दलित एवं पिछड़ी जातियों की समस्याएं

'‘भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान"(स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक) 

भूमिका
भारतीय कला व संस्कृति का एक समृद्धशाली इतिहास रहा है। जिसका लगभग सात हजार वर्ष पुरानी प्रामाणिक परम्परा विद्यमान है जिसका प्रमाण विभिन्न उपलब्ध साक्ष्यो से अब पूरी दुनिया के सम्मुख है। इतनी पुरानी और समृद्ध संस्कृति को गौरव देने में भारतीय कला और कलाकारों का बहुत योगदान है। भारतीय कला की चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्यकला तथा आंचलिक कला शैलियां अत्यंत उत्कृष्ट रूप में हमारे सम्मुख विद्यमान हैं। भारतीय कला बहुत सी चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ी, जिनका सामना भारतीय कलाकारों को भी करना पड़ा और जिसे उन्होने बड़ी कुशलता के साथ पूरा भी किया। युगों-युगों से भारतीय कला आत्माभिव्यक्ति एवं रचनाधर्मिता की दृष्टि से अत्यंत उच्च स्तर तक समृद्धशाली रही है जिसे कालांतर में कुछ विदेशी कला-तत्वों के समावेश के कारण परिर्वतन तो हुए किंतु भारतीय कला और कलाकारों ने अपने मूल तत्वों एंव भारतीयता को कभी नहीं त्यागा। ऐसी विषम् परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी कला परम्परा, सभ्यता, संस्कृति को अक्षुण्ण रखने एवं उसके अस्तित्व को बनाए रखने हेतु अनेकों कला आदोंलन हुए जिसमें बंगाल स्कूल के कलाकारों ने अग्रणी रहकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन कलाकारों ने अपनी कला पर आसन्न विदेशी प्रभावों को हटाने के लिए हर तरह से संघर्ष किए। उन्होनें अपने साथ देश के बहुत से कलाकारों को जोड़कर विदेशी कलाओं के प्रभावों को ही कम नहीं किया वरन् अपनी कला के मूल्यों मान्यताओं और तकनीकी पर लेख लिखे जिसको जनान्दोलन बनाकर आजादी के आन्दोलन के साथ जोड़कर विदेशी प्रभाव से मुक्त कराया।
भारतीय कला के दर्शन प्राचीन काल से आधुनिक काल तक अपनी दार्शनिक सोच को संजोकर उसे विभिन्न रूपों में विस्तारित किया है जिससे वह समय परिवर्तन के साथ भले ही बदलते रहे हों और इनके कारण कला में हुए इन परिवर्तनों की वजह से ही समकालीन कला में विभिन्न बदलावों को देखा जा सकता हैै। यही कारण है कि हम इन कलाओं को समय के साथ साथ चलने वाली कला कह सकते है और समय के साथ साथ चलने वाली कलाओं को ही ‘समकालीन कला’ के रूप में जाना जाता है। समकालीनता का सीधा अर्थ यद्यपि नित् नवीन परिवर्तनों या नए-नए अविष्कारों से भी है, जिसके कारण कलाकारों की कलात्मक अभिव्यक्ति एवं सौन्दर्यात्मक दृष्टि में भी बदलाव के दर्शन होते हैं इन्हीं बदलावों से भारतीय कला में समकालीन कला के विविध रूप उपस्थित होते जा रहे हैं जिसमें हमें कलाओं के नए अर्थ भी दिखाई देने लगे हैं। इन कला आंदोलनों से कला के स्वरूप में दिन-प्रतिदिन जो बदलाव दिखाई दे रहा है दरअसल यही वह तत्व है जो समकालीनता का प्रतिनिधित्व करता है। 
आज समकालीन कला में बहुत से नये प्रयोगों के दर्शन होते हैं, जो भारतीय कलाकार कर रहा है। इसमें चित्रकला, मूर्तिकला, ग्राफिक तथा फोटोग्राफी आदि कलाएं आती है जिसका स्वरूप प्राचीन या परम्परागत कलाओं से बिल्कुल अलग है। परंतु एक्सपेरिमेंटल आर्ट के इस दौर में कला में जो बदलाव देखा गया है वही बदलाव हमें भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया के कला पटल पर हमें स्थान दिलाने में कामयाब हो रहा है।
