शनिवार, 31 जनवरी 2026

ब्राह्मणों का भारत में आगमन और मूल जातियों पर उनका अधिकार


ब्राह्मणों का भारत में आगमन और मूल जातियों पर उनका अधिकार

ब्राह्मणों का भारत में आगमन एक विवादास्पद ऐतिहासिक विषय है, जो मुख्य रूप से इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी (Indo-Aryan Migration Theory) से जुड़ा है। यह थ्योरी 19वीं शताब्दी में यूरोपीय विद्वानों द्वारा विकसित की गई थी, लेकिन अब पुरातात्विक, भाषाई, जेनेटिक और पुराविद्या के प्रमाणों पर आधारित है। कुछ विद्वान इसे "आर्यन इन्वेजन" (Aryan Invasion) कहते हैं, लेकिन मुख्यधारा के विद्वान इसे "माइग्रेशन" (प्रवासन) मानते हैं – एक धीमी प्रक्रिया, न कि आक्रमण। दूसरी ओर, कई भारतीय राष्ट्रवादी विद्वान आर्यों को भारत का मूल निवासी मानते हैं और "आउट ऑफ इंडिया थ्योरी" (Out of India Theory) का समर्थन करते हैं। नीचे विस्तार से चर्चा की गई है, जो विभिन्न स्रोतों पर आधारित है।


1. ब्राह्मणों का आगमन: ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण

  • समय और उत्पत्ति: इंडो-आर्यन लोग लगभग 2000 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व के बीच मध्य एशिया (Central Asia) या स्टेप क्षेत्र (Pontic-Caspian Steppe) से उत्तर-पश्चिम भारत में प्रवेश कर धीरे-धीरे फैले। यह हड़प्पा सभ्यता (Indus Valley Civilization) के पतन के बाद की अवधि थी। वे इंडो-ईरानियन लोगों से अलग हुए और बैक्ट्रिया-मार्गियाना संस्कृति (BMAC) से प्रभावित हुए, जहां से वे धार्मिक विश्वास लेकर आए।
  • प्रमाण:
    • भाषाई: संस्कृत (Sanskrit) इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से जुड़ी है, जो यूरोप और एशिया की भाषाओं से मिलती है। आर्यन लोग संस्कृत लेकर आए, जिससे वैदिक ग्रंथ बने।
    • जेनेटिक: हाल के अध्ययनों (जैसे हार्वर्ड के डेविड रीच के नेतृत्व में) से पता चलता है कि दूसरे सहस्राब्दी ईसा पूर्व में स्टेप वंश (Steppe ancestry) भारत में आया, जो ब्राह्मणों और अन्य उच्च वर्णों में अधिक पाया जाता है। दक्षिण एशियाई आबादी में प्राचीन दक्षिण भारतीय (AASI), ईरानी किसान (Iranian Farmer) और स्टेप वंश का मिश्रण है। ब्राह्मणों में स्टेप वंश का अनुपात अधिक है, जो इंडो-आर्यन भाषाओं के रखवालों के रूप में उनकी भूमिका दर्शाता है।
    • पुरातात्विक: कोई बड़े आक्रमण के प्रमाण नहीं, लेकिन सांस्कृतिक परिवर्तन (जैसे घोड़े, रथ और लोहे के उपयोग) दिखते हैं। यह धीमी सांस्कृतिक प्रसार (Cultural Diffusion) था।
  • प्रवासन की लहरें: पहली लहर ईरान से (Zagros क्षेत्र से) किसान और पशुपालक आए (लगभग 4000 ईसा पूर्व से पहले), फिर दक्षिणी रूस (Volga) से दूसरी लहर (1000 ईसा पूर्व से पहले)। वैदिक संस्कृति (1700-1100 ईसा पूर्व) इसी से विकसित हुई।

2. मूल जातियों पर ब्राह्मणों का अधिकार: सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

