सामाजिक साहित्य

सामाजिक साहित्य 

‘आलोचक बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं’

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हाल ही में कतर में उर्दू अदब का प्रतिष्ठित ‘फरोग-ए-उर्दू’ सम्मान पाने वाले हिंदी-उर्दू के चर्चित कथाकार शमोएल अहमद से निराला की बातचीत.

इन दिनों क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?
संस्मरण लिख रहा हूं. इसके पहले अपनी ही कहानी मृगतृष्णा की स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त था. उस पर टेलीफिल्म बनाई जा रही है.


आपकी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है और अब आप हिंदी के चंद महंगे लेखकों में शामिल होने वाले हैं!
मेरी रचनाओं का अनुवाद तो पहले भी होता रहा है, अभी भी हो रहा है लेकिन मैं क्या महंगे लेखकों में शामिल होऊंगा. जर्मनी में जर्मन एकेडमी के जस्ट फिक्शन सीरिज में मेरे उपन्यास ‘नदी’ का अनुवाद ‘रिवर’ नाम से हुआ है. उसके एवज में करीब 25 हजार डॉलर की रॉयल्टी शायद मुझे मिलेगी. यह इतनी बड़ी राशि तो नहीं हुई कि मैं सबसे महंगा लेखक माना जाऊं.


कहानी और उपन्यास आपकी पहचान रहे हैं. संस्मरण लिखना अनायास शुरू किया आपने या यह ज्यादा महत्वपूर्ण विधा लगी?
सच कहूं तो इसकी प्रेरणा अपने युवा साहित्यकार मित्र अरुण नारायण से मिली. वैसे मुझे भी लगता रहा है कि किसी फनकार के जीवन में आवारापन बना रहना चाहिए. संस्मरण लिखना एक तरीके से आवारापन ही है. इससे आप यथास्थिति के खिलाफ खड़े होने की कोशिश करते हैं. अगर आप लेखन में ईमानदार हैं तो संस्मरण लिखने के लिए साहस चाहिए. लेखक को अपना आकलन करना चाहिए और संस्मरण लेखन एक तरीके से अपना आकलन करना भी है. इस विधा में आपको सब कुछ स्वीकार करना पड़ता है. 


आप इंजीनियर रहे. बाद में कथाकार बने, उपन्यासकार हुए, ज्योतिष केंद्र भी चलाते रहे हैं और एक बड़ी पहचान एक साथ अनेक प्रेम करने वाले की भी रही. कौन-सी पहचान ज्यादा पसंद है?
पूरी दुनिया में सब कुछ खंडित हो रहा है तो एक पहचान के साथ क्यों रहा जाए? पहले कहानीकारों पर एक सामाजिक दायित्व व दबाव होता था, वह टूट गया. सबसे पहले गरीबी को अभिशाप माना गया, उसे हटाने का नारा चला, वह बीच में ही खंडित हो गया. समाजवाद का सपना दिखाया गया, वह सपना ही चोरी हो गया. धर्मनिरपेक्षता का सपना दिखाया जाता है, वह भी टूट चुका है. रही बात इंजीनियर और कथाकार बनने की तो मैं आपको एक बात बताता हूं. जब दस साल का था तो मेरी पहली कहानी अखबार में प्रकाशित हुई. इंजीनियरिंग की डिग्री मैंने ली तो इंजीनियर की नौकरी मैंने की और मुख्य अभियंता के पद तक पहुंचा लेकिन मैं ईमानदारी से कह रहा हूं, मैं कभी इंजीनियर था ही नहीं.