भारतीय कला के इतिहास में कलाकारों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है चाहे वह आधुनिक कला हो प्राचीन या मध्यकालीन कला हो या प्रागैतिहासिक कालीन कला, सभी कालों में इन भारतीय कलाकारों ने अपने-अपने तरीके से भारतीय कला को पल्लवित और विकसित किया है। स्वतंत्र भारत में भारतीय कला के लिए बंगाल शैली का ऐतिहासिक महत्व है जिसे आनन्द कुमार स्वामी तथा ‘इ.वी. हैवल’ जैसे चिन्तकों ने स्वीकार किया है। इस शैली का योगदान दो स्तरों पर सबसे महत्वपूर्ण रहा, तत्कालीन कलाकारों को पूरे देश में कला को एक समान वैचारिक धरातल पर एकजुट कर भारतीय कला तत्वों के रक्षार्थ उन्हें अंकित करने की प्रेरणा देना तथा चित्रकला को पश्चिम के प्रभावों से मुक्त करना जो आजादी के समान्तर विकसित हुआ, वह पहला स्वदेशी कला का आन्दोलन था। इस कड़ी में विनोद बिहारी मुखर्जी, नंदलाल बोस, असित कुमार हल्दार, रामकिंकर बैज, यामिनी राय आदि कलाकार थे जिन्होंने कला को इस शिखर पर पहुचाया तथा कला में स्वदेशी चेतना का विस्तार किया।
कलाकार अपनी कला से कला जगत को, मानवमात्र और स्वयं को संबोधित करता है, उसके इस संबोधन में भी उसके उपस्थित होने का जो भाव छुपा है और कदाचित् उसकी रचना में वह जिस भूमिका में भी हो, या चाहे वह किसी भी माध्यम में सृजन करता हो, अगर वह कलाकार है तो उसका होना इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने में उस कला के लिए कितना सक्षम और मौलिक है। इससे यह तो स्पष्ट ही हो जाता है कि रचनाकार का चाहे कोई भी माध्यम हो, कला सृजन की प्रकिया एक जैसी होती है और उसमें एक ही तरह का विचार, मंथन कार्य करता है। कला का काम मन के रचाव को उन्नत, मानवीय एवं संवेदनशील बनाना है, जिसके परिणाम स्वरूप कला क्षेत्र में आश्चर्यजनक परिर्वतन के साथ अद्भुत् परिणाम सामने आते हैं। वैसे रचना के लिए सहायक साधन की आवश्यकता तो होती है पर माध्यम किसी कृति का उद्देश्य नहीं होता। चाहे आदिम मानव की मिट्टी या रेत हो चाहे पत्थर या लकड़ी हो, हड्डी ही क्यों न हो कला एक सृजन प्रक्रिया है, साधन और माध्यमों का किसी भी तरह का मूल्य नहीं।
कलाकार को यदि कलात्मकता का वातावरण मिल जाये तो वह अपनी कला को एक नन्हें पौधे की तरह बढ़ाने लगता है। जब 19वीं शताब्दी में कला का स्वरूप बिगड़ने लगा था तब वहीं दूसरी तरफ भारतीय कला के चिन्तक कुछ महान कलाकारों ने इसके स्वरूप को बचाये रखने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए, जिनमें अनेक आंदोलन व ग्रुपों का निर्माण हुआ। जिसके द्वारा उन्होंने गु्रपों में बंाटकर भारतीय कला की उस विषम् स्थिति को संभाला। इसमें ई0वी0 हैवल, टैगोर बंधु आदि कलाकर थे। इसके अलावा प्रोगे्रसिव ग्रुप के कलाकारों ने भी यही काम किया। इसी के साथ साथ देश में आजादी का विगुल भी बज गया था और इन कलाकारों को भी एक सुन्दर मंच मिला उन्होनें एक जुट होकर भारतीय कला को उच्च स्तर तक पहुंचाया। उनके इस हौसले को देखते हुए तत्कालीन राष्ट्र निर्माताओं को लगा कि कलाओं के संरक्षण की महति आवश्यकता है जिसके लिए विभिन्न अकादमियों की स्थापना की अवधारणा बनी जिसमें - साहित्य, संगीत एवं नाटक तथा ललित कला के उत्थान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर इनकी स्थापना हुई। ललित कला अकादमी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भी यही था यह कला संस्थाएं एक स्वयात्तशासी संस्थाएं है। 
आज कला को जिन शब्दों में परिभाषित किया जा रहा है वह कुछ नया सा प्रतीत होता है परंतु कला इतिहास से स्पष्ट है कि विभिन्न कालों की चित्रकला को प्रगति का ज्ञान विभिन्न शास्त्रों में वर्णित रचनाओं, जैसे वेद, पुराण, रामायण या महाभारत में प्राप्त कला प्रसंगों से प्राप्त होता है। प्राचीन काल की चित्रकला हमारे जीवन की अभिव्यक्ति बनी हुई थी यही कलाएं जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक हमारा समस्त जीवन की लीलाएं चित्रकला से ओतप्रोत है। चित्रकला वस्तुतः जीवन की अभिव्यक्ति हैं भारतीय जीवन के हर पहलु को स्पर्श कर उसे सजाने संवारने का प्रयत्न इस कला ने किया है। यही कारण है कि सभी कौशल और कौतूहलों की परिगणना कला के अंतर्गत होने लगी। 