  • मूल निवासी कौन थे?: भारत के मूल निवासी मुख्य रूप से द्रविड़ (Dravidian), ऑस्ट्रो-एशियाटिक (Austroasiatic) और प्राचीन दक्षिण भारतीय (AASI) समुदाय थे, जो हड़प्पा सभ्यता से जुड़े थे। वे कृषि, शहरीकरण और प्रकृति-केंद्रित धर्म में कुशल थे।
  • अधिकार कैसे स्थापित हुआ?:
    • वर्ण व्यवस्था (Varna System): आर्यन लोग वैदिक धर्म और ग्रंथों (ऋग्वेद आदि) के माध्यम से सामाजिक पदानुक्रम स्थापित किया। ब्राह्मण सबसे ऊपर थे – पुजारी, शिक्षक और धार्मिक नेता के रूप में। क्षत्रिय योद्धा, वैश्य व्यापारी और शूद्र सेवा वर्ग थे। मूल निवासी अक्सर निचले वर्णों में रखे गए। यह व्यवस्था धीरे-धीरे जाति (Caste) में बदली, जहां अंतर्विवाह (Endogamy) लागू हुआ (लगभग 2200 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी तक, और गुप्त काल में मजबूत)।
    • सांस्कृतिक एकीकरण: आर्यन लोग मूल निवासियों से मिश्रित हुए, लेकिन ब्राह्मणों ने वैदिक भाषा, यज्ञ और देवताओं (इंद्र, अग्नि) को प्रमुख बनाया। मूल देवताओं (जैसे शिव-पूर्व रूप) को शामिल किया गया, लेकिन ब्राह्मणों का धार्मिक नियंत्रण रहा। जेनेटिक अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च वर्णों में स्टेप वंश अधिक है, जो सामाजिक प्रभुत्व दर्शाता है।
    • शक्ति का स्रोत: ब्राह्मणों ने ज्ञान, शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों पर एकाधिकार रखा। वे राजाओं के सलाहकार बने, जिससे सामाजिक-आर्थिक नियंत्रण मिला। मूल जातियां (जैसे दास या दस्यु) वैदिक ग्रंथों में कभी-कभी नकारात्मक रूप से चित्रित हैं, लेकिन वास्तव में मिश्रण हुआ।
  • प्रभाव: इससे भाषा परिवर्तन (Language Shift) हुआ – उत्तर भारत में इंडो-आर्यन भाषाएं प्रमुख बनीं, जबकि दक्षिण में द्रविड़ भाषाएं बनी रहीं। सामाजिक असमानता बढ़ी, जो आज की जाति व्यवस्था की जड़ है।

3. विवाद और वैकल्पिक दृष्टिकोण

  • आर्यन इन्वेजन थ्योरी की आलोचना: 1980 के दशक से "आक्रमण" की अवधारणा त्याग दी गई, क्योंकि कोई बड़े युद्ध के प्रमाण नहीं। अब इसे "धीमी प्रसार" माना जाता है। कुछ विद्वान (जैसे हिंदू राष्ट्रवादी) इसे औपनिवेशिक साजिश मानते हैं, जो भारतीयों को विभाजित करने के लिए बनाई गई। वे आर्यों को भारत का मूल निवासी बताते हैं और वैदिक संस्कृति को हड़प्पा से जोड़ते हैं।
  • आउट ऑफ इंडिया थ्योरी: इस अनुसार, आर्य भारत से निकलकर यूरोप और एशिया फैले। लेकिन मुख्यधारा के विद्वान इसे प्रमाणों की कमी से अस्वीकार करते हैं।
  • राजनीतिक आयाम: यह थ्योरी हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए चुनौती है, क्योंकि ब्राह्मणों को "बाहरी" मानना उनके नेतृत्व को प्रश्नित करता है।

कुल मिलाकर, ब्राह्मणों का आगमन सांस्कृतिक मिश्रण की प्रक्रिया था, जिसने भारत की सामाजिक संरचना को आकार दिया। लेकिन यह विषय बहस का है, और नए जेनेटिक अध्ययन (जैसे 2018-2019 के) इसे मजबूत कर रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए पुरातात्विक स्रोतों का अध्ययन करें।

किसान जातियों का भारत के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक योगदान

किसान जातियों का भारत के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक योगदान