आपकी रचनाओं में सेक्सुअल फैंटेसी ज्यादा होती है, इसलिए कुछ लोग आपको सेक्स का लेखक भी कहते हैं.
अब लोगों का क्या? लोगों ने तो अपने स्तर से हरसंभव कोशिश की कि सेक्स को जहर देकर मार दिया जाए. सेक्स मरा तो नहीं लेकिन और जहरीला जरूर हो गया. इसलिए मैं अब ज्यादा लोगों की बातों पर ध्यान ही नहीं देता. हाल में मुझे फरोग-ए-उर्दू सम्मान मिला. नसीरुद्दीन शाह भी साथ में थे. मैं पटना लौटा तो फेसबुक पर मेरे खिलाफ एक अभियान चला. किसी ने ‘नगमा बानो’ नाम से फेक आईडी बनाकर लिखा कि शमोएल अहमद बेहद ही कमीना इंसान है, उसे कैसे इतना बड़ा सम्मान मिल गया. उस फेक आईडी ने लिखा कि उसके पति दुबई में रहते हैं, वह मेरे घर आया-जाया करता था. उसने मेरे साथ बदसलूकी की है, मेरा यौन शोषण किया है. इसके बाद तो मुझे गालियां ही गालियां दी जाती रहीं. मैं हैरत में था, मेरा ऐसी घटनाओं से कभी कोई वास्ता नहीं रहा लेकिन मैं बचाव की मुद्रा में नहीं आया. मैंने जवाब दिया- मोहतरमा, जो कह रही हैं, वह बिल्कुल सही है. सिर्फ हमारा संबंध ही नहीं बना है बल्कि उनके जो दो बच्चे हैं, उसमें एक मेरा है, यकीन न हो तो उस बच्चे का डीएनए टेस्ट करवा लिया जाए. इसके बाद वह अभियान बंद हुआ.


आप हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं में लिखते हैं. सेक्स को लेकर ज्यादा वर्जनाएं किस भाषा में हैं?
उर्दू में तो सेक्स तरक्की पसंद विषय माना जाने लगा है. इसके लिए मैं मंटो का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने समय में ही इसे आजादी दिला दी थी. कुछ उसी तरह से जैसे अंग्रेजी में डीएच लॉरेंस ने. हिंदी में यह आजादी अब तक नहीं मिल सकी है, हालांकि तेजी से बदलाव हुए हैं. करीब तीन दशक पहले मैंने राजेंद्र यादव के पास ‘हंस’ में छापने के लिए अपनी कहानी ‘बगोले’ भेजी थी. उस कहानी में एक ब्वॉय हंटर अभिजात महिला की कहानी है, जो अपने जाल में मर्दों को फांसती है. एक रोज वह एक 17 साल के लड़के को फांसती है और अपने पास लड़के के आने के पहले तमाम तरह की कल्पनाओं में डूबी रहती है. सोचती है कि वह उस लड़के को धीरे-धीरे सभी तरीके बताएगी लेकिन जब वह किशोर आता है तो महिला को ही कायदे समझाने-सिखाने लगता है. महिला को सदमा लगता है, वह उसे भगा देती है. राजेंद्र यादव ने जवाब में लिखा कि शमोएल, कहानी को नहीं छाप सकता, पाठक नाराज हो जाएंगे. उसके बाद इंटरनेट युग आया तो मैंने इस पर कहानी लिखने की सोची. मैंने चैटिंग को जाना. इंटरनेट पर बिखरे कई सेक्स ग्रुप से जुड़ा और बाद में ‘सेक्सुअल चैटिंग’ पर एक कहानी ‘अनकबूत’ लिखी. मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि अनकबूत में बगोले से ज्यादा सेक्सुअल फैंटेसी थी और तमाम तरह के वर्जित शब्द भी लेकिन राजेंद्र यादव ने उसे सहर्ष छापा और कहा भी कि मजेदार और बेजोड़ कहानी है. कहने का मतलब यह कि वक्त के बदलाव के साथ मन-मिजाज बदलता है. 


