बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

कहाँ हैं बहुजन समाज पार्टी के पुराने दिग्गज ?

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
बुधवार, 15 फ़रवरी, 2012 को 04:55 IST तक के समाचार

राजबहादुर मायावती ही की तरह बसपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री मायावती इस समय विधान सभा चुनाव में एक कड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना कर रही हैं, क्योंकि ‘बहुजन से सर्वजन की राजनीति’ में उनके बहुत से साथी पीछे छूट गए हैं.

इनमे से कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने पार्टी की स्थापना और उसे आगे बढ़ाने में कांशी राम के साथ मिलकर काम किया था.

(इससे जुड़ी ख़बरें
हाथी की मूर्तियों को ढँकने के ख़िलाफ़ जनहित याचिका ख़ारिज
चुनाव आयोग का फ़ैसला ग़लत: बसपा
मायावती सरकार के दो मंत्री भाजपा में)

राज बहादुर उन चुनिंदा दलित नेताओं में से हैं, जो कांशी राम द्वारा स्थापित पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलित कर्मचारियों के संगठन बामसेफ में रहे और इसके बाद 1984 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएस फोर से जुड़े. डीएस फोर ही ने बाद में बहुजन समाज पार्टी की शक्ल ले ली.

राज बहादुर उत्तर प्रदेश बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष भी बने. वर्ष 1994 में पहली बार बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की साझा सरकार बनी तो राज बहादुर कैबिनेट मंत्री बने.

'बसपा भटकी'
राज बहादुर का कहना है कि जब 1995 में मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के लिए भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया तो उन्होंने इसे बीएसपी सिद्धांतों के खिलाफ समझते हुए बगावत कर दी.

"वास्तव में जब बहुजन समाज पार्टी अपनी दिशा से बहक गयी तब हमने बसपा को छोड़ा है, क्योंकि जब दिशा गलत होती है तो दशा की और दुर्दशा होती है"
राज बहादुर
राज बहादुर कहते हैं, “वास्तव में जब बहुजन समाज पार्टी अपनी दिशा से बहक गई, तब हमने बसपा को छोड़ा है, क्योंकि जब दिशा ग़लत होती है तो दशा की और दुर्दशा होती है. जब बसपा ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन चुनाव लड़ने का या राजपाट बनाने काम शुरू किया तो उसी समय मैं तुरंत बसपा से अलग हो गया था और हमारे साथ कई विधायक भी अलग हुए थे.”

राज बहादुर अकेले नेता नहीं हैं, जिन्होंने बीएसपी छोड़ी या निकाले गए. उनके अलावा आरके चौधरी, डॉक्टर मसूद, शाकिर अली, राशिद अल्वी, जंग बहादुर पटेल, बरखू राम वर्मा, सोने लाल पटेल, राम लखन वर्मा, भगवत पाल, राजाराम पाल, राम खेलावन पासी, कालीचरण सोनकर आदि अनेकों ऐसे नेता हैं जिन्हें बीएसपी से बाहर का रास्ता दिखाया गया.

इनमें आरके चौधरी, काली चरण सोनकर अपनी पार्टी चला रहें हैं. सोने लाल पटेल ने भी अपनी पार्टी बनाई थी, जिसे उनकी मौत के बात उनकी पत्नी चला रही हैं.

लेकिन ज्यादा तादाद ऐसे लोगों की है जो कांग्रेस या समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए.

पूर्व मंत्री शाकिर अली इस समय समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ रहें हैं, जबकि डॉक्टर मसूद, बलिहारी बाबू, रामाधीन, मेवा लाल बागी और राम खेलावन पासी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहें हैं. कई पुराने बीएसपी नेता इस समय कांग्रेस से सांसद हैं.

'कांग्रेस बेहतर'

राज बहादुर का कहना है कि अम्बेडकरवादी कांग्रेस को अपना करीबी मानते हैं क्योंकि कांग्रेस ने डाक्टर अम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया था और उनके विचारों का प्रचार प्रसार किया.

जानकारों का कहना है कि मायावती अपने को ऐसे नेताओं से असुरक्षित समझती थीं जो सीधे कांशी राम से बात करते थे. इसलिए उन्होंने उन सभी लोगों को बीएसपी से बाहर किया जो उनके नेतृत्व को चुनौती दे सकते थे.

