मंगलवार, 8 मार्च 2011

दैनिक जनसत्ता के संपादकीय पेज पर आज छपा है, यहां नए शीर्षक के तहत पोस्ट किया जा रहा है।


नीतीश जी, सवर्ण आरक्षण लागू कीजिए, प्लीज़!

by Dilip Mandal on 07 मार्च 2011 को 20:56 बजे
(दैनिक जनसत्ता के संपादकीय पेज पर आज छपा है, यहां नए शीर्षक के तहत पोस्ट किया जा रहा है।)

दिलीप मंडल

नीतीश कुमार की सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। किसी भी राज्य में पहली बार सवर्ण या ऊंची कही जाने वाली जातियों के उत्थान के लिए आयोग बना है। यह आयोग इसलिए बनाया गया है ताकि सवर्णों के विकास के लिए उपाय सुझाए जाएं। वैसे तो, विकास की तमाम योजनाओं में सवर्णों की पहले से ही हिस्सेदारी है। नरेगा से लेकर जनवितरण प्रणाली और समेकित ग्रामीण विकास से लेकर सर्वशिक्षा और विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना तक कहीं भी उनकी हिस्सेदारी में बाधा नहीं है। इस योजनाओं में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए किसी आयोग की जरूरत नहीं है।

दरअसल उनकी एक ही दिक्कत है कि उन्हें शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण नहीं मिलता। सवर्णों की शिकायत है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्गों को शिक्षा और नौकरियों में दिए जा रहे आरक्षण की वजह से उनका विकास रुक गया है। उनकी तरक्की के मौके कम हो गए हैं। उनके बच्चों को दाखिला नहीं मिलता, नौकरियों की तलाश में वे मारे-मारे फिरते हैं। ज्यादा नाराज होने पर वे आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह तक कर लेते हैं। यह एक त्रासद स्थिति है। सवर्णों की इस शिकायत को दूर करने के लिए ही बिहार में सवर्ण आयोग का गठन किया गया है।  

अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सवर्णों को आरक्षण देना चाहते हैं। यह एक अच्छी बात है और इसमें देर नहीं करनी चाहिए। ऐसा करके बिहार देश के सामने एक मिसाल कायम करेगा। बिहार को यह गौरव नीतीश कुमार के नेतृत्व में मिले, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। लोगों ने उनके नेतृत्व वाले गठबंधन को इतने भारी बहुमत से जिताया है, अब नीतीश कुमार पर जिम्मेदारी है कि न सिर्फ बिहार के सभी समुदायों का ध्यान रखें बल्कि देश के सामने ऐसी मिसाल भी कायम करें जिसे बाकी राज्य भी अपनाएं। सवर्णों के हितों की रक्षा करना और उनके साथ हो रहे अन्याय को दूर करने की पहल करना उनका कर्तव्य भी है। बिहार चुनाव के जनादेश का संदेश भी यही है। इसलिए सवर्ण आयोग गठित करने की नीतीश सरकार की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए। अगले कदम के रूप में आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सवर्णों को आरक्षण देने के लिए कानून बनाने की तैयारी करनी चाहिए। सवर्ण आयोग का गठन एक खास सामाजिक समस्या को दूर करने के लिए किया गया है। नीतीश कुमार ने ऐसा करके लोगों की महत्वाकांक्षाएं भी जगा दी हैं।

भारत के संविधान में सवर्ण या ऊंची जाति नाम की किसी श्रेणी का उल्लेख तक नहीं है। विशेष अवसर का सिद्धांत अनुसूचित जाति, जनजाति और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भी कुछ विशेष प्रावधान हैं। लेकिन सवर्णों के लिए किसी तरह का प्रावधान नहीं है। बिहार सरकार को विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार के पास भेजना चाहिए और संविधान में संशोधन कर सवर्णों के लिए आरक्षण का प्रावधान जोड़ने की मांग करनी चहिए।    

