दलित

धम्म-चक्र-प्रवर्तनः मौजूदा बाधाएँ एवं चुनौतियाँ

-बी॰आर॰विप्लवी

इसके पहले कि हम धम्म के चक्के (पहिए) को गतिशील बनाए रखने की बात करें, हमें धर्म ;त्मसपहपवदद्ध और धम्म ;क्ींउउंद्ध की मानव-जीवन में आवश्यकता को रेखांकित करना आवश्यक होगा। अनावश्यक प्रगल्भ-प्रलाप और बहस-म़ुबाहिसों से बुद्धि-बिलास तो किया जा सकता है, किन्तु इससे जीवन की कठिनाइयों या दुःखों से त्राण मिलेगा, यह सोचना भी हक़ीक़त से बहुत दूर की बात है। इसीलिए मानव-जीवन के उद्देश्य और उसकी प्राप्ति में सहायक नियम-विनियम या अनुष्ठान ही लोकोपयोगी और बहुतायत लोगों द्वारा ग्राह्य हो सकते हैं। इसी व्यावहारिकता के मद्देऩज़र मानव-जीवन की आवश्यताओं, आकांक्षाओं और अभिलाषाओं का कतिपय मूर्तन करने के लिए स्वभावतः प्राकृतिक  और भौतिक जगत के आस-पास ही इसकी तलाश लाजमी भी है और अनुमन्य भी। जो प्राकृतिक है वह स्वाभविक है। जो परा-प्राकृतिक है वह अस्वाभाविक, कल्पित और फलतः दुरूह है। यही कारण है कि दुनिया में व्याप्त वस्तुओं और पदार्थों की प्राकृतिक घटनाएँ उनका स्वभाव हैं। पानी की तरलता उसका स्वभाव है, नदी का प्रवाह उसका स्वभाव है और आग की उष्णता आग का स्वभाव है, आदि-आदि। यही तरलता पानी की प्रकृति है, प्रवाह नदी की प्रकृति है, उष्णता आग की प्रकृति है। यही उनका धम्म है। जो प्रकृति-प्रदŸा और प्रकृति का समर्थक है वह धम्म है। जो परा-प्राकृतिक से मनुष्य के भीतर भय, लोभ, हानि-लाभ आदि की आशंका से उसके ऊपर नियंत्रण आरोपित करता है, कदाचित वही धर्म या त्मसपहपवद है। यही धम्म और धर्म के बीच की बारीक रेखा  दोनों को अलग समूहों में बाँटती है। इस रेखा को देख न पाने के दृष्टि-दोष के कारण साधारणतया दोनों एक ही जान पड़ते हैं, केवल भाषा और वर्तनीे के अन्तर के साथ। तर्क यह भी होता है कि धम्म पालि-प्राकृृत है, धर्म संस्कृृत। संस्कृृत का अर्थ ही है संस्कार किया हुआ, सुधारा हुआ, परिवर्तित किया हुआ और बदला हुआ। अतः यह तथ्य है कि धम्म और धर्म का स्वरूप भी पालि-प्राकृृत और संस्कृृत की तरह ही है। संस्कार या बदलाव के अपने-अपने मानदण्ड हैं।

संस्कृत ने पालि-प्राकृत के शब्दों को अपभंश तथा अशुद्धता के परिमाण तक निन्दित-गर्हित कर समानान्तर तत्सम शब्दों की तलाश किया ताकि उसमें आसानी से बदलाव किया जा सके। इसी प्रक्रिया से धम्म और धर्म की प्रकृति और मौलिकता को समझना चाहिए। यह अन्तर श्रमण और ब्राह्मण संस्कृतियों का है जिसे शब्दों का मामूली परिवर्तन कह कर सत्य को और अधिक देर तक घटाटोप में नहीं रखा जा सकता। धम्म स्वाभाविक एवं प्राकृतिक है, धर्म व्युत्पन्न एवं सृजित है। भारत में बौद्ध-साहित्य, विचार-धारा, भाषा, लिपि, संस्कृति तथा स्थापत्य की विशद सीमाओं को संकुचित करने के ऐसेे बहुत से ऐतिहासिक उदाहरण हैं।