हिंदीवाले अनुवाद में तो लॉरेंस की कृति  ‘लेडी चैटर्ली का प्रेमी’  ब्लादीमीर नाबाकोव की  ‘लोलिता’  पढ़ना चाहते हैं लेकिन कोई हिंदी लेखक ऐसा ही लिखे तो फिर हाय-तौबा क्यों?
दरअसल इसमें सबसे बड़ा पेंच तो आलोचक फंसाते हैं. दुर्भाग्य से हिंदी आलोचना में एक प्रेमचंदी घेरा बना हुआ है, उस घेरे से बाहर निकलने ही नहीं देना चाहते किसी को. हालांकि उदय प्रकाश, अखिलेश जैसे रचनाकारों ने उस घेरे को तोड़ा है. अब हिंदी के समाज को कौन समझाए कि अपने यहां जिन रचनाओं में हुस्न का बखान दिल खोलकर हुआ है उन्हें ही क्लासिकल माना जाता है. कुमार संभव, गीत गोविंद, अलिफ लैला आदि में क्या है. बेहद ही खूबसूरत तरीके से हुस्न का बखान.

‘किसी फनकार के जीवन में आवारापन बना रहना चाहिए. संस्मरण लिखना एक तरीके से आवारापन ही है’

आप आलोचकों को दोष दे रहे हैं. आपकी बातों से लगता है कि हिंदी साहित्य में आलोचक एक गैरजरूरी तत्व की तरह हैं.
बेशक. सच कहूं तो आलोचक बेपेंदी के लोटे होते हैं. आलोचक को माली की भूमिका में होना चाहिए लेकिन अधिकांश आलोचक लकड़हारे की भूमिका में रहना चाहते हैं. मेरे हिसाब से तो रचनाकारों को ही आलोचक भी होना चाहिए. अब बताइए कि राजेंद्र यादव कहानी की आलोचना करेंगे तो बेहतर होगा या नामवर सिंह कहानी की आलोचना करेंगे! वैसे मैं तो यही मानता हूं कि जिनकी रचनाओं में दम होता है, उन्हें आलोचक की दरकार नहीं.


भारत जैसे मुल्क में सबसे बड़ी समस्या रोटी की है लेकिन लेखक और कवि सबसे ज्यादा प्रेम के पीछे भागते हैं. आप जैसे लेखक प्रेम के साथ सेक्स के पीछे भी भागते हैं.
ऐसा नहीं है कि रोटी को महत्व नहीं मिला या नहीं मिल रहा. खूब लिखा गया है और लिखा भी जा रहा है लेकिन प्रेम की रचनाएं जल्दी लोकप्रिय हो जाती हैं. और वैसे भी प्रेम तो आत्मा की भूख है न, इस पर हमेशा ही लिखा जाता रहेगा. सेक्स के पीछे भागने का जो सवाल आप पूछ रहे हैं तो उसका जवाब यह है कि सेक्स तो प्रेम का एक जरिया भर होता है. शुरू में शरीर आता है, सेक्स आता है लेकिन प्रेम करने वाला बाद में उससे ऊपर उठ जाता है. जैसे अध्यात्म में आत्मा की परिकल्पना है लेकिन आत्मा को वास करने के लिए एक शरीर की जरूरत तो होती है न. 


आपकी अपनी प्रिय रचना कौन-सी है और लेखकों में कौन पसंद हैं?
सिंगारदान. अपनी इस कहानी से मुझे बेपनाह मोहब्बत है. यह मेरे इलाके भागलपुर की कहानी है. भागलपुर दंगे के समय एक कैंप में मैं तवायफ से मिला था. दंगाइयों ने उसका सब कुछ लूट लिया था, इसका अफसोस नहीं था उसे, वह बार-बार मुझसे कह रही थी कि मेरा सिंगारदान भी ले गए सब. वह पीढ़ियों से मेरे पास था, मेरी पहचान था. मुझे तभी लगा था कि इस तवायफ की तरफ से मुझे भी एक विरोध दर्ज कराना चाहिए. विरासत को ही खत्म कर देने, पहचान पर ही प्रहार कर देने की जो परंपरा चली है, उसके खिलाफ. जहां तक पसंदीदा लेखकों की बात है तो हिंदी में उदय प्रकाश, अंग्रेजी में मिलान कुंदरा और उर्दू में इंतजार हुसैन मेरे प्रिय लेखक हैं.
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 मुलाक़ात | शख़्सियत | ‘जाति विरोधी साहित्य ही दलित साहित्य है’

