूप वर्मा का चिन्तन अद्भुत है। उनका यह कथन देखिए-

‘रामायण की कथा कोई इतिहास नहीं है, वरन एक काल्पनिक साहित्य है। यदि रामायण इतिहास होती, तो रामायण के आर्थिक पक्ष भी उसमें लिखे होने चाहिए थे। राम और उसकी जाति के लोग, सभी ब्राह्मण और ऋषि मुनि कोई उत्पादन और निर्माण अपने श्रम से नहीं करते थे,  फिर भी राम सभी ब्राह्मण और ऋषि मुनियों की सेवा में अपार धन व्यय करता था। रामराज्य में कोई खनिज नहीं निकाला जाता था, फिर भी परिवार के सभी लोग सोने के आभूषण और मुकुटों से लदे रहते हैं। पक्की सड़क नहीं, नदियों पर पुल नहीं, कोई कल-कारखाना नहीं, बांध, नहर या नलकूप नहीं। असिंचिंत खेती से किसान ने जो थोड़ा बहुत पैदा कर लिया, पहले राजा राम के कर्मचारी बटाई करके ले गए। फिर स्थानीय ठाकुर, ब्राह्मण को दिया गया। जो बचा, उसमें बढ़ई, कुम्हार, बुनकर आदि प्रजाजन, भूमिहीन मजदूर और स्वयं किसान को अपना जीवन बिताना पड़ता था। भयानक शोषण पर आधरित राजतन्त्र-प्रणाली ही रामराज्य की कामना है, परन्तु उसकी चर्चा पंडित वाल्मीकि से लेकर पंडित तुलसीदास तक, किसी ने करना उचित नहीं समझा।’

वर्मा जी के अनुसार रामराज्य को आदर्श राज्य इसलिए कहा गया, क्योंकि उसमें साधु-सन्त, ब्राह्मण और क्षत्रिय सुखी और आदरणीय थे। वैश्यों के बारे में वर्माजी का मत था कि ब्राह्मणवाद ने वैश्य को बड़ी ही दयनीय स्थिति में रखा है। वह ब्राह्मणों के लिए दुधरू गाय है, उसी के धन से ब्राह्मणों का रामराज्य चलता है। ‘इस प्रकार वैश्य को जितना धन अपने लिए कमाना पड़ता है, उससे कई गुना अधिक वह ब्राह्मणों और क्षत्रियों  के लिए कमाता है।’ इसलिए उसे शोषण के हर हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। वर्माजी के मतानुसार, वैश्य की मानसिकता भी घोर ब्राह्मणवादी है, इसीलिए वह किसानों और कारीगरों का भयानक शोषण करता है। वह अपने अवैध धन का उपयोग मन्दिर बनवाने और यज्ञ कराने में करता है। उनका मत है कि वैश्य की यही ब्राह्मणवादी मानसिकता भारत की अर्थव्यवस्था को चैपट किए हुए है। इसे हम वर्माजी के लेखन में आगे भी देखेंगे।


वर्माजी की प्रश्नोत्तरी

रामस्वरूप वर्मा ने सामाजिक परिवर्तन और समता-मूलक समाज के निर्माण के लिए कई विचारशील पुस्तकों की रचना की। इनमें ‘क्रान्ति क्यों और कैसे’, ‘ब्राह्मण-महिमा: क्यों और कैसे’, मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद’, ‘मनुस्मृति: राष्ट्र का कलंक’, ‘निरादर कैसे मिटे’, ‘आत्मा, पुनर्जन्म मिथ्या: मानव समता क्या, क्यों और कैसे’, ‘महामना डा. बी. आर. आंबेडकर साहित्य की जब्ती और बहाली’, ‘अछूतों की समस्या और समाधन’ उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक और महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ शीर्षक से लिखा, जो दयानन्द के ‘सत्यार्थ प्रकाश और ‘जोतिबा फुले के ‘गुलामगिरी’ ग्रन्थ के स्तर का है। अगर वर्माजी अन्य पुस्तकें न भी लिखते, तो भी उनका केवल ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ ग्रन्थ ही बहुजनों में क्रान्ति-चेतना लाने में काफी था। इसमें उन्होंने उसी शैली में स्वयं ही सवाल किए हैं और स्वयं ही उनके उत्तर दिए हैं, जिस शैली में स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में दिए हैं। इस ग्रन्थ के प्राक्कथन में उन्होंने लिखा है, ‘प्रश्नोत्तर के द्वारा ब्राह्मणवाद में जकड़े लोगों के दिमाग का धुंध हटेगा और उन्हें मानववाद का प्रशस्त मार्ग स्पष्ट दिखेगा, ऐसी आशा इस मानववादी प्रश्नोत्तरी से करना अनुचित न होगा। जीवन के चारों क्षेत्रों ; सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक में व्याप्त ब्राह्मणवाद को त्यागकर, यदि भारत के निराश्रित व दरिद्र लोगों ने मानववाद का रास्ता अपनाया, तो निश्चय ही उन्हें निरादर व दरिद्रता से छुटकारा मिलेगा, और मैं इस परिश्रम को सार्थक समझूंगा।’

मानववाद क्या है? मानव-समता से क्या तात्पर्य है? मानव-मन की आवश्यकताएं क्या हैं? पदार्थ जड़ होता है या चैतन्य? जीव किसे कहते हैं? जीव की उत्पत्ति कब और कैसे हुई? आदि बहुत से प्रश्न हैं, जिनके उत्तर वर्माजी ने दिए हैं। कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर इस प्रकार हैं-

प्रश्न- समाजवाद किसे कहते हैं?

उत्तर- एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था की रचना की विचारधरा, जिससे कोई किसी के श्रम का शोषण न कर सके, समाजवाद कही जाती है।

प्रश्न- क्या आत्मा का पुनर्जन्म होता है?

उत्तर- आत्मा जैसी कोई चीज सृष्टि में नहीं है। अतः जो नहीं है, उसके पुनर्जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता।

प्रश्न- पुनर्जन्म की घटनाएं होती सुनी गई हैं, तो क्या वे भी असत्य हैं?

उत्तर- पुनर्जन्म की सारी कहानियां गढ़ी गई होती हैं। इनमें सत्य का धेला भी नहीं है। अव्वल तो ये भारत में ही घटती और सुनी जाती हैं, दुनिया के अन्य देशों में नहीं। दूसरे यह असम्भव है, क्योंकि दुनिया के किसी बच्चे को यह याद नहीं है कि मां के पेट में वह किस प्रकार महसूस करता था। आज तक इसके बारे में किसी ने भी नहीं बताया, तो फिर जब गर्भकाल की बात का ही पता नहीं है, तब उसके पूर्व की बात कहां और कैसे याद रहेगी?

प्रश्न- ब्रह्म क्या है?

उत्तर- ब्रह्म का अर्थ है सबसे बड़ा। यह तौल-नाप का पर्यायवाची विश्लेषण है। जैसे ब्रह्म ज्ञानी सबसे बड़ा ज्ञानी। ब्रह्म का यही तात्पर्य है।

प्रश्न- यह सृष्टि ईश्वर ने बनाई, क्या यह सच है?

उत्तर- नहीं। यदि सृष्टि किसी एक व्यक्ति ने बनाई होती, तो उसमें इतनी विविधता न होती, जैसे एक लोहार, बढ़ई या कुम्हार जो भी चीजें बनाता है, उसमें उसकी दक्षता अवश्य दिखाई पड़ती है और उस दक्षता में दिन-रात वृद्धि होती रहती है, जब तक कि उसकी बनाने की शक्ति क्षीण नहीं होने लगती। इस धरती पर हजारों लोग लंगड़े, अंधे काने, कुबड़े, लूले आदि है। यदि ये सब एक व्यक्ति के बनाए होते, सब सुन्दर होते, और विकृत न होते। अच्छे लोहार से खराब हंसिए नहीं बनते, और न अच्छे बढ़ई से खराब खूंटा बनता है। इसलिए सृष्टि किसी ईश्वर की बनाई हुई नहीं है। यह पदार्थ के स्वभाव संघात का परिणाम है।

प्रश्न- यदि सृष्टि ईश्वर ने नहीं बनाई, और वह इसे नहीं चलाता, तो यह चल कैसे रही है?