लेकिन सवाल उठता है कि यह आरक्षण किस तरह लागू किया जाए?  देश में जातिवार जनगणना नहीं होती। बिहार के भी जातिवार आंकड़े, इस वजह से उपलब्ध नहीं है। लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है कि बिहार में सवर्णों की आबादी 10 फीसदी के आसपास होगी। अगर किसी को इस अनुमान पर संदेह है तो उसे तत्काल जातिवार जनगणना के लिए आंदोलन शुरू करना चाहिए। जातिवार जनगणना के बाद प्रामाणिक आंकड़े होंगे तो हर समुदाय के विकास के लिए योजनाएं बनाने में आसानी होगी। बहरहाल जब तक जातिवार जनगणना न हो जाए, तब तक 1931 के आंकड़ों से काम चलाया जा सकता है। इन आंकड़ों से अगर बिहार में सवर्णों की आबादी 10 फीसदी साबित होती है तो नीतीश सरकार को विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सवर्णों के लिए शिक्षा, नौकरियों, ठेकों, सप्लाई आदि में 10 फीसदी आरक्षण लागू कर देना चाहिए। चूंकि नीतीश कुमार को लगता है कि बिहार में सवर्णों की हालत ठीक नहीं है और उनके लिए विशेष उपाय किए जाने चाहिए, तो उन्हें सवर्णों को आरक्षण देने का साहस दिखाना चाहिए। जनादेश का सम्मान करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

सुप्रीम कोर्ट में बालाजी केस में फैसले के बाद ओबीसी आरक्षण देश में जिस तरह लागू होता है, उसी तरह का फॉर्मूला सवर्णों के लिए लागू करना नीतीश कुमार को अन्यायपूर्ण लग सकता है। बालाजी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से कम ही रहना चाहिए। इसलिए ओबीसी आरक्षण लागू हुआ तो हालांकि आबादी में उनका हिस्सा 52 फीसदी माना गया, लेकिन आरक्षण 27 फीसदी दिया गया क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलाकर पहले से ही 22.5 फीसदी आरक्षण लागू था। ओबीसी को 27 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने से 50 फीसदी की सीमा टूट जाती। इसलिए उन्हें आबादी से लगभग आधा आरक्षण मिला।

लेकिन नीतीश कुमार को सवर्णों के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए। 52 फीसदी ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण देना एक बात है लेकिन 10 फीसदी सवर्ण आबादी के लिए 5 फीसदी आरक्षण देना सरासर अन्याय होगा। उन्हें आबादी के अनुपात में आरक्षण मिलना चाहिए।  नीतीश कुमार को विधानसभा में प्रचंड बहुमत का समर्थन हासिल है। उन्हें विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र में भेजना चाहिए कि बिहार विधानसभा ने सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का कानून पारित किया है। इसके बाद बचेंगी 90 फीसदी सीटें। इसलिए एक और कानून पारित कर बाकी 90 फीसदी सीटें, ठेके, सप्लाई के टेंडर आदि का बंटवारा संविधानसम्मत सामाजिक समूहों के बीच आबादी के अनुपात में करने का फैसला भी किया जाए।

संविधान में जिन समूहों को मान्यता प्राप्त है वे हैं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक और शैणक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग। यानी बाकी 90 फीसदी सीटें और अवसर इन तीन समुदायों को मिलना चाहिए। इन समूहों के बीच बंटवारे लिए जाति के आंकड़ों की जरूरत होगी। संबंधित आंकड़ों के लिए सरकार या तो जनगणना करा ले या फिर किसी समाजशास्त्री के नेतृत्व में एक आयोग बनाकर तीन महीने के अंदर सर्वे कराकर आंकड़े जुटा ले। बिहार सरकार केंद्र सरकार से यह कह सकती है कि जनगणना आयुक्त का कार्यालय बिहार में जातिवार जनगणना कराए। 