‘जाति विरोधी साहित्य ही दलित साहित्य है’

imageडॉ. तुलसीराम

डॉ. तुलसीराम उन चुनिंदा दलित चिंतकों में से हैं जो दलित साहित्य से लेकर उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मसलों पर सुलझी हुई राय रखते हैं.  इन तमाम मसलों पर उनकी  पूजा सिंह से बातचीत.
‘मुर्दहिया’  पिछले सालों में आई सबसे चर्चित आत्मकथाओं में से है. दलित साहित्य की मुख्य पहचान आत्मकथाओं से ही है. आप सामान्य साहित्य और दलित साहित्य में क्या अंतर देखते हैं?
दलित साहित्य जाति व्यवस्था विरोधी साहित्य है. साधारण तौर पर जो साहित्य माना जाता है जिसमें ज्यादातर सवर्ण लेखक हैं, यह उससे भिन्न है क्योंकि अन्य लेखक चाहे जितने भी बड़े हों जाति व्यवस्था के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाते थे. जातीय भेदभाव, जातीय व्यवस्था के खिलाफ, जातीय शोषण के खिलाफ एक संगठित रूप में दलित साहित्य सामने आया. तकनीकी रूप से इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से हुई 60 के दशक में. कहने को तो दलित कविता, कहानी और उपन्यास भी लिख रहे हैं लेकिन जैसे ही दया पवार की आत्मकथा बलूत आई, समूचे साहित्य जगत में  तहलका-सा मच गया. वह आधुनिक दलित साहित्य की पहली आत्मकथा है. फिर एक-एक करके तमाम दलित आत्मकथाएं लिखी गईं. हिंदी क्षेत्र में भारत में दलित साहित्य थोड़ा पीछे है. जहां तक मेरी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ का सवाल है तो वह श्मशान घाट वाला एक ऐसा चौराहा था जहां से गुजरे बिना कहीं नहीं जाया जा सकता था. प्रतीकात्मक रूप में मैंने माना कि मुर्दहिया हमारी जिंदगी है. मेरी आत्मकथा अलग है क्योंकि अधिकांश दलित आत्मकथाएं बहुत क्रोध में लिखी गई हैं.

आप लंबे समय से जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में हैं. क्या दुनिया के अन्य देशों में भी दलितों या अस्पृश्यों का यही हाल है?
जैसे हमारे यहां अस्पृश्यता है उसी तरह अफ्रीका से लेकर यूरोप व अमेरिका तक लोगों से रंग के कारण बुरा बर्ताव किया जाता रहा है. रंगभेद के दौर में अश्वेत लोगों के लिए चलने के लिए अलग पटरी, अलग दुकानें और यहां तक कि ट्रेन में अलग डिब्बे हुआ करते थे. उन्हें स्कूलों में एडमिशन नहीं मिल पाता था. उनके लिए अलग स्कूल थे. यहां तक कानून भी अलग-अलग थे. हमारे यहां यही दलितों के साथ होता रहा. कुआं नही छूना, सवर्णों के मोहल्ले से नहीं गुजरने देना, यह वही है. यह भेदभाव मीडिया में भी है. दिल्ली में गत वर्ष 16 दिसंबर को हुई सामूहिक बलात्कार की जघन्य घटना को अंतरराष्ट्रीय स्तर का मसला बना दिया गया. हरियाणा में ऐसे अपराध रोज होते हैं. दलित बच्चियों को बलात्कार के बाद जलाकर मार दिया जाता है. मीडिया के लिए यह एक कॉलम की खबर है.



मुर्दहिया को मशहूर समाज विज्ञानी बद्री नारायण ने वंचित वर्ग का सबअल्टर्न इतिहास कहा, लेकिन एक अन्य दलित विद्वान डॉ. धर्मवीर ने कहा है कि इस किताब में दलितों को लेकर प्रतिबद्धता नहीं है.
धर्मवीर की तो बात ही अलग है. वे स्त्री विरोधी व्यक्ति हैं, मेरी मां के खिलाफ उन्होंने ऐसी काल्पनिक बात कही जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. देखिए, सवाल प्रतिबद्धता की कमी का नहीं बल्कि ईर्ष्या का है. मेरी आत्मकथा के आते ही तमाम दलित आत्मकथाओं की पूछ कम हो गई. तो ये सारी बातें उसी क्रोध से उपजी हैं.