पत्रकार राज बहादुर सिंह के अनुसार कांशी राम ने कभी कहा था कि वह किसी कुर्मी नेता को मुख्यमंत्री बनाएंगे, इसलिए कुर्मी नेता विशेषकर मायावती की महत्वाकांक्षा का शिकार हुए.

'मूल समीकरण टूटे'

भारतीय जनता पार्टी का साथ लेने के बाद मायावती ने सवर्ण और ब्राह्मण नेताओं को ज्यादा महत्त्व देना शुरू किया, क्योंकि उनसे उन्हें अपने नेतृत्व को खतरा नही लगता. सवर्ण समुदाय का साथ मिलने से 2007 में मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बन सकीं.

लेकिन इस प्रक्रिया में कांशीराम द्वारा बनाया गया 15 बनाम 85 फीसदी का बहुजन सामाजिक समीकरण टूट गया.

धीरे-धीरे करके पिछड़ी जातियों और मुस्लिम समुदाय की भागीदारी बहुजन समाज पार्टी में कम हो गयी. प्रेक्षकों का कहना है कि हाल ही में बाबू सिंह कुशवाहा का निष्कासन भी बहुजन समाज पार्टी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाएगा.

बहुजन समाज पार्टी में इस विषय पर बात करने के लिए कोई नेता उपलब्ध नही था, क्योंकि मायावती ने अपने नेताओं को मीडिया से बात करने से मना कर रखा है.

--------------------

बहन जी में सेवा भावना कि कोई नई प्रक्रिया का सूत्र ही नहीं है केवल और केवल सत्ता के शीर्ष पर आसीन होने के,मुलायम सिंह यादव इससे भिन्न रहे पर अमर सिंह के आगमन से 'कुछ' विकृतियाँ उनमे आयीं जिससे उनका 'समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष' स्वरुप प्रभावित हुआ, पर अमर सिंह के जाने के बाद 'नेता जी के पास से बहुत सारे शुक्र -शनि रुपी सारे लूटेरे लगभग अपनी दूकान समेट कर जा चुके हैं)
"बहन जी कि मजबूरी ये है कि वो सदियों कि सारी दौलत जिससे दलित महरूम रहा है, उसे वह इकठ्ठा कर लेना चाहती हैं, यही कारण है कि आँखें मूदकर दोनों हाथों दौलत लूटती रही हैं, निश्चित रूप से दलित पुरे देश के निर्माण में अपना श्रम दिया है, उसे उसका हक मिलना चाहिए पर उन सबका हक 'बहन' जी अपनी मूर्तियों में लगाएं यह कोई बदलाव का स्वरुप नहीं है''
बदलाव के लिए "दलित समाज शास्त्रियों का मत, दलित चिंतकों का मत, दलित साहित्यकारों, कलाकारों,स्त्रियों का मत, जो समय समय पर बहन जी के तमाम कामों से भिन्न हुआ है उस पर विचार न कर 'मायावती जी कि निरंकुशता' ने सारी बदलाव की संभावनाओं को धूमिल किया है, यह समय इसी तथ्य को मजबूती से साबित करने जा रहा है. 
नीतिगत बदलाव न करके 'द्विजात्मक' संसाधनों के तहत व्यक्ति पूजा को ही प्रधानता दी हैं.
सामाजिक न्याय की शक्तियाँ इनके इस दुस्साहस से दुखी हैं.
क्योंकि मूर्तियां और प्रेरणा स्थल महापुरूषों या महिषियों के बनाते हैं,माया वतियों के नहीं , "बहन मायावती ने सबसे ज्यादा प्रचलित हिरण्यकश्यप की कथा के अनुरूप है, जिसमें वह अपने पुत्र प्रहलाद को जलाने के लि‌ए बहन होलिका को बुलाता है। जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठती हैं तो वह जल जाती है और भक्त प्रहलाद जीवित रह जाता है। तब से होली का यह त्योहार मनाया जाने लगा है। 
कल क्या होगा, कहीं कुछ कथा का स्वरुप ऐसा न हो जाए .