जो भी हो एक सामान्य व्यक्ति इस दुनिया में सुख-पूर्वक जीना चाहता है। इस सुख की सीमाएँ न्यूतम आवश्यकताओं की पूर्ति से लेकर असीम संग्रह की लालसा तक जाती हैं। न्यूनतम आवश्यकताओं तक की चाहत में लालच, संचय, भविष्य का भय एवं अहंकार जैसे तत्वों की  प्रायः अनुपस्थिति के कारण वह प्रायः दुःख का कारक नहीं बनता। इसके विपरीत असीम लालसा और अनियंत्रित चाहत ही दूसरों के देय भाग को अपने पास संग्रह करने की दुर्वृŸिा का प्रेरक और दुःख का कारण है। यह सुख या दुःख मनुष्य की अपनी निर्मिति है इसलिए इस सुख का कारण और दुख का निवारण मनुष्य और मनुष्य के ही बीच का मामला है, न कि मनुष्य और ईश्वर के बीच का। मनुष्य और ईश्वर के बीच का परा-प्राकृतिक धर्म अभौतिक तथा ग़ैर-दुनियावी है, फलतः इससे सांसारिक दुःखों से त्राण की उम्मीद व्यर्थ है। मनुष्य-मनुष्य के बीच के आपसी आचरण और कार्य-व्यापार को अनुशासित करता धम्म वर्तमान मनुष्य-जीवन की शान्ति और मर्यादित सुखी जीवन हेतु अति उपयोगी हो सकता है। इसी कारण धम्म ने सामाजिक जीवन में सुख-शान्ति के अनुशासन हेतु अपनी महती आवश्यकता का एहसास कराया, फलतः तथागत भगवान बुद्ध की प्रज्ञा, करुणा एवं मैत्री से अनुप्राणित धम्म का चक्र पहली बार सारनाथ के मृगदाव में पंचवर्गीय भिक्खुओं की उपस्थिति में चल पड़ा - ’’बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।’’ प्रश्न उठता है कि यह धम्म-चक्र सभी लोगों के सुख के लिए, सभी लोगों के हित के लिए क्यों नहीं परिचालित हुआ ? यह विचारणीय है। कदाचित जो अल्प-संख्य लोग अधिसंख्य का अधिकार छीनते हैं उन्हीं को आक्रांता के पंजों से छुड़ाकर, उन्हें मुक्ति दिलाना बहुजन हिताय है। धम्म आक्रांता और अत्याचारी को सुख पहुँचाने वाला कैसे हो सकता है ? धम्म एक साथ ही आक्रान्ता एवं आक्रमित को किस प्रकार प्रोत्साहित और संवर्धित कर सकता है ? इसी कारण धम्म उन लोगों को ही समर्पित है जो दमित हैं, तापित हैं, सताए हुए हैं, गुलाम बनाए गए हैं। शोषित को धम्म के ज़रिए शोषण से नज़ात का रास्ता मिलता है। शोषक को पराप्राकृृतिक धर्म की ज़रूरत अपने शोषण के तार्किक औचित्य को न्याय-पूर्ण, दिखावा हेतु ईश्वर और भाग्य के सहारे स्थापित करने की ओट चाहिए होती है। इसीलिए भारतीय समाज-व्यवस्था में धम्म का चक्र अनवरत चलना ही चाहिए। इसे चलाने में वर्तमान समय की चुनौतियाँ धम्म के उद्भव के समय से कोई अलग नहीं हैं। हाँ समय के साथ आर्थिक-वैज्ञानिक पहल के कारण इनके तौर-तरीक़ों में अन्तर अवश्य आया है। इसे पहचाने बिना दुःख का निदान करना सम्भव नहीं है।

महा कारुणिक तथागत बुद्ध ने जिस धम्म को प्रचारित किया वह अपने समय में जितना प्रासंगिक था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, कदाचित कल भी रहेगा। यह धम्म मनुष्य मात्र को आदि में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी और अन्त में भी कल्याणकारी है। मनुष्य की स्वतंत्रता और मुक्ति का प्रवक्ता धम्म-करुणा का धम्म है। इसमें मनुष्यमात्र के लिए ही नहीं बल्कि प्राणी-मात्र के लिए सुख की कामना है - ’’सब्बे सŸाा सुक्खी होन्तु’’। विशद कल्याणकारी चिन्तन का धम्म प्रत्येक समस्या का समाधान शान्ति में खोजता है। वैर से वैर शान्त नहीं होता - ऐसे चिन्तन की परम्परा विश्व-शान्ति और जीव मात्र के कल्याण हेतु एक अद्भुत वैज्ञानिक सोच है। शास्ता ने प्रकृति की परस्पर निर्भरता ;प्दजमतकमचमदकमदबमद्ध के नियम को बड़ी शिद्दत से महसूस किया होगा। इसीलिए किसी को भी प्रकृति के साथ छेड़-छाड़  करने से रोका। उन्हें पता था कि प्राकृतिक असन्तुलन से पूरे जीव-जगत में असन्तुलन पैदा होगा जो मनुष्यों और प्राणियों के जीवन को असंयत तथा असंतुलित करके दुःख का कारण बनेगा। इसीलिए यह धम्म का चक्र पूरी कायनात के लिए  एक प्राकृतिक सीख है। यहीं से नैसर्गिक सुख का आरंभ होता है। 

दूसरों को दुःख पहँॅुचाने से असंतुलन पैदा होता है; जो दुःख देने वाले को भी दुष्प्रभावित करता है। कार्य-कारण का सिद्धान्त (पटीच्च समुप्पाद), अनित्यवाद (अनिच्च) का सिद्धान्त और मध्यम मार्ग (मज्झिम मग्ग) की खोज भगवान बुद्ध द्वारा पहली वैज्ञानिक खोज है जिसने प्रकृति के साथ सभी जीवन-सŸााओं की निर्भरता तथा नित्य परिवर्तनशीलता के सिद्धान्तों के ज़रिए भविष्य की वैज्ञानिक खोज का मार्ग सुगम किया। इन्हीं कार्य-कारण के नियमों की व्यापक व्युत्पŸिा से न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया सम्बन्धी गति के नियम को समझा जा सकता है। अनित्यवाद के आधार पर ऊर्जा के संरक्षण ;ब्वदेमतअंजपवद व िमदमतहलद्ध के नियम और बाद के आंइसटीन जैसे वैज्ञानिकों द्वारा ऊर्जा और द्रव्य के आपसी अन्तर्परिवर्तनीय गुणों का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकता का पक्षधर धम्म निश्चित ही दुनिया के प्राणी-मात्र के सुख और शान्ति का पथ-प्रदर्शक है। इसे चलाते रहना मनुष्यता के स्थायित्व की सर्वोपरि आवश्यकता है।