कुछ लेखकों का मानना रहा है कि दलित ही दलित लेखन कर सकता है, क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सहानुभूति कभी स्वानुभूति का स्थान नहीं ले सकती? 
अगर कोई सवर्ण जाति व्यवस्था के खिलाफ लिखता है तो इसे क्यों नहीं दलित साहित्य माना जाए? करीब ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने जाति व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छोड़ा. उनके अनुयायियों में सभी प्रमुख लोग सवर्ण थे. लेकिन उन्होंने कभी दलितों व अन्य में भेदभाव नहीं किया. जाति से लड़ने के कारण ही ब्राह्मणों ने बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम कराया. बौद्ध धर्म को भारत से बेदखल कर दिया गया. इस तरह का अत्याचार उन बौद्धों को सहना पड़ा जो मूलतया सवर्ण थे. ऐसे मे कोई लेखक जब कहता है कि केवल दलित ही दलित साहित्य रच सकता है तो यह सही नहीं है. जो भी जाति व्यवस्था के विरोध में लिखता है वह दलित साहित्य रचता है.


कहा जाता है कि हिंदी में दलित साहित्य का आगमन मराठी में आई दलित आत्मकथाओं के जरिए हुआ. 
यह सच है. इसे मानने में कोई हर्ज नहीं है. इसकी शुरुआत दया पवार की आत्मकथा से हुई. दलित साहित्यकार सूरजपाल सिंह चौहान कहते हैं कि कब तक हमें राहुल सांकृत्यायन या मराठी दलित साहित्य की कलम से पीटा जाएगा. ऐसे तो वे दलितों के लिखे को भी नकार रहे हैं. यह उग्रवादी विचारधारा है और उग्रवाद का जीवन बहुत छोटा होता है. नक्सलवादियों को ही देख लीजिए. आज वे कम से कम डेढ़ सौ समूहों में बंट गए हैं और एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं.


डॉ. बीआर आंबेडकर दलित शब्द के खिलाफ थे. उनकी नजर में इसकी जातीय पहचान नहीं थी. वे हर वर्ग के शोषित को दलित मानते थे? 
जी हां, आंबेडकर डिप्रेस्ड क्लास शब्द का इस्तेमाल करते थे. उनकी सोच बहुत व्यापक थी. 1951 में वे हिंदू कोड बिल लाए थे जो नहीं पास हो सका. इसके जरिए महिलाओं को पिता की धन संपत्ति में अधिकार और बराबरी की शिक्षा दिलाने की बात थी. संसद में उन्होंने कहा था, ‘जो योगदान मैं संविधान के जरिए नहीं दे पाया हूं, उसे हिंदू कोड बिल के जरिए देना चाहता हूं.’ लेकिन इसे नकार दिया गया. आंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू कोड बिल मुख्यतया सवर्ण महिलाओं के लिए था. तो सवर्ण महिलाओं के लिए उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दिया, लेकिन कोई इतिहासकार इस बारे में नहीं लिखता. उनको संकुचित ढंग से केवल दलितों का हितैषी साबित करने की कोशिश की गई.


क्या आज के दलित आंबेडकर की दिखाई राह से विचलित हो चले हैं?
हां, उनका एक हिस्सा विचलित हो चुका है. मायावती और उनके अनुयायी इसी में आते हैं. उन्होंने जितनी मूर्तियां बनवाई हैं उतने स्कूल खोल देतीं तो दलितों को कितना फायदा होता.  कुछ लोग दलित साहित्य को आंबेडकर साहित्य का नाम दे रहे हैं. यह भी गलत है. एक व्यक्ति को आधार मानकर साहित्य नहीं रचा जा सकता. यह व्यक्ति पूजा एक नए किस्म के अंधविश्वास की ओर ले जाएगी. यह साहित्य रच रहे समूचे दलित समाज को नकारने की बात है.