कला की उत्पत्ति जीवन का श्रृंगार करने की लालसा से हुई है। आदिम युगांे का शिल्पी जीवन के व्यवहार की अनुकृति कला में उतारता था जिसके साथ ही जीवन को अपनी कला से प्रभावित करने की लालसा भी उसके मन में प्रबल रूप से विद्यमान थी। अपनी गुफाओं की दीवारों पर वह शिकार का चित्र बनाता तथा उन चित्रों में उसकी आकांक्षाएं व्यक्त होती थी। कलाकार का विश्वास था कि उसके इस तरह के अंकन के अनेक मायने निकलेंगे सम्भवतः वह अपने या मानव के कौशल को प्रदर्शित करने के लिए वह ऐसा करता रहा हो। चित्रों द्वारा समझाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। वैसे चित्रकला का उद्भव यज्ञवेदियों की रेखा कृति से हुआ है जिसका प्रमाण ऋगवेद में स्पष्ट मिला है। चित्रकला के बारे में बहुत सी कथा व प्रमाण है जिन पर विश्वास करना ही पड़ता है। इसी तरह भारत वर्ष में मूर्तिकला व ग्राफिक कला के अनेको उदाहरण भी अनेकों उद्धरणों में दिखाई देते हैै। मूर्तिकला में तो मानों कलाकारों ने पत्थरों में जान ही फूंक दी हो। जिसके प्रमाण अजन्ता, ऐलोरा, बाघ, जोगीमारा, खजुराहों आदि की कलाकृतियों में दिखाई देता है।
आज ललित कलाओं का जो रूप हमारे सामने है इसको देखकर भारत का हर युवा कलाकार इसकी ओर आकर्षित होता है हर युवा कलाकार अब अपनी कला को उभारने और अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन में उद्वत्त होता हैै। जिसके लिए अनेक आयोजनों व प्रदर्शनियां से वो अपनी कला को पूरे विश्व पटल के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु तत्पर रहता है। यही कारण है कि आज युवा कलाकार अपनी कला में नया करने के लिए उसमें किसी भी वस्तु का प्रयोग करता है, जिसको एक्सपेरिमेंटल आर्ट कहा जाता है। इन प्रयोगों के द्वारा ही भारतीय कला का स्वरूप पूरी तरह से बदलता जा रहा है इसी बदलाव के चलते जो कला हमारे सम्मुख है उसे हम समकालीन कला के रूप में देख पा रहे हैं। आज कला में जो प्रयोग हो रहे है वो अच्छे तो हैं परंतु आम दर्शक इन कलाकृतियों को समझने में थोड़ा समय लेता है उसके अन्तर मन को यह प्रयोग अच्छे लगते है।
जब भी दर्शक किसी नई कलाकृति या मूर्ति को देखते हैं तो दर्शको को थोडा सोचना पड़ता है कि कलाकार ने जो कृति उनके सम्मुख प्रस्तुत की है वो उन से क्या कहना चाहती है जबकि पहले मूर्तियों व कलाकृतियों को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता था। इसके प्रमाण अजन्ता, एलोरा आदि गुफाओं में मिलते है इन गुफाओं की मूर्तियों को देखकर लगता है कि ये अभी बोल पडेगी। दर्शक चैंकता नहीं था परंतु आज सब उल्टा ही है। ललित कला अपने इन युवा कलाकारों केे ऐक्सपेरिमेंट्स को मानते हैं, इनका पूरा समर्थन करती है व इनके प्रयोगों को स्वीकार कर इनको एक मंच देती है जिससे वे यहां आकर अपनी कला का प्रदर्शन कर सकंे।
ललित कला अकादमी एक ऐसी संस्था है जिसने राष्ट्र में कलाओं के प्रति अपनी सुविधाएं तब से प्रदान करनी शुरू कर दी थी, जब से विश्व नें भारतीय कला के सार्वभौमिक प्रभाव को महसूस करना आरम्भ किया था। इस कला संस्था में एक पुस्तकालय, कला अभिलेखागार और कला संरक्षण प्रयोगशाला है, अपने कार्यरत् सदस्यों एवं विशेषज्ञों की मदद से यह उत्कृष्ट कृतियों के स्थायी संग्रह का प्रलेखन एवं संरक्षण करके कला सेवा के प्रति प्रतिबद्ध है। ललित कला अकादमी के मिशन का केन्द्र विभिन्न स्थानीय दर्शकों को आधुनिक और समकालीन कला का आनंद प्रदान करवाना तथा उनके प्रति गहरी समझ को प्रोत्साहित करना हैं इसका यही मकसद राष्ट्रीय प्रदर्शनी तथा भारत में त्रैवार्षिकी प्रदर्शनी को देखकर पता चलता है जहां विदेशों से भी कलाकार आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इसके लिए यहां बहुत बडा उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव तीन वर्ष मंे एक बार मनाया जाता है परंतु राष्ट्रीय प्रदर्शनी प्रतिवर्ष होती है इसमें भी देश के हर राज्य से कलाकार आते है। विभिन्न कार्यक्रमों और अनुकूल प्रतिभागिताओं के मध्य से अकादमी भारतीय कला और कलाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करती है और मुख्य रूप से उसके केन्द्र भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चित्रकला के साथ मूर्तिकला को भी भारतीय कलाओं में सर्वश्रेष्ठ कला माना हैं ये कला प्राचीन व मन को मोह लेनी वाली थी। इन कलाओं में अजन्ता की गुफाओं को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है मूर्तिकला की उत्पत्ति मानव की धार्मिक रूचियों के द्वारा पनपी। हमारे देश के अधिकांश लोग मूर्तिपूजक थे इसलिए इस कला का विकास होना निश्चित सा ही प्रतीत होता है। मूर्तिकला में मूर्तिकारों ने अपनी सृजनशीत्मता से भारतीय मूर्तिकला को समृद्ध किया है जिसमें रामकिंकर बैज, देवी प्रसाद राय चैधरी, शंखु चैधरी, प्रदोष दास गुप्ता, धनराज भगत आदि कलाकार मुख्य थे। इन कलाकारों ने भारतीय मूर्तिकला में अपना सशक्त योगदान दिया है मूर्तिकला मे कलाकार ने अपनी कला को कुछ इस ढंग से प्रस्तुत किया कि वो बेजान मूर्तिकला पत्थर जिन पर ये कलाकार कार्य किया करते थे वे पूरी मूर्ति बनने के बाद बोलती सी प्रतीत होती थी। जिसके प्रमाण अजन्ता, एलोरा आदि गुफाओं में देखने को मिलते हैं परंतु समय के साथ-साथ सभी कलाओं में बदलाव देखा गया तो यह कला भी इन परिवर्तनों से कैसे बच पाती। इसमें बनी (रेडीमेड) वस्तुओं को मूर्तिकार द्वारा सामग्री के रूप में प्रयोग करने का समान बढ़ा है। इसमें बनी बनायी वस्तुओं के कला में इस्तेमाल और कारीगरों द्वारा तैयार मूर्ति शिल्पों में कलाकार का चारित्रिक गुण नगण्य है व उसमें एक कलाकृति से दूसरी कलाकृति के क्रमिक विकास के लक्षण भी कम ही दिखते हैं।
आज कलाकृतियों में विचारों और भावों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है। मुख्य बात यह है कि कलाकार क्या सृजन कर रहे है न कि यह कि उसका माध्यम कितना अल्पजीवी है। इसके स्थायित्व के लिए डिजिटल और इलैक्ट्रानिक माध्यम से रिकार्ड किया जाने लगा है। आज समकालीन मूर्तिकला तथा ग्राफिक कला के रूप का विस्तार इस प्रकार हो चुका है कि पत्थर, लकड़ी, कांस्य, धातु, टेराकोटा, वुडकट, लीनोकट सेरेमिक, प्रिंटमेकिंग आदि के अलावा इन कलाओं के कलाकार अब अलग-अलग माध्यमों के प्रयोग अपनी कला में कर रहे हैं । आज कलाकार अपनी कला में बदलाव ला रहा है इसके लिए वो नई-नई तकनीकों का प्रयोग कर अपनी कला को विभिन्न दीर्घाओं में प्रस्तुत करता है। जिसमें ये दीर्घाएं इन कलाकारांे का सहयोग करती है। आज कलाकार अपने विचारों और भावनाओं को कला में अभिव्यक्त करने के लिए किसी सामग्री विशेष का मोहताज नहीं रहा है। वह अनेक माध्यमों यथा स्टील और प्लास्टिक की पाइप, प्लेट, ढले बर्तन, गुटके के रेपर, गोबर आदि से अपनी कला को नये ढ़ंग से प्रस्तुत करता है। जिसको इन्सटालेशन कला का नाम दिया गया है। यह कला एक नई कला के रूप में उभरी है। जिससे कलाकार अपनी कला में पुरानी से पुरानी वस्तुओं को इस्तेमाल कर अपनी कला को उच्च स्तर तक ले जा चुका है।
कलाकार अपनी कला को और भी कई ढ़ंग जैसे - फोटोग्राफी, विडियों आर्ट जैसी कलाओं के माध्यम से समकालीन भारतीय कला को समृद्ध बनाने में लगा हुआ है जिसमें उसका साथ पूर्ण रूप से भारतीय देश की संस्थाएं व दीर्घाएं दे रही है । इन कला संस्थाओं और दीर्घाओं के माध्यम से भारत के बहुत से कलाकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना झंडा फहरा कर आ चुके है। उन्होंने वहां जाकर अपनी कला की स्वच्छता, संस्कृति व परम्परा को अपनी कला में दिखाया जिससे वहां के कलाकार बहुत प्रभावित होकर भारत आयें। यहां आकर उन्होने भारतीय कला को समझाने के लिए उनका पूर्ण रूप से अध्ययन प्रारम्भ कर दिया । इसको जानने और समझने के बाद उनकी कलाकृतियों में कहीं-कहीं भारतीय कला का महसूस किया गया।