धम्म-चक्र प्रवर्तन की राह में आने वाली बाधाओं तथा चुनौतियों का विश्लेषण किया जाय तो हमें  भविष्य की योजनाओं को अमली जामा पहनाने में मदद मिलेगी। इन बाधाओं और चुनौतियों को मुख्यतः निम्नवत रेखांकित एवं चिन्हित कर सकते हैं:- 1. ऐतिहासिक चुनौतियाँ  2. धार्मिक एवं सांस्कृतिक चुनौतियाँ  3. सामाजिक चुनौतियाँ   4. राजनैतिक चुनौतियाँ  5. आर्थिक एवं संसाधन जनित चुनौतियाँ  6. शैक्षणिक चुनौतियाँ।  

कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। शून्य से शिखर तथा शिखर से शून्य की पुनरावृŸिा अनित्यवाद का ही उदाहरण है। इसी परिप्रेक्ष्य में इतिहास का दोहराव भी समझा जाना चाहिए। इतिहास हमें सावधान करता है, बशर्ते हम प्रकृति-प्रदŸा धम्म का ध्यान रखें। इतिहास साक्षी है कि बुद्ध द्वारा प्रतिपादित धम्म ने अपने समय में लोक-धम्म ओर राज-धम्म की हैसियत प्राप्त कर लिया था। इसी समय वैदिक कर्मकाण्डों एवं बलि-यज्ञांे से अनुप्राणित ब्राह््मण-धर्म यहाँ के आदि-धम्म, सत्य-धम्म, सैन्धव-धम्म को अपने आपमें समाहित करने में लगा था। समाहरण का यह प्रयास मुट्ठी भर लोगों द्वारा अधिसंख्य जनता पर अधिभार स्वरूप ;ज्ंगंजपवदद्ध था। इसका और कोई सकारात्मक पक्ष नहीं था, सिवाय इसके कि आत्मा-परमात्मा के विश्वास की मनगढ़न्त कथाओं के आधार पर ईश्वर का भय दिखाकर लोगों को अंधविश्वास हेतु बाध्य किया जाय। कोई अन्य कल्याणकारी पहलू जनता ने नहीं देखा। परिणामतः इसी ज़मीन पर भगवान बुद्ध ने ईश्वरवाद, आत्मा, परमात्मा, भाग्य, चतुर्वर्ण, वैदिक. पवित्रता आदि सभी थोथी दलीलों को नेस्तानबूद कर दिया।

ऐसा भी नहीं कि लोक प्रिय-धम्म काल में कोई वैदिक-ब्राहमण-धर्म जि़न्दा ही नहीं बचा। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि भगवान बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद ही कुशीनारा में उपस्थित भगवान के अग्रणी ब्राहमण शिष्य सुमंगल ने कहा ’’अच्छा ही हुआ कि महान महात्मा अब और अनुशासित करने के लिए नहीं हैं। अब हम स्वतंत्र हैं।’’ यह सुनकर अन्य भिक्खुओं ने भगवान की शिक्षाओं को तुरन्त ही लिपिबद्ध करने का निर्णय लिया। इससे प्रमाणित है कि वैदिक-ब्राहमण-धर्म सुसुप्त था, मरा नहीं था। उसने अवसर की तलाश ज़ारी रखी ताकि बुद्ध-धम्म को पतित सिद्ध किया जा सके। ऐसा हुआ भी। ऐसे योजनाकारों द्वारा भिक्खु-संघ में प्रवेश कर महत्वपूर्ण पदों को हासिल करते ही जैसे सुसुप्त धर्म जाग उठा और बौद्ध धम्म को तार-तार कर दिया। यही धम्म-पतन के विस्तृत कारणों में जाना हमारा विषय नहीं है। देखना यह है कि आज की परिस्थितियों में बौद्ध-धम्म को यत्नपूर्वक लोक-धम्म बनाने के लिए बोधिसत्व बाबा साहब डा॰अम्बेडकर ने जो संकल्प लिया तथा आनागारिक धर्मपाल जैसे धम्मधरों, ने जो त्याग  किया, उस धम्म के विनाश के वे ही कारक क्या आज भी तो मौज़़ूद नहीं हैं जो ऐतिहासिक  समय में थे ? स्पष्ट है कि वे कारक आज भी मौज़ूद हैं और उनके द्वारा विरोध की अन्तर्घाती तीव्रता प्रबलतर है। ऐसे में धम्म को अन्ध-भक्ति, अन्ध-मूर्ति-पूजा, जादू-टोना सरीखे कई तरह के आडम्बरों से बचाना होगा। प्रब्रज्या या दीक्षा देने में भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किन्हीं भस्मासुरों को अन्तरंग हित-चिन्तक समझने की भूल न हो जाय। मूर्ति-पूजा और वर्णाश्रम आधारित धर्म की कथित मर्यादाओं का बहिष्कार, विज्ञान सम्मत ज्ञान और धम्म का अंगीकार ही मनुष्य की स्वतंत्र चेतना के विकास द्वारा इन बुराइयों से बचाने का एक मात्र रास्ता है। पुरोहितवाद तथा व्यक्तिगत धन-संचय की प्रवृŸिा से भी उपदेशकों को ख़़़ुद को बचाना होगा। 

