रविवार, 8 फ़रवरी 2015

बिहार के बहाने ;

बिहार के बहाने 
"जीतन राम मांझी प्रकरण ने बिहार में दलितों और पिछडों की राजनैतिक एकता पर करारा वार किया है। अगर आप जरा भी संवेदनशील हैं तो आप इस समय बिहार के दलितों के दिल में उठने वाले दर्द और हूक का अंदाजा लगा सकते हैं।
(-प्रमोद रंजन )
के हवाले से कहना चाहता हूँ प्रमोद भाई उर्मिलेश जी ने एक बहस चलाई है जिसमें देश की राजनीती के लिए विकल्प पर चरचा हो रही है, इसी समय बिहार एक अलग तरह के राजनितिक चरित्र के साथ उठ खड़ा हुआ इसमें भी नए विकल्प का सवाल मरता हुआ नज़र आ रहा है उर्मिलेश जी का बी बी सी वाला आलेख भी आगे दे रहा हूँ और प्रमोद और राहुल के फेब के बयां भी पर मुझे इन सारे मसलों पर लगता है की दलित और पिछड़ा एजेंडा सवर्णों ने उन्ही से खत्म करा दिया ! भाई उर्मिलेश, प्रमोद रंजन और राहुल कुमार कैसे देखते हैं वह अलग विषय है पर सामाजिक सरोकारों पर बड़े बड़े इधर उधर होते नज़र आते हैं। नितीश कोई सामाजिक सरोकारों को समझने वाले नेता नहीं हैं उन्होंने जितने राजनैतिक करवट बदले हैं उससे कौन वाकिफ नहीं है। ऐसे राजनैतिक चरित्रहीन व्यक्ति को    
ये तमाशे चल रहे हैं मोदी जी के ! "हरकारा" आपने देखा होगा उनसे मेल खता हुआ व्यक्तित्व ! दूसरी और आनन्द कुमार जी ! ये सब कितने खास हैं किसके लिए नीति बनाएंगे ये ! ये विदेशी फंडों से जीवन यापन वाले हैं इन्हे तो इस देश की शिक्षा को ठीक करने का मौक़ा मिला क्या किया इन्होने हजारों काबिल और ईमानदार दलित पिछड़े जिन्होंने कर्ज लेकर पढाई की मेहनत की 'ईमानदार' है उन्हें आज भी सड़क ही नापनी है, क्योंकि उनके आका नहीं हैं, उनके आका नहीं कालेजों संस्थानों और विश्वविद्यालयों में इसलिए वो नाकाबिल हैं. 
भाई उर्मिलेश जी ! आप को मैंने कल नितीश को राजनितिक और संत बताते हुए मैंने सुना आश्चर्य हुआ "ऐसे अवसरवादी" नेता को सपोर्ट करना पुरे सोच के लिए नुकसानदेह है जिसका खामियाजा "आम जान जीवन" के संघर्षों ने खड़ा किया था जिसे इन्होने डुबो दिया है।  आप क्या समझते हैं ये बिहार के कोई खानदानी राजा थे जो इन्हे ही सत्ता में बने रहना चाहिए था ! मांझी क्यों ईमानदार इनके प्रति रहे ये तो उस अवाम के प्रति ईमानदार नहीं रहे जिसने उन्हें अपना नेता बनाया था ! कमोवेश यही हाल सभी पिछड़े नेताओं का है !
 * 
"जीतन राम मांझी प्रकरण ने बिहार में दलितों और पिछडों की राजनैतिक एकता पर करारा वार किया है। अगर आप जरा भी संवेदनशील हैं तो आप इस समय बिहार के दलितों के दिल में उठने वाले दर्द और हूक का अंदाजा लगा सकते हैं।