आज जब हम समकालीन भारतीय कला को देखते हैं तो पाते है कि भारतीय कला का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है जिसमें कलाकारों और उनके द्वारा खोजी गई नई-नई तकनीकों का बहुत बड़ा हाथ है। कलाकार अपनी कला में बदलाव करने हेेतु विभिन्न प्रकार के प्रयोगो द्वारा अपनी भारतीय कला को सर्वश्रेष्ठ बनाने में लगा रहा, जिसमें वो आज पूरी तरह से सफल हो चुका है। कलाकार की कलाकृति के सृजन में आशय ओर माध्यम इन दोनांे का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । जैसे कि मनुष्य के जीवन में आत्मा और शरीर का स्थान है। 
जब एक आम आदमी कलाकार की किसी कलाकृति के दर्शन करते हैं तो वह तटस्थ होता है। उसके कोई पूर्वाग्रह नहीं होता तथा वह किसी सीमा में बंधा नहीं होता है। उसकी दृष्टि में किसी प्रकार का भेद नही होता, वह स्वतंत्र होता है। इस स्वतंत्र भाव से किसी कलाकार की किसी कृति को निहारना उसका अपनी आंतरिक सुख होता है। जरूरी नहीं है कि वह सकून सार्वभौमिक हो। मसलन कोई कार्य किसी व्यक्ति को बेहद अच्छा लगता है और वहीं कार्य दूसरे को बिल्कुल खराब लग सकता है। कलाकृति को देखने की दर्शक की भी यह दृष्टि होती है। उसकी व्यक्तिगत मनोदशा कलाकृति का तब मूल्यांकन कर रही होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आज कलाकार अपनी कलाकृति में जो नये परिवर्तन दर्शकों को दिखाता है वो बहुत अटपटे से प्रतीत होते हैं। जिनके कारण वो उन कलाकृतियों को नकारने लगते है परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि कलाकार और उसके नये प्रयोग बेकार है। इन नये माध्यमों व तकनीको से कलाकार अपनी कला को राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ले जा चुका है ।
कलाकार की कलाकृति में महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह किसी वाद से पे्ररित है या फिर कि वह किन सिद्धांतों पर आधारित है। महत्त्वपूर्ण यह है कि उसे देखकर मन को कितना सुकून मिल रहा है और वह संवेदना के स्तर पर कितना हमें यानी आम दर्शकों को जगाती है और जिस समय में हम जी रहे है उसमें में उसकी प्रासंगिकता क्या है। कलाकृति को देखते हुए उसके आस्वाद का यह अहसास ही तब मूल्यांकन का हमारा सहारा बनता है।
हम देख सकते है कि आज कला में जो नये परिवर्तन हो रहे हैं उसका पूरा श्रेय भारतीय कलाकार, संस्थाआंे और संग्राहलयों को दिया जाना चाहिए जिनके रहते आज भारतीय कला बहुत उच्च स्तर पर दिखाई देती है। कलाकार अपनी कृतियों के साथ कला संस्था से जुड़ता है जिसके द्वारा उसको प्रसिद्धि पाप्त होती है। बाद में उनकी उन चित्रों व मूर्तियों आदि को संग्रहालय में रखा जाता है जिसको उपयुक्त साक्ष्यों में देखा भी गया है। आज ऐसे बहुत से कलाकार है जो इस दुनिया में तो नहीं है परंतु जीवित से प्रतीत होते हैं क्योंकि भारतीय कलाकारांे की कला को बचाने के लिए इनकी कृतियों को संग्राहलयों में रखा गया है जिससे वो अमर हो गई। यह एक महत्त्वपूर्ण कार्य हमारी कला को बचाये रखने में आज सक्षम है। भारतीय कला में जो कार्य बहुत पहले हुआ उससे आज की स्थिति थोडी संतोषजनक है। इन संगठनों द्वारा कलाकार को अब दर-दर भटकने की आवश्यकता नहीं पड़ती जैसे वह पहले भटकता था।
इतिहास के विभिन्न कालों में भारतीय कलाओं, चित्रकला, मूर्तिकला, ग्राफिक कला आदि के राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जीवन के बड़े शक्तिशाली रूप में दिग्दर्शन किया है । निःसंदेह अवनति एवं ह्रास के काल भी रहे हैं, किंतु हर बार समय के साथ पुनर्जागरण एवं परिवर्तन होता रहा है। यही परिवर्तन समय के साथ साथ बढते रहे और इन परिवर्तनों के कारण कलात्मक अभिव्यक्ति के नये रास्ते निकलने लगे। इनकी खोज में बहुत से बंगला कलाकार सामने आये थे जिन्होंने भारतीय कलाओं में आधुनिकतावाद का श्रीगणेश करवाया। एक सर्वथा विभिन्न रूप में, अजंता की भावना से गहन रूप से अनुप्राणित व सूजा और गोंगा से प्रभावित ‘अमृता शेरगिल’ ने एक नई शैली का श्रीगणेश किया जिसमें पश्चिमी प्रणाली के साथ पूर्वी आदर्शों के समन्वय की कोशिश भी की।
जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो कलाकारों ने अपनी कला के बिखरे स्वरूप को संभालने के लिए एकजुट होकर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। जिसके लिए उन्होने पूरे देश में विभिन्न प्रकार के आयोजन प्रारंभ कर दिये। इस स्थिति को संवारने में दिल्ली इसका महत्वपूर्ण केन्द्र बनकर सामने आयी। वैसे कलाकार देश के हर कौने में फैले थे परंतु दिल्ली इनका गढ़ बन गया जहां आकर इन्होंने अपनी कला को सुधारने व संभालने की सुंदर शुरूआत की थी। दिल्ली में ही भारत सरकार ने भारतीय कलाकारों के लिए एक अकादमी की स्थापना करवाई जिसको भारतीय युवा कलाकारों की महत्वकांक्षाओं को समझते हुए बनवाया गया। इस अकादमी को ललित कला अकादमी का नाम दिया गया। ललित कला यानि सारी दृश्य कलाओं का संगम। यहां पर युवा कलाकारों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रबंध किये गये जिसके कारण आज भारत देश का युवा कलाकार अपनी कला का घटक अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक जमा चुका है। इन सब कलाकारों की कलाओं को देख कर लगता है कि हमारे देश की कला और कलाकार आज अपने नये रूपों के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुके हैं। इस सबको देखकर हमें अपनी कला पर बड़ा गर्व प्रतीत होता है।
आज समकालीन भारतीय कला का स्वरूप काफी बदल चुका है और इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात आती है, वह यह है कि अब कलाकार स्वतंत्र होकर कार्य करने लगा है। कलाकार जब किसी कलाकृति का निर्माण कैनवास पर कर रहा होता है तो वह उसके साथ अपनी संवेदनाओं को भी बुन रहा होता है। ऐसा करते समय वह अतीत को भी कलाकृति में आमंत्रित कर भविष्य के स्वरों को भी उसमें संजो रहा होता है। कलाकृति के जरिये समय की इस बनावट में वह समय की समान विसंगतियों दुखों व सुखद स्थितियों की संकल्पना को सामाजिक सरोकार के साथ उद्घाटित करता है। जिसके द्वारा आज भारतीय समकालीन कला को हम बिल्कुल नये रूप में देख सकते हैं। इन कलाकारेां के निरंतर प्रयत्नों से भारतीय कला में बहुत सी संस्थाओं, दीर्घाओं संग्रहालयों का निर्माण भी हुआ। जहां भारतीय कलाकार अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी बहुत ही खुले ढंग से कर सकता था। इन सब संस्थाओं और दीर्घाओं में दिल्ली की ललित कला अकादमी सबसे सर्वश्रेष्ठ कला संस्था के रूप मान्यता प्राप्त कर चुकी है। ललित कला अकादमी में देश के विभिन्न राज्यों से कलाकार आकर विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियां किया करते हैे। इन कलाकारों के लिए ललित कला अकादमी द्वारा प्रदर्शनी आयोजित करने हेतु अनेक व्यवस्थाएं की गई हैं। यहां आकर कलाकार अपने कला का प्रदर्शन बहुत ही स्वतंत्र रूप से कर सकता है।
ललित कला अकादमी भारतीय कला के विकास की अवधारणा को लेकर सजग है। जब हमारा देश आजाद हुआ और ललित कलाओं के समग्र विकास की बात आयी तब अकादमी की अवधारणा ने मूर्त रूप लिया। पहले भारत में कला दीर्घाएं तो थी परंतु उनका विस्तार व विकास उस तरह से नहीं हुआ था कि इन कलाकारों व उनकी कला के प्रदर्शन की जिम्मेदारी को संभाल सके। तभी इनकी शुरूआत देश की राजधानी दिल्ली से हुई। यहां पर ललित कला अकादमी द्वारा इन कलाकारों ने अपने देश की बिखरती परंपरा व संस्कृति को संभालते हुए यहां आकर इसकी कला दीर्घा में अपनी कला की पहली प्रदर्शनी 1955 में की थी। इस प्रदर्शनी से जुडे कलाकारों को राष्टीªय स्तर पर पुरस्कृत भी किया गया। ललित कला अकादमी एक ऐसी संस्था के रूप में भारतीय कला के सामने आयी जिसने समकालीन कला को समझने एवं बढ़ने का भार अपने कंधों पर लिया। इसके कारण भारतीय कला को अपना खोया स्वरूप वापस मिला और नयी कला की नींव पड़ी, यद्यपि 1949 में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के रूप जिस संस्थान को स्थापित किए जाने की योेजना बनी उससे भी समकालीन कला जगत में आशा का संचरण हुआ। इस संस्था की स्थापना के बाद भारत में बहुत से कला दीर्घाएं, संस्थाएं, कला विद्यालय आदि का निर्माण किया गया जिसमें भारतीय कला के बारे में बताया, दिखाया व पढाया जाता था। इन कला विद्यालयों से पढकर जो विद्यार्थी आगे चलकर बडे कलाकार बनते, वो अपनी कला का प्रदर्शन इन कला दीर्घाओं और संस्थाओं में किया करते थे जो क्रम आज भी यथावत् है।