राज्य विधानसभा को यह भी प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि जिस तरह तमिलनाडु 69% आरक्षण देता है, उसी तरह बिहार भी सीमा से ज्यादा आरक्षण देगा। इस बारे में संसद में सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि एक कानून बनाकर बिहार के इस प्रावधान को संविधान की नवीं अनुसूचि में डाला जाए। इस तरह न्यायपालिकाएं न्याय करने की नीतीश सरकार की कोशिशों में अड़ंगा न डाल पाएंगी। ऐसा करना बेहद जरूरी है क्योंकि मामला अदालत में फंस गया तो सुशासन का एजेंडा अधूरा रह जाएगा। आरक्षण को इस तरह लागू करने से हर समुदाय को उसका वाजिब हक मिलेगा और जातियों के बीच भाईचारा बढ़ेगा। जाति संबंधी कई विवाद इस तरह हल हो जाएंगे और सामाजिक समरसता आएगी। पिछड़ों के अंदर अनुसूचि एक और दो के बीच भी अवसरों को विभाजन हो। दलितों और महादलितों के बीच विभाजन की बात नीतीश भी अब नहीं कर रहे हैं तो इस विभाजन को फिलहाल टाल दिया जाए और दलितों को एक समूह माना जाए।

मुसलमानों में भी अशराफ और पसमांदा के बीच आबादी के हिसाब से अवसरों को बंटवारा किया जाए। इस तरह कई सवाल जो राजनीतिक ताकत और दादागिरी से तय होते हैं, उन्हें हल करने का एक वैज्ञानिक तरीका मिल जाएगा। अभी तक आरक्षण संबंधी विवादों को सड़कों पर हल करने की कोशिशें होती रही हैं। इस मामले में एक नए मॉडल की नितांत आवश्यकता है। नीतीश कुमार ने सवर्ण आयोग बनाकर एक नया रास्ता निकाला है। इस पर अब पूरे देश की नजर होगी। साथ ही इस बात पर भी नजर होगी कि सवर्ण आयोग के अगले कदम के रूप में नीतीश कुमार क्या करते हैं। यह बहुत जरूरी है कि सवर्ण आयोग और सवर्णों और बाकी समुदाय को आबादी के अनुपात में आरक्षण के मामले में राजनीतिक इच्छा शक्ति में किसी तरह की कमी नहीं होनी चाहिए। 

बिहार का यह मॉडल पूरे देश को रास्ता दिखा सकता है। आरक्षण और अवसरों के बंटवारे को लेकर देश भर में उत्पात होते रहते हैं। अगर बिहार ने एक ऐसा फॉर्मूला दे दिया, जिससे सामाजिक समरसता का मार्ग खुले, तो बाकी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी इस पर अमल कर सकती है। जाट और गुर्जरों के आरक्षण संबंधी आंदोलनों का भी इस फॉर्मूले से समाधान निकल सकता है। सबसे बड़ी बात तो यह कि इस तरह सवर्णों की अरसे से चली आ रही यह शिकायत दूर हो जाएगी कि आरक्षण की वजह से उनके साथ अन्याय हो रहा है।

एक आदर्श लोकतंत्र में किसी भी समुदाय के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। यह लोकतंत्र के हित में नहीं है। सवर्णों को जब दुर्बल समुदाय मान लिया गया है और उनके लिए आयोग गठित कर दिया गया है तो सवर्णों के लिए विशेष अवसर देने में किसी तरह का संकोच नहीं करना चाहिए। किसी भी दुर्बल समुदाय को हक से वंचित रखना अच्छी बात नहीं है। सवर्णों को आरक्षण के साथ अगर बाकी जाति समूहों को उनकी आबादी अनुपात में अवसर मिल जाएंगे तो फिर किसी को भी शिकायत करने का मौका नहीं मिलगा। इस तरह हर जाति समूह को विकास करने  का मौका मिलेगा। इससे बेहतर सुशासन और क्या हो सकता है?

नीतीश कुमार के सामने एक ऐतिहासिक मौका है। बिहार के मतदाताओं ने उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी सौपी है। सवर्णों को आरक्षण देने के साथ ही, सभी सामाजिक समूहों को आबादी के अनुपात में आरक्षण देकर वे बिहार के सामाजिक सवालों को हल करने के साथ ही देश को भी दिशा दिखा सकते हैं। उन्हें यह अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। बिहार के जनादेश का वास्तविक अर्थों में सम्मान इसी तरह किया जा सकता है।

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