सामाजिक चिन्तक

दलित प्रतिरोध और कबीर की कविता
(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राधा कृष्णन सभागार में  (दिनांक 29.09.2013) समय 14.00 बजे दलित प्रतिरोध और कबीर की कविता विषयक संगोष्ठी में दिया गया व्याख्यान।)


-बी॰आर॰विप्लवी
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का दलित-साहित्य-चैप्टर एवं हिन्दी पत्रिका अनिश के संपादक-प्रकाशक डाॅ॰ विपिन कुमार इस आयोजन के लिए बधाई के पात्र हैं। वास्तव में समस्याओं का हल तो बातचीत के ज़्ारिए आपसी समझ-बूझ एवं विश्वास पैदा करके ही सम्भव होता है। यह संगोष्ठी इस दिशा में महत्वपूर्ण क़दम है। 

 इसके पहले कि विषय पर बातचीत शुरू की जाय विषय और वक्ता से श्रोताओं का संवाद सानिध्य बनाने के लिए जरूरी है कि अपने बारे में बता दिया जाय। रेल विभाग में एक टेक्नोक्रैट की हैसियत से मुलाज़्ामत के नाते शुष्क खुरदरे तकनीकी कार्यों की खटर-पटर में रात-दिन खपाना प्रायः स्वभाव बन गया है जहाँ साहित्यिक सोच-समझ के लिए न तो समय है न तो समुचित अवसर। फलतः ऐसे आयोजनों में शिरकत कर पाने की कम ही गंुजाइश बन पाती है। यूँ भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय में हिन्दी के प्रोफेसर, रीडर, विभागाध्यक्ष लोगों के बीच ख़ुद को इतर व्यावसायिकता के कारण रूप से अकेला और अलग-थलग ही पा रहा हूँ। लगता है कि दूसरों कीे स्व-परिभाषित एवं पूर्व-निर्धारित निषिद्ध सीमा में जाकर अकादमिक ज्ञान-मीमांसा की बहस में टांग अड़ाने के लिए खड़ा हूँ। फिर भी कोशिश रहेगी कि साहित्यिक पोथियों में लिखी-पढ़ी बातों को सामाजिक संदर्भों में परिचर्चा का विषय बनाऊँ। इसलिए बता दूँ कि मेरी चर्चा की सीमाएँ कबीर के सामाजिक सरोकारों तक होंगी और कविताओं को देखने की दृष्टि भी वही होगी ताकि़ कबीर की विरासत के असली-नकली पैराहन की भीतरी शिनाख़्त उनके लोगों की राज़मर्रा की उठने-बैठने, बोलने, सोचने, खाने-पीने से लेकर लोकाचार तक के माध्यम से भी की जा सके। सबसे पहले यह साफ़ हो जाना चाहिए कि यदि अगरबŸाी, लोबान जलाकर कबीर का भूत उतारना है या फूल-माला चढ़ाकर कबीर के विचारों का गला घोट देना है तो इन आयोजनों को छलावा ही कह सकते हैं। कबीर की कविता पर बातचीत होगी तो दलित-शोषण की बात अवश्य ही होगी। यदि दलित की बात होगी तो साथ में ब्राह्मणवाद की भी बात होगी ही अन्यथा इसके विना यह चर्चा कबीर के सच के साथ आँख-मिचैली का खेल और लुकाछिपी जैसा धोखा बनकर केवल मन-बहलाव जैसा ही का साधन मात्र होगी। यदि इस भ्रमवाद की चर्चा को पर्दे में रखकर बात की जाएगाी तो कबीर पर बातचीत अधूरी, ग़ैरवाजिब़ तथा आत्मवंचना बनकर असंगत ही रहेगी। ऐसी स्थिति में कबीर को ईमानदारी से समझ पाने के लिए हमें उनके शब्दों, संबोधनों, ध्वनियों, मुहावरों, कहावतों, उलाहनों, गालियों और व्यंग्योक्तियों को सहलाना-पुचकारना होगा और उनको जीना होगा। ब्राह्मणवाद सरीखे शब्दों को व्यक्तिगत या सामूहिक अवमानना का संबोधन न समझकर इस शोषणवादी विचारधारा को समझना होगा वरना कबीर की कविता और कबीर की आरती उतारकर यहाँ से विदा हो लेना ही ज़्यादा अच्छा होगा। ठीक इसी प्रकार धम्म और धर्म की मूलभूत और लोक स्वीकृत धारणाओं को समझे विना भी कबीर की कविता और आध्यात्म पर बात-चीत न्यायसंगत नहीं हो पाएगी। जहाँ कबीर होंगे, वहाँ उनकी जुझारू-भाषा की हनक भी होगी ही। मनमाफि़क कहानी या अख़्यान गढ़कर किसी को अच्छा या बुरा बनाने में कबीर की आड़ ली जाय या उन्हें मिस कोट किया जाय, यह परम्परा बन्द होनी चाहिए, वरना यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन के पैसे पर दलित और स्त्री विमर्श की काग़जी ख़ानापूरी का समाजिक न्याय से कोई लेना देना नहीं रह जाएगा। कबीर की दलित-मुक्ति के स्वर को दबाने के लिए दलित-विमर्श का दिखावा कबीर के साथ फिर से एक धोखा ही साबित होगा।

 कबीर-परम्परा की बोली-बानी और शब्दों की अवधारणा उन लोगों पर सही नाजि़ल होगी जो उन्हें अनायास ही जीते हैं, तथा वही जिनका ओढ़ना-बिछौना है। कबीर की आम फ़हम भाषा को अनपढ़-असभ्य-गँवार कहकर उनके आंदोलन की आँच को ठंडा कर देने का काम हुआ ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंचित समुदाय को उनकी शाश्वत ज्ञान परम्परा से दूर रखा जा सके। इसी उद्देश्य से सर्व-स्वीकृत शब्दों के रूप को बदलकर एक जि़न्दा परम्परा की जड़ काटने का काम हुआ। इसी क्रम में धम्म के बर-अक्स धर्म को गढ़कर खड़ा किया गया तथा बार-बार सर उठाती आवाज़ों का दमन करने का उपक्रम हर दौर में किया गया।

 ज्ञातब्य है कि धर्म का आधार भूत संरचना एवं मान्यता परा प्राकृतिक है जबकि धम्म का आधार विशुद्ध प्राकृतिक है। धम्म आदमी से सीधा संवाद स्थापित करता है किन्तु धर्म में उसके ठेकेदारों के ज़रिए ईश्वर तक पहुँचने की बंदिश है। बुद्ध तो कहते हैं कि धम्म की धुरी मनुष्य और ईश्वर के बीच न होकर मनुष्य और मनुष्य के बीच है। दुनिया के इसी जीवन में मानवता की सेवा-सहायता ही सच्चा धम्म है। कबीर की कविता भी इसी मानव-धम्म की वकालत करती दिखाई देती है जो धर्म की कृत्रिमता की पोषक नहीं बल्कि उसकी उन्मूलक है। यहीं से कबीर की परम्परा एक मज़बूत प्रतिरोध पैदा करती है तथा कबीर का समाज इसी प्रतिरोध को अधिक विकसित करता हुआ आगे बढ़ता है। यही प्रतिरोध उसे भयंकर झंझावातों में भी अडिग एवं दृढ़ रखता हैै तथा जड़ों समेत उखड़ जाने से बचाता  है। 

 अब आज की विषय-वस्तु पर आते हैं अर्थात दलित-प्रतिरोध और कबीर की कविता पर! आखि़र यह दलित प्रतिरोध है क्या ? इसकी व्याख्या ज़रूरी है। रोध से अवरोध, प्रतिरोध और गतिरोध जैसे शब्द बने हैं; जिनके अर्थों के बोध की अलग-अलग लोक-स्वीकृतियाँ हंै। शब्दों की अभिव्यक्ति-क्षमता को सम्पूर्ण लोक-परिवेश ही लोकाचार हेतु तय करता है। समय के साथ शब्दों की स्वीकृत अवघारणा भी बदलती रहती है। यहाँ प्रतिरोध का भाव अवरोध के भाव से भिन्न है। अवरोध किसी के मार्ग में जान बूझकर रुकावट डालने या पैदा करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है जबकि प्रतिरोध स्वयं के ऊपर आत्मस्वीकृत एवं स्वयं पर अध्यारोपित ऐसी रुकावट है जो स्वयं पर औरांे द्वारा अनधिकृत और अवांछित आवेगों, भावांे और वृŸिायों के संचरण और प्रभाव को रोकती है या कहें कि ऐसा कवच बनाती है जिसपर अवांछनीय आक्रमणों को स्वतः बेअसर करने की ताक़त होती है। विज्ञान की भाषा में प्रतिरोध किसी घातु या चालक का वह प्राकृतिक गुण है जो उष्मा या विद्युतधारा के स्वतंत्र बहाव को अंशतः या पूर्णतः रोकता है। ध्यान रहे कि वह धारा को नहंीं रोकता बल्कि धारा को अपने अंदर प्रवाहित होने से अपनी क्षमता की सीमा तक बचाता है। ऐसी ही प्रतिरोधक-क्षमता विकसित करने की बात कबीर की कविता मंे भी देखी जा सकती है। दलित आक्रमण नहीं करता, ज़बरदस्ती किसी का रास्ता नहीं रोकता बल्कि स्वयं को इस स्तर तक मज़बूत और अभेद्य बना लेता है ताकि आक्रामक शक्तियों का कोई भी हथियार निष्क्रिय और अप्रभावी हो जाए। इसीलिए कबीर के यहाँ दलित द्वारा आक्रामकता की बात नहीं कही गई है, बल्कि स्वयं को दूसरों की आक्रामकता से बचने के लिए भीतरी कवच पैदा करने और उसे मज़बूत करने की बात है। यदि आक्रामक तत्वों के प्रत्यावर्तन के कारण आक्रमणकारी स्वयं को घायल कर लेता है तो इसमें उस प्रतिरोधकता को जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जिसने स्वयं की मात्र रक्षा हेतु कवच विकसित किया है। बिजली का बहाव कम प्रतिरोध चाहता है। जहाँ उसे कम प्रतिरोध का सुगम मार्ग मिलता है उसी से होकर बहती है। यही हालत दलितों पर अत्याचारों की है। लेकिन अतिवादी आक्रामक संस्कृति उसके इस प्रतिरोध पर भी एतराज़ करती है। उसे तो ऐसी जमात चाहिये जो आसानी से प्रतिकार-शून्य होकर सभी तरह के अत्याचारी हमलों को बर्दाश्त ही न करे बल्कि आततायियों का जयकारा भी करे। सुनने में यह आज अजीब भी लगता है तो केवल दूसरों को ही। कुछ लोगों का तो यह शगल ही है, जो आज भी उस दमन को ही सामाजिक शान्ति का एक मात्र रास्ता बताते हैं।