भारत में वैसे बहुत पहले से ही कला विद्यालय व महाविद्यालयों का निर्माण हो चुका था। परंतु वहां पर उस समय कला का विकास नहीं हो पाया जिसके कारण कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर पाते थे इसलिए इन कलाकारों ने वहां से बाहर निकलना ही बेहतर समझा। अब स्थिति यह है कि भारत में बहुत सी कला दीर्घाएं हैं जिसके द्वारा कला बाजार का विकास भी हुआ। वर्तमान भारत का कला परिदृश्य तथा कला बाजार विशेषकर बड़े नगरों में केंन्द्रित हो रहा है क्योंकि अधिकांश सफल कलाकार तथा युवा कलाकार आज भी बाजार का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किये हुए हैं। भारत की समकालीन कला का बाजार, आर्थिक परिवर्तनों, खुली आर्थिक नीति तथा निजी क्षेत्र के विकास के कारण पनप सका है। आज की कला दीर्घाआंे के कारण भारत की कलाकृतियां बहुत ऊंचे दामों पर बिक रही हैं जिसके कारण आज भारतीय कला व कलाकारों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी जाना जाता हैं। समकालीन कला के विकास में कला बाजार का बहुत महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। दो अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध नीलामी घरों द्वारा कला की पहली नीलामी मुंबई में क्रिस्टीज द्वारा संपन्न हुई तथा दूसरी 1992 मंे दिल्ली में सुदबी के द्वारा कराई गई थी। उसके बाद भारत में नीलामियों का सिलसिला प्रारंभ हो गया परंतु कला का दूसरा पक्ष यहां भी दिख रहा है कि कलाकृतियां औद्योगिक उत्पाद की वस्तु की तरह औद्योगिक समाज में स्वयं क्रय विक्रय की वस्तु बन गई है।
आज भारतीय कला जिस जगह पर खडी है वहां का निर्माण भारतीय कलाकारों द्वारा बहुत मजबूती से किया गया है जिस पर खड़े होकर भारतीय कला का स्वरूप बहुत ही साफ और स्वच्छ दिखाई देता है। कलाकार अपना रास्ता स्वयं ही खोज रहा है इसके लिए उसको नई नई तकनीकों की जानकारी भी प्राप्त हो रही है जिससे वे अपनी कला में बहुत ही नये प्रयोगों का इस्तेमाल कर रहा है और भागते समय व बाजार की मांग इस समय यही है कि कलाकार निरंतर नये प्रयोग करें जिससे उसकी कलाकृति में कुछ अलग देखने को मिले और वो उंचे दामों पर बिके। यहां के चित्रकारों के अतिरिक्त शिल्प एवं गृही उद्योगों के क्षेत्र में कार्यरत् कलाकारों तथा शिल्पकारों का स्तर इतना ऊंचा है कि उन्हें ललित कला के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान मिल गया है। कलाकार की कृतियों का विकास और उन्नत स्तर उसी स्थिति में संभव है जब स्वयं चित्रकार अपने मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसी उद्देश्य से ललित कला अकादमी ने दिल्ली में स्थित गढ़ी स्टूडियों में अलग अलग कमरों का निर्माण करवाया जिसके द्वारा इन युवा कलाकारों को अपने अपने क्षेत्रों में काम करने में सुविधा होें।
ललित कला के इन केन्द्रों में विभिन्न कला दीर्घाएं, स्टूडियों, अतिथिगृह आदि का भी निर्माण यहां करवाया गया। जैसे-जैसे कलाकार अपनी कला में नये माध्यम की नई तकनीकों को डालता रहा, वैसे-वैसे उनकी कला का व्यवसायिकरण भी बढ़ता जा रहा है। इस व्यवसाय को बढ़ाने में भी ललित कला अकादमी का योगदान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि ललित कला संस्था 1955 से दिल्ली व अनेक राज्यों में कला प्रदर्शनियां करवाती आई है जिनके कारण हर राज्यों से कलाकार इन प्रदर्शनियों में अपनी भागीदारी दिखाते हुए अपनी कला प्रदर्शन यहां करते आये हैं। यहां आकर उनको विभिन्न प्रकार की कला, कलाकारों, नई तकनीकोें, नये माध्यमों को जानने का मौका प्राप्त हुआ है।