उत्तर- सृष्टि का कारण पदार्थ की गतिशीलता है। चूंकी पदार्थ स्वयमेव गतिशील है, अतः चल रही है।

प्रश्न- जब आत्मा नहीं है, तो भूत-प्रेत कहां से आते हैं?

उत्तर- आज तक किसी प्रेतात्मा के होने का प्रमाण नहीं मिला है। कुछ ओझाई आदि को पनपाने के लिए कुछ युक्तियां तैयार कर लेते हैं, जिन्हें अज्ञानी लोग भूत-प्रेत की करनी समझते हैं।…प्रेतात्मा सम्बन्धी जितनी कहानियां हैं, वे पूरे तौर से मिथ्या होती हैं, क्योंकि सृष्टि में पदार्थ से भिन्न आत्मा जैसी किसी वस्तु की उपस्थिति सम्भव नहीं।

प्रश्न- जब आत्मा नहीं, तो स्वर्ग-नरक में कौन जाता है?

उत्तर- आज तक किसी मानव ने स्वर्ग-नरक नहीं देखा है। यह अज्ञानी लोगों को भय दिखाने के लिए मानवकृत कल्पना है। वास्तव में स्वर्ग-नरक सृष्टि में कहीं स्थित नहीं है। दूसरे, जब आत्मा नहीं, तो स्वर्ग-नरक का अस्तित्व स्वयं निरर्थक हो जाता है।

इन कुछ प्रश्नों के अलावा और भी बहुत से प्रश्नों के तार्किक उत्तर ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ में दिए गए हैं। उसमें अन्तिम महत्वपूर्ण प्रश्न है: ‘क्या क्रान्ति बिना हिंसा के सफल नहीं होती?’ उत्तर में वर्माजी का मत है: ‘यह विचार अज्ञान पर आधरित है। वास्तव में क्रान्ति अहिंसा से ही होती है, क्योंकि यह मन का विषय है।’


क्रान्ति क्यों और कैसे?

लेकिन क्रान्ति क्या है? और वह कैसे आयेगी? इसका वर्णन वर्माजी ने अपनी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक ‘क्रान्ति क्यों और कैसे?’ में किया है। उन्होंने इस किताब में इसे अच्छे से समझाया है। उनके अनुसार, लोग क्रान्ति का प्रयोग अनाप-शनाप यन्त्रावत करते हैं, लेकिन वे क्रान्ति का मतलब नहीं जानते। उनके अनुसार, जो दल ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था को मानते हैं, वे भी ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ या ‘क्रान्ति अमर रहे’ का नारा लगाते हैं। वे पूछते हैं, आखिर, क्रान्ति या इंकलाब का अर्थ क्या है? वे स्वयं ही उत्तर देते हैं: ‘जीवन के पूर्व-निर्धारित मूल्यों का मानव हित में पुनर्निर्धारण का नाम क्रान्ति है।’ उन्होंने दूसरे शब्दों में कहा कि जब पहले से चले आते जीवन-मूल्य बहुजनों के हित में न होकर, अल्प जनों के हित में हो जाते हैं, तब बहुजन-हिताय और बहुजन-सुखाय की पृष्भूमि में उनका फिर से मूल्यांकन करना पड़ता है। यह मूल्यांकन ही क्रान्ति की संज्ञा पाता है। वे आगे इतिहासकार ट्यनवी की भाषा में समझाते हैं: ‘पतझड़ की निष्क्रियता से हेमन्त की पीड़ा और उसके पश्चात बसन्त का उत्साह।’ उनकी दृष्टि में यह क्रान्ति की मनोहारी परिभाषा है, अर्थात्, ‘निष्क्रिय पुरातन का विनाश और सक्रिय नूतन का विकास।’

जीवन के पूर्वनिर्धरित मूल्य क्या हैं? वर्माजी बताते हैं: ‘ब्राह्मणवादी मूल्यों में जन्मा व्यक्ति ऊंच या नीच जाति में जन्म लेता है और मुसलमान तथा ईसाइयों के यहां जन्मा व्यक्ति इन्सान के रूप में पैदा होता है। अतः इस विषय में सामाजिक मूल्यों का पुनः निर्धरण करना होगा। क्या कोई व्यक्ति पैदा होते ही ऊंच या नीच हो जाता है? स्पष्ट है कि ब्राह्मणवादी सामाजिक मूल्य विषमतापरक हैं, उसमें इन्सान की परख का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः जीवन का यह सामाजिक मूल्य फिर से तय करने योग्य है। पुनः निर्धरित सामाजिक मूल्य इस तरह हो सकता है कि मानव-मानव बराबर हैं।  इसी तरह से सारे सामाजिक मूल्यों का पुनः निर्धरण करने में ही सामाजिक क्रान्ति निहित है।’

आर्थिक क्रान्ति क्या हैं? वर्माजी कहते हैं, गरीबी-अमीरी दोनों ईश्वर की देन हैं, यह स्थापित किया गया है। इस पर फिर से सोचना होगा। क्या वास्तव में गरीब और अमीर ईश्वर ने बनाए हैं? वर्माजी कहते हैं, नहीं, इसका कारण दुव्र्यवस्था और आर्थिक शोषण है। उनके अनुसार, ‘उत्पादन के क्षेत्रों पर अधिकार किसी व्यक्ति का होने पर ही गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ती है। भाग्य के नाम पर इस कब्जे को कायम रखने में देश की प्रगति कुगति की ओर जा रही है।’ अतः इन मूल्यों को फिर से तय करना होगा। यही आर्थिक क्रान्ति है।

सांस्कृतिक क्रान्ति के लिए, वर्माजी का जोर ब्राह्मणवादी संस्कृति के विनाश पर है। इसके लिए, उनके अनुसार, अर्जक; मानववादी संस्कृति का विकास जरूरी है। वे कहते हैं कि जब तक समतामूलक अर्जक संस्कृति का उदय और पुनर्जन्म तथा भाग्यवाद पर आधरित विषमतामूलक ब्राह्मणवादी संस्कृति का विनाश नहीं होगा, तब तक सांस्कृतिक क्रान्ति सम्भव नहीं। इसलिए उन्होंने कहा कि उनके अर्जक संघ के प्रयासों से अर्जक संस्कृति तर्क-युग की स्थापना कर रही है। अर्जक युवकों को अपने शोषण का ज्ञान हो गया है, और उन्होंने उससे मुक्त होने के लिए जिहाद छेड़ दी है। वैज्ञानिक ज्ञान और जनतन्त्र उनकी आखें खोल रहा है और वे अपनी अपार शक्ति का अनुभव करने लगे हैं। उनका कहना है कि जिस तीव्रता से वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ेगा, उतनी ही तीव्रता से ब्राह्मणवादी संस्कृति का नाश होगा।

राजनीतिक क्रान्ति क्या है? वर्माजी कहते हैं कि राजनीति में भी जीवन के पूर्वनिर्धरित मूल्यों का ही बोलबाला है। इसलिए ‘जनतन्त्र का आगमन तो हुआ, किन्तु पूर्वनिर्धारित राजतन्त्रीय मूल्यों के पुनर्निर्धरण के अभाव में जनतन्त्र मुरझा गया है, और राजतन्त्र की एक व्यापक कुलीन तन्त्रीय प्रणाली सारे देश की प्रशासनिक परम्परा में छाई हुई है।’ इस तरह ‘वर्ण और वर्ग से कुलीन लोग अब सारे शासन व प्रशासन पर छाए हुए हैं, और जनतांत्रिक मूल्यों का विकास खटाई में पड़ गया है।’ इस राजनीतिक मूल्य को पिफर से तय करने से ही राजनीतिक क्रान्ति होगी।