 यह बताना प्रासंगिक होगा कि जहाँ भी दलितों के साथ अत्याचार में ख़ून-ख़राबा होता है, द्वन्द्वात्मक प्रतिकार होता है, वहाँ के दलित-पिछड़ों को तथाकथित भद्र समाज के लोग प्रायः निरीह, कमज़ोर और डरपोक समझते हैं। जबकि इसे तो क्रान्तिकारी परिवर्तन हेतु इंक़लाब का शुभ संकेत माना जाना चाहिए। वास्तव में जहाँ प्रतिकार नहीं है, वहाँ अत्याचार भी नहीं हो रहे हैं, यह भी एक भ्रामक तथ्य है। प्रतिकार-शून्य समाज द्वारा अत्याचारों को सहने का आदी होने से ही संतुष्ट होकर यह मान लेना कि यहाँ पर अत्याचार नहीं है, एक आत्म-वंचना की स्थिति है। जहाँ प्रतिकार, प्रतिशोध और अन्याय के विरुद्ध तन कर खड़े होने की प्रवृŸिा होगी, संघर्ष वहीं होगा।  शेर-बकरी के बीच संघर्ष नहीं हो सकता। वहाँ एकतरफ़ा हमला होता है तथा जंगल की शांति में खलल केवल में़़़...में.... के चंद शब्दों भर होता है और उसके पल भर में बुझ जाने तक ही रहता है। किन्तु एक शेर और सुअर की लड़ाई से जंगल प्रायः थर्रा उठता है। शोर दूर तक पहुँचता है। शेर की मृत्यु भले ही न हो किन्तु अपनी जि़दगी बचाने के लिए जूझता सुअर, शेर को मुश्किलों में डाल देता है। ऐसे में जंगल का राजा यूँ ही, तफ़रीहन, सुअर की अस्मिता पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं करता। यही इन संघर्षो का सबक़ है।

  अभी-अभी एक वक्ता के हवाले से बताया गया है कि बीते कल को उन्होंने (त्रिपाठी जी ने) अपना वक्तव्य दिया जिसमें सवाल उठाया कि ’’लोग ब्राह्मणवाद की बात तो करते हैं लेकिन यह क़तई नहीं बताते हैं कि वे किस ब्राह्मणवाद की बात करते हैं ? ब्राह्मणवाद के भी कई भेद हैं आदि-आदि..........। श्इस संबंध मंे इतना अवश्य कहना होगा कि ब्राह्मणवाद केवल ब्राह्मणवाद है तथा इसमें हिन्दु जातियों की भाँति तरह-तरह के भेद गढ़ कर भारी-भरकम शब्द-जाल में तथ्यों को उलझाना तो ब्राह्मणवादी परंपरा ही है। ऐसे शब्दों के अवगुंठन में छिपी ख़तरनाक नीयत वंचितों-दलितों-मज़्लूमों को लक्ष्य से भटकाने के लिए ताक लगाये बैठी है। इसे पहचानना ज़रूरी है। वह अपने चोले को समयानुसार एवं परिस्थिति-अनुकूल बदल-बदल कर प्रगट होती रहती है। उसे तो उसके हर रूप में ही चुनौती मिलनी चाहिये। परजीवी संस्कृति की यह विशेषता होती है कि वह अपना हर शिकार अपनी इकलौती स्ट्रेटेजी के बार-बार दोहराव के अन्तर्गत नहीं करता है। इससे पहले कि शिकार उसकी पूर्व में अपनाई गई तकनीकों को समझे और उससे बचने का रास्ता तलाशे, वह अपनी सम्पूर्ण रणनीति को ही बदल लेता है। कई बार शिकार की अपनी ही बिरादरी सा रूप धर लेता है और साथ चलता हम सफ़र एकाएक शिकारी के बाने में नमूदार हो जाता है। परजीवी संस्कृति अपने लक्ष्य में एक बार फिर से सफल हो जाती है। इसीलिए आजकल दलित-ब्राह्मणवाद, दलितों में ब्राह्मणवाद आदि नये-नये उत्पादों की ओर ध्यान खींचा जा रहा है ताकि मुख्य मुद्दे से लोगों का ध्यान हटया जा सके। ऐसे हथकंडे कोई नये नहीं हैं। इस संदर्भ में एक छोटी सी ग्रामीण कहानी का जि़क्र करना चाहूँगा। शायद इन उपक्रमों को समझने में यह काफ़ी मदद कर सकती है। हुआ यूँ कि एक बार उस गाँव के पुरोहित ने बस्ती के लोगों में यह बात फैला दी कि फलाँ-तारीख़ की रात बारह बजे के बाद पिशाच की बेटी का ब्याह सिवान के पीपल के पेड़ पर होने का मुहुर्त है। तदनुसार आगन्तुक पिशाच बारात लेकर आएगा। वह पूरी शान-शौक़त से आसमान मार्ग से आएगा। उनके आते ही आसमान में चकाचैंध करता उजाला हो जाएगा। इस बात को नमक-मिर्च लगाकर अफ़वाह की सूरत फैला दिया गया। मुक़र्रर तारीख़ को रात बारह बजा नहीं कि पहले से ही बस्ती के लोग एक-एक कर इक्ठ्ठा होने लगे। देखा-देखी समूची बस्ती के बाल-वृद्ध, नर-नारी एकत्र हो गये।  सिवान में जैसे मेला लग गया। बस्ती में सन्नाटा था और सिवान में चहल-पहल! सयानों (जानकारों) नेे सबको ख़ामोश रहने की हिदायत दी ताकि पूरा तमाशा बिना टोक-टाक के देखा जा सके। ख़बर यह भी थी कि पिशाच की बारात जब गगन-मार्ग से आयेगी तो उस समय आसमान में एकाएक उल्का पिंड जैसा अप्रतिम उज़ाला पीपल के पेड़ तक आ जायेगा। सबकी आँखो को तेज़ मशाल की सूरत में रौशनी चका-चैंध कर देगी। औरत-मर्द ख़ामोशी की हिदायत के बावज़्ाूद खुसर-फुसर करने से बाज़ नही आ रहे थे। सबके दिमाग में बस उसी ब्याह के भावी दृश्य पर मंथन चल रहा था। समय बीतता रहा और लोग साँसे रोके इंतज़ार करते रहे। रात के बारह बज गये। उसके बाद पिछले पहर के एक, दो और तीन बज गये। बारात में देर-सबेर होने के व्यावहारिक कारणों पर चर्चा होती रही। भिनसार की चुक चुकिया चिरई भी बोल उठी। कहीं कोई रोशनी नहीं। रोशनी दिखी तो बस सबेरे के सूरज की। सारी बस्ती रत जगा करके उदास-निराश अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगी। बस्ती वाले अच्छे-भले, खाते-पीते लोग थे। बस्ती के कमासुतों ने एक दूसरे से आगे निकलते की ठानी थी। लेकिन यह क्या ? लौटकर बस्ती के लोगों ने देखा कि उनका सारा माल-असबाब तो उसी रात लुट चुका था। लगता है ष्पिशचवाष् की बारात पीपल के पेड़ पर न आकर बस्ती की ओर रुख कर ली। एक गुनिया ने शक ज़ाहिर किया कि कहीं पुरोहित की पिशचवा के बारातियों से दोस्ती तो नहीं थी ? रोना-पीटना-कोसना तो दिन भर चला लेकिन किसकी मज़ाल कि पंडित जी को दोष मढ़े? गुनिया ने प्रवक्ता के तौर पर बयान बदल दिया कि बारात आने के समय गाँव के किसी मर्द ने छींक दिया था जिसके कारण अपसकुन हुआ और क्रोधित पिशचवा ने पूरी बस्ती को तबाह कर डाला।