ललित कला अकादमी इन युवा कलाकारों के लिए राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रदर्शनियां आयोजित करवाती है। इन प्रदर्शनियों के द्वारा भारतीय कलाकार अपनी कला को जान व समझ पाता है और उसमें विभिन्न प्रकार के माध्यमों का प्रयोग करके अपनी कला का एक रूप देता है। इसी तरह के बहुत से कार्यक्रम है जिसका आयोजन ललित कला द्वारा होता है जैसे कार्यशालाएं, कला शिविर, कला उत्सव, छात्रवृत्ति अन्य प्रदर्शनियां आदि ऐसे आयोजन है जिसके द्वारा भारतीय कलाकार इनमें सम्मिलित होकर एक नया मंच पाते हैं। 
ललित कला अकादमी दिल्ली में जो आयोजन करवाती है वहीं आयोजन उसी रूप में इसके अपने (रिजनल सेन्टर्स) कला केन्द्र भी करवाते हैं। इन केन्द्रों में विभिन्न प्रकार के कला मेले, कार्यशालाएं, प्रदर्शनियां होती रहती है। इन राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में विदेशों से भी कलाकार यहां आकर कार्य करते हैं जिससे उनको कलात्मक अनुभव प्राप्त होता है। इन कलाकारों के यहां आने से पता चलता है कि भारतीय कला और इसकी परंपरा इनको यहां खींच लाती जिससे पश्चिमी कला का प्रदर्शन भी भारतीय कलाओं में शामिल हो जाता है। जिनके कारण भारतीय कला का बाजार बढता जा रहा है।
ललित कला अकादमी इन युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। यह एक महत्वपूर्ण बात है कि भारतीय कला के विकास में ललित कला अकादमी जो योगदान दे रही है ऐसी कोई और संस्था इस रूप में समाज में कलाकारों के सामने नहीं आई है। यह संस्था एक ऐसे रूप में कार्यरत् है जो भारतीय समकालीन कलाकारों को अपने दायरे से बाहर निकाल कर स्वतंत्र समाज में लाकर खड़ा करती है। यहां आकर भारतीय कलाकारों ने अपने को व अपनी कला को पहचाना और उसको एक नये सुंदर रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया।
ललित कला अकादमी समकालीन भारतीय कला और कलाकारों के लिए उनके गौरवशील अतीत और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण परिवर्तन तथा विकास का सूचक है। इसीलिए इसको भारतीय कलाओं के पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था माना जाता है। जिसने भारतीय कला को उसकी पहचान दिलाई है। ये संस्था अपनी स्थापना और उसके उद्देश्यों को पूरा करने में तत्पर है। यद्यपि भेदभाव के अनेक आरोपों से जूझती यह संस्था कला के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। यही कारण है कि भारत की समकालीन कला को अन्तर्राष्ट्रीय मंचो तक ले जाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
-सपना तंवर 

(सपना के इस शोध को कैसे किसी परीक्षक ने गलत कहा है निचे के निवेदन में देखिये)

सेवामें
मा.कुलपति महोदय
चै.चरण सिंह विश्वविद्यालय
मेरठ

विषयः शोध ग्रन्थ के मूल्यांकन से सम्बन्धित विसंगति के सम्बन्ध में । भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान (स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक) 

महोदय,
मैं सपना तंवर शोधार्थिनी अनुरोध करती हूं कि आप संलग्न रजिस्टर्ड पत्रः का सन्दर्भ लें इसमें उल्लिखित विन्दुओं का सन्दर्भ ग्रहण करने की कृपा करें जिसमें मेरे शोध ‘‘भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान (स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक)’’ के साथ तीन परीक्षकों की रिर्पोट भी संलग्न की गयी है जिसमें दो परीक्षक महोदय द्वारा पी-यच.डी. उपाधि प्रदत्त किए जानें की संस्तुति की गयी है (संलग्नक-1,2) परन्तु तीसरे परीक्षक महोदय ने अपनी संस्तुति में जो तथ्य प्रकाशित किए हैं उनका मेरे शोध कार्य से सीधे कोई सम्बन्ध ही नहीं बनता।

मान्यवर ! उनकी सम