वर्माजी की दृष्टि में क्रान्ति और परिवर्तन दोनों अलग-अलग हैं। उनके अनुसार क्रान्ति सम्पूर्ण जीवन को लेकर चलती है, और यह मानसिक होती है, जबकि परिवर्तन पाथर््िाव होता है और वह सम्पूर्ण जीवन को लेकर नहीं चलता। उनका मत था कि क्रान्तिविहीन परिवर्तन निरर्थक और निस्सार हुआ करता है। यही कारण है कि देश में सरकारें बदलने के बाद भी क्रान्ति नहीं होती। उन्होंने कहा कि यदि लोगों ने क्रान्ति का मार्ग अपनाया, तो इससे देश का सारा नक्शा बदल जायेगा और ‘आदमी को भी इन्सा होना मयस्सर हो जायेगा।


ब्राह्मणवाद का प्रचारक रामचरितमानस

1974 में रामचरितमानस के चार सौ साल पूरे होने के अवसर पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने धूमधाम से ‘मानस-चतुष्शती’ का आयोजन किया था। इस आयोजन की तैयारी 1970 में हुई थी। तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने इस आयोजन के लिए एक करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया और रामचरितमानस का अधिकाधिक प्रचार करने की दृष्टि से उसकी चार करोड़ प्रतियां जनता में मुफ्त बांटने की घोषणा की। रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ की ओर से इसका भारी विरोध किया। उन्होंने न केवल इसके विरोध में तत्कालीन प्रधनमन्त्री इन्दिरा गांधी और राष्ट्रपति वी. वी. गिरि को पत्र लिखे, बल्कि ‘ब्राह्मण महिमा: क्यों और कैसे’ शीर्षक से एक किताब भी लिखी। इस पुस्तक की प्रस्तावना में वर्माजी ने लिखा कि करोड़ों अर्जकों की गरीबी दूर करने के लिए प्रधनमन्त्री के पास कोई कार्यक्रम नहीं है, लेकिन ब्राह्मणशाही को कायम रखने के लिए अर्जकों की गाढ़ी कमाई से एक करोड़ रुपया खर्च किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के कारण ब्राह्मणवाद का नाश होते देखकर ही ब्राह्मण वर्ग ब्राह्मणवाद के पोषक ग्रन्थ की चतुष्शती मनाने का उपक्रम कर रहा है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि ब्राह्मणवाद के प्रचारकों के हाथ में ताकत देना बन्दर के हाथ में मशाल देने से कम खतरनाक नहीं है।


इस पुस्तक में वे चार पत्र भी शामिल हैं, जो वर्माजी के द्वारा मानस चतुष्शती के विरोध में तत्कालीन प्रधनमन्त्री श्रीमती गांधी और राष्ट्रपति वी. वी. गिरि को भेजे गए थे। पहला पत्र 18 जून 1970 को श्री वी. वी. गिरि को भेजा गया। इसके मजमून के कुछ खास अंश इस प्रकार थे-

मान्यवर,

तुलसी चतुष्शती मनाने का आयोजन देश में किया जा रहा है। सुना है कि आप उक्त आयोजन के संरक्षक हैं और भारत की प्रधानमन्त्री माननीया इन्दिरा गांधी उक्त समारोह समिति की अध्यक्ष बनने जा रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आप पंडित तुलसीदास को भारत राष्ट्र का परम हितकारी मान रहे हैं, तभी तो आप तुलसी चतुष्शती समारोह के संरक्षक बने। यह भी नहीं कहा जा सकता कि आपने पंडित तुलसीदास के रामचरितमानस का अध्ययन नहीं किया है। भारत के संविधान को आप अमली जामा पहनाने की शपथ ले चुके हैं। यही नहीं, राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान जब आप लखनऊ आए थे और उत्तर प्रदेश ‘गिरि जिताओ’ समिति का संयोजक होने के नाते आपने मेरे सभापतित्व में बुलाई गई विधायकों की बैठक को दारुल शफा ए ब्लाक के कॉमन रूम में सम्बोधित किया था। तब भी आपने यही कहा था कि आप जीतने पर भारत के संविधान की मर्यादा प्राणपण से कायम रखेंगे।

‘भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। उसमें भारत के प्रत्येक नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए गए हैं। संक्षेप में भारत का संविधान मानव-मानव की बराबरी के सिद्धान्त को स्वीकार करता है, और स्त्री-पुरुष, शूद्र-ब्राह्मण, म्लेच्छ हिन्दू जैसे अमानवीय अन्तर की कल्पना भी नहीं करता। तब फिर आपने उपर्युक्त अमानवीय अन्तर के प्रतिषपक पंडित तुलसीदास की चैथी शताब्दी मनाने को संरक्षण कैसे दिया? क्या यह कार्य संविधन की मर्यादा का उल्लंघन नहीं है? क्या इससे देश के विशाल बहुमत को भारी ठेस नहीं लगती?

‘पंडित तुलसीदास के ग्रन्थों में पुनर्जन्म और भाग्यवाद का ही प्रतिपादन मिलता है। पुनर्जन्म और भाग्यवाद से मानव-मानव में ऊंच-नीच और छुआछूत की भावना अनिवार्य रूप से पनपती है। छुआछूत की भावना को भारत का संविधान अनुचित करार देता है और देश का कानून अस्पृश्यता को जुर्म करार देता है। लेकिन पंडित तुलसीदास की पुस्तक रामचरितमानस में केवट या मल्लाह को अस्पृश्य कहा गया है। ‘लोक वेद सबही विध् नीचा, जासु छांह छुइ लेइअ सींचा।’

‘आज भारत का संविधान किसी जाति को अधम या पापी कहना जुर्म मानता है। पंडित तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस में कई जातियों को अधम और पापी कहा है ‘जे वर्णाध्म तेलि कुम्हारा, वपच, किरात, कोल, कलवारा। आभीर, यवन, किरात, खल वपचादि अति अध्रूप जे।।’ एक ओर भारत का संविधान भारत के सभी नागरिकों को समान माने, जिसे अमल में लाने के लिए आप चुने गए हैं, और दूसरी ओर आप उस ग्रन्थ को सम्मान प्रदान करने के लिए संरक्षण दें, जो देश के करोड़ों लोगों को अधम, नीच, पापी, अस्पृश्य कहे, तो इस अन्तर्विरोध का शमन होना असम्भव ही कहा जायेगा।

‘पंडित तुलसीदास शूद्र को शिक्षा देना ऐसी ही समझते हैं, जैसे सांप को दूध पिलाना। यानी शूद्र सांप है और शिक्षा दूध। जनश्रुति के अनुसार सांप को दूध पिलाने से वह अधिक विषैला हो जाता है। उसी प्रकार पंडित तुलसीदास के अनुसार शूद्र विद्या पाने से अधिक खतरनाक हो जाता है। रामचरितमानस के काकभुसुंडी-गरुड़ संवाद में काकभुसंडी पूर्वजन्म में शूद्र होने की बात कहते हुए कहता है अधम जाति में विद्या पाए, भयउं यथा अहि दूध् पिलाए।’

‘भारत का संविधान अनिवार्य शिक्षा लागू करने का संकल्प लेता है और पंडित तुलसीदास शूद्र को विद्या पढ़ाना खतरनाक बताते हैं।