 कहना यह है कि ऐसी कहानियाँ भी कई हक़ीक़तों और अनुभवों के बाद ही बनती हंै। ठगे-लुटे लोग कुछ समझ पायें, इसके पहले ही पिशचवा स्वयं देवता का रूप धर लेता है, और भारत भर का दूध अकेले ही पी जाता है। कभी दूध पीता है, कभी टोपी लगा कर भष्टाचार मिटाने के लिए अवतार ले लेता है। कभी योग-विद्या और आयुर्वेद विज्ञान से सशक्त भारत बनाते-बनाते चुनाव लड़ने या लड़ाने का मंत्र-फूँक नारा लगाने लगता है। वह जब कभी बौद्ध भिक्षुओं का नया नकली दल तैयार करके आत्म-विस्फोटक बम का रूप दे देता है, तो भी उसका चोला सामयिक एवं प्रथम दृष्टया प्रासंगिक ही लगता है। ऐसे में उसका शिकारी स्वरूप खाल और खोल के नीचे घात लगाये बैठा रहता है। मठों, ठगों और स्वनाम-धन्य बाबाओं की अश्लील हरक़तों को बताना भी कठिन, छुपाना भी भारी। ऐसी बट-मार धर्मधारियों की टीम नियोजित प्रबंधन के तहत काम करती है। वेदवानों (विद्वानों ?) की ऐसी ही परम्परा अपने मायाजाल में उलझाकर बड़े-बड़े आन्दोलनों की हवा निकाल चुकी है।

 एक प्रश्न यह उठाया गया है कि आखि़रकार बुद्ध ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे प्रश्नों को अव्याकृत रखकर उनसे टकराने से क्यों बचते रहे तथा क्या उन्होंने भी वर्णवादी व्यवस्था को सीधे चुनौती न देकर मूक रहकर उन्हीं का साथ नहीं दिया। कहना यह है कि किसी भी विचारक,  अन्वेषक, मनीषी या दर्शन-शास्त्री के विचारोें का मूल्यांकन समय के सापेक्ष सामाजिक-राजनैतिक एवं धार्मिक परिवेश में ही किया जाना चाहिये। ईसा के 600 वर्ष पहले जब वैदिक प्रभाव ने अपना विस्तार और प्रभाव सशक्त कर लिया थाय धर्म के एकमात्र ज्ञाता, वाचक, प्रकाशक  और व्याख्याता केवल ब्राह्मण ही थे जिन्होंने राजनैतिक सŸााओं को भी अपने काबू में करने का उपक्रम कर रखा था। ऐसे में मंद-मति दलित पीडि़त जनता को प्रशिक्षित करने के बजाय उनके भरोसे वेदवाद से भैतिक संघर्ष कदाचित आत्मघाती ही होता। इसी तारतम्य में वैदिक ब्राह्मणी मान्यताओं की अस्वीकृति या अव्याकृति को देखा जाना चाहिए। बुद्ध भी एक मनुष्य ही थे कोई पराप्राकृतिक या आसमान से उतरनेवाली चमत्कारी शक्ति नहीं। वेे देश-काल की नब्ज़ पकड़कर पीडि़त मानवता को दुःखों से छुड़ाने हेतु अपने कार्य में लगे थे। कुतर्कियों से निरर्थक बहस न करने के कारण कुतर्कों को उनकी मौन स्वीकृति मानना भी एक कुटिल और कपटपूर्ण टिप्पणी है। उन्होंने बार-बार आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक, ईश्वर, पुनर्जन्म की मान्यताओं को नकारा।  ऐसे ही निरर्थक प्रश्नों को बार-बार उठाने के कारण ही उन्होंने इसे अनुत्पादक और लोक हित में बाधक कहा। अव्याकृत का उनका आशय यह था कि वे ही अन्तिम निर्णायक नहीं है जो बता दंे कि इस धरती और आसमान के उस पार क्या है ? यह कब से अस्तित्व मेें है तथा कब तक रहेगी ? इसे बनाने वाला कौन हैै, आदि-आदि.......। क्योंकि इसके बाद भी बहुत से बुद्धिमान आएँगे और शायद बहुत से प्रश्नों का उŸार देंगे तथा समस्याओं को हल करेंगे, उनका निदान बताएँगे। इसीलिए वे ऐसे प्रश्नों को बार-बार चिन्तन-मनन के लिए लोगों पर छोड़ते थे ताकि वे अपनी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बुद्धि-विवेक तथा तर्क से यह जानें  कि सच्चाई क्या है। किसी के द्वारा बताए गये सच को विना ख़ु़द संतुष्ट हुए न मानें। अव्याकृत को इस संदर्भ, में समझे जाने के बजाय भगवान बुद्ध द्वारा दुनिया के तमाम अनुपयोगी, निरर्थक और समय-बर्बाद करने वाले विषयों पर अनुत्पादक बहस में न पड़ने को यह कहना कि वे उन प्रश्नों से जूझने के बजाय उनसे बचते रहे, ठीक नहीं है। भगवान बुद्ध ने अपने समय की ख़ामियों, आडम्बरों, अंधविश्वासों तथा किम्वदन्तियों का जितना स्पष्ट उŸार दिया है, उससे आगे की सोचना भी शायद आज तक संभव नहीं हो पाया है। बुद्ध का दर्शन केवल बुद्धि-विलास या शब्दों की जुगाली का संसाधन नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का अस्त्र बन कर उभरा जिससे बहुजन समाज को सशक्त और आत्म-चेतनायुक्त करने का अस्त्र मिला। निश्चित रूप से इन उपादानों से परजीवी वंचक-संस्कृति के निहित स्वार्थ पूरे नहीं होते, इसीलिए उनके द्वारा बुद्ध और बौद्धों की निन्दा, आलोचना को समझा जाना चाहिए।

 ब्राह्मणवाद के बदलते चेहरे और चोले का जि़क्र करते हुये पहले ही कहा जा चुका है कि इसके बोलने के अर्थ और इसके करने के अर्थ बहुधा एक ही नहीं होते हैं। वह जो कहता है वही करता नहीं और जो करता है उसे बताता नहीं। ऐसी ही उसकी रणनीति और चाल है। किन्तु कबीर जो कहते हैं, वही करते हैं जो करतें हैं वही कहते हैं। इसीलिए कबीर का उपदेशक रूप अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए दूसरों की माल-मलाई उड़ानेवाला स्वरूप नहीं है। बल्कि वह श्रमण संस्कृति का अनुगामी है। अपनी कठिन मेहनत की कमाई से ही अपना भरण-पोषण करता है। यह कबीर कपड़ा बुनता है, और उसे लेकर ख़ुद बाज़ार में बैठता है, बेचता है और अपने श्रम की क़ीमत पर अपनी जि़न्दगी बशर करता हैं। इसीलिए कबीर ब्राह्मणवाद की दोगली चाल को सरेआम दुत्कारता और खण्डन करता है। ठीक यही बुद्ध के यहाँ भी है। बुद्ध जो स्वयं करते हैं, वही और उतनी ही शिक्षा भिक्षुओं को देते हैं। आपको बताना चाहता हूँ कि भगवान बुद्ध के अग्रिम पंक्ति के भिक्खु सुभद्र ने  कुशीनारा में भगवान बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद ही अपने मूल ब्राह्मणी चरित्र को छुपा न सका था। अभी भगवान का भौतिक शरीर वहीं (कुशीनारा में) रखा ही था कि उस भिक्खु ने कहा श्अच्छा ही हुआ कि यह महान् श्रमण अब नहीं रहा। मत रोओ, मत विलाप करो। हम सब श्रमण गौतम से मुक्त हुए। हमें उसके इस कहने पर बड़ी हैरानी होती थी कि यह तुम कर सकते हो और यह नहीं कर सकते। अब हम जो चाहेंगे करेंगे और जो नहीं चाहेंगे नहीं करेंगे। क्या यह अच्छा नहीं है कि वह चल बसा है। रोना किस लिए। विलाप किस लिए। यह तो खुशी की बात है1।श् यह सुनकर भिक्खुओं ने तत्काल इस पर चर्चा की तदन्नतर समय पाकर संघ की सभा बुलाकर यह निर्णय लिया कि भगवान के वचनों को तत्काल लिपिबद्ध कर लेना चाहिए, वरना इनमें मनमाने परिवर्तन कर इसे नकली बनाने में देर नहीं लगेगी।  धम्म के विरोधी इसे अपनी सुविधा के अनुसार लिखकर मूल वचन गायब कर दंे तो आश्चर्य क्या