भारत में "किसान जातियां" मुख्य रूप से उन समुदायों को संदर्भित करती हैं जो परंपरागत रूप से कृषि से जुड़े रहे हैं, जैसे जाट, यादव (अहीर), गुर्जर, कुर्मी, पटेल आदि। ये जातियां भारतीय समाज की रीढ़ रही हैं, और इनका योगदान बहुआयामी है। ये समुदाय ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने से लेकर आर्थिक विकास, धार्मिक परंपराओं और राजनीतिक परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। नीचे विभिन्न क्षेत्रों में इनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है, जो ऐतिहासिक, सामाजिक और समसामयिक संदर्भों पर आधारित है।

1. सामाजिक योगदान

किसान जातियां भारतीय समाज की आधारशिला हैं, जो ग्रामीण जीवनशैली, परिवार व्यवस्था और सामुदायिक एकता को मजबूत करती रही हैं।

  • ग्रामीण समाज की संरचना: ये जातियां कृषि-आधारित समाज का मुख्य हिस्सा हैं, जहां संयुक्त परिवार प्रथा, सामुदायिक सहयोग और परंपरागत मूल्यों का प्रचार करती हैं। ब्रिटिश काल से पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी, और गांवों में दस्तकारी तथा व्यापार कृषि से जुड़े थे। आधुनिकीकरण के प्रभाव से इनमें परिवर्तन आया, जैसे संयुक्त परिवारों का विघटन, लेकिन ये समुदाय अभी भी सामाजिक स्थिरता प्रदान करते हैं।
  • जाति और सामाजिक परिवर्तन: किसान जातियां जाति व्यवस्था में मध्य स्तर पर हैं, और इनके आंदोलनों ने जातिगत भेदभाव को चुनौती दी है। उदाहरणस्वरूप, किसान आंदोलनों ने जाटों और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक तनाव को कम किया तथा दलितों के प्रति सद्भाव बढ़ाया। आधुनिकीकरण ने परंपराओं और धार्मिक विश्वासों के बंधनों को ढीला किया, जिससे विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक संपर्क बढ़ा और जाति पंचायतों का प्रभाव कम हुआ।
  • समुदायिक विकास: ये जातियां ग्रामीण विकास में योगदान देती हैं, जैसे जल संरक्षण, कृषि सहकारी समितियां और सामाजिक सुधार। किसान आंदोलनों ने सामाजिक जागरूकता बढ़ाई, जैसे 2020-21 के आंदोलन ने सांप्रदायिक राजनीति को चुनौती दी।

2. आर्थिक योगदान

किसान जातियां भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, क्योंकि कृषि जीडीपी का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इन समुदायों ने उत्पादन, व्यापार और विकास में योगदान दिया है।

  • कृषि उत्पादन: ये जातियां कृषि की मुख्य शक्ति हैं, जो गेहूं, चावल, दालें आदि उगाती हैं। हरित क्रांति (1960s) में जाट और पटेल जैसे समुदायों ने सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाया। बाजारोन्मुखी कृषि ने आर्थिक विकास को गति दी, हालांकि इससे छोटे किसानों पर दबाव भी बढ़ा।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था: ये समुदाय दस्तकारी, पशुपालन और व्यापार से जुड़े हैं, जो ग्रामीण रोजगार प्रदान करते हैं। जनजातीय किसान समुदायों ने जंगलों को साफ कर कृषि भूमि तैयार की, जिससे आर्थिक विकास में योगदान हुआ। हालांकि, वैश्वीकरण ने चुनौतियां पैदा कीं, जैसे ऋण और बाजार अनिश्चितता।
  • राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भूमिका: किसान जातियां खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं और निर्यात में योगदान देती हैं। कृषि संकट के बावजूद, इनके संगठनों ने एमएसपी और ऋण मुक्ति जैसे मुद्दों पर संघर्ष कर आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया।

3. धार्मिक योगदान

किसान जातियां धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने और बदलने में महत्वपूर्ण हैं, हालांकि यह क्षेत्र कम प्रत्यक्ष है।