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

पांच साल का हिसाब

पांच साल की 'माया'नगरी
 शनिवार, 4 फ़रवरी, 2012 को 18:26 IST तक के समाचार
मायावती ने देश की राजनीति को एक नई दिशा दी
वर्षों पहले नरसिंह राव के इस बयान में न सिर्फ़ महिला सशक्तिकरण की बात थी, बल्कि दलित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने को लेकर चल रहे बदलाव की ओर भी इशारा था.
एक दलित परिवार में पैदा हुईं मायावती का राजनीतिक सफ़र उतार चढ़ाव भरा रहा है. एक समय दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली मायावती देश के सबसे बड़े राज्य की सबसे युवा महिला मुख्यमंत्री बनीं.
मायावती की जीवनी लिखने वाले अजय बोस बताते हैं कि वर्ष 1977 में कांशीराम मायावती से मिलने पहुँचे, उस समय मायावती सिविल सेवा की तैयारी कर रही थी.
उन्होंने मायावती से कहा था- मैं एक दिन तुम्हे इतना बड़ा नेता बना दूँगा कि एक आईएएस अधिकारी नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में आईएएस अधिकारी तुम्हारे आदेश के लिए खड़े रहेंगे.
और ये बात सच भी हुई जब 1995 में 39 साल की उम्र में मायावती ने देश के सबसे बड़े राज्य की सबसे युवा मुख्यमंत्री बनीं.

वापसी के लिए संघर्ष

दलितों की मसीहा और प्रभावशाली नेता के रूप में उभरीं मायावती आज अपने राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रही हैं.
पिछले पाँच वर्षों के दौरान उन पर आरोपों की झड़ी लगी और भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें 21 मंत्रियों को हटाना पड़ा. पार्कों में अपनी मूर्तियाँ लगवाने को लेकर सवाल उठे, तो सरकारी धन के दुरुपयोग पर भी विपक्ष ने उनको घेरा.
लेकिन इन सब आरोपों के बीच उत्तर प्रदेश चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी को ख़ारिज करना इतना आसान नहीं. दलितों के बीच पार्टी की ज़बरदस्त पैठ है और इन पाँच वर्षों में गिनाने के लिए कई उपलब्धियाँ भी.
लेकिन, क्या इन पाँच वर्षों में एक राजनेता के रूप में मायावती परिपक्व हुई हैं.
"मायावती परिपक्व ज़रूर हुई हैं, लेकिन उन्होंने अपने वोटरों और क़रीबी लोगों से दूरी बना ली है. हालांकि ये दूरी नौकरशाही ने बनाई हुई है."
उदय सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार
वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा कहते हैं, "मायावती परिपक्व ज़रूर हुई हैं, लेकिन उन्होंने अपने वोटरों और क़रीबी लोगों से दूरी बना ली है. हालांकि ये दूरी नौकरशाही ने बनाई हुई है."
शायद मायावती को इस दूरी का सबसे बड़ी ख़ामियाज़ा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था. मायावती को इस चुनाव में तगड़ा झटका लगा था.
मायावती की जीवनी लिखने वाले पत्रकार अजय बोस का मानना है कि मायावती ने 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद अपने वोटरों को जोड़ने की भरपूर कोशिश की और काफ़ी हद तक सफल रहीं.
अजय बोस कहते हैं, "मायावती ने एक बड़ा काम ज़रूर किया, जो दलित वोट उनसे बिछड़ने वाला था, उन्होंने उसे वापस जोड़ा. इसलिए इस चुनाव में भी मायावती की अनदेखी नहीं की जा सकती है. सर्वजन समाज को लेकर चलने के मुद्दे पर भी उनका संतुलन क़ायम है."
"मायावती ने एक बड़ा काम ज़रूर किया, जो दलित वोट उनसे बिछड़ने वाला था, उन्होंने उसे वापस जोड़ा. इसलिए इस चुनाव में भी मायावती की अनदेखी नहीं की जा सकती है."
अजय बोस, मायावती के जीवनीकार
अजय बोस की बात से पत्रकार उदय सिन्हा सहमत नहीं हैं. उदय सिन्हा का कहना है कि मायावती ने वोटरों से दूरी के मुद्दे पर कुछ ख़ास नहीं किया और सर्वजन समाज के लोगों का भी कोई ख़ास कल्याण नहीं हुआ.
उदय सिन्हा ने कहा, "मायावती ने अपने आप को लोगों से काट दिया. वो पहले फ़ीडबैक लेती थी, उससे भी वे अलग हो गईं. ये राजनीतिक दृष्टि से उनका बहुत ख़राब फ़ैसला रहा है और इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा. उन्होंने सर्वजन समाज की एक जाति को छोड़कर बाक़ियों का कुछ ख़ास ख़्याल नहीं रखा."