दूसरी चुनौती धार्मिक एवं सांस्कृृतिक आक्रमणों की है। आज धम्म की मनमानी व्याख्याएँ, बुद्ध-चरित, बुद्ध-संहिता, त्रिपिटक में घालमेल आदि ऐसी प्रतिगामी तथा प्रतिक्रियावादी साजिशें हंै जो बौद्ध-धम्म की ओर आकृृष्ट लोगों में भ्रम-धारणा फैलाकर धम्म-प्रसार को रोकती हंै। धम्म-पद में मिलावट, काल्पनिक बोधिसत्व के पूर्व जन्म की कथाएँ आदि प्रसंग कई तरह की आशंकाएँ पैदा करते हंै। इसी प्रकार वैदिक-धर्म के निरंतर चोला बदलते रहने तथा भगवान बुद्व को विष्णु का अवतार घोषित कर अपनी अंधी गली में अन्य धम्म-पथिकों को भटकाने के काम भी हो रहे हैं, सतर्कता और सावधानी ज़रूरी है। दलितों-आदिवासियों के आदि धम्म को मान्यता न देकर धार्मिक जनगणना में उन्हें मनमाने ढं़ग से हिन्दू घोषित करना ऐसी कुटिल नीति है, जिसमें धर्म-निरपेक्ष जनता को भ्रामक जंजाल में बाँधा गया है। गैर हिन्दू धार्मिक मिशनरियों द्वारा वंचित पीडि़त जनता की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ सम्बंधी सेवाएँ यदि उनसे स्वतः जोड़ती हैं तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं।

तीसरी सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक मतभेद, वर्णवाद तथा अस्तित्ववाद के कारण है। यह सच है कि धम्म के ध्वजवाहक वही लोग क़तई नहीं बनना चाहेंगे जो शासक, प्रभु, स्वामी, मालिक, जमींदार, पुरोहित या समाज में जन्मजात उच्चवर्णीय सम्मानजनक पद के स्वयंभू ठेकेदार हैं। धम्म की आदर्श पारमिताएँ उनकी वंशवादी प्रतिष्ठा पर कुठाराघात करती हैं। इसलिए वे कभी भी इस धम्म के ईमानदार उन्नायक नहीं हो सकते। भारतीय परिप्रेक्ष्य में हिन्दुवादी व्यवस्था ने पुरोहित को राजा से भी ऊँचा स्थान दिया है। इसलिए सबसे पहला और चिरन्तन विरोधी वही है। पुरोहितवाद अन्य वर्णों के यजमान को मूर्तिपूजा तथा कर्मकाण्डों के ज़रिए अपनी इच्छानुसार स्वर्ग-नरक भेजने का स्वयंभू अधिकारी है। उसके द्वारा दिखाया डर परा-प्राकृृतिक है। इससे मुक्ति पाने हेतु दृढ़ आत्म-शक्ति, विशद ज्ञान एवं तर्क-शक्ति की सम्पŸिा होनी चाहिए, जो आज के सामाजिक संदर्भ में लोगों में बहुत कम दिखती है। 

चैथी सबसे बड़ी चुनौती स्वयं बहुजन अनुयायियों की राजनैतिक दुर्दशा की है। राजनैतिक भेद-भाव के कारण राजनैतिक भागीदारी में हाशिए पर ढकेला गया समाज अपनी मान्यताओं और विश्वासों को स्थापित कर पाने में बार-बार अनाश्वस्त हो जाता है। वह धम्म की ओर दृृढ़तापूर्वक पैर  नहीं बढ़ा पाता। सामाजिक-राजनैतिक गौण हैसियत के कारण उसे धम्म-क्षेत्र में भी बार-बार पराभाव, आक्रमण, नाइन्साफ़ी एवं अपमान का सामना करना पड़ता है। उसे बार-बार यह याद दिलाया जाता है कि धम्मानुयायी होने के कारण वह अल्पसंख्यक है तथा उसे बहुसंख्यकों के रहमो-करम पर जीना है। यह असुरक्षा उसे धम्म के प्रति समर्पण से रोकती है। अल्पसंख्या का यह कुपाठ बहुजन एकता के लिये चुनौती है। 