आज़ दुनिया हमें भगवान बुद्ध के कारण ही सम्मानपूर्वक जानती-पहचानती है। किन्तु इस देश के ब्राह्मणवाद ने उसी भगवान बुद्ध का देश निकाला कर दिया जिसके द्वारा उपदेशित बुद्ध-धम्म के कारण हम अपने आप को विश्वगुरु कहते हुए शेखी बघारते हैं। उन्हीं को ही तिरस्कृत करने और उनके विचारों को नेस्नाबूद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई। ऐसा करना ब्राह्मणवाद के ही बूते की बात है। इस प्रकार का दोहरा चरित्र पग-पग पर और भारतीय वातावरण की साँस-साँस में व्याप्त है या तो अपने पाँव पूरी तरह फैलाने में प्रयासरत देखा जा सकता है। इसीलिए कबीर कहते हैं कि - श्बिन देखे वहि देस की बात करत है कूर / आपै खारी खात है बेचत फिरै कपूर।श् अर्थात तुम हमसे स्वर्ग की अच्छी-अच्छी लुभावनी बातें करते हो और वहाँ ख़ुद जाने को तैयार नहीं हो। यदि इतनी अच्छी चीज़ हमें मिलने के उपाय बता रहे हो तो पहले तुम्हें ही प्राप्त करनी चाहिए थी। खुद तो ख़ारी (अखाद्य) खा रहे हो, हमें कपूर की सुगंध से बहला रहे हो। इस प्रकार तुम्हारी कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का अन्तर स्पष्ट है। कहना यह है कि भगवान बुद्ध ने जिस प्रचीन श्रमण-मार्ग को प्रशस्त किया, उसी को कबीर ने भी अपनाने की सलाह दी। कबीर ने भगवान बुद्ध के दर्शन को अपने समय की माँग के अनुसार परिभाषित-परिचालित किया। कबीर की अहिंसा स्वयं मार खाकर चुप रह जाने वाली नहीं है। कबीर ष्लुकाठाष् लेकर चैराहे पर खड़े हैं और दुश्मन से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। कबीर ने तो भगवान बुद्ध के विचारों को परिष्कृत करके उसमें वही प्रतिरोधात्मक क्षमता पैदा की है, जिससे लैस होकर हम अपने को अपसंस्कृति के हमले से स्वयं को सुरक्षित रख सकते हैं। कबीर ने बुद्ध-दर्शन का परिष्कार किया-संस्कार किया। इसीलिए भगवान बुद्ध दलित-अस्मिता के प्रथम संस्करण हैं, कबीर उन्हीं के द्वितीय संस्करण और बाबा साहब डाॅ॰ भीमराव अम्बेडकर सबसे नवीन ;स्ंजमेजद्ध संस्करण हैं। कहीं कोई भिन्न नहीं है। धम्म के प्रतिपूरक और शोधक बनकर नये अवरोधों को चुनौती देते कबीर कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं ओर शायद कल भी रहेंगे। बस डर है कि कहीं हम कबीर को भी पत्थर का बुत न बना दें और उनके महिमा-मंडन के घने जंगल में उनके कीमती विचारों को भटका न दें। केवल विचारों की पूजा से ही भला होगा अन्यथा कबीर को लाल झंडे वाले, गेरुआ या नीले रंगों के झंडे वाले इस बुत को लपेटकर एक बिजूका बना देने को तैयार खड़े हैं। इन विचारों के अन्तिम संस्कार करने को अमादा बहु रूपिए आज अपनी हर तिकड़मी चाल के ज़रिए बुद्ध-कबीर-अम्बेडकर को अगवा करने की हर जुगत भिड़ाए पड़े हैं। भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार कहना कबीर को विधवा ब्राह्मणी का बेटा कहना इन्हीं कुटिल करतूतों का परिणाम है। आज इसी परजीवी संस्कृति द्वारा अम्बेडकर भी किसी कद्दावर भगवान के चोले में बैठाए जाने की प्रतीक्षा सूची में रखे गये हैं। इसी प्रकार के अभियान वैचारिक आंदोलनों को भस्मीभूत कर देने में लगातार कामयाब होते दिखाई दे रहे हैं तथा कबीर के वारिस ठकुआए यह तमाशा देखे जा रहे हैं।

 दोहरे चरित्र को जीवन के केवल एक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सभी क्षेत्रों में देखा जा सकता है जिसने एक चरमोत्कर्ष पर पहुँची संस्कृति को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी तथा आज भी सक्रिय है। शब्दों को बदलना, तीज त्योहारों को बदलना, वेश-भूषा को बदलना, पूूजा-मान्यता को बदलना, साहित्य-इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार बदलते रहना, इसी अपसंस्कृति की दूरगामी रणनीति रही है। कोई विचार करे कि भिक्खु, भिक्खा, सिक्खा, मूसा, खेत आदि शब्दों में क्या ग़लत, क्या अशोभन, क्या कर्ण-कटु है जो त्यागने लायक है? साहित्य में भी तद्भव और तत्सम का ईजाद किया गया ताकि बुद्ध-कबीर  की परम्परा को भाषा के स्तर पर ही पटखनी दे दी जाय। तद्भव के मायने हुआ श्वैसा ही जैसा था या हैश् और तत्सम का मायने हुआ श्उसी के समान।श् विचारणीय है कि जो वही हैं वह मौलिक है या जो श्वैसा ही हैश् वह मौलिक है। इस प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट है कि किसी शब्द और भाषा को दोयम दर्जे की कहना, एक साजिश है। एक भरी-पूरी भाषा-संस्कृति को अशुद्ध कहकर अमर्यादित किया गया है। इनकी भाषा अशुद्ध, इनकी बोली अशुद्ध, इनकी वेष-भूषा अशुद्ध, इनकी वाणी अशुद्ध, इनका देखना अशुद्ध, इनको छूना अशुद्ध, इनका वचन-प्रवचन, गुण सभी कुछ अशुद्ध। इस प्रकार से एक प्रतिकारात्मक हीगोमोनी ;भ्महवउवदलद्ध का निर्माण भी इसी षड्यंत्र की एक कड़ी है जिसके ज़रिए यह यवस्था अपने वर्चस्व को परवान चढ़ाती आयी है और इसी के शिकार कबीर हैं, नानक हंै, रैदास हंै, दादू हंै, चोखा मेला हैं। बार-बार के क्रान्ति प्रयासों को इसी हथियार से निष्क्रिय किया जाता रहा है और आज भी दलित-जागृति को धता बताने को नये-नये तरीके खोजे जा रहे हैं।