  • धार्मिक विश्वास और प्रथाएं: ये समुदाय प्रकृति-केंद्रित धार्मिकता में विश्वास रखते हैं, जैसे फसल उत्सव (बैसाखी, पोंगल) और लोक देवताओं की पूजा। आधुनिकीकरण ने धार्मिक बंधनों को ढीला किया, लेकिन ये अभी भी त्योहारों और अनुष्ठानों के माध्यम से सांस्कृतिक निरंतरता प्रदान करते हैं।
  • सामाजिक-धार्मिक सुधार: किसान आंदोलनों ने धार्मिक विभाजनों को पार किया, जैसे 2020-21 आंदोलन में सिख, हिंदू और मुस्लिम किसानों की एकता ने सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाया। जाट और अन्य समुदायों ने धार्मिक आंदोलनों में भाग लिया, जो सामाजिक न्याय से जुड़े थे।
  • परिवर्तन: वैश्वीकरण ने धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित किया, जैसे पूर्वज पूजा में कमी, लेकिन ये समुदाय अभी भी ग्रामीण धार्मिक जीवन का केंद्र हैं।

4. राजनैतिक योगदान

किसान जातियां राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में सक्रिय रही हैं, विशेष रूप से आंदोलनों और दबाव समूहों के माध्यम से।

  • आंदोलन और विद्रोह: 19वीं-20वीं सदी में किसान आंदोलनों (जैसे संथाल विद्रोह, तेलंगाना विद्रोह) ने औपनिवेशिक शोषण का विरोध किया। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) जैसे संगठनों ने कृषि कानूनों पर दबाव बनाया, जैसे 2020-21 आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को वापस करवाया।
  • जाति राजनीतिकरण: ये जातियां चुनावों में निर्णायक हैं, जहां जाट (उत्तर भारत), पटेल (गुजरात) आदि ने राजनीतिक दलों को प्रभावित किया। दबाव समूह के रूप में, किसान संगठन नीतियां बदलते हैं, जैसे एमएसपी और भूमि अधिकार।
  • लोकतंत्र में भूमिका: इनके आंदोलनों ने राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई और सांप्रदायिकता को चुनौती दी, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हुई। हालांकि, जातिगत विभाजन (जैसे जाट-केंद्रित आंदोलन) चुनौतियां भी पैदा करते हैं।

कुल मिलाकर, किसान जातियां भारत के विकास की धुरी हैं, लेकिन चुनौतियां जैसे कृषि संकट, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता बनी हुई हैं। इनके योगदान ने देश को आत्मनिर्भर और एकजुट बनाया है, और भविष्य में इनकी मजबूती राष्ट्रीय प्रगति की कुंजी है। 

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जनजातीय किसानों (आदिवासी किसानों) का भारत के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक योगदान बहुत महत्वपूर्ण और बहुआयामी रहा है। भारत में आदिवासी समुदाय (Scheduled Tribes) लगभग 8.6% आबादी का हिस्सा हैं, और इनमें से अधिकांश जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जहां कृषि उनकी मुख्य आजीविका है। ये किसान मुख्य रूप से झूम (शिफ्टिंग कल्टीवेशन), पारंपरिक कृषि, वन उत्पादों पर निर्भर रहते हैं। इनका योगदान न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत में भी है।

नीचे विभिन्न क्षेत्रों में इनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

1. सामाजिक योगदान

जनजातीय किसान भारतीय समाज की विविधता और सामुदायिक एकता के प्रतीक हैं।

  • सामुदायिक जीवन और सहयोग: इन समुदायों में सामूहिक श्रम (जैसे झूम खेती में सामूहिक कार्य), संसाधनों का साझा उपयोग और परिवार-आधारित कृषि प्रबंधन प्रमुख है। यह सामाजिक एकजुटता, सहयोग और पारंपरिक ज्ञान को बनाए रखता है।
  • ग्रामीण विकास और स्थिरता: ये किसान ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर सामाजिक संरचना को मजबूत करते हैं। महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है – वे बीज संरक्षण, खाद्य संग्रह और घरेलू कृषि में अग्रणी रहती हैं।
  • सांस्कृतिक निरंतरता: पारंपरिक खेती प्रथाएं (जैसे अपातानी जनजाति की एकीकृत कृषि-मछली पालन) सामाजिक मूल्यों को जीवित रखती हैं और पर्यावरण के साथ सामंजस्य सिखाती हैं।

2. आर्थिक योगदान

जनजातीय किसान भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, विशेष रूप से ग्रामीण और वन-आधारित अर्थव्यवस्था में।