प्राजातांत्रिक-गणतंत्र द्वारा जनता का कथित स्वशासन अपनी सामंती अहमान्यताओं से ऊपर नहीं उभर पाया है। जमींदारों, ताल्लुकदारों की जगह माननीय सांसदों और विधायकों ने ले ली है। राजतंत्र ने अपनी सुविधा के अनुसार गणतंत्र का संस्करण गढ़ लिया है। औपनिवेशिक-आज़ादी के बाद भी सामाजिक-आज़ादी नहीं मिलने से समता और भातृृत्व के सपने ताक पर रखे रह गये हैं। संवैधानिक सहूलतों से ना-समझ बहुजन का शुरुआती इस्तेमाल प्रभुवर्ग ने अपने पक्ष में किया, बाद में कुछ रोटी के टुकड़े देकर कृृतार्थ किया। अब बहुजन सŸाा की भूख देखकर उसके वोट-तंत्र पर ख़़़ुद काबिज़ हाने के लिए चंद क्रीत नुमाइंदों की अगवानी पर पूरे समाज को गिरवी कर लेने का यन्त्रीकरण ;डमबींदपेउद्ध कार्यरत है। ऐसे में बहुमत के लिए जातीय और राजनैतिक गठजोड़ के गणित में यहाँ के दलित, पिछड़े मूल निवासियों के बीच तफ्ऱका पैदा कर अपनी रोटी सेंकना, प्रभुवर्ग के चरित्र में पहले से मौज़ूद है। ऐसी राजनैतिक जालसाज़ी के शिकार बहुजन एक धम्म कीे छत के नीचे आने से भी हिचकिचाते रहे हैं। राजनैतिक हिस्सेदारी के लिए प्रभुवर्ग द्वारा उसकी राजनैतिक स्वीकृृति भी धार्मिक शर्त पर ही निर्भर करती है। कई राजनैतिक गुटों ने बहुजनों को भी अलग गुटों में बाँट दिया है। उन्हें ऐसा आभास दिया गया है कि हिन्दू रहकर ही उन्हें सŸाा का स्वाद मिल सकता है। यह अजीब ऊहापोह की स्थिति है। हज़ारों जातियों में विभाजित ऊँच-नीच के भ्रामक ख़ानों में बैठे बहुजन ब्राह्यमणिक श्रेष्ठता के मोह में एक दूसरे को नीचा दिखाने को तत्पर हैं। धम्म में आकर समाहित होना उन्हें नागवार गुज़रता है क्योंकि कुछ तबक़ों को भ्रम में रखा गया है कि वे श्रेष्ठ हिन्दु धर्म के सबसे मज़बूत अंग हैं। 

मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति भड़काए गए दंगों और ख़ून-ख़राबे में हिन्दू-मुसलमान दोनों ओर के दलित-पिछड़े एक दूसरे के ख़ून के प्यासे बनते हैं। धार्मिक उन्माद में मदमस्त करता ब्रेन-वाश दोनों समुदायों के ब्राहमणिक धोखेबाजों द्वारा आयोजित किया जाता है। वैदिक-ब्राहमण धर्म के अल्पसंख्यक हो जाने के डर ने धम्म के विरुद्ध नकारात्मक और घातक षडयंत्र रचा है। धम्म के पारम्परिक वारिस यदि अपने पुराने घर लौट आएँ तो आक्रांता, क्रूर धर्म से छुटकारा संभव है। जातियों-उपजातियों की वर्ण-वादी वैमनस्यता धम्म में आकर ही मिट पाएगी। धम्म में हिन्दू जाति व्यवस्था का समूल नाश ज़रूरी शर्त है। यह धार्मिक शक्ति ही राजनैतिक और आर्थिक शक्ति में अभ्यन्तरित होगी। इसीलिए यह इस देश के बहुजनों के हित में है कि वे बुद्ध की बुद्धिवादी ;ॅपेकवउद्ध शरण में जाएँ। धम्म की पवित्र शरण में जाएँ, संघ की पवित्र  शरण में जाएँ।  केवल और केवल बौद्ध की धम्म-छत ही हमारी एकता के ज़रिए हमारी प्रगति सुनिश्चित कर सकती है कोई और नहीं। बाबा साहब डा॰ अम्बेडकर ने धम्म-ग्रहण की ऊँची छलांग के ज़रिए बहुजनों को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने की पहल की है, फ़ायदा उठाना न उठाना उनके अपने हाथों में है।

पाँचवी चुनौती आर्थिक संसाधनों के कमतरी की है। ज़्यादातर बहुजन भूमिहीन, बेरोज़गार या दिहाड़ी मज़दूर हैं, जो अपनें बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मामलों की समुचित देखभाल नहीं कर पाते तथा धम्म-चर्चा जैसे विषय उनकी प्राथमिकता की सूची में शामिल ही नहीं हैं। जिन गृृहस्थों को भिक्षुओं के लिए भोजन-वत्रादि की व्यवस्था करनी है यदि वे ही अक्षम हैं तो धम्म-हानि होगी ही। राजनैतिक सŸाा की अनदेखी तथा पारम्परिक पुरोहिती सोच ने ग़रीब के हक में रोटी सुनिश्चित नहीं की, समान शिक्षा सुनिश्चित नहीं की। फिर यह धम्म का पहिया घुमाने वाले अन्यत्र कहाँ से आएँगें। धम्म, राजनीति और समाज की तिकड़ी का क्रमिक सहयोग ज़रूरी है। धम्म एकता और बन्धुत्व लाता है, एकता राजनैतिक-शक्ति और राजनैतिक-शक्ति आर्थिक और सामाजिक सम्मान और हैसियत दिलाती है। इसलिए केवल और केवल बौद्ध धम्म ही इस देश की पीडि़त मानवता को खुशहाली का तोहफ़ा दे सकता है।  