 आजकल दलित-संकीर्णतावाद, दलित-ब्राह्मणवाद, दलित-जातिवाद, दलित-वर्चस्ववाद और दलित आक्रामकता पर बहस ज़्यादा तेज़ कर दी गयी है ताकि मुख्य मुद्दे की गरमाहट को पानी डालकर ठंडा कर दिया जाय। इस प्रकार के वादों से इन्कार नहीं किया जा सकता किन्तु यह भी प्रकारान्तर से ब्राह्मणवाद की ही प्रस्तुतियाँ हैं। क्यों? क्योंकि हमारे देश-समाज का आदर्श ही ब्राह्मण है। यहाँ हर व्यक्ति ब्राह्मण बनकर सम्मान पाना चाहता है। बिना श्रम के मलाई उड़ाना चाहता है। समाज का अगुवा बनना चाहता है और हर तरह से अपना प्रभुत्व औरो पर थोपना चाहता है। निश्चित रूप से किसी भी समाज में जो विकसित या समादृत है, वही हमारा आदर्श या माडल रोल बनता है। हम उसी की नकल करते हैं और उसी के नक्शें-कदम चलते हैं या चलने की कोशिश करते हैं। यदि किसी गाँव में एक युवक कड़ी मिहनत करके आई.ए.एस., आई.पी.एस. जैसा उच्च पद पा जाता है तो उसकी देखा-देखी दूसरे घरों के युवक भी पढ़ाई की ओर ध्यान लगाते हैं या कोशिश करते हैं। यही नहीं पास-पड़ोस के युवक भी इससे प्रेरित होकर उसी तरफ़ बढ़ते हैं। बच्चों और नौजवानों के अभिभावकगण भी बार-बार उसी युवक की मिसाल देते हैं और अपने पाल्य से वैसा ही बनने की चुनौती देते रहते हैं। तो आखिर आई.ए.एस. बनने में ऐसी क्या ख़ास बात है ? चूँकि आई.ए.एस. की छवि यही है कि वह पूरे जि़ले में अपनी हुकूमत चलाता है, बड़े-बड़े लोग उसकी चरण-रज लेते नहीं अघाते तथा वह बड़े बंगले, अच्छी गाड़ी और नौकर-चाकरों की फ़ौज का मालिक होता है। सारे पुलिस-दरोगा-कोतवाल डिप्टी कलेक्टर उसके हुक्म के गुलाम होते हैं। उसे धूप-बारिस-सर्दी का कोई डर नहीं क्योंकि उसका सब काम जबान चलाने से हो जाता है। उसे पैसे की कोई कमी नहीं। बल्कि किसी चीज़्ा की कोई कमी नहीं है। ऐसे सुविधा सम्पन्न और पूजनीय व्यक्ति की नकल कौन नहीं करना चाहेगा। ठीक यही उदाहरण सामाजिक प्रभुत्व का भी है। ब्राह्मण के लिए श्रम किये बिना ही सारी वस्तुएँ उपलब्ध हैं तथा वह पृथ्वी का पूरा उपभोग करने का अधिकारी है। उसकी चरण-रज लेकर या आशीर्वाद लेकर लोग धन्य हो जाते हैं। उनके घर की लुगाइयाँ पर्दे में रहती हैं। वे कभी श्रम नहीं करतीं इसलिए उनकी इज्जत भी सबके ऊपर है। कामगारों की जनानियाँ दिन-रात मालिक के खेत-खलिहानों, घर-आँगन, मरनी-जीवनी जैसे हर श्रम साध्य कार्य में अपने को खपाती हैं, वह भी अपने श्रम की माकूल मज़दूरी पाये बिना। उनकी मिहनत-मशक्कत ही उन्हें नीच-अछूत और अनादरणीय बनाने की बाह्मणी मान्यता हैं। वे भी चाहती हैं कि हम ब्राह्मणी बनकर वही सम्मान और सामान हासिल करें जो एक क़ामचोर अभिजात्य पुरुष और उसकी लुगाई को मिलता है। ऐसी स्थिति सारे समाज में कामचोरी फैलाने का मूल कारण क्यों न बने ? इतिहास गवाह है कि हमने श्रम की तौहीन की है तथा कामचोरी, बेईमानी, जालसाजी, लफ्फ़ाजी की पूजा की है इसीलिए हमारे आदर्श और हमारे हीरो ब्राह्मण हैं। हम सभी ब्राह्मण बनने की ओर उन्मुख हैं। यह भी मुख्य मुद्दे से भटकाने की चालाकी है कि लोग चाहते हैं कि कोई क़ानून, कोई संविधान या कोई लोकपाल जैसा जादू इस देश से भ्रष्टाचार मिटा देगा। यह मात्र दिवा-स्वप्न ही है। भ्रष्टाचार का क़ानून से एक सीमा तक ही लेना-देना है। यदि क़ानून लागू करने वाले लोग ही भ्रष्ट हों तो कौन रोकेगा? अभी तो हम आर्थिक भ्रष्टाचार की ओर मुँह उठाये अंधी दौड़-धूप का हिस्सा बनकर भ्रष्टाचार मिटाने की मुहिम में अपना नाम लिखाना चाहते हैं। सामाजिक सांस्कृतिक, धार्मिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक भ्रष्टाचार से आँखें मूँदे पानी पर लाठी पीट रहे हैं तथा उठती लकीरों की गिनती करना चाह रहे हैं। हम पेड़ के पŸो को काट-छाँट रहे हैं और उसकी जड़ को मिलने वाली ऊर्जा की ओर से या तो बेख़बर हैं या जानबूझकर लोगों को मूल-प्रश्न से भटकाए रखना चाहते हैं। इस देश की नींव ब्राह्मणवाद पर है जिसे आजादी के बाद समाजवाद में तब्दील करने का सपना देखा गया था। लोकतांत्रिक सेकुलर क़ानून के पुलिन्दे को आज भी ब्राह्मणवाद ही धता बताए हुए है। क़ानून तो उसकी मर्जी से चलता रहा है, और आज भी वह, भीतर से इस जनतांत्रिक क़ानून को मानने में हिचकिचाता है क्योंकि इसे मानने का अर्थ है ब्राह्मणवाद की अर्थी निकालना जो वह कभी नहीं चाहेगा। इस गुत्थी को सुलझाये बिना हमारी मुश्किलें दूर नहीं होने वाली हैं। क़ानून पर चलने वालों की मनसा, नीयत ओर उनका नैतिक चरित्र ही इसे लागू करने या न करने के लिए निर्णायक हो सकता है। जहाँ का हर व्यक्ति बिना श्रम के अन्न, बिना मिहनत के दुनिया की हर सुविधा, बिना गुण के सारा सम्मान हासिल करने की ओर उन्मुख है, वहाँ पर नैतिक-चरित्र की शुचिता की उम्मीद भी बेमानी है। इसीलिए क़ानून के साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना हेतु मानवतावादी धर्म या धम्म की आवश्यक्ता होती है। जहाँ का धर्म भौतिकता को ही मान्यता देता है। ख़ुद के भ्रष्टाचार को अपना आभूषण मानता है, ऐसे धर्म से उम्मीद भी क्या की जाय। कुल मिलाकर आप देखें कि भारत का ज़र्रा-ज़र्रा ब्राह्मणवाद के मकड़ज़ाल में उलझा-फँसा हुआ है। फिर उद्धार कैसे हो ? इसी कारण कोई भी सच्चा भारतीय, सच्चा राष्ट्रवादी हमेशा ही उन पतित धार्मिक मूल्यों पर कुठाराघात करेगा जिसके कारण जीवन का हर क्षेत्र दूषित हो गया है। कोई भी परजीवी अपनी प्रकृति के अनुसार अपना भोज्य प्राप्त करने हेतु अपने शिकार की तलाश करता है। एक जगह से भोज्य बन्द होते ही दूसरा शिकार तलाशता है। खटमल कुर्सी से निकलेगा तो चारपाई में जाएगा, चारपाई से निकलेगा तो सोफ़ा में जाएगा, सोफ़े से निकलेगा तो तख़त में जाएगा। यह सुनने में सबके लिए कर्ण-प्रिय नहीं होगा कि जब तक वह जि़न्दा रहेगा, ख़ून ही पिएगा। ऐसी परजीवी संस्कृति को समाप्त करने के उपाय सरल नहीं हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए। शायद यहीं से वामपंथी विचारधारा की हिंसक प्रवृŸिा को औचित्य सिद्ध करने का मौका मिलता है। देश को ख़ूनी-क्रान्ति की ओर धकेलने के इस कुचक्र को रोकना है, तो सच्चे मन से इस फासीवादी पुरोहित्व को उखाड़ फेंकना होगा।

 कबीर बार-बार इसी परजीवी संस्कृति को नेस्तानाबूद करने की बात कहते हैं। श्साधो वाभन, निपुन कसाईश् इससे कठोर चोट और क्या हो सकती है ? वे ब्राह्मणवाद को और ब्राह्मण को केवल कसाई कहकर सन्तुष्ट नहीं होते बल्कि कहते हैं कि वह तो कसाईपने में निपुण है। कबीर की ऐसी कविता में कबीर को ढँूढना कोई मुश्किल नहीं है, शर्त इतनी है कि हम ईमानदारी से देख पाने का साहस करें। कबीर अपनी कविता के माध्यम से बार-बार दलितों शोषितों को भी सचेत करते हैं तथा उनकी उदासीनता तथा भाव-शून्यता को लानत भेजते हैं - श्साधों यह मुर्दों का गाँवश्। वे जीते जी मुर्दा बनने वाली कौम को धिक्कारते हैं तथा चेतना के स्तर पर इन्हें सावधान करते हैं। यही कबीर की कविता की विशेषता है जिसमें दलित प्रतिरोध की अनगिनत संजीवनियाँ हैं, बस उन्हें सही संदर्भों में समझने की ज़रूरत है।

 कबीर की कविता का स्वर नितान्त मानवतावादी है। वह न तो ब्राह्मणवादी है न ही शूद्र-दलितवादी। कबीर को किसी वाद में उलझाना कबीर के विचारों को अपहृत करने जैसा है। वाद हमेशा किसी व्यक्ति या विचार की तरफ झुका ;।सपहदमकद्ध होता है इसलिए उसका चरित्र व्यक्ति, विचार और पंथ निरपेक्ष नहीं रह जाता। कबीर जब कहते हैं कि श्हिन्दू कहो तो हौं नहीं मुसलमान मैं नाहिं / पाँच तत्व का पूतरा गैलनि खेले माहिंश् तो उनकी यह घोषणा सच्चे अर्थों में पंथ-निरपेक्ष है, सेकूलर है। भारत का धार्मिक-राजनैतिक घराना परम्परागत रूप से अपनी ही जाति-धर्म के व्यक्ति का नेतृत्व स्वीकार करता है। इसीलिए कबीर का सेकूलर नेतृत्व हमारे देश के लिए एक आदर्श नेतृत्व हो सकता है। ऐसा नहीं होने देने का कारण भी यही है कि कबीर के भरोसे किसी धर्म या पंथ की रोटी नहीं सेंकी जा सकेगी और सारा गुरूडम धरा-का-धरा रह जाएगा । भारत का साम्प्रदायिक-वर्चस्ववादी वर्ग इसे क्यों क़बूल करेगा? ऐसे में कबीर की कविता, कबीर की भाषा, कबीर की बोली-बानी, कबीर की वेष-भूषा, कबीर के विचार, कबीर की साधना यहाँ तक की कबीर की ज़ाति और जन्म तक को अशुद्ध घोषित करने वाले लोग उपरोक्त कारणों से ही कबीर के आलोचक हैं। साहित्य में कबीर की आलोचना भी पूर्वाग्रही है। धर्म में उनका कोई स्थान नहीं है।