उपलब्धियां

लेकिन मायावती ने क्या इन पाँच वर्षों में कुछ किया ही नहीं. अंबेडकर ग्राम में अभूतपूर्व विकास को बहुजन समाज पार्टी बड़ी उपलब्धि मान रही है. और तो और पार्कों के निर्माण को भी कहीं न कहीं दलित अपने सम्मान से जोड़कर देखता है.
अजय बोस कहते हैं, "पार्क और मूर्तियाँ मायावती का पागलपन नहीं, इसके पीछे उनकी एक राजनीतिक सोच है और दलित इसे अच्छा काम मानता है."
जानकारों की मानें, तो लब्बोलुआब ये है कि मायावती ने अपने मौजूदा कार्यकाल की शुरुआत से ही उन लोगों से किनारा करना शुरू कर दिया, जो उनके क़रीबी रहे थे और जो उनके समर्पित मतदाता थे.
लेकिन बाद में ही सही मायावती को ये सच समझ में आ गया और दलितों के पास भी मायावती के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं. सवाल ये भी है कि मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद क्या उनका दलित वोटबैंक खिसकेगा.
उदय सिन्हा इसे पूरी तरह ख़ारिज करते हैं. कहते हैं, "ड्राइंग रूप में चलने वाले विचार-विमर्श में तो इसका असर पड़ सकता है, लेकिन मतदान केंद्रों पर इसका असर नहीं पड़ेगा. उत्तर प्रदेश में मायावती के समर्पित वोटर 11 प्रतिशत हैं. ये 11 प्रतिशत वोट मायावती के अलावा कहीं और नहीं जाएगा. मायावती के समर्पित वोटरों में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है."
"राजनीति करने वाले राजनीति तो करेगा ही. वैश्य वोटबैंक भाजपा का है, जाट वोटबैंक अजित सिंह का है, दलित वोटबैंक मूल रूप से मायावती का है, तो पिछड़ा वर्ग और यादव मुलायम सिंह का वोटबैंक है"
उदितराज, दलित नेता
जब मैंने यही सवाल उदित राज के सामने रखा, तो उन्होंने कहा कि वोट बैंक के रूप में तो सभी इस्तेमाल होते हैं. दलितों के मायावती से जुड़े रहने के बारे में वे कहते हैं कि दलितों के पास विकल्प नहीं है. मायावती ने उनके लिए अगर कुछ ख़ास नहीं किया, तो अन्य लोगों ने क्या कर दिया....
उदित राज कहते हैं, "वोट बैंक तो सभी है. इस शब्द का इस्तेमाल मुझे समझ नहीं आता है. राजनीति करने वाले राजनीति तो करेगा ही. वैश्य वोटबैंक भाजपा का है, जाट वोटबैंक अजित सिंह का है, दलित वोटबैंक मूल रूप से मायावती का है, तो पिछड़ा वर्ग और यादव मुलायम सिंह का वोटबैंक है."
अपने पाँच साल के कार्यकाल में मायावती ने भले ही कई ग़लतियाँ की हों, लेकिन एक परिपक्व राजनेता के तौर पर उन्होंने कम से कम अपने समर्पित मतदाताओं को फिर से अपने ख़ेमे में वापस लेने की कोशिश की है.
लेकिन जब तक उत्तर प्रदेश का मतदाता एक बेहतर प्रशासक के रूप में मायावती को सबसे बेहतर विकल्प नहीं मानेगा, मायावती को मुश्किल पेश आ सकती है. लेकिन ये कहना कि मायावती सत्ता के संघर्ष में काफ़ी पिछड़ गई है, फ़िलहाल उचित नहीं होगा

एकात्म मानवतावाद

कुछ विद्वान मित्रों का मानना है कि भाजपा की तरफ आम लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है और वह इसलिए कि उन लोगों के मन में उनमें  हिंदू होने का म...