बुधवार, 28 जुलाई 2010

मुसलमानों को आरक्षण देने की तैयारी

अमर उजाला से साभार -
नई दिल्ली।
Story Update : Thursday, July 29, 2010    1:25 AM
मुसलमानों को नौकरियों और शिक्षा में बढ़ावा देने के लिए सरकार उन्हें आरक्षण देने पर विचार कर रही है। बुधवार को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि मुसलिमों को ओबीसी कोटे के जरिए आरक्षण दिया जा सकता है। खुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे पर प्रतिबद्ध है। कांग्रेस के घोषणापत्र में इस बारे में प्रतिबद्धता जाहिर की गई थी।

रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में की गई थी सिफारिश
खुर्शीद से पूछा गया था कि क्या सरकार अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के बारे में रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को मानने के लिए तैयार है। आयोग की रिपोर्ट पिछले साल दिसंबर में संसद में पेश की गई थी। इसमें मुसलमानों को दस फीसदी और अन्य अल्पसंख्यकों को शासकीय नौकरियों में पांच फीसदी आरक्षण की अनुशंसा की गई थी। आयोग ने सुझाव दिया था कि अगर १५ फीसदी आरक्षण को लागू करने में परेशानियां आती हैं, तो अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के लिए वैकल्पिक रास्ता भी अपनाया जा सकता है।

दूसरे विकल्प पर भी काम
मंडल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक संपूर्ण अन्य पिछड़ा वर्ग जनसंख्या का ८.४ फीसदी अल्पसंख्यक हैं। इस आधार पर कुल ओबीसी आरक्षण के २७ फीसदी में से ८.४ फीसदी अल्पसंख्यकों के लिए और उसमें से छह फीसदी मुसलिमों के लिए रखा जाना चाहिए। खुर्शीद ने कहा कि आयोग ने कहा था कि या तो इसे 15 फीसदी के हिसाब से दीजिए या 27 फीसदी की भागीदारी के हिसाब से। हम दूसरे विकल्प पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सच्चर समिति ने भी दूसरे विकल्प की सिफारिश की थी। खुर्शीद इस मुद्दे पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के संपर्क में हैं क्योंकि फैसला उसे करना है।

आंध्र, कर्नाटक, केरल की तर्ज पर दिया जा सकता है कोटा
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी मई में मुसलिम नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया था कि मुसलिमों को आरक्षण देने की प्रक्रिया पर आगामी छह महीने में काम हो जाएगा। समझा जा रहा है कि पार्टी अल्पसंख्यकों को उसी तरीके से आरक्षण देने के पक्ष में है, जैसा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में है। तमिलनाडु में ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण में से 3.5 फीसदी आरक्षण मुसलिमाें को दिया गया है, जबकि आंध्र प्रदेश में मुसलिमों को चार फीसदी आरक्षण दिया गया है।

राम स्वरुप वर्मा और पिछड़ा एवं दलित आन्दोलन की दशा और दिशा.


डॉ.लाल रत्नाकर
'अर्जक संघ' मानवीयतावादी संगठन का निर्माण कर जिस आन्दोलन को राम स्वरुप वर्मा (जन्म - २२ अगस्त १९२३ मृत्यु १९  अगस्त १९९८ ) ने ०१ जून १९६८ में प्रारंभ किया वह आज वह उत्तर प्रदेश में दम तोड़ रहा है, यद्यपि सामाजिक चेतना का सूत्रपात करने का जो वीडा उन्होंने उठाया उसका प्रभाव ही था की पिछड़े और दलितों की पार्टियों ने उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण सामराज्य को तहस नहश किया, जो साठ के दसक से ही शुरू हो गया इसके प्रथम चरण में चौधरी चारण सिंह ने किसानों की आवाज़ बुलंद की और कांग्रेस छोड़ कर इस सामाजिक आन्दोलन के पक्षधर बने जो १८६७ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए और राम स्वरूप वर्मा उनके मंत्रीमंडल में राजस्व मंत्री बनाये गए.   


Ramswaroop Verma (1923-1998) was born August 22, 1923 in Uttar PradeshIndia. He was the founder of Arjak Sangh, a humanist organisation. The organization emphasizes social equality and is strongly opposed to Brahminism. Verma denied the existence of god and soul. He was strongly opposed to the doctrine of karma and fatalism. Verma campaigned tirelessly against Brahminism and untouchability.