 क्योंकि कबीर गलत के साथ समझौतावादी नही है।  वह लुकाठी हाथ में लेकर काशी के चैराहे पर पाखंडियों को ललकारता है, तो भला कबीर की आलोचना नहीं होगी तो क्या होगी। कबीर का मध्यम मार्ग दो अतियों से बचाने का मार्ग है, दो नावों पर पाँव रखने का नहीं । कबीर अपनी मान्यता में स्पष्ट हैं, अपनी अभिव्यक्ति में सादा हैं किन्तु अपनी सच्चाई पर दृढ हैं। कबीर द्वारा आत्मा-परमात्मा, राम, ईश्वर, यमराज, स्वर्ग, नरक आदि की उक्ति पारम्परिक मान्यताओं को नकारने के लिए ही उद्धरण में आई है। सामाजिक स्वीकृतियों को बिना नाम लिए ख़ारिज करना भी प्रायः भ्रामक ही होता है। इस रूप में कबीर की रण-नीति न तो भुलावा देने की है न ही रहस्यवादी। उनका संदेश उनके लोगों की जन-भाषा में हैं, जहाँ कोई लाग-लपेट, कोई छुपाव या कोई बचाव नहीं है। इसीलिए कबीर अँखियन देखी बातऔर सुरझावनवारी बातें ही अपने पदो ंके माध्यम से करते दिखाई देते हैं। उनकी भाषा का संबोधन सन्त को, साधु को होता है किसी धर्म गुरु या ज़ाहिद को नहीं। कबीर की ताक़त उनकी साफ्रगोई और सपाट बयानी है। कबीर की साहित्यिक आलोचना में जब रूढि़वादी विचारों का पुट होता है तो कबीर पर आक्रमण ही होता है। कबीर जैसे मज़बूत विचारक को हिन्दी साहित्य के पुरोधाओं में अग्रगण्य, रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे लोगों ने अक्खड़ी स्वभाव, खिचड़ी भाषा, ब्राह्मणी पुत्र, अहंकारी जैसे विशेषणों से लांछित-गर्हित किया है। कबीर को अपने समय की षडयंत्रकारी ताक़तों के सामने भी इसी रूप में विहित किया गया। अन्त में उन्हें काशी छोड़कर मगहर में शरण लेनी पड़ी। वहाँ भी उनकी हत्या नहीं बच पायी। इस प्रकार हम कबीर की सामाजिकी को अधिक मुखर पाते हैं जिसकं ज़रिए केवल दलित प्रतिरोध का विकास ही नहीं बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों के हमले से बचने के लिए अपने ऊपर भी ऐसा प्रतिरोधक कवच लगा सकता है, जहाँ से झूठ, प्रपंच को जड़ से उखाड़-फेकने की उद्यमशीलता वजूद में आए।

 कुछ मित्रों ने अभी कहा कि जिस दलित की चर्चा हम कर रहे हैं, वह आज वैसा नहीं रह गया है। काफ़ी बदलाव हुआ है तथा भेद-भाव में कमी आयी है। मेरा कहना है कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है। इसलिए बदलाव या परिवर्तन हर जगह, हर समय घटित होना एक सत्य है। देखना यह है कि इस बदलाव में क्या लाभकारी या दलित-उद्धारक बदलाव हुआ है ? हम उसी का स्वागत करेंगे और इसीलिए उसकी पड़ताल ज़रूरी है। हमने शारिरिक छुआछूत को कम करके मानसिक छुआछूत में बदल दिया है। हम आपके साथ उठेंगे, बैठेंगे, बोलेंगे, बतियाएँगे, पीएँगे-खाएँगे लेकिन अपना शिकार करने अनयत्र कहाँ जाएगें? हू-ब-हू ऐसी ही स्थिति है। ऐसी स्थिति में ऊपर से देखने पर या प्रचार के लिए यह कहना बड़ा अच्छा लगता है कि दलित-उत्पीड़न और जातीय भावना में कमी आयी है। मैं एक उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ। यह कि़स्सा नहीं इक्कीसवी सदी की सच्चाई है।

 आप जानते ही हैं कि किसी न किसी पंथ की महंथगीरी करने का चस्का पुरोहिताई का पुराना शगल है। माल-मलाई अलग और पाँव-छुवाई अलग मिलती है। इसमें पंथ की छोटाई या बड़ाई नहीं देखते। ये देखते हैं कि वहाँ की गद्दी मिले, बस! तर्क यह है कि नरक में भी रहो तो राजा बनकर। तो एक स्वनामधन्य पुरोहित ने कबीर पंथ को पकड़ा और धीरे-धीरे पकड़कर ज़्ाोर से जकड़ लिया। अपनी विद्वता के सारे हथकंडे कबीर पंथियों पर आज़माए ताकि चुग्गा-चारा कहीं फिसल न जाय। उन्होंने बड़े नेताओं और अफ़सरों (दलित-शूद्र) को अपनी वाणी से प्रभावित किया और चन्दा से लेकर आश्रम की ज़मीन तक का उपहार पाकर कबीर नाम की नैया के खेवनहार बन बैठे। आश्रम की महिमा दूर-दूर तक फैलायी गई।  कबीर पर किताबों की झड़ी लगा दी और कबीर के दर्शन के एक मात्र पारखी बनकर अपने आभा-मंडल के नीचे बड़ों-बड़ों को चैंधिया दिया। कबीर-बानी का गायन होता और उनका प्रवचन चलता तथा जगह-जगह उनका भण्डारा भी होता रहता था। पंथगुरु एक बार गोरखपुर पधारे थे। भंडारे का कार्यक्रम था। पता लगा कि कुछ दलित कार्यकर्ता रसोई में हाथ बँटाना चाह रहे हैं। महंथ जी ने साफ़ मना कर दिया। भंडारा सम्पन्न होने के बाद जब इस बावत उनसे पूछा गया कि कबीर के यहाँ तो ज़ात-पात का भेद नहीं है, फिर कबीर के नाम पर भंडारे में इस प्रकार का जाति-बर्ताव क्यों ? उन्होंने अपना स्टैन्ड क्लीयर किया कि श्कबीर-पंथ में होने के नाते मैं भी जाँत-पाँत में विश्वास नहीं करता किन्तु यहाँ पर हमारे ही परिवार और गाँव के लोग जुटे हैं। अगर उन्होंने अछूत का बनाया हुआ खाने से मना कर दिया तो क्या होगा। मैं ब्राह्मण होकर उन्हें अपने से दूर तो नहीं  भगा दूँगाश्। तो यह चैकी और चैका की बात सामने आ गयी। महंथ जी अब इस दुनियाँ में नहीं हैं, लेकिन इस घटना में उनकी मज़बूरी या उनके भीतर छुपे हुए पुरोहितत्व के पक्ष और प्रतिपक्ष में बहस ज़रूर की जा सकती है। 

 कहना यह है कि बस इसी स्तर पर माहौल में परिवर्तन या सुधार हुआ है। चलिए मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। मेरी (नौकरी वाला) पद भारत सरकार के संयुक्त सचिव स्तर का है। मेरे एक बाॅस जो ब्राह्मण थे, मुझे दिन में कम से कम तीन या चार बार अपनी उच्च बुद्धिमŸाा और वाक्पटुता के ज़रिए इशारों-इशारों में यह जता देते थे कि मैं कुछ भी हो जाऊँ किन्तु उनकी कुलीनता के नीचे ही हूँ। कभी वे अपने नौकर की कहानी बनाकर, कभी बनिहार की, कभी अपने सहपाठी की, यही दर्शाते थे कि कुछ भी हो मैं ब्राह्मण हूँ और आप गै़र-ब्राह्मण हैं। तो इसी तरह के सतही स्तर पर भेद-भाव मिटने का भ्रम फैलाया गया है। भौतिक-छुआछूत ने अब मानसिक-छुआछूत का रूप ले लिया है। अब तो लगी हुई चोट का दर्द अरसे बाद पता चलता है, जब कि डैमेज-रिपेयर के सभी रास्ते बन्द हो गये रहते हैं।

 एक प्रश्न उठाया गया है (संचालक की ओर स)े कि पिछले दिन के वक्तव्य में डा॰ काली चरन स्नेही’ (विभागाध्यक्ष, हिन्दी, लखउऊ विश्व विद्यालय, लखनऊ) द्वारा अपने संबोधन में यह कहा गया कि जो दलित तिवारी जी, शुक्ला जी, मिश्रा जी, चैबे जी के इर्द-गिर्द ही पिछलग्गू बनकर रहेंगे उन दलितों के सुधरने की क्या आशा की जाय? यही नहीं श्री स्नेही ने अपने वक्तव्य के बाद पूछे गये प्रश्नों का उŸार देने से भी कथित रूप से इंकार कर दिया था। इस बारे में यही कहा जा सकता है कि वक्ता स्नेही जी ने ब्राह्मणी जंजाल में दलित के फँस जाने की अपनी आशंका के कारण ही शायद ऐसा कहा होगा। अभी भी दलित के पास उस तरह की षड्यंत्रवोधक बुद्धि शायद नहीं है। उसके भोलेपन के कारण उसके ठगे जाने की संभावना कहीं अधिक रहती है। चूँकि ब्राह्मण हमेशा इसी प्रकार की बुद्धि का परिचालन एवं संस्करण करता रहा है अतः यह सम्भव है कि उसके पास जाने पर या रहने पर दलित स्वयं उसका शिकार हो जाए और उसका प्रतिरोधक स्वर आत्महंता बन जाय। इस तरह की नसीहत के पीछे यही उद्देश्य दिखाई देता है कि दलित-चिन्तक-विचारक भी इस सच्चाई को पूरी शिद्दत से स्वीकार करें।