    छठी चुनौती शिक्षा सम्बन्धी भेद-भाव की है। बिना शिक्षा के बुद्धि और ज्ञान की बात बेमानी है। प्राचीन बौद्ध-भारत में धम्म के वास्तविक उŸाराधिकारियों की अशिक्षा के कारण ही धम्म के भीतर-घातियों ही ने खुद को  धम्म का दायाद बना लिया तथा नियन्त्रक ओहदों पर बैठ गये। उन्होनें इस देश से धम्म-निकाला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हम अपने पड़ोसी देशों चीन, म्याँमार, थाईलैण्ड, वियतनाम, तिब्बत तथा विशेष रूप से श्री लंका के बौद्ध समाज के ऋणी हैं जिन्होंने भारत में धम्म की पुनस्र्थापना में अग्र्रणी भूमिका निभाई। हम ब्रिटिश सरकार तथा नागरिकों का भी अभिनन्दन करते हैं जिन्होंने ज्ञान की ज्योति सबके लिए जलाई तथा भगवान बुद्ध से सम्बन्धित पुरावशषों में गहरी रुचि लेकर उसे दुनिया के सामने ले आए। आज शिक्षा के नाम पर ग़रीबों के लिए जो परिषदीय तथा सरकारी विद्यालय हैं, वहाँ शिक्षा की गुणवŸाा नहीं के बराबर है। मिड-डे-मील के बहाने खाना खाने आयी इन्सानी बच्चों की आबादी शिक्षा के बिना तो जानवरों जैसी ही रहेगी। प्राइवेट नर्सरी, किडन गार्डन और कान्वेन्ट स्कूलों में शिक्षित बच्चों तथा सरकारी स्कूलों के मिड-डे-मील की लालच में लाए बच्चों की शिक्षा में ज़मीन आसमान का अंतर होना स्वाभाविक है। ऐसी शिक्षा प्रणाली ने फिर से बहुजनों से शिक्षा का अधिकार छीनने की साजि़श रची है। ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि भारत में समान शिक्षा के लिए आन्दोलन बौद्ध-समाज का पहला एजेन्डा होना चाहिए।

अन्त में एक और चुनौती का जिक्र करना चाहूँगा जो धम्म-पथ के यात्रियों तथा बौद्ध-समाज के लोगों द्वारा आत्म-निरीक्षण न करने की है। हमने ऐसे धम्म का दामन पकड़ा है जिसके शास्ता की प्रज्ञा (उच्च कोटि का ज्ञान) शीलवान-चरित्र और वैज्ञानिक-दृृष्टिकोण मानव-मात्र के लिए ही नहीं बल्कि प्राणि-मात्र के प्रति करुणा और अहिंसा के उच्च आदर्श एवं निरपवाद भिक्षु-जीवन का रहा है। देखना है कि ऐसे महान आदर्शोे से जुड़कर हमने शास्ता के उच्चस्थ व्यक्तित्व तथा आदर्शों को कहीं से कोई द़ाग तो नहीं लगाया ? हमारे व्यक्तिगत चरित्र से बुद्ध, धम्म संघ की  तरफ उँगली तो नहीं उठी ? क्या हमनें उन उच्च आदर्शों के स्थापना में कुछ भी सकारात्मक भूमिका निभाई है ? यदि नहीं ंतो हमारे कारण धम्म-चक्र में रुकावट न आए ऐसा सोचकर ख़़ुद को परिमार्जित करें तथा इस महान धम्म को उपहास का विषय न बनने दें।

हमारे धम्म-प्रतिनिधि  प्रयत्नपूर्वक ज्ञानार्जन तथा शील में परिपक्वता हासिल करें। सादे वस्त्रों में उपासक बनकर भी धम्माचरण और धम्म प्रचार करने से धम्म की वृृद्धि होगी। एक भिक्खु की आलोचना सौ उपासकों की निन्दा से भी बड़ी है। इसीलिए भिक्खु का जीवन शील, संयम आत्म-नियंत्रण के कड़े व्रत का है। धम्म के प्रवर्तन हेतु केवल भिक्खुओं की ही जि़म्मेदारी नहीं है। सबसे बड़ी जि़म्मेदारी उपासकों और गृृहस्थों की है, जो धम्म को बढ़ाने में हर तरह सहयोग करते हैं। मुझे भिक्खु एवं भिक्खु-संघ के शील इत्यादि पर बात नहीं करनी चाहिए ऐसा कुछ लोगों का मानना है। किन्तु मैं अपनी जि़म्मेदारी समझता हूँ कि धम्म के सभी पक्षों को प्रस्तुत करते हुए भिक्खु के उच्च व्यक्तिगत आदर्शोें की बात भी करूँ जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। मेरी आलोचना या सलाह से बचकर आगे पूरे समाज द्वारा आलोचना हो, इस पर एहतियात के मद्देनज़र ही मैं यह बात कह रहा हूँ। भिक्खु धम्म का प्रतीक है। उसका प्रत्येक क्रिया-कलाप, उठना, बैठना, चलना, खाना, सोना, देखना भी समाज द्वारा गहराई तथा संवेदनशीलता से परीक्षित किया जाता है।  धम्म के वालन्टियर्स बनाए जाएँ जिनके ऊपर चीवर पहनने की वाध्यता न हो किन्तु वे धम्म-पथ के सजग प्रहरी हों। इससे समाज में ज़्यादा जागृृति अएगी। भिक्खुओं को शादी-व्याह आदि कर्मकांडों में न उलझाना ही बेहतर है। भिक्खु संघ की नियमित बैठकें करके परिमार्जन की सतत प्रकृृति बरकरार रखी जानी चाहिए। हमें नकली बौद्धों की सूचना से चकित नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें पहचानकर उन्हें बहिष्कृृत किया जाना चाहिए। जंगली जीवन-प्रवृŸिायाँ युद्धोन्मुख करती हैं, शान्तिपूर्ण समाजिक जीवन-प्रवृŸिायाँ बुद्धोन्मुख करती हैं। बुद्धि विवके का राज्य स्थापित करके ही भय-मुक्त सुखमय वातावरण बनाया जा सकेगा। बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया को बौद्ध जीवन पद्धति ही सकून दे सकती है। यह प्रज्ञा-पथ है। यह करुणा से परिपूर्ण है। यह मैत्री से लब्रेज है।