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Biography

Ramswaroop Verma came from an agriculturist family. He did his M.A. (Hindi) from Allahabad University in 1949 and Law Graduation from Agra University. In both the examinations he secured first position in the first class in the University. He qualified in the written examination of the Indian Administrative Services, but did not appear in the interview. Verma was of the view that an administrator has to work within limitations. He wanted to work for social change as a free citizen. He came in contact of prominent Indian democratic socialist leaders of his time such as Acharya Narendra Dev and Dr. Ram Manohar Lohia. Consequently, he became a member of the Socialist Party. Several times he was elected to the U.P. Assembly.In 1967, he was for some time Finance Minister of Uttar Pradesh in the government headed by Charan Singh, who later became the prime minister of India. According to Ramswaroop Verma, political and economic equality could not be achieved without a social and cultural revolution. Consequently, he founded Arjak Sangh on 1 June 1968 for achieving this aim. He also started Arjak Saptahik, a Hindi weekly. He was the chief editor of the weekly. Verma was also influenced and inspired by Ambedkar. Verma was active in party politics for a long time. However, he is best known and remembered as a thinker,writer and the founder of Arjak Sangh. He kept working for Arjak Sangh throughout his life. He kept writing articles and books and delivered many lectures for promoting humanism. Ramswaroop Verma wrote and spoke in Hindi only. He died in Lucknow on 19 August 1998.

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Books by Ramswaroop Verma

Manavwadi Prashnotri (Humanist Question-Answers), Lucknow: Arjak Sangh, 1984.
Kranti Kyon aur Kaise (Revolution: Why and How?), Lucknow: Arjak Sangh, 1989.
Manusmriti Rashtra ka Kalank (Manusmriti a National Shame), Lucknow: Arjak Sangh, 1990.
Niradar kaise mite? (How to remove Disrespect?) Lucknow: Arjak Sangh, 1993.
Achuton ki Samasya aur Samadhan (The Problem of Untouchables and its Solution) Lucknow: Arjak Sangh, 1984.

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References

Arjak Sangh Siddhanta Vaktavya - Vidhan - Karyakram ( Principles, Statute and Programmes of Arjak Sangh), Patna: Arjak Sangh, ninth edition, 2001.



मा. स्वरूप वर्मा जन्म दिवस 






Ramswaroop Verma (1923-1998) was born August 22, 1923 in Uttar 




Pradesh, India. He was the founder of Arjak Sangh, a humanist 






organisation. The organization emphasizes social equality and is strongly opposed to Brahminism. Verma denied the existence of god and soul. He was strongly opposed to the doctrine of karma and fatalism. Verma campaigned tirelessly against Brahminism and untouchability.







Ramswaroop Verma came from an agriculturist family. Verma was of the view that an administrator has to work within limitations. He wanted to work for social change as a free citizen. Several times he was elected to the U.P. Assembly.In 1967, he also served as Finance Minister of Uttar Pradesh.





According to Ramswaroop Verma, political and economic equality could not be achieved without a social and cultural revolution. Consequently, he founded Arjak Sangh for achieving this aim. He also started Arjak Saptahik, a Hindi weekly. He was the chief editor of the weekly. Verma was also influenced and inspired by Ambedkar. However, he is best known and remembered as a thinker,writer and the founder of Arjak Sangh. He kept working for Arjak Sangh throughout his life. He kept writing articles and books and delivered many lectures for promoting humanism. He died in Lucknow on 19 August 1998.

  

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

जिनका सामाजिक सरोकार रहा है !