  • खाद्य सुरक्षा और उत्पादन: ये किसान मिलेट्स (रागी, ज्वार), पारंपरिक चावल की किस्में, फल-सब्जियां और वन उत्पाद (मधु, हर्बल, बांस) उत्पादित करते हैं। ये स्थानीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और बाजार में योगदान देते हैं।
  • जैव-विविधता और सतत कृषि: झूम कृषि और एग्रोफॉरेस्ट्री से जैव-विविधता संरक्षण होता है। ये किसान जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसलें (जैसे जलवायु-सहिष्णु बीज) विकसित करते हैं, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में योगदान देते हैं।
  • वन उत्पाद और आजीविका: वनों की देखभाल और माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (MFP) संग्रह से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। सरकारी योजनाएं जैसे वन धन योजना इनके उत्पादों को बाजार से जोड़ती हैं।

3. धार्मिक योगदान

जनजातीय किसानों की धार्मिक मान्यताएं प्रकृति-केंद्रित हैं, जो कृषि से गहराई से जुड़ी हैं।

  • प्रकृति पूजा और अनुष्ठान: फसल चक्र, बीज बोने और कटाई के समय प्रकृति देवताओं (जैसे भूमि माता, वन देवता) की पूजा होती है। यह धार्मिक प्रथाएं पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती हैं।
  • सांस्कृतिक विरासत: पारंपरिक उत्सव (जैसे बैसाखी, पोंगल जैसी फसल उत्सव) और लोक देवताओं की पूजा धार्मिक विविधता को बनाए रखती है। ये प्रथाएं सतत विकास और जैव-विविधता से जुड़ी हैं।
  • आध्यात्मिक संतुलन: कृषि को धार्मिक कर्तव्य मानकर ये समुदाय पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाए रखते हैं, जो आधुनिक पर्यावरणवाद से मेल खाता है।

4. राजनैतिक योगदान

जनजातीय किसानों ने स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: संथाल विद्रोह (1855), बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899-1900), तेलंगाना विद्रोह आदि में आदिवासी किसानों ने औपनिवेशिक शोषण (भूमि हड़पना, भारी कर) के खिलाफ लड़ाई लड़ी। ये आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम की नींव बने।
  • आधुनिक राजनीति: पेसा एक्ट (1996), वन अधिकार अधिनियम (2006) जैसे कानूनों के लिए संघर्ष। जनजातीय क्षेत्रों में राजनीतिक जागृति बढ़ी, जहां ये समुदाय अपने अधिकारों (जमीन, जंगल) के लिए सक्रिय हैं।
  • नीति प्रभाव: किसान संगठन और आंदोलन (जैसे हाल के कृषि कानून विरोध) में भागीदारी से नीतियां प्रभावित होती हैं। जनजातीय नेता (जैसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू) इनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबिंबित करते हैं।

योगदान की तुलनात्मक तालिका (संक्षिप्त अवलोकन)

क्षेत्रमुख्य योगदानउदाहरण/प्रभाव
सामाजिकसामुदायिक एकता, महिलाओं की भूमिकाझूम में सामूहिक श्रम, सांस्कृतिक निरंतरता
आर्थिकखाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता संरक्षणमिलेट्स, वन उत्पाद, सतत कृषि
धार्मिकप्रकृति-केंद्रित पूजा, पर्यावरण संरक्षणफसल अनुष्ठान, लोक देवता पूजा
राजनैतिकविद्रोह और अधिकार संघर्षबिरसा मुंडा, संथाल विद्रोह, FRA 2006

जनजातीय किसान भारत की सतत विकास यात्रा में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन चुनौतियां जैसे भूमि हड़पना, जलवायु परिवर्तन और बाजार पहुंच की कमी बनी हुई हैं। सरकारी योजनाएं (जैसे पीएम जनमन, वन धन) इनके योगदान को मजबूत करने में मदद कर रही हैं। इनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली आधुनिक कृषि के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो खाद्य सुरक्षा और जैव-विविधता को मजबूत करती है।






गौतम बुद्ध (जन्म ५६३ ईसा पूर्व – निर्वाण ४८३ ईसा पूर्व)

गौतम बुद्ध (जन्म ५६३ ईसा पूर्व – निर्वाण ४८३ ईसा पूर्व) 

एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ। [2]


इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व अनार्य शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। २९ वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए। इतिहासकार पं. कोटा वेंकटचलम के अनुसार गौतम बुद्ध का जन्म १८८७ मे तथा निर्वाण १८०७ ईपू मे हुआ था और अनेकानेक इतिहासकार मानते हैं कि भारतीय तिथिक्रम, वंशावलीयो और पुरातत्व के अनुसार बुद्ध निर्वाण की यही तिथी सिद्ध होती है। [3][4][5][6][7][8][9][10][11][12][13][14][15]

उनका जन्म 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में हुआ था, जो नेपाल में है।[16] लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था। कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया। शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया।[17] गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाए। क्षत्रिय राजा शुद्धोधन उनके पिता थे। परंपरागत कथा के अनुसार सिद्धार्थ की माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया। शिशु का नाम सिद्धार्थ दिया गया, जिसका अर्थ है "वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो"। जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की- बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा।[18] शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा।[18] दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिवस व्यापक रूप से थएरावदा देशों में मनाया जाता है।[18] सिद्धार्थ का मन वचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की।

शिक्षा एवं विवाह

सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ को तो पढ़ा ही , राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। सोलह वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। पिता द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोगों से युक्त महल में वे यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ। लेकिन विवाह के बाद उनका मन वैराग्य में चला और सम्यक सुख-शांति के लिए उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया।

विरक्ति

राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं। वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया। उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य? चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया।

महाभिनिष्क्रमण

सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग-साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ। वह उरुवेला पहुँचे और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे।

सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर काँटा हो गया। छः साल बीत गए तपस्या करते हुए। सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई। शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग : एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहे थे। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो । ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।’ बात सिद्धार्थ को जँच गई। वह मान गये कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है ओर इसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है।

ज्ञान की प्राप्ति

बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे,जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की। ३५ वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा। समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ।वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया।

धर्म-चक्र-प्रवर्तन

वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया। महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला।आनंद,बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे।

महापरिनिर्वाण

पालि सिद्धांत के महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार ८० वर्ष की आयु में बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाण के लिए रवाना होंगे। बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।[19]

उपदेश

भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया । उन्होंने दुःख, उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग सुझाया। उन्होंने अहिंसा पर बहुत जोर दिया है। उन्होंने यज्ञ और पशु-बलि की निंदा की। बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है -

महात्मा बुद्ध ने सनातन धरम के कुछ संकल्पनाओं का प्रचार किया, जैसे अग्निहोत्र तथा गायत्री मन्त्र

ध्यान तथा अन्तर्दृष्टि
मध्यमार्ग का अनुसरण
चार आर्य सत्य
अष्टांग मार्ग
बौद्ध धर्म एवं संघ

बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। भिक्षुओं की संख्या बहुत बढ़ने पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने उतना अच्छा नहीं माना। भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय’ लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है।

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श्रमण और ब्राह्मण परम्परा

 श्रमण परम्परा


श्रमण परम्परा (पालि : समण) भारत में प्राचीन काल से जैन, आजीविक, चार्वाक, तथा बौद्ध दर्शनों में पायी जाती है। [1] भिक्षु या साधु को श्रमण कहते हैं, जो सर्वविरत कहलाता है। श्रमण को पाँच महाव्रतों - सर्वप्राणपात, सर्वमृष्षावाद, सर्वअदत्तादान, सर्वमैथुन और सर्वपरिग्रह विरमण को तन, मन तथा कार्य से पालन करना पड़ता है।

संस्कृत एवं प्राकृत में 'श्रमण' शब्द के निकटतम तीन रूप हैं - श्रमण, समन, शमन । श्रमण परम्परा का आधार इन्हीं तीन शब्दों पर है। 'श्रमण' शब्द 'श्रम' धातु से बना है, इसका अर्थ है 'परिश्रम करना।' [2]श्रमण शब्द का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद में 'श्रमणोऽश्रमणस' के रूप में हुआ है। अर्थात् यह शब्द इस बात को प्रकट करता है कि व्यक्ति अपना विकास अपने ही परिश्रम द्वारा कर सकता है। सुख–दुःख, उत्थान-पतन सभी के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। [3]