आइए हम संकल्प लंे कि पूरी दुनियाँ को हिंसा की भयावह  त्रासदी से बचाने तथा शान्तिमय विश्व-धम्म के प्रसार हेतु अपनी शक्ति लगा देंगे तथा इस मानवता-वादी धम्म को धर्म की रूढि़ग्रस्त परिभाषा से मुक्त कराकर उच्च आदर्शों पर प्रस्थापित कर इसे साम्प्रदायिक संकीर्णताओं में उलझने नहीं देंगे। सभी सŸााओं को सुखी देखने का आदर्श परवान चढ़े।

इन्हीं कामनाओं के साथ!
भवत्तु सब्ब मंगलङ् !!

नमो बुद्धाय!  जय भीम!    जय भारत!

(बी॰आर॰विप्लवी)
अपर मंडल रेल प्रबंधक

पूर्व मध्य रेल,मुगलसराय






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प्रमोशन में आरक्षण कहाँ तक उचित है .
प्रमोशन में आरक्षण पर समाजवादी पार्टी विरोध दर्ज करा रही है, कांग्रेस समेत अनेक दल इसपर समर्थन कर रही है पर मायावती कह रही हैं की ये सीरियस नहीं हैं -
1.क्या अब तक जो प्रमोशन हो रहे थे उसमें कोई अनियमितता हो रही थी या हो रही है।
2.


दलित
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(दलित आज जिन समस्यायों से जूझ रहा है उनमें उनका उत्पीडन महत्वपूर्ण है, इसका कारण क्या है ऐसा क्यों हो रहा है यह दरअसल मानसिकता का संकट है, अतः जब तक इनकी सोच नहीं बदलेगी तब तक यह संकट बना ही रहेगा, सोच कैसे बदले और किसकी बदले इस पर गौर करना है, जिसे दबंग कहा जा रहा है दरअसल वे  ही समस्या की जड़ हैं, वह जनमानस को अपनी संपत्ति समझते हैं इसीलिए उसपर अपना अधिकार समझते हैं, जैसे चाहते हैं व्यवहार करते हैं। यही कारन हैं ऐसी घटनाओं के घटने के। और भी बहुत सारे कारण हैं जिनमें इन दबंगों की कुंठित और अमानवीय सोच जो कई बार इन दलितों में भी दिखाई देती है, यही कारण है की यह समस्याएं जडवत हैं जो बदलने का नाम नहीं ले रही हैं.
इन्ही पर केन्द्रित है यह कॉलम)
आरक्षण पर-

प्रमोशन में आरक्षण पर सरकार के सामने फंसा नया पेच

नई दिल्ली/ब्यूरो
Story Update : Sunday, August 26, 2012    12:41 AM
ag warns govt on Reservation in promotion
अनुसूचित जाति व जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण देने संबंधी विधेयक लाने का वादा कर चुकी केंद्र सरकार के सामने अब नया पेच फंस गया है। केंद्र को उसके ही शीर्ष विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने सलाह दी है कि सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रस्ताव कानूनी तौर पर पुख्ता नहीं है।

उन्होंने सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि इस विषय पर कोई भी कानून लाते समय सतर्कता बरती जाए। इस तरह के कानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, जबकि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश की ओर से पदोन्नति में आरक्षण देने के कानून को निरस्त कर चुका है।

वाहनवती की ओर से यह राय कार्मिक मंत्रालय को भेजी गई है। हाल ही में सरकार ने टिकाऊ संशोधन कर एससी/एसटी को प्रमोशन में आरक्षण का भरोसा राजनीतिक दलों को दिलाया था। वाहनवती ने सरकार को इस मुद्दे पर सावधानी से कदम बढ़ाने की नसीहत देते हुए कहा है कि संशोधन के लिए प्रस्तावित कदम मजबूत होने चाहिए क्योंकि नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर लोग अदालत में इसे चुनौती देंगे।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर सरकार को इस मुद्दे के सभी पहलुओं से अवगत कराते हुए पेचीदगियों की जानकारी भी दी है। सर्वोच्च अदालत ने 28 अप्रैल को पूर्व की मायावती सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी को दिए गए प्रमोशन में आरक्षण को निरस्त कर दिया था। इसी के बाद केंद्र सरकार ने इस आरक्षण के संबंध में संशोधन लाने को कहा था। हाल ही में इस मसले पर सर्वदलीय बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने रुख साफ करते हुए कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए सरकार टिकाऊ विधेयक लेकर आएगी।