एक सच और साफ बोलने वाले मुख्‍यमंत्री के प्रति शरद यादव कैसी भाषा का इस्‍तेमाल कर रहे थे? दलितों ने जो जनता दल (यू) के प्रदेश कार्यालय में और पटना के एक होटल में घुस कर नीतीश-शरद समर्थकों की जो मार-कुटाई की, वह शरद यादव की बदतमीज भाषा का ही परिणाम थी। वास्‍तव में मुझे यह जानकर हर्ष हुआ कि समाज के सबसे कुचले हुए तबके लोगों ने इन सत्‍ता संस्‍थानों पर हमला करने का साहस किया। कहते हैं, जो होता है, सो अच्‍छा होता है। शायद इन्‍ही कारणों से बिहार में स्‍वतंत्र दलित राजनीति का भी आगाज हो।
लेकिन नीतीश-शरद, आपने जो काम किया है, वह माफ करने लायक नहीं है।" 
(प्रमोद रंजन - फारवर्ड प्रेस में वरिष्ठ संपादक हैं )
*
इतने हल्ला के बाद मुझे भी लगने लगा था की मोदी और बीजेपी डेवलपमेंट करेंगे । इसलिए मैंने उनके खिलाफ लिखना बंद कर दिया था । मुझे लगने लगे था चाहे ये अंधविश्वास या अवैज्ञानिक बातो को क्यों न बढ़ावा देते हो लेकिन जब ये विकाश करेंगे , लोग शिक्षित होंगे , तब अपने आप अंधविश्वास कम होगा । मैंने सोचा था विकाश और अंधविश्वास एक साथ नहीं चल सकते । मैंने बिलकुल सही सोचा था । लेकिन हुआ उल्टा ये लोग विकाश करने के बजाय भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर ध्यान दे रहे है , संस्कृत को लागु , रामजादे-हरामजादे को बढ़वा दे रहे है । लड़के-लड़कियों को ऐसे पिट रहे है जैसे इनके बाप का देश हो । ये भूल रहे है इन्हे नौजवान युवा और युवतियों ने इन्हे सत्ता दिलाई और उसके पास इसे छीनने की भी ताकत है । ये भूल रहे है ये भगत सिंह और आंबेडकर का देश है , यह देश किसी एक धर्म, जाति और समुदाय का नहीं हो सकता ।
जो बोला था उसे पूरा करो मोदी बाबू , नए वादे और बात बाद में कर लेंगे । अगर ऐसे ही चलता रहा कांग्रेस का हश्र तो आप के सामने ही है । कही सत्ता की लालच में आप भी भरोसा न खो दे । याद रखे ये भरोसा ही आपकी सत्ता और ताकत है । इसे मत गँवाइये लोकतंत्र में इसकी बड़ी कीमत है । एक चाय वाले को यह अगर प्रधानमंत्री बना सकती है तो एक प्रधानमंत्री को … ।
राहुल कुमार 
डबलिन , आयरलैंड
*
बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने इस्तीफ़ा देने से मना करते हुए कहा कि वो विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेंगे.
इससे पहले जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने पत्र लिखकर मांझी को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा था.
जीतन राम मांझी ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा कि वो 20 फ़रवरी को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेंगे.
मांझी ने पत्रकारों से कहा, "बिहार विधानसभा में जो भी साथ देगा उसका स्वागत है."
मांझी ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए से कहा, "लोग समझने लगे हैं कि नीतीश कुमार ने सामाजिक परिक्षेत्र में जो काम नहीं किया था, जीतन राम मांझी उनसे बढ़कर काम करने लगे हैं. इसलिए दो-चार-पाँच लोग बार-बार नीतीश कुमार को बरगला रहे हैं."