 यह विज्ञान का सिद्धान्त है कि उच्च विभव से वोल्टेज नीचे विभव वाली वस्तु में जाता है, या उँची टंकी का पानी निचली सतह की टंकी में जाता है। चूँकि छल-छद्म विद्या में शूद्र-दलित बिल्कुल कोरा काग़ज है। ब्राह्मण के पास तो छल-बुद्धि है। अब चाहे वह इसे भले के लिए इस्तेमाल करे या बुरे के लिए। इस प्रकार दलित-शूद्र जब ब्राह्मणी संगत में पड़ता है तो वह उसी ब्राह्मणी बुराई का शिकार होने के लिए ज़्यादा संवेदनशील  ;ैनबमचजपइसमद्ध हो जाता है। उसकी रोधक क्षमता को आक्रामकता की उच्च क्षमता के सामने पंगु होने का ख़तरा रहता है। इसी कारण सावधानी के लिए आगाह किया होगा। दलित-शोषित यदि बल-बुद्धि में ज्यादा मज़बूत हो जाएगा तो उसके पास बुऱाइयों के आक्रमण से बचने की प्रतिरोधकता भी पैदा हो जाएगी। यह स्वयं को बुलंद करने का मामला है। दलित के लिए यही चुनौती है कि वह अपने को बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से प्रबलतर करे तथा देने वाला बने, माँगने वाला नहीं। आप जब तक माँगने वाले बने रहोगे, तब तक आपको निन्दा-प्रतारणा झेलनी पड़ेगी। सशक्तीकरण में ही प्रतिरोध की शक्ति भी निहित होती है। 

 संचालक ने जिन दो मुद्दों पर प्रश्न उठाए हैं तथा उनका उŸार चाहा है, वे हैं - 

पहला प्रश्न -

यह कि श्एक तरफ तो आपने बुद्ध को मनुष्य कहा तथा अपने पूरे वक्तव्य में पाँच से सात बार भगवान भी कहा, यह विरोधाभाष क्यों ? आपने बुद्ध के बचाव में कहा कि आखि़रकार बुद्ध भी मनुष्य ही थे।श्

दूसरा प्रश्न -

श्आपने कहा कि ब्राह्मणों के पास बुद्धि तो होती ही है फिर वे इसे अच्छी ओर लगावें या बुरी ओर, यह उनका अपना मामला है। दूसरी तरफ़ आपने ब्राह्मणों को, बुरा ही बुरा कहा जिससे किसी भी ब्राह्मण को बुरा क्यों नहीं लगेगा!श्

इन प्रश्नों का पैदा होना स्वाभाविक है। हाँ, विश्वविद्यालय के तथा-कथित विद्वानों द्वारा उठे पहले प्रश्न पर आश्चर्य अवश्य होता है। वर्तमान भारतीय वातावरण में ईश्वर, भगवान, आत्मा, परमात्मा, महात्मा, अवतार आदि शब्दों के अर्थ और अभिधारणा को एक सोची समझी रणनीति के तहत इतना भ्रामक और गड्ड-मड्ड किया गया है कि यहाँ विद्वानों, प्रोफेसरों, आचार्यों, शोधार्थियों की भीड़ में भी इनके सही अर्थ या भाव को तलाशना कठिन है। यदि मैं हिन्दू मिथकों की भी बात लूँ तो वहाँ भी ईश्वर संसार का सृजनकर्ता है। भगवान तो कई हंै। जिसमें कुछ पूर्व निर्धारित आचरण-शुचिता, पराक्रम और विवकेशीलता हो, वही भगवान हो सकता है। आत्मा या आत्मन, परमात्मा या परमात्मन के अर्थ भी जीव-जगत के बोध तथा परम-सŸाा बोध से हैं। स्पष्ट है कि ईश्वर और भगवान में बहुत बड़ा फ़र्क है। इसी क्रम में बुद्ध को मनुष्य से भगवान बन जाने को समझा जाना चाहिए -

भग्ग रागो - भाग दोसो भग्ग मोहो अनासवो
भग्गस्य पापका धम्मा भगवा तेन पउच्चति (बुद्ध चरित ले॰ अश्वघोष)

अर्थात् जिसने अपने भीतर के राग-द्वेष को भग्न कर दिया हो, चकनाचूर कर दिया हो, वही भगवान है। कोई भी मनुष्य इस बुद्धत्व के ज़रिए भगवान बन सकता है। इसीलिए मैंने बुद्ध को भगवान कहा और मनुष्य भी कहा। किसी भी भगवान को बनने-बनाने की पहली शर्त ही है कि वह मनुष्य हो। कोई परा-प्राकृतिक ईश्वर, जिसे किसी ने देखा भी नहीं वह ईश्वर हो सकता है भगवान नहीं हो सकता। भगवान राजनीश की पुस्तक श्मैं अपने को भगवान क्यों कहता हूँश् कृपया आप पढ़ें। इससे भी बहुत से भ्रम-धारणाएँ शायद ख़त्म हो जायेंगी। ब्राह्मणवाद ने ही बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार बताकर पूरे आन्दोलन को ही हाईजैक कर लेने की कोशिश किया।  इतना गोलमाल दुनिया के किसी भी अन्य इतिहास ने शायद नहीं देखा होगा। बच्चों को स्कूलों में यही दुुविधा का इतिहास रटाया जाता है। आज हमारी बातों को सुनकर लोगों को ऐसा लगता है, जैसे वे किसी सिरफिरे की बात सुन रहे हैं।  इस प्रकार इतिहास, संस्कृति, साहित्य को शामिल-गमला कर दिया गया है। सही-ग़लत का निर्णय करने के लिए विवेक के साथ बड़ी हिम्मत चाहिए। तर्क को भी अंध-भक्ति और आस्था के नीचे दबा दिया गया है। न तराजू रहेगा न तौल होगी। दाम बस कूतेगें और मनमाफि़क सौदा होगा। यही इन भ्रमधारणाओं के प्रचार-प्रसार के पीछे है।

 दूसरे प्रश्न का उŸार देते हुए मैं यह कहूँगा कि सच को सच कहने में यदि किसी को बुरा लगता है तो उन्हें खुश रखने के लिए झूठ बोलना तो उचित नहीं कहा जाएगा। आज तक सच का गला भी इन्हीं चाटुकार-चापलूस जमातों ने घोटा है। यदि खरा-खरा सच नहीं सुनना हो तो दलित-विमर्श नामक नाटक को बन्द किया जाना चाहिए। सदियों से व्यवहार में घृणा और अनाचार करने वाले लोग अब अपनी करतूत को कान से सुनना भी गवारा नहीं कर रहे, प्रायश्चित तो दूर की बात है। अपनी करतूतों के उजाग़र होेने से उन्हें असुविधा ज़रूर हो रही होगी किन्तु इसे गाली तो न समझा जाए।

 मैंने यह ज़रूर कहा कि ब्राह्मण पराया माल खाकर बैठा-बैठा केवल दिमाग़ी ख़ुराफ़ात ही करता रहा है। इसलिए इस मामले में उसका दिमाग तेज़ है। दलित उसके पास कितनी भी सावधानी से रहे, उसकी कुटिल-नीति का शिकार होने को अभिशप्त है। इसीलिए इस छल-कपट के निरोध हेतु भी उन चालाकि़यों से बढ़कर दिमाग विकसित करना होगा। यदि दलित बुद्धिवादी होकर अपनी समझदारी एवं विवेक को उनसे ऊँचा उठा लेता है तब उसे डरने की ज़रूरत नहीं होगी बल्कि उससे वंचक स्वयं ही डरेगा। हर मोर्चे पर, हर तरह सशक्त और बुद्धिवादी होना सबसे पहली ज़रूरत है। इसके बिना दलित उद्धार असंभव है। देने वाला अपनी मर्जी से देता है; माँगने वाले की मर्जी नहीं चलती, इसलिये मांगनेवाला नहीं बनना है।  बौद्धिक सशक्तीकरण ही इसकी कुंजी है। इसीलिए अम्बेडकरवाद, कबीरवाद या बुद्धवाद की पहली सीख है कि आप प्रज्ञावान बनो। बिना प्रज्ञा के प्रकाश के आप अँधेरे में भटकते हुए सही-गलत की पहचान नहीं कर सकते।