'समन' का अर्थ है, समताभाव, अर्थात् सभी को आत्मवत् समझना, सभी के प्रति समभाव रखना। जो बात अपने को बुरी लगती है, वह दूसरे के लिए भी बुरी है। इसका स्पष्टीकरण आचारांगसूत्र एवं उत्तराध्ययनसूत्र में मिलता है। ‘शमन' का अर्थ है अपनी वृत्तियों को शान्त रखना, उनका निरोध करना। अर्थात् जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है वह महाश्रमण है। इस प्रकार श्रमण परम्परा का मूल आधार श्रम, सम, शम इन तीन तत्त्वों पर आश्रित है एवं इसी में इस नाम की सार्थकता है।

श्रमण परम्परा अत्यन्त प्राचीन, उन्नत और गरिमामय है। भारतीय इतिहास के आदिकाल से ही हमें श्रमण परम्परा के संकेत उपलब्ध होते हैं। मोहनजोदड़ो सभ्यता के विशेषज्ञ प्रो. रामप्रसाद चन्द्रा, डॉ. प्राणनाथ विद्यालंकार तथा डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी इत्यादि विद्वान भी सिन्धु सभ्यता के अवशेषों और मुहरों का सम्बन्ध आदि तीर्थंकर ऋषभदेव और उनके द्वारा प्रतिपादित श्रमण धर्म से जोड़ते हैं। उन्होंने सप्रमाण स्पष्ट किया है कि भारत में तप एवं साधना के प्रवर्तक आदि तीर्थंकर ऋषभदेव थे। मोहनजोदड़ों के अवशेषों में तीर्थंकर ऋषभदेव की ध्यान अवस्था की मूर्ति का चित्रण हुआ है। उनके समीप कल्पवृक्ष का एक पत्र अंकित हुआ है। त्रिशूल के रूप में त्रिरत्न का प्रतिनिधित्व किया गया है। वृषभ का चिन्ह भी बैल की आकृति के रूप में यहाँ उपलब्ध है और सात मुनियों की तपस्या की आकृतियाँ भी इस योगी मूर्ति के साथ है।

ब्राह्मण और श्रमण

ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता हो और वेदवाक्य को ही ब्रह्म वाक्य मानता हो। ब्राह्मण धर्म मानता है कि ब्रह्म, और ब्रह्माण्ड को जानना आवश्यक है, तभी ब्रह्मलीन (ब्रह्म समा जाना) होने का मार्ग खुलता है। श्रमण वह जो श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता हो और जिसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की नहीं श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा तथा सम्प्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रन्थों में मिलता है जबकि वेद, उपनिषद और स्मृतियाँ ब्राह्मण परम्परा के ग्रन्थ हैं।[4]

ये दोनों परम्पराएँ भारतीय धर्म में गुरू पद को भोगते रहे हैं लेकिन एक ही देश में रहते हुए उसी का अन्न जल ग्रहण करते हुए भी दोनों की चिन्तन पद्धति अलग है। ब्राह्मण परम्परा का मूल आधार वेद रहा है जिसकी धुरी परब्रह्म (ईश्वर) है। वेदों में जो कुछ भी आदेश एवं उपदेश उपलब्ध होते हैं अर्थात् यज्ञ, तप,आराधना स्तुति। उन्हीं के अनुसार जिस परम्परा ने अपनी जीवन पद्धति का निर्माण किया, वह ब्राह्मण परम्परा कहलाती है तथा जिस परम्परा ने वेदों को प्रमाणित न मानकर आत्मज्ञान, आत्मविजय एवं आत्म-साक्षात्कार पर विशेष बल दिया वह श्रमण परम्परा कहलाती है। ब्राह्मण परम्परा और श्रमण परम्परा में कौन अधिक पुरानी है, यह कहना भी कठिन है।

ब्राह्मणों का भारत में आगमन और मूल जातियों पर उनका अधिकार

ब्राह्मणों का भारत में आगमन और मूल जातियों पर उनका अधिकार ब्राह्मणों का भारत में आगमन एक विवादास्पद ऐतिहासिक विषय है, जो मुख्य रूप से इंडो-आ...