विरोध में है सपा
समाजवादी पार्टी प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में है। उसका कहना है कि इससे सामाजिक भेदभाव बढ़ेगा।

भाजपा का रुख साफ नहीं
इस मुद्दे पर दुविधा में पड़ी भाजपा ने अपना रुख अब तक खुलकर जाहिर नहीं किया है। उसकी आशंका है कि प्रमोशन में आरक्षण को समर्थन पर उसका सबसे खास वोट बैंक सवर्ण नाराज हो जाएंगे, जबकि विरोध करने पर अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग।

सरकार ने किया वादा
सरकार ने हाल ही में राजनीतिक दलों को भरोसा दिलाया है कि उसने सभी कानूनी पहलुओं की जांच करने के बाद एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण मुहैया करने को लेकर संविधान में संशोधन करने का समर्थन किया है।

एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण मुहैया कराने के लिए प्रस्तावित कदम पर्याप्त रूप से मजबूत होना चाहिए क्योंकि इसे अदालत में चुनौती दिए जाने की प्रबल संभावनाएं है।
जीई वाहनवती, अटॉर्नी जनरल

दबंगों ने महिला को किया अधमरा


खुर्जा (बुलंदशहर) : थाना देहात क्षेत्र के गांव अच्छेजा घाट निवासी एक महिला को दबंगों ने इस कदर पीटा की वह बेहोश हो गई। परिजनों ने उसे सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया है। वारदात की रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
गांव अच्छेजा घाट निवासी काली चरन का दबंगों से दरवाजा लगाने को लेकर पिछले काफी दिन से विवाद चल रहा है। आरोपी दबंग पहले भी पीड़ितों पर दो बार हमला कर मारपीट कर चुके हैं। गुरुवार को दबंगों ने फिर से दरवाजे को लेकर पीड़ित के घर पर धावा बोला और पीड़ित की पत्‍‌नी अनीता को लाठी डंडों से जमकर पीटा। घर में अकेली अनीता बेहोश हो गई। आरोपी फरार हो गए। बाद में घायल महिला को परिजनों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। तहरीर तीन दबंगों के खिलाफ थाना पुलिस को दी है। ग्रामीणों ने बताया कि दोनों पक्षों में अक्सर दरवाजे को लेकर मारपीट और हाथापाई होती रहती है। कई बार गांव के लोगों ने दोनों पक्षों को समझाया, लेकिन विवाद शांत नहीं हुआ। 

छेड़छाड़ का विरोध करने पर युवती को किया अधमराAug 03, 03:24 am


सिकंदराबाद (बुलंदशहर) : रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार भी छेड़छाड़ की घटनाओं से अछूता नहीं रहा। गुरुवार को मनचलों ने छेड़छाड़ का विरोध करने वाली युवती को टेंपो से खींचकर पिटाई कर अधमरा कर दिया। युवती को गंभीर हालत में दिल्ली रेफर किया गया है।
आजमपुर हुसैनपुर निवासी विधवा पुष्पलता अपनी ननद गुड्डी व बच्चों के साथ दिल्ली में रहती है। बुधवार शाम पुष्पलता अपनी ननद व देवर विजय के साथ दिल्ली से गांव आ रही थी। वैर रेलवे स्टेशन पर उतरकर तीनों गांव जाने वाले एक टेंपो में सवार हो गए। टेंपो में पहले से ही गांव का एक युवक भी बैठा था। आरोप है कि युवक ने ननद-भाभी के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी। गुड्डी ने विरोध किया तो मनचले ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। टेंपो में करीब एक दर्जन सवारियां बैठी थी, मगर किसी ने भी युवक का विरोध नहीं किया।
इधर जैसे ही टेंपो गांव पहुंचा तो आरोपी ने गुड्डी को अपने घर के सामने गाड़ी से नीचे खींच लिया और परिजनों के साथ मिलकर ननद भाभी की पिटाई की। देवर विजय ने घर जाकर परिजनों को जानकारी दी। इसके बाद पीड़ित परिजन किसी प्रकार दोनों महिलाओं को छुड़ाकर लाए।
मारपीट में गुड्डी काफी जख्मी हो गई थी, जिसे रात में ही जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उसकी हालत को गंभीर देखते हुए डाक्टरों ने उसे दिल्ली रेफर कर दिया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जब वे रिपोर्ट कराने जा रहे थे तो उन पर फिर से हमला किया गया। हालांकि आरोपी पक्ष भी पीड़ित पक्ष पर मारपीट का आरोप लगा रहा है।
एसओ केएस चौहान ने बताया कि दोनों पक्षों ने अभी कोई तहरीर नहीं दी है, तहरीर मिलने के बाद ही कोई कार्रवाई की जाएगी।
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