 आपने ब्राह्मणवाद पर मेरी ख़री बातों को बुरा समझा तथा बताया कि मैंने ब्राह्मण को विद्वान तो माना है। हाँ ब्राह्मण को मैं बुद्धिमान तो नहीं हाँ वेदवान ( वेद वाला/वेद मानने वाला/ वेद जानने वाला) ज़रूर समझा है। जो वेदों का ज्ञाता है, उसकी लोक-कल्याणकारी बुद्धि का आकलन आप स्वयं करें। जहाँ वेदों में शत्रुओं के नाश की2, बरसात होने की3, कृषि अच्छी होने की4, गायों को दूध देने वाली होने5 की प्रार्थनाएँ हैं जिनमें अपनी स्वार्थ-परक चाहत एवं लोक-अमंगल की पराकाष्ठा है। लोग चाहें तो वेद पढ़कर तस़दीक कर लें। सबसे पुराने ऋग्वेद के छः मंडल ही प्रामाणिक जान पड़ते हैं उसमें भी प्रथम मंडल को छोड़कर। तो प्रश्न यह उठता है कि यदि वेदों में दुनिया का सारा ज्ञान भरा पड़ा है तो यह वेदवान (ब्राह्मण) जो अपने को बुद्धिमान भी मानता है, आज तक समाज के लिए उसका सकरात्मक योगदान क्या है ? सारे वैज्ञानिक अविष्कारक केवल अमरीका, यूरोप, चीन, फ्रांस, जर्मनी, इंगलैण्ड, जापान में ही क्यों हुए ? हमारे विद्वान कहाँ व्यस्त थे ? पिछले ढाई हज़ार साल का इतिहास देखें तो बात समझ में आ जाएगी कि ज्ञान के ठेकेदारों के द्वारा नकारात्मक-वंचक व्यवस्था के अलावा और क्या ख़ोज की गयी ? धर्म में, दर्शन में, विज्ञान में, कृषि में, उत्पादन में इनका क्या योगदान रहा है ? अपकृत और अपहृत धर्म-कर्म पर आधारित यह व्यवस्था सच्चे आँकड़ों के द्वारा भेद खुलने पर शर्मशार होने की जगह उलटे आक्रामक हो रही है। यही इसकी प्रकृति भी है। आज पुरातत्वविदों ने तो साबुत भौतिक वस्तुओं को दुनिया के सामने ला पटका है जिसे विज्ञान ने भी स्वीकार करते हुए समय की विभिन्न श्रेणियों में क्रम बद्ध कर रख दिया है। ऐसे सच ने झूठे इतिहास को नेस्तानाबूद कर दिया हैं। हड़प्पाई संस्कृति या सैन्धव-सभ्यता का शतांश भी आर्य-सभ्यता या ब्राह्मण-विद्वŸाा ने यदि स्वयं में पैदा किया होता तो भी मानते इनकी बुद्धि का लोहा। लेकिन नहीं, बस दूसरों का अन्न चाहिए, दूसरों का वस्त्र चाहिए, दूसरों की स्त्री चाहिए, दूसरों का धन चाहिए, दूसरों का घर चाहिए और दूसरों को गुलाम बनाने की स्वतंत्रता चाहिए - बस यही इनकी खोज है, इतनी ही समझ है। दूसरों की चीज़ों पर अपना ट्रेडमार्क लगाना, दूसरे का रैपर बदलना इनकी फितरत है। ऐसे में इतिहास और साक्ष्य के अन्य माध्यमों की शुद्धता किस प्रकार निरपेक्ष एवं खाँटी सच मानी जा सकती है। आज के पाँच हजार साल पहले हमने लोथल गुजरात में पŸान के जल-स्तर नियंत्रण वाला तकनीक बन्दरगाह बना रखा था, ऊँचे कामोडवाले शौचालय जिनमें चमकदार तथा जोड़ विहीन(ज्वांटलेस) दिखने वाली टाइल्स का काम सामने रखा, सोने चाँदी की महीन कारीगरी रखी, अपनी स्वतंत्र लिपि रखी, अपना योग-दर्शन रखा। हमारी वह विरासत एकाएक कहाँ लुप्त हो गयी ? ऐसी सभ्यता को नष्ट करने वाले क्यों फिर से उसका शतांश भी विकसित नहीं कर पाए? तो इसे कौन सी मनीषा-विवेक और वैज्ञानिक-बुद्धि की मिसाल माना जाय? ऐसा शायद इसीलिए है कि सारा ध्यान, सारा विवेक, सारा प्रयास, सारा प्रय़ोजन, केवल दूसरों को विनष्ट करके उनकी धन-सम्पŸिा लूटने तक ही सीमित थी। यह नकारात्मक बुद्धि भारतीय इतिहास-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, व्यापार-शिल्प में कोई पहल करनी तो दूर अनुसरण करके भी एक उच्च संस्कृति को आगे नहीं ले जा सकी, वरन उसे दफ़्न करने का ही यत्न किया। उनकी भाषा, उनका शिल्प, उनका योग, उनके तीज त्योहारों पर अपने मिथकों का ट्रेड मार्क चढ़ाकर उन्हें अपमानित करने की कथाएँ गढ़ लीं गईं। स्पष्ट है कि इस अप संस्कृति ने विद्वŸाा का इस्तेमाल निर्माण-निर्णय के लिए कभी भी नहीं किया। हमेशा विघ्वंश करने में ही ख़ुद को खपाया। ऐसी विनाशक षड्यंत्रकारी चाल को यदि बुद्धिमŸाा कहेंगे तो अवश्य ही बुद्ध को बुद्धू या बुद्ध के अनुयाइयों-प्रसंशकों को बुद्धू कहना उनकी अपनी धारणा और परिभाषा के मुताबिक ही है। केवल बुद्ध विहार और बुद्ध से सम्बन्धित अवशेषों को ही निन्दित नहीं किया गया बल्कि एक ऐसे प्रदेेश को जहाँ बुद्ध ने सबसे अधिक प्रचार-प्रसार का कार्य किया, वहाँ के निवासियों को बुद्धू कहकर बुद्ध का अर्थ ही उलट दिया गया। वह सिर मुँड़ाने की बौद्ध परम्परा को मृत्यु बाद ष्मुण्डनष् कराने की प्रथा चलाकर सिर मुड़ाने वाले बौद्ध अनुयायियों को लज्जित करने का उपक्रम किया। गया में बुद्ध की ज्ञान-स्थली को ष्पिण्डपातष् पाने वाले भिक्खुओं की तेजस्विता की हँसी और माखौल उड़ाकर वहाँ मृत आत्मा की तृप्ति के लिए ष्पिण्ड-दानष् नाम के कर्मकाण्ड की रचना की। ऐसे हज़ारों-लाखों उदाहरण जीवन की हर साँस में मौजूद हंै, जहाँ पर विनाशक प्रयत्नों के अलावा निर्माण के चिन्ह नहीं मिलते। ऐसी घृणा, बँटवारे और ऊँच-नीच के ख़ानों में क़ैद लोगों के अलग-थलग समुदायों में कभी भी राष्ट्रीयता की भावना मजबूती से नहीं उभर पायी न उभर सकती है। यहाँ न तो एक धर्म है, न एक नस्ल है, न एक जाति है, न एक सामाजिकता है, नहीं एक शिल्प है, न तो एक भाषा है। इतने विभाजनों में एकता को मज़बूत करना साँपों को गट्ठर में बाँधकर तराजू में तौलने जैसा जटिल काम है। आज तक हमने भाषा के मामले में भी अलगाव को ही प्रश्रय दिया है। यदि तमिल, तेलगू, मलयालम और कन्नड़ जैसी भाषाओं के बोलने वाले द्रविड़-संस्कृति के वाहक लोग हिन्दी-संस्कृत को अपनाने से परहेज कर रहे हैं या विरोध कर रहे हैं तो इसके पीछे भी भाषाई ब्राह्मणीकरण ही जिम्मेदार है। यदि हम भारत की एकता और राष्ट्रीयता को मजबूत करने के प्रति ईमानदार हैं तो हमें सबको साथ लेकर चलना ही होगा। अपने पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देकर; यदि राजभाषा के रूप में हम दक्षिण भारतीय भाषाओं तथा अन्य भाषाओं के शब्दों, मुहावरों को शामिल करें तो किसे आपŸिा हो सकती है?  यदि राष्ट्र में सबकी भागीदारी और राष्ट्रीयता में सबकी ईमानदार भागीदारी चाहते हैं तो हमें खुले मन से सबकी भाषाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। एक मज़बूत और अखंड भारत बनाने और इसे बनाये रखने की यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सभी भारतीय बनकर अपनी भिन्न-भाषा संस्कृति के पूर्वाग्रहों को त्यागंे तथा कम से कम समान भाषा पर संवैधानिक स्वीकृति को लोक-स्वीकृति में बदलकर एक ही देश के वासियों का आपस में विदेशीपन और अजनबीयत छुड़ाकर संवाद स्थापित करने का, मेल-जोल करने का मार्ग प्रशस्त करें। यही राष्ट्र के हित में है और यही सबके हित में है। इस प्रकार के मनन-चिन्तन को कार्य-रूप देने की नज़ीर कबीर से इतर कहाँ मिल सकती है। कबीर केवल दलित प्रतिरोध का ही ओजस्वी स्वर नहीं है बल्कि राष्ट्रीय एकता की जागृति का नाम है। 

शौके दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर।।
भवत्तु सब्ब मंगलङ् !!
ऐसा ही हो।

(बी॰आर॰विप्लवी)
अपर मंडल रेल प्रबंधक
पूर्व मध्य रेल, मुगलसराय

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