'विकास पर बात'


मांझी ने पशोपेश में डाल रखा है अपनी ही पार्टी को

जीतन राम मांझी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि प्रधानमंत्री से उनकी केवल विकास के मुद्दे पर बात हुई.
पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने मांझी को एक चिट्ठी लिखकर कहा था कि विधानमंडल की बैठक में नीतीश कुमार को नया नेता चुन लिया गया है.
मांझी ने इस पर कहा, "बिहार विधानमंडल दल की बैठक ग़ैर-कानूनी है, इसलिए किसी को नेता चुनने या उस नेता को मंजूरी देने की बात भी ग़लत है."
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/02/150203_urmilesh_bihar_va?SThisFB&fb_ref=Default


बिहार: मझधार में मांझी और नीतीश के विकल्प




बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी चाहते तो बिहार की दलित-उत्पीड़ित जनता के पक्षधर और सेक्युलर-लोकतांत्रिक सियासत के तरफ़दार नेता बनकर एक नया इतिहास रच सकते थे.
लेकिन बीते कुछ महीनों के दौरान उनके काम, बयान और गतिविधियों पर नज़र डालें तो निराशा होती है. उन्होंने दलितों के बीच चुनावी-जनाधार पैदा करने की कोशिश ज़रूर की, पर दलित-उत्पीड़ितों के मुद्दों और सरोकारों के लिए कुछ खास नहीं किया.
ले-देकर वह बिहार के कुछ सवर्ण-सामंती पृष्ठभूमि के दबंग नेताओं के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संरक्षण-समर्थन में उभरते ‘दूसरे रामसुदंर दास’ नज़र आए.
अगर उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के रास्ते पर चलने की कोशिश की होती, तो नीतीश कुमार या शरद यादव उनके खिलाफ़ मुहिम छेड़ने का साहस नहीं कर पाते.
लेकिन कुर्सी पर बने रहने और जिस नीतीश ने उन्हें मुख्यमंत्री नामांकित किया, को चिढ़ाने और नीचा दिखाने के लिए वह भाजपा के शीर्ष पुरूष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं, राज्य के छोटे-मोटे भाजपा नेताओं का भी अभिनंदन करने लगे.
'भाजपा भी मांझी से खुश'


जदयू-राजद समर्थन की सरकार चला रहे मुख्यमंत्री ने भाजपा में किसकी-किसकी तारीफ नहीं की? वह भी अगले विधानसभा चुनाव से महज़ सात-आठ महीने पहले.
इस सहनशीलता के लिए नीतीश-शरद के धैर्य की तारीफ़ करनी होगी. शायद, उनमें डर भी था कि मांझी को छेड़ने से जद(यू)-राजद के दलित-समर्थन में दरार न पैदा हो!
उनके दिमाग में सवाल रहा होगा कि भाजपा को ऐसा मौका क्यों दें?
मांझी के बयान और प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर डालें तो उनके व्यक्तित्व की एक जटिल तस्वीर उभरती है. कभी वह बहुत हल्की किस्म की बातें कहते नजर आते हैं तो कभी नए राजनीतिक हस्तक्षेप का संकेत दे रहे होते हैं.
कभी वह सेक्युलर-सामाजिक न्याय की बात करते रहे हैं तो कभी ‘दस या बीस मिनट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा से दोस्ती कर लेने’ की अपनी पार्टी नेताओं को धमकी भी देते रहे हैं.
कभी उनमें वैचारिक प्रौढ़ता के अभाव के साथ एक तरह की सरलता दिखती तो कभी उनमें ज्यादा चतुराई, अति महत्वाकांक्षा और परले दरजे का अवसरवाद नजर आता रहा. उनके बारे में यह भी कयास लगाया जाने लगा कि अगले विधानसभा चुनाव आते-आते वह कहीं भाजपा के मददगार न बन जायें!
यह महज़ संयोग नहीं कि पिछले कुछ समय से भाजपा-एनडीए के बड़े नेता भी मांझी से खुश नज़र आते रहे. कभी प्रधानमंत्री मोदी तो कभी उमा भारती तो कभी पासवान ने उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े.
यह भी संयोग नहीं कि उनकी अपनी पार्टी में सवर्ण-सामंती छवि के नेताओं ने उनके पक्ष में मोर्चा संभाले रखा. इनमें महाचंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रवीन्द्र राय जैसे लोग सबसे आगे हैं.
दलितों पर रवैया