एसा नहीं की पिछड़ी जातियां एका-एक आ गयी और सारी समस्या खड़ी हो गयी .
मुंशी राम सुन्दर यादव
(से एक मुलाकात जो पिछले दिनों जून २०१० के पहले सप्ताह उनके गाँव में हुयी 'रसिकापुर' जौनपुर जनपद का एक परंपरागत गाँव है जहाँ ज्यादातर यादव आवादी है बाकि थोड़े से और लोग है जो सामाजिक तौर तरीके से इन्ही के आस पास के है)
ऐसे ही कुछ लोग जिन्हें हम यहाँ लगा रहे है उनका सामाजिक सरोकार रहा है , बहुत सारे आंदोलनों को उन्होंने गति दी है भले ही उन आंदोलनों का परिणाम उनके प्रतिकूल गया हो पर सारा आन्दोलन खड़ा ही उनके प्रयासों से था .
मुझे याद है १९९१ के विधानसभा उत्तर प्रदेश के चुनाव होने थे और मै दिल्ली में डॉ.संजय सिंह तब संचार मंत्री थे स्वर्गीय चंद्रशेखर जी के मंत्रीमंडल में उनके यहाँ आया हुआ था कुछ लोगों को टेलीफोन के कनक्शन की सिफारिश करनी थी . तब टेलीफोन के मायने होते थे और महानगरों में लम्बी कतार लैंड लाईन टेलीफोन की, खैर यह सारे काम हो गए पर ३१. हुमायूँ रोड के  संचार भवन के अतिथि निवास में प्रवास जो राजनीति की खुमारी का मुकाम बना टेलीफोन की सुबिधा और टिकट बटवारे के दौर का नज़ारा, निहायत विचारहीन सुविधाभोगी राजनेताओं का जमावड़ा उन दिनों कांग्रेस के गर्दिश के दिन और भाजपाईयों का 'मंडल' का विरोध और 'कमंडल' का हमला करके 'विश्वनाथ प्रताप सिंह' के राज्य का पतन और श्री चंद्रशेखर जी का सत्तानासिन किया जाना.  
जिसके निहितार्थ थे अगड़ी जातियों के क्योंकि श्री चंद्रशेखर जी पिछड़ी जातियों के अघोषित शत्रु थे और पिछड़ी जातियों के कुछ नेता उनके भक्त बने हुए थे जिनका उनके लिए कोई मायने नहीं था केवल अपनी चौधराहट चलाने के स्व.चंद्रशेखर जी ये जानते थे, यद्यपि उन दिनों पिछड़ों की राजनीती के बहुत सारे वरिष्ठ और कनिष्ठ तमाम तरह के नेता थे पर वह कहीं न कहीं धोखे में थे, जिनको लग रहा था की उनका कोई समझदार नेता आ गया तो उनकी दुकान ही बंद हो जाएगी (यह बात इसलिए भी प्रासंगिक है की कई पिछड़े राजनेताओ की गति और दुर्गति इसी चालाकी के चलते हुयी है) पर स्व.चंद्रशेखर जी जो स्वभाव से पिछड़ों के विरोधी थे.वे पिछड़ों के सारे आन्दोलन को कुंद करने में कामयाब हो गए थे.
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यही कारण है की पिछड़ों के बड़े नेता कभी एक साथ आकर नहीं खड़े हुए, अक्सर चंद्रजीत जी इस बात को स्वीकारते थे की कहीं न कहीं यह गड़बड़ हो रही है, पर बाकि नेता स्व.श्री चंद्रजीत यादव को पचा नहीं पा रहे थे या उनका अन्दर का बौनापन उन्हें उनके पास आने से रोकता था. पर यादव जी की महत्वाकांक्षा और उनका राजनैतिक कैरियर तथा उनका आन्दोलन सब कुछ इस स्तर का था की कई पिछड़े नेता खामखाह इनसे इर्ष्या करते थे जिसकी सारी जानकारी उन्हें थी पर वो चाहकर चलकर उन्हें समझाना चाहते थे पर कौन समझ रहा है .

इसी तरह अनेक पिछड़ों के बुद्धिजीवी रातदिन एक करके चिंतन करते सामाजिक बदलाव के बारे में  सोचते थकते नहीं थे पर कुंद बुद्धि राजनेता जनता को बेवकूफ बनाने के अलावा जो कर रहे थे उस पर आज सी.बी.आई. की नज़र है, या तो उनके भाई भतीजे या कुटुम्बी हरपने को तैयार बैठे है. इस प्रथा का सबसे अधिक असर पिछड़े नेताओं पर हुआ है उतना शायद और नेताओं पर नहीं दुखद यह है की पिछड़े समाज का विखंडन करने में जितना योग इन समकालीन नेताओं ने किया है उतना उन्होंने नहीं जो स्वाभाविक विरोधी थे, कभी भी इन पिछड़े नेताओं ने अपनी क्रीम को राजनीति में आने से जितना रोका उतना तो पराये भी नहीं. जबकि स्व.श्री चंद्रजीत यादव हमेशा अच्छे लोगों को राजनीती में लाने के पक्षधर रहे, पिछड़ों की महिलाओं को हमेशा आगे लाने के लिए आन्दोलन चलाये -
डॉ.लाल रत्नाकर 

एकात्म मानवतावाद

कुछ विद्वान मित्रों का मानना है कि भाजपा की तरफ आम लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है और वह इसलिए कि उन लोगों के मन में उनमें  हिंदू होने का म...