क्या आज दलित एक नई तरह की जातीय पहचान के साथ कट्टर हो रहा है?
यह मायावती की देन है. सन 1984 में जब बहुजन समाज पार्टी बनी तो कांशीराम ने नारा दिया कि अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो. ऐसे में तब दलित समुदाय काफी हद तक उनके साथ हो गए. सबसे खतरनाक बात यह हो गई कि कांशीराम और मायावती ने हर जाति का अलग सम्मेलन बुलाकर जातीय भावना को भड़काया. मायावती अपनी बैठकों में कहती रही हैं कि ब्राह्मण हाशिये पर चले गए हैं अब उनके सशक्तीकरण के लिए मैं उन्हें मजबूत बनाऊंगी. तो जाति व्यवस्था के निर्धारक ब्राह्मणों को वह हाशिये पर गया हुआ बताती हैं. ब्राह्मण कितना भी हाशिये पर चला जाए लेकिन ईश्वर उसका सबसे बड़ा हथियार है. एक गरीब ब्राह्मण एक दोने में कुछ फूल लेकर घूमता है और हजारों रुपये कमा लेता है. यह ईश्वर की सत्ता है. देश में अब पार्टियों की नहीं जातियों की सत्ता है. फिर चाहे वह उत्तर प्रदेश हो, बिहार हो या दक्षिण भारत.


पिछले साल के अंत में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने कहा था कि अगर साहित्य में आरक्षण हुआ तो वह भी राजनीति की तरह गंदा हो जाएगा. उनके इस वक्तव्य को आप किस तरह देखते हैं?
उनका यह बयान अनुचित है क्योंकि किसी भी दलित साहित्यकार ने साहित्य में आरक्षण की बात नहीं की. यह उनकी अपनी सोच है. यह कहना कि आरक्षण राजनीति को गंदा करता है, गलत है. अगर दलितों का आरक्षण नहीं हो तो पूरे भारत में एक भी नौकरी दलित को नहीं मिलेगी. यह एक कड़वी हकीकत है. 1950 से दलितों और आदिवासियों के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण लागू हुआ. समग्रता में कुल 10 फीसदी आरक्षण ही मिला. जो 12.5 फीसदी छूट गया उसमें दलितों की कई लाख नौकरियां सवर्णों ने इस आधार पर हथिया लीं कि योग्य पात्र नहीं मिला. बहुत बाद में वीपी सिंह ने यह व्यवस्था की कि अगर योग्य दलित नहीं मिला तो पद रिक्त रखा जाएगा. देश के विश्वविद्यालयों में तीन फीसदी से ज्यादा दलित नहीं हैं. जेएनयू में मैं अकेला हूं जो असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर तीनों पदों पर जनरल कोटे से आया. आरक्षण से तो थोड़ी-बहुत समानता ही आई है. पर इसके बिना हालात बहुत विकट होते.


महात्मा गांधी ने द. अफ्रीका में रंगभेद को लेकर सबसे पहले आवाज उठाई, लेकिन भारत में वेजाति और वर्ण व्यवस्था के कट्टर हिमायती नजर आते हैं?
गांधी से आंबेडकर की लड़ाई इसी बात पर हुई. यहां उनका कहना था कि छुआछूत आदमी की देन है जबकि जाति व्यवस्था ईश्वर की देन है. इसलिए जाति व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. जबकि दलितों की सारी समस्या जाति व्यवस्था की देन है. वह हर जगह गीता लेकर घूमते थे. उसी गीता का 18वां अध्याय जाति व्यवस्था का महिमामंडन करता है. वहां कृष्ण कहते हैं कि जाति मैंने बनाई है और जो इसका विरोध करेगा वह मेरा विरोध करेगा. मैं उसका संहार करूंगा. इस मामले में गांधी की भूमिका बहुत नकारात्मक थी.

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