एक सवाल उठना लाज़मी है, अगर मांझी सचमुच दलित-उत्पीड़ित अवाम के हमदर्द रहे हैं, तो बिहार में ऐसे समुदायों के लिए चले कार्यक्रमों के प्रति उनका रवैया क्या था?
शायद ही इस बात पर किसी तरह का विवाद हो कि बिहार जैसे राज्य में भूमि-सुधार दलित-उत्पीड़ित समुदायों के पक्ष का सबसे प्रमुख एजेंडा है. आजादी के तुरंत बाद ही बिहार में भूमि सुधार कार्यक्रम लागू करने की कोशिश की गई.
लेकिन ताकतवर नेताओं की एक लाबी ने इसे नहीं होने दिया. क्या जीतनराम मांझी के ‘दलित-एजेंडे’ में भूमि सुधार जैसा अहम मुद्दा शामिल है? क्या अब तक के अपने कार्यकाल में मांझी ने भूमि सुधार की बंदोपाध्याय रिपोर्ट को पटना सचिवालय की धूलभरी आलमारियों से बाहर निकालने की एक बार भी कोशिश की?
अगर नहीं, तो कहां है उनका दलित-एजेंडा? दलित-एजेंडा सिर्फ भाषणबाजी नहीं हो सकता! ऐसी भाषणबाजी तो दलित समुदाय से आने वाले पहले के नेता भी करते रहे हैं. क्या अमीरदास आयोग को फिर से बहाल करने के बारे में कभी विचार किया?
इसका गठन कुख्यात रणवीर सेना के राजनीतिक रिश्तों की जांच के लिए हुआ था लेकिन भूस्वामी लाबी के दबाव में पूर्ववर्ती सरकार ने उस आयोग को ही खत्म कर दिया.
राज्य के मुख्यमंत्री और दलित नेता के तौर पर मांझी की बड़ी परीक्षा शंकरबिघा हत्याकांड के सारे अभियुक्तों के स्थानीय अदालत द्वारा छोड़े जाने के फैसले पर भी होनी थी.

क्यों ख़ामोश रहे मांझी?

शंकरबिघा गांव में सन 1999 के दौरान रणवीर सेना सेना की अगुवाई में 24 दलितों की हत्या की गई थी. कुछ समय पहले लक्ष्मणपुर बाथे कांड में भी ऐसा ही हुआ था. उस कांड में 58 दलित मारे गये थे. पर अदालत ने सबको बरी कर दिया.
शंकरबिघा और लक्ष्मणपुर बाथे जैसे हत्याकांडों को लेकर वह क्यों खामोश रहे? पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों के स्तर पर इस तरह के मुकद्दमों से जुड़ी पड़ताल आदि में कितनी लापरवाही की गई होगी, इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं.
बहुत संभव है, यह ‘लापरवाही’ योजना के तहत की गई हो. मांझी सरकार अमीर दास आयोग की बहाली या इस तरह की कोई और पहल कर सकती थी. पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ.
मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों सरकारी सम्मेलन कक्ष में राज्य के दलित-आदिवासी अफसरों की एक ‘गोपनीय बैठक’ को संबोधित किया.

फ़ायदा या नुकसान



सवाल है, संवैधानिक ढंग से निर्वाचित एक मुख्यमंत्री कुछ समुदाय विशेष से जुड़े अफसरों की ‘गोपनीय बैठक’ क्यों संबोधित करता है?
ऐसे में, आज जब विधानसभा चुनाव को महज कुछ महीने रह गये हों, मांझी को बनाये रखना जद(यू)-राजद के नज़रिये से न केवल आत्मघाती होगा बल्कि भाजपा को मुंहमांगा मौका देने जैसा होगा.
जिस सियासी-समूह का कप्तान स्वयं अपने प्रतिद्वन्दी समूह के प्रति उदार और सहानुभूति वाला दिखे, वह भला चुनावी-रणक्षेत्र में कैसा प्रदर्शन कर सकता है!
ऐसे में नीतीश-शरद वही करना चाहते हैं जो उन्हें करना चाहिए. लेकिन एक पेंच है. राजभवन का, जहां भाजपा के एक पूर्व नेता विराजमान हैं.
अगर मांझी ने स्वेच्छा से इस्तीफा देकर नीतीश के शपथग्रहण का रास्ता तैयार नहीं किया तो कुछ मुश्किलें जरूर पैदा हो सकती हैं. पर संविधान इस बारे में साफ है, विधायक दल में बहुमत वाले नेता की बात ही निर्णायक होती है.
बहुमत का फैसला शनिवार को होना है. और बहुमत नीतीश के साथ नज़र आता है.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

एकात्म मानवतावाद

कुछ विद्वान मित्रों का मानना है कि भाजपा की तरफ आम लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है और वह इसलिए कि उन लोगों के मन में उनमें  हिंदू होने का म...