‘उपर्युक्त उदाहरणों से यद्यपि पंडित तुलसीदास की भारत का संविधान विरोधी विषमतामूलक प्रवृत्ति का भली-भांति परिचय देना शायद सम्भव न हो, लेकिन आपके व्यस्त समय को ध्यान में रखकर पत्र का कलेवर बढ़ाना भी ठीक न प्रतीत हुआ। अतः इन उदाहरणों को बटलोई के चावल की भांति परखने के लिए पर्याप्त मानकर मैं आपसे सविनय एवं साग्रह यही निवेदन करूंगा कि आप तुलसी-चतुष्शती समारोह की संरक्षकता से अपने को तत्काल विलग करके इसकी घोषणा कर दें और अपने प्रधनमन्त्री को भी भाग लेने से कतई मना कर दें। हो सकता है कि ब्राह्मणों को गौरव दिलाने के लिए भगीरथ प्रयास करने वाले पंडित तुलसीदास की चतुष्शती समारोह का संरक्षक आपको ब्राह्मण होने के कारण बनाया गया हो। किन्तु आपके महिमामय पद के यह सर्वथा विपरीत होगा, और जिन्होंने आपको वर्ग-विहीन समाज के निर्माण का प्रयास करने वाला समझकर राष्ट्रपति बनाने में मत दिया था, उनको महान क्लेश एवं क्षोभ होगा।

आपका,

रामस्वरूप वर्मा


वर्माजी ने इसी आशय का दूसरा पत्र 27 जून 1970 को तत्कालीन प्रधनमन्त्री इन्दिरा गांधी को लिखा। इस पत्र के मुख्य अंश इस प्रकार हैं-

माननीया इन्दिरा गांधी

महोदया,

समाचार पत्रों से और अन्य प्रकार की खबरों से ऐसा पता चला है कि तुलसी चतुष्शती समारोह की अध्यक्षता आपने स्वीकार कर ली है। यह जानकर मुझे दुख हुआ कि आपने भारत के संविधन के प्रति निष्ठा की शपथ लेने के बावजूद तुलसीदास जैसे साम्प्रदायिक व्यक्ति के चतुष्शती समारोह की अध्यक्षता स्वीकार कर ली।

‘पंडित तुलसीदास की चतुष्शती मनाने में आपकी शिरकत इसलिए तो नहीं है कि आपने भी एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया है और पंडित तुलसीदास भी ब्राह्मण थे। आपके लिए यह शोभनीय नहीं होगा, क्योंकि आप धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणतन्त्र की प्रधानमन्त्री हैं और पंडित तुलसीदास ब्राह्मणवाद के प्रबल पोषक और तथाकथित सनातन धर्म के प्रचारक थे। अतः भारत की प्रधानमन्त्री रहकर आप पंडित तुलसीदास की चतुष्शती में सम्मिलित नहीं हो सकतीं, क्योंकि पंडित तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस में शूद्रों, अन्त्यजों, यवनों को अत्यन्त पापी और नीच बताकर भारत की बहुसंख्यक जनता का दारुण अपमान किया है। ऐसा कवि न तो राष्ट्रीय हो सकता है और न राष्ट्र का हितकारी।

‘आप नारी हैं। स्वभावतः आपके दिल में उनके दुख-सुख को समझने की अधिक क्षमता है। पंडित तुलसीदास ने अपने ग्रन्थों में नारी-निन्दा की झड़ी लगा दी है। उनके अनुसार ब्रह्मा ने भी स्त्री के हृदय की गति नहीं जान पाई, क्योंकि वह सारे कपट, पाप और अवगुणों की खान है-‘विध्हिु न नारि हृदय गति जानी, सकल कपट अध् अवगुन खानी।’

इस पत्र में भी वर्माजी ने पंडित तुलसीदास के ग्रन्थों से अनेकों उद्धरण देकर उनसे तुलसी चतुष्शती समारोह से अपना नाता तोड़ने का अनुरोध किया था।

किन्तु, राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री दोनों ने ही दो माह तक उनके पत्र का जवाब नहीं दिया। तब वर्माजी ने उन्हें पुनः क्रमश: 6 अगस्त 1970 और 14 अगस्त 1970 को पत्र लिखे, और पुनः स्मरण कराया कि पंडित तुलसीदास न राष्ट्रीय कवि थे और न उनका रामचरितमानस राष्ट्रीय ग्रन्थ है, बल्कि वह संविधान-विरोधी ग्रन्थ है, जिसके समारोह में भाग लेने से संविधान का उल्लंघन होगा। किन्तु वर्माजी का यह प्रयास भी विफल हुआ, और सरकार द्वारा मानस- चतुष्शदी धूमधाम से मनाई गई।

ये दोनों पत्र रामस्वरूप वर्मा की पुस्तक ‘ब्राह्मण-महिमा’ में आरम्भ में दिए गए हैं। उसके बाद उसमें तुलसीदास और उनकी ब्राह्मण-महिमा पर तीन अध्याय हैं, जिनके शीर्षक हैं: ‘मर्यादापुरुषोत्तम या ब्राह्मण-गुलाम राम’, ‘क्या रामचरितमानस धर्मिक ग्रन्थ है?’ तथा ‘राम और रावण काल्पनिक पात्र।’ यह तात्विक विवेचन उन्होंने देश के उन करोड़ों बहुजन अर्जकों के लिए किया, जो ब्राह्मणवाद से पीड़ित हैं और अज्ञान की गोली खाकर सोए हुए हैं।

पहले अध्याय में उन्होंने राम की मर्यादा को प्रश्नांकित किया है। उसमें उन्होंने कहा कि केवल मर्यादापुरुषोत्तम की रट लगाने से कोई मर्यादापुरुषोत्तम नहीं हो जाता, बल्कि नैतिक मूल्यों के आधार पर ही किसी को मर्यादापुरुषोत्तम कहा जा सकता है। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या इस कसौटी पर राम खरे उतरते हैं? उनका उत्तर दिया, नहीं। उन्होंने तर्क दिया: ‘चूंकि बालि व रावण राम के विरोधी थे, अतः उनका अपराध प्राणदण्ड का कारण हुआ और राम के मित्र सुग्रीव व विभीषण उसी अपराध को जीवन भर करते रहे, लेकिन राम ने उसकी कतई परवाह नहीं की।’ उन्होंने कहा कि यही ब्राह्मणवादी नैतिक मूल्य है, जिसे मर्यादापुरुषोत्तम राम ने स्थापित किया। इसे तत्कालीन राजनीति से जोड़ते हुए उन्होंने कहा, ‘यही कारण है कि माननीया इन्दिरा गांधी और कमलापति त्रिपाठी रामचरितमानस का प्रचार लाखों रुपया खर्च करके करवा रहे हैं। ये भी राम के इसी पक्षपात के पोषक हैं और अपने इस कुकर्म या अवगुण को रामचरितमानस की आड़ में ढकना चाहते हैं। पक्षपातपूर्ण आचरण करने वाला राज्य न तो आदर्श कहा जा सकता है, न टिकाउ हो सकता है।’ उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्राह्मणवादी शासक पक्षपातपूर्ण न्याय करके ही अपने को मजबूत करते हैं और कायम रहते हैं।

उन्होंने और भी प्रश्न खड़े किए। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के राम ने शीलहीन ब्राह्मण को पूजनीय और शूद्र चाहे कितना ही शील-गुण-सम्पन्न हो, उसे अपूजनीय माना है। उन्होंने प्रश्न किया, इतनी अनैतिकता के साथ ब्राह्मणों की सेवा का समर्थन करने वाला राम भला मर्यादापुरुषोत्तम कैसे हो सकता है? वह तो साधरण पुरुष के योग्य भी नहीं है। उन्होंने जोर देकर पूछा कि जो राम यह कहते हों कि उनका जन्म ब्राह्मणों की रक्षा के लिए हुआ है, वह राम मानवतावादी भी कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि जो राम पूरे रामचरितमानस में बार-बार यही कहते हैं कि उन्हें ब्राह्मण-द्रोही पसन्द नहीं, और वे ब्राह्मणों के द्रोही का नाश करेंगे, वह राम जातीयता और गैर-बराबरी का समर्थक कैसे हो सकता है? वे कहते हैं कि वह राम तो मर्यादा का पालक नहीं, मर्यादा का घातक ही कहा जायेगा। उन्होंने कहा कि ऐसे राम के राज्य की प्रशंसा भारत के ब्राह्मण या उनके पिछलग्गू भले ही करें, पर उसे मानवोचित राज्य नहीं कहा जा सकता।

दूसरे अध्याय में रामस्वरूप वर्मा ने रामचरितमानस को धर्मिक ग्रन्थ माने जाने का खण्डन किया है। यह अध्याय एक घटना से आरम्भ होता है। हुआ यह था कि 1974 में मानस- चतुष्शती के विरोध में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में एक विधायक ने रामचरितमानस के एक पन्ने को फाड़कर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया था। इस घटना ने ब्राह्मणों में रोष पैदा कर दिया। इस पर वर्माजी ने लिखा कि 1957 में भी एक भूप किशोर नामक विधयक ने रामचरितमानस को सदन में फाड़ा था, पर उस समय कोई शोर नहीं मचा था। इस पर वर्माजी ने लिखा: ‘1957 का उत्तर प्रदेश मानव-समता के आधार पर आजादी पाने के कारण कुछ न कुछ मानववाद का कायल था। इसलिए रामचरितमानस को फाड़ने पर ब्राह्मणवादी मन दबाकर रह गए। किन्तु अब देश तेजी से ब्राह्मणवाद की ओर अग्रसर हुआ है। यह इसी से प्रमाणित है कि सन 1974 में रामचरितमानस का पन्ना फाड़ने पर ब्राह्मणवादी अखबार और लोग हाहाकार मचाए हुए हैं, यानी अब ब्राह्मणवाद अपने चरमोत्कर्ष पर है। और अब किसी की क्या मजाल कि कोई ब्राह्मणवाद का सबसे बड़ा ग्रन्थ फाड़े। यह ब्राह्मणवाद की तौहीन है, और यह तौहीन वह शासक बनकर कैसे सहन कर सकता है?’

वर्माजी ने यह अध्याय इसी घटना को केन्द्र में रखकर लिखा है। ब्राह्मणों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के किसी निर्णय का हवाला दिया गया कि धार्मिक पुस्तक को फाड़ना दण्डनीय अपराध है। इस सन्दर्भ में वर्माजी ने इस तथ्य का खण्डन किया कि रामचरितमानस धर्मिक ग्रन्थ है। उन्होंने कहा कि धर्मिक ग्रन्थ वह होता है, जो धर्म के प्रवर्तक द्वारा लिखा जाता है, या जिसमें धर्म-प्रवर्तक के उपदेशों का संग्रह होता है जैसे त्रिपिटक, जिसमें बु (की वाणी है, या जैसे कुरान, जिसमें मुहम्मद साहब पर नाजिल अल्लाह की आयतें हैं, या जैसे बाइबिल, जिसमें ईसा मसीह के विचार संग्रहीत हैं। उन्होंने प्रश्न किया कि इस आधर पर रामचरितमानस को धर्म-ग्रन्थ कैसे कहा जा सकता है? क्या इसके प्रणेता पंडित तुलसीदास किसी धर्म के संस्थापक थे, या उन्होंने ऐसा दावा किया? फिर ब्राह्मण रामचरितमानस को धर्म-ग्रन्थ क्यों माने हुए हैं? वर्माजी ने इसके उत्तर में कहा कि ‘ब्राह्मणवादी लोग इस साधारण सी पुस्तक को धर्म-ग्रन्थ बनाने पर इसलिए तुले हुए हैं, क्योंकि इसमें ब्राह्मण-महिमा का विशद गान मिलता है।’


वर्माजी ने आगे एक और विचारोत्तजक खुलासा किया, जो बहुजनों की दृष्टि से बहुत ही विचारणीय है। उन्होंने कहा-

‘एक बात इस विवाद को स्पष्ट कर देती है कि रामचरितमानस को धर्म-ग्रन्थ, साहित्यिक ग्रन्थ, आदर्श ग्रन्थ आदि साबित करने वाले प्रायः ब्राह्मण ही हैं, क्योंकि रामचरितमानस ब्राह्मणवादियों का ही ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को पढ़ने से ब्राह्मण की श्रेष्ठता अल्हड़ मन पर बैठ जाती है और अविकसित बुद्धि के अवर्ण लोग ऐसा मानकर ब्राह्मणवादी शोषण के सहज शिकार हो जाते हैं। इसलिए इसे अवर्ण मछलियों को फसांने के लिए सवर्ण वंशी की भाॅंति प्रयोग करने के कारण देश का ब्राह्मण समूह इसकी रक्षा करने में तत्पर है।’

तीसरे अध्याय में वर्माजी ने इस मत का प्रतिपादन किया है कि राम और रावण काल्पनिक पात्र हैं। उन्होंने 1974 में द्रविड़ कड़गम की ओर से तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी को लिखे गए पत्र के सन्दर्भ से बताया कि द्रविड़ कड़गम ने प्रधानमन्त्री से उत्तर भारत में द्रविड़ों को आहत करने वाली रामलीला को बन्द कराने का अनुरोध् किया था, क्योंकि उनके अनुसार रावण द्रविड़ था, जिसका जलाया जाना उनके लिए अपमानजनक था। उन्होंने पत्र में यह धमकी भी दी थी कि यदि रामलीला बन्द नहीं की गई, तो वे उसकी प्रतिक्रिया में राम, सीता और लक्ष्मण के पुतले जलाने के लिए विवश हो जायेंगे। इन्दिरा जी ने उनके पत्र का कोई नोटिस नहीं लिया, और परिणामस्वरूप उन्होंने ‘25 दिसम्बर 1975 को रावण-लीला करके राम, लक्ष्मण और सीता के 18 फीट ऊंचे विशाल पुतलों को जलाया।’

वर्माजी ने अनेक पुष्कल प्रमाणों से स्पष्ट किया है कि राम और रावण काल्पनिक पात्र हैं। उन्होंने अपना मत प्रतिपादित किया, ‘ऐसा लगता है, महामना बुद्ध के सम्बन्ध् में लिखे गए अश्वघोष के ‘बुद्धचरितम’ के विरोध् में वाल्मीकीय रामायण का सृजन हुआ।’ उनका मत है कि ‘इतिहास में राम व रावण नाम के राजाओं का वर्णन कहीं किसी राज्यवंश परम्परा में नहीं मिलता।’ उनके अनुसार, ‘राम का त्रेता में पैदा होना और ब्राह्मणवाद की स्थापना के लिए मानववादी रावण को मारना एक कोरी कल्पना है।’ उन्होंने निष्कर्ष दिया, ‘कल्पित पात्रों को लेकर संविधान-विरोधी काम करना सर्वथा निन्दनीय और दण्डनीय ही कहा जायेगा। अतः रामलीला करना सर्वथा अनुचित है। राम-रावण जैसे कल्पित पात्रों के लिए राष्ट्रीय एकता को हानि पहुंचाना पूरे तौर पर अविवेकपूर्ण ही कहा जायेगा।’

मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद

रामस्वरूप वर्मा ने ‘मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद’ शीर्षक से लिखी पुस्तक में राष्ट्रीयता और हिन्दू राष्ट्रवाद पर गम्भीर चर्चा की है। उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि भारत में अनर्जक, यानी शोषक श्रेणी के लोग भावनात्मक एकता की बातें तो बहुत करते हैं, और एक राष्ट्र होने के नारे भी लगाते हैं, किन्तु वे यह नहीं बताते कि यह एकता कायम कैसे होगी। उन्होंने प्रश्न किया: ‘जिस देश में आठ करोड़ अछूत, चार करोड़ आदिवासी, छह करोड़ मुसलमान तथा एक करोड़ ईसाइयों के हाथ का छुआ पानी पीने में भी रोक हो, ऐसी ब्राह्मणवादी व्यवस्था देश में एकता के रास्ते में बाधक नहीं, तो क्या है? ब्राह्मणवाद के प्रबल स्तम्भ शंकराचार्य जैसे लोग तो शूद्रों और म्लेच्छों को इन्सान भी मानने को तैयार नहीं। फिर इनका बनाया हुआ भोजन करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यह है ब्राह्मणवाद की राष्ट्र-विरोधी भेद-कारक दुर्नीति, जिसके रहते भारत में एकता असम्भव ही रहेगी।’

भारत के वर्तमान शासक जनतन्त्र में भारतीय संविधान की शपथ खाते हैं, किन्तु ब्राह्मणवाद को पालते-पोसते हैं। वर्माजी के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने 11 अप्रैल 1974 को ‘गुरु गंगेश्वर चतुर्वेद संस्थान’ की ओर से वेद-प्रचार हेतु किए जाने वाले 11 दिवसीय आयोजन के अन्तिम दिन वेद-स्थापना संस्कार पूरा किया था। इस अवसर पर उन्होंने कहा था कि वेद ज्ञान का भंडार हैं और वे सहिष्णुता तथा समता की शिक्षा देते हैं। वर्माजी ने इसके खण्डन में कहा कि वेदों में ब्राह्मणों में एकता लाने के लिए तो अवश्य मन्त्र आए हैं, किन्तु उनमें ऐसे मन्त्र भी पर्याप्त हैं, जिनमें आर्यों द्वारा दस्युओं ; शूद्रों के नाश की प्रार्थनाएँ की गई हैं। उन्होंने कहा कि इन्दिरा गांधी का यह कहना कि वेद ज्ञान के भंडार हैं, एकदम सत्य से परे है। वेदों का सृजन आर्यों ने अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थनाओं के रूप में किया था, जिनमें बहुत सी उफल-जलूल बातें भी भरी पड़ी हैं और वे प्रार्थनाएं भी दुश्मनों; शूद्रो का नाश करने के लिए, धनी होने के लिए तथा जुआ जीतने जैसी बातों के लिए हैं।

क्या ब्राह्मणवाद भारत के अन्दर एकता की भावना, कौम, धर्म या संस्कृति के नाम पर जगा सकता है? इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर वर्माजी ने एक विस्तृत विमर्श में दिया है। उनके अनुसार जो लोग हिन्दू राष्ट्र की कल्पना करके चलते हैं, वे अपने आपको ही धोखा देते हैं। लगभग चार हजार जातियों में विभाजित हिन्दू एक कौम कैसे हो सकती है? उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्राह्मणवाद को खत्म किए बगैर भारत का एक राष्ट्र होना असम्भव है।

उन्होंने ब्राह्मणों के आदर्श सूत्र: ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्’ को कोरी लफ्फाजी बताया। 

कँवल भारती , सामाजिक प्रश्नों पर अपने विशिष्ट दृष्टि से हिंदी समाज की जड़ता तोड़ने वाले हमारे समय के महत्वपूर्ण चिंतक हैं।

 *यह लेख 5 जुलाई 2020 को पहली बार मीडिया विजिल में छपा था।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

बाबा साहब ने क्या इसीलिए कुर्बानी दी थी  



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक भारतीय दक्षिणपंथी हिंदुत्व स्वयंसेवी[1] अर्धसैनिक संगठन है।[2] यह संघ परिवार नामक हिंदुत्व संगठनों के एक बड़े समूह का जनक और नेतृत्वकर्ता है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी शामिल है, जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल है। मोहन भागवत वर्तमान में आरएसएस के सरसंघचालक (मुख्य) हैं, जबकि दत्तात्रेय होसबाले सरकार्यवाह (महासचिव) के रूप में कार्यरत हैं। 27 सितंबर 1925 को स्थापित,[3] इस संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य चरित्र निर्माण करना और “हिंदू अनुशासन” स्थापित करना था, ताकि हिंदू समुदाय को संगठित कर एक हिंदू राष्ट्र की स्थापना की जा सके।[4] यह संगठन हिंदुत्व की विचारधारा के प्रसार के माध्यम से हिंदू समुदाय को “सशक्त” बनाने तथा भारतीय संस्कृति और उसकी “सभ्यतागत मूल्यों” को बनाए रखने का लक्ष्य रखता है। दूसरी ओर, आरएसएस को “हिंदू श्रेष्ठतावाद” के सिद्धांत पर आधारित संगठन के रूप में भी वर्णित किया गया है। इस पर अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता के आरोप भी लगाए गए हैं।[5]

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ-संचलन
संक्षेपाक्षर आर० एस० एस०
स्थापना 27 सितम्बर 1925 (100 वर्ष पूर्व)
विजयादशमी १९२५
संस्थापक डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार
प्रकार स्वयंसेवी, निःस्वार्थ राष्ट्रभक्ति[1], अर्धसैनिक[6][7]
वैधानिक स्थिति सक्रिय
उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद[8]
मुख्यालय नागपुर, महाराष्ट्र, भारत
निर्देशांक 21.146634°N 79.110654°E
सेवित क्षेत्र
क्षेत्र भारत
विधि समूह चर्चा, बैठकों और अभ्यास के माध्यम से शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण
सदस्यता
५०-६० लाख[9][10][11]
५६८५९ शाखाएँ (२०१६)[12]
आधिकारिक भाषा
संस्कृत, हिन्दी
महासचिव
सुरेश 'भैयाजी' जोशी
सरसंघचालक
मोहन भागवत
संबद्धता संघ परिवार
ध्येय "मातृभूमि के लिए निःस्वार्थ सेवा"
जालस्थल rss.org/hindi/
औपनिवेशिक काल के दौरान, आरएसएस ने ब्रिटिश राज के साथ सहयोग किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कोई भूमिका नहीं निभाई।[13][14] स्वतंत्रता के बाद, यह एक प्रभावशाली हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में विकसित हुआ, जिसने कई संबद्ध संगठनों की स्थापना की, जिनके माध्यम से स्कूल, चैरिटी और क्लब संचालित किए गए। इसे 1947 में चार दिनों के लिए प्रतिबंधित किया गया था, और बाद में तीन बार और प्रतिबंधित किया गया—पहली बार 1948 में जब नाथूराम गोडसे, जो आरएसएस से जुड़ा था, ने महात्मा गांधी की हत्या की; फिर आपातकाल (1975–1977) के दौरान; और तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।
संस्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर सन् १९२५ में विजयादशमी के दिन डॉ॰ केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी।
सबसे पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।

सरसंघचालक

शताब्दी समारोह और मुख्य आकर्षण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने विजयादशमी, 2 अक्टूबर, 2025 को 100वां वर्ष पूरा किया। [15][16]

स्मारक डाक टिकट और सिक्का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक स्मारक सिक्के का अनावरण किया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। इस सिक्के पर पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारत माता की तस्वीर अंकित है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर एक विशेष डाक टिकट और ₹100 का स्मारक सिक्का जारी किया। [17]भारतीय मुद्रा के इतिहास में पहली बार, सिक्के पर भारत माता की छवि अंकित है।[18]

मुख्य अतिथि

मध्य में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2 अक्टूबर, 2025 को (आरएसएस) विजयादशमी उत्सव में मुख्य अतिथि थे, जो संगठन के शताब्दी समारोह का भी प्रतीक था। [19] यह कार्यक्रम नागपुर के रेशमबाग मैदान में आयोजित किया गया था, जहाँ 1925 में आरएसएस की स्थापना हुई थी। कोविंद ने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए कहा कि दोनों व्यक्तियों ने उनके जीवन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सामाजिक एकता और सद्भाव के उनके दर्शन में समानताएँ बताईं।[20]

संरचना

संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघचालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। वर्तमान में संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचपन हजार से ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेलयोगवंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

२०११ में नागपुर में संघ का एक कार्यक्रम

संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:

  • केंद्र
  • क्षेत्र
  • प्रान्त
  • विभाग
  • जिला
  • तालुका/तहसील/महकमा
  • नगर
  • खण्ड
  • मण्डल
  • ग्राम
  • शाखा

शाखा

शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:

  • प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
  • सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
  • रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
  • मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
  • संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।

पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५५,००० से ज्यादा शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता हैं।

संघ के उत्सव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पहला उत्सव है, वर्ष प्रतिपदा। इसे नव-संवत्सर भी कह सकते हैं। इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था और सभी देवताओं ने सृष्टि के संचालन का दायित्व संभाला था। यह भारतीय या हिंदू रीति से नव वर्ष का शुभारंभ है। यह उत्सव चैत्र शुक्ल प्रथमा को मनाया जाता है।

संघ का दूसरा उत्सव है -- गुरु पूर्णिमा। यह उत्सव पूरे देश में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। भारत में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया है। संघ में गुरु किसी व्यक्ति को न मानकर भगवा ध्वज को माना गया है। भगवा ध्वज भारत की सनातन संस्कृति का प्रतीक है। इसी प्रतीक में भारत की समूची ऋषि-परम्परा छिपी है। यही कारण है कि इस उत्सव के माध्यम से स्वयंसेवक देश की प्राचीन संस्कृति की अमूल्य धरोहर से जुड़ते हैं और भारतीय संस्कारों पर गर्व करते हैं। संघ में गुरु पूर्णिमा को गुरु दक्षिणा के रूप में भी मनाया जाता है।

संघ का तीसरा उत्सव है, रक्षा बंधन। आज समाज में यह उत्सव भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा से जुड़ा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में यह उत्सव दूसरे रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी स्वयंसेवक शाखा पर एकत्र होते हैं और एक-दूसरे को रक्षा का सूत्र बाँधते हैं। इस प्रकार वे अपने भाइयों के लिए, अपने धर्म और संस्कृति के लिए एक-दूसरे के काम आने के संस्कार को सुदृढ़ करते हैं। यह उत्सव सभी को सामूहिक सुरक्षा का संस्कार देता है।

संघ का चौथा उत्सव है -- हिंदू साम्राज्य उत्सव । महाराज शिवाजी ने सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बीच अपने बल पर हिंदू राज्य की स्थापना की थी- संघ के लिए यह बहुत बड़ी प्रेरणा है। शिवाजी अकेले ऐसे शासक थे जिन्होंने चारों ओर फैले विदेशी शासन को छकाते हुए न केवल उन्हें चुनौती दी अपितु उनके बीच अजेय हिंदू राष्ट्र के रूप में अपने राज्य की स्थापना की।

संघ का पाँचवाँ उत्सव है -- विजयादशमी उत्सव । संघ हिंदू संस्कृति की विजय का स्वप्न साकार करना चाहता है। इसके लिए विजयदशमी से बढ़कर अच्छा उत्सव और कौन हो सकता है। इस उत्सव में संघ में पहले शस्त्र-पूजा की जाती है फिर पूरे शहर में गणवेशधारी स्वयंसेवकों का पथ-संचलन होता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का छठा उत्सव है मकर संक्रांति। यह सूर्य की दिशा के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर उन्मुख होने का उत्सव है। यह नई चेतना के संचार का उत्सव है।

ऐसा नहीं है कि संघ इन छहों उत्सवों के अलावा अन्य कोई उत्सव मनाता ही न हो। होलीदीपावलीशरद पूर्णिमा, ऐसे उत्सव हैं जिनपर संघ में खूब हर्षोल्लास मनाया जाता है।

संघ शिक्षण वर्ग

१९३९ के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय का फोटो

ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:

  • दीपावली वर्ग — ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
  • शीत शिविर या (हेमंत शिविर) — ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।
  • निवासी वर्ग — ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।
  • बौद्धिक वर्ग — ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
  • शारीरिक वर्ग — ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
  • संघ शिक्षा वर्ग — प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं।
    • "प्राथमिक वर्ग" एक सप्ताह का होता है। इस वर्ग का आयोजन सामान्यतः जिला करता है।
    • "प्रथम" और "द्वितीय वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं। इस वर्ग का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है। "द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है।
    • "तृतीय वर्ग" 25 दिनों का होता है। इसका आयोजन हर साल नागपुर में ही होता है।

कार्य

सामाजिक सेवा और सुधार

हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।[21]

महात्मा गांधी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।[22]

राहत और पुनर्वास

सुनामी के उपरान्त सहायता कार्य में जुटे स्वयंसेवक

राहत और पुर्नवास संघ कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश चक्रवात में रहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है।[23]

संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।

उपलब्धियाँ

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया।[24] केवल दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

दादरा, नगर हवेली, और गोवा का वि-उपनिवेशीकरण

दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका रही। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया।

इसी प्रकार संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से जवाहरलाल नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा हुई। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा स्वतन्त्र हुआ।[25][26]

आपातकाल के विरुद्ध आन्दोलन

२५ जून १९७५ को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक शिष्टाचार तथा सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मात्र अपना राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल थोप दिया। उस समय इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी नीतियों, भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा और सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘समग्र क्रांति आंदोलन’ चल रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्ण समर्थन मिल जाने से यह आंदोलन एक शक्तिशाली, संगठित देशव्यापी आंदोलन बन गया। इस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ टक्कर लेकर उसे धूल चटा सकती थी। इस संभावित प्रतिकार को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा अन्य छोटी-मोटी २१ संस्थाओं को प्रतिबन्धित किया गया। किन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा किसी की ओर से विरोध का एक भी स्वर नहीं उठा। इससे उत्साहित हुई इंदिरा गांधी ने सभी प्रांतों के पुलिस अधिकारियों को संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ तेज करने के आदेश दे दिये। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने उस चुनौती को स्वीकार करके समस्त भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया और एक राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलन के प्रयास में जुट गए। थोड़े ही दिनों में देशभर की सभी शाखाओं के तार भूमिगत केन्द्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ गए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूमिगत नेतृत्व (संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक) एवं संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद एवं मजदूर संघ इत्यादि लगभग ३० संगठनों ने भी इस आंदोलन को सफल बनाने हेतु अपनी ताकत झोंक दी। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों एवं विभिन्न विचार के लोगों को भी एक मंच पर एकत्र कर दिया। संघ ने नाम और प्रसिद्धि से दूर रहते हुए राष्ट्रहित में काम करने की अपनी कार्यपद्धति को बनाए रखते हुए यह आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा घोषित ‘लोक संघर्ष समिति’ तथा ‘युवा छात्र संघर्ष समिति’ के नाम से ही चलाया। संगठनात्मक बैठकें, जन जागरण हेतु साहित्य का प्रकाशन और वितरण, सम्पर्क की योजना, सत्याग्रहियों की तैयारी, सत्याग्रह का स्थान, प्रत्यक्ष सत्याग्रह, जेल में गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता/सहयोग,प्रशासन और पुलिस की रणनीति की टोह लेने के लिए स्वयंसेवकों का गुप्तचर विभाग आदि अनेक कामों में संघ के भूमिगत नेतृत्व ने अपने संगठन कौशल का परिचय दिया।

इस आंदोलन में भाग लेकर जेल जाने वाले सत्याग्रही स्वयंसेवकों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा थी। सभी आयुवर्ग के स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी से पूर्व और बाद में पुलिस के लॉकअप में यातनाएं सहीं। उल्लेखनीय है कि उस समय पूरे भारत में संघ के प्रचारकों की कुल संख्या १३५६ थी (अनुषांगिक संगठनों के प्रचारक इसमें शामिल नहीं हैं) जिनमें से मात्र १८९ को ही पुलिस पकड़ सकी, शेष भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन करते रहे। स्वयंसेवकों ने विदेशों में भी जाकर इमरजेंसी को वापस लेने का दबाव बनाने का सफल प्रयास किया। विदेशों में इन कार्यकर्ताओं ने ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के नाम से विचार गोष्ठियों तथा साहित्य वितरण जैसे अनेक कामों को अंजाम दिया।

बाद में इंदिरा गांधी ने संघ के भूमिगत नेतृत्व एवं जेलों में बन्द नेतृत्व के साथ एक प्रकार की राजनीतिक सौदेबाजी करने का विफल प्रयास किया था। उन्होने कहा– ‘‘संघ से प्रतिबन्ध हटाकर सभी स्वयंसेवकों को जेलों से मुक्त किया जा सकता है, यदि संघ इस आंदोलन से अलग हो जाए’’। परन्तु संघ ने आपातकाल हटाकर लोकतंत्र की बहाली से कम कुछ भी स्वीकार करने से मना कर दिया। संघ ने इंदिरा गान्धी के पास स्पष्ट संदेश भेज दिया गया – ‘‘देश की जनता के इस आंदोलन का संघ ने समर्थन किया है, हम देशवासियों के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते, हमारे लिए देश पहले है, संगठन बाद में’’।

अन्त में देश में हो रहे प्रचण्ड विरोध एवं विश्वस्तरीय दबाव के कारण आम चुनाव की घोषणा कर दी गई। इंदिरा गान्धी ने समझा था कि बिखरा हुआ विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकेगा, परन्तु संघ ने इस चुनौती को भी स्वीकार करके सभी विपक्षी पार्टियों को एकत्र करने जैसे अति कठिन कार्य को भी कर दिखाया। संघ के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने प्रयत्नपूर्वक चार बड़े राजनीतिक दलों को अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक मंच पर आने को तैयार करा लिया। सभी दल जनता पार्टी के रूप में चुनाव के लिए तैयार हो गए।

चुनाव के समय जनसंघ को छोड़कर किसी भी दल के पास कार्यकर्ता नाम की कोई चीज नहीं थी, सभी के संगठनात्मक ढांचे शिथिल पड़ चुके थे, इस कमी को भी संघ ने ही पूरा किया। लोकतंत्र की रक्षा हेतु संघर्षरत स्वयंसेवकों ने अब चुनाव के संचालन का बड़ा उत्तरदायित्व भी निभाया। अन्ततः जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया।

आलोचनाएँ और आरोप

महात्मा गाँधी की १९४८ में संघ के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद संघ पर सरदार पटेल ने प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया।

संघ के आलोचकों द्वारा संघ को एक अतिवादी दक्षिणपंथी संगठन बताया जाता रहा है एवं हिंदूवादी और फ़ासीवादी संगठन के तौर पर संघ की आलोचना भी की जाती रही है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का यह कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लिप्त रहती हैं। विवादास्पद शाहबानो प्रकरण एवं हज-यात्रा में दी जानेवाली सब्सिडी इत्यादि सरकारी नीति उसके अनुसार इसके प्रमाण हैं।

संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की इस बारे में मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। इस क्रम में सबसे विवादास्पद और चर्चित मामला अयोध्या विवाद रहा है जिसमें बाबर द्वारा सोलहवीं सदी में निर्मित एक बाबरी मसजिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में भगवा ध्वज अपनाने का पक्षधर

आरम्भ में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे के स्थान पर भगवा ध्वज को स्वीकार करने का पक्षधर था। संघ ने, अपने मुखपत्र "ऑर्गनाइज़र" के १७ जुलाई १९४७ दिनांक के "राष्ट्रीय ध्वज" शीर्षक वाले संपादकीय में, "भगवा ध्वज" को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करने की मांग की।[27]

21वीं सदी में, सदस्य संख्या के आधार पर इसे दुनिया का सबसे बड़ा अतिदक्षिणपंथी संगठन माना जाता है। आरएसएस की आलोचना एक उग्रवादी संगठन के रूप में भी की गई है, और कई विद्वानों का मानना है कि यह घृणा फैलाने और हिंसा को बढ़ावा देने का कार्य करता है।

ख्यातिप्राप्त स्वयंसेवक

संबंधित संगठन

अनेकों संगठन हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित हैं और स्वयं को संघ परिवार के सदस्य बताते हैं।[28] अधिकांश मामलों में, इन संगठनों के शुरूआती वर्षों में इनके प्रारम्भ और प्रबन्धन हेतु प्रचारकों (संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक) को नियुक्त किया जाता था।

संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशों में कार्यरत है। संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है। जिनमे कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संघठन सक्रिय रहते हैं।

सम्बद्ध संगठनों में कुछ प्रमुख संगठन ये हैं -[29]

संघ साहित्य के प्रकाशक

निम्नलिखित प्रकाशन संघ की योजना द्वारा संचालित नहीं है, निजी हैं। इन प्रकाशनों ने भी उच्च कोटि का संघ साहित्य बड़ी संख्या में प्रकाशित किया है।

  1. सुरुचि प्रकाशन , देशबन्धु गुप्ता मार्ग , झण्डेवाला, नई दिल्ली-५५
  2. लोकहित प्रकाशन , संस्कृति भवन ; राजेन्द्र नगर, लखनऊ-४
  3. राष्ट्रोत्थान साहित्य , केशव शिल्प ; केम्पगौड़ा नगर, बंगलौर-१९
  4. भारतीय विचार साधना
    • डॉ॰ हेडगेवार भवन महाल, नागपुर-४४०००२
    • मोती बाग ; ३०९, शनिवार पेठ, पुणे-४११०३०
    • मंगलदास बाड़ी, डॉ॰ भडकम्कर मार्ग नाज सिनेमा परिसर, मुम्बई-४०००४
  5. ज्ञान गंगा प्रकाशन , भारती भवन, बी-१५, न्यू कालोनी, जयपुर-३०२००१
  6. अर्चना प्रकाशन , एच.आई.जी.-१८, शिवाजी नगर, भोपाल-४६२०१६
  7. साधना पुस्तक प्रकाशन , राम निवास ; बलिया काका मार्ग, जूनाढोर बाजार के सामने, कांकरिया, अमदाबाद -३८००२८
  8. सातवलेकर स्वाध्याय , पो - किलापारडी , मण्डल जिला-वलसाड, गुजरात-३९६१२५
  9. साहित्य निकेतन , ३-४/८५२, बरकतपुरा, हैदराबाद-५०००२७
  10. स्वस्तिश्री प्रकाशन , ४४/९, नवसहयाद्री सोसाइटी , नवसहयाद्री पोस्टास मोर पुणे-४११०५२
  11. जागृति प्रकाशन , एफ. १०९, सेक्टर-२७ , नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) उ.प्र. २०१३०१
  12. सूर्य भारती प्रकाशन , २५९६, नई सड़क, दिल्ली-११०००६

चित्र दीर्घा

सन्दर्भ

  1.  Andersen & Damle 1987, p. 111.
  2. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; paramilitary नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  3. Chitkara, National Upsurge 2004, p. 362.
  4. Andersen & Damle 1987, p. 2.
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  6. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; McLeod2002 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
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  34. Chitkara, National Upsurge 2004, p. 168.

इन्हें भी देखें

विचारधारा

बाहरी कड़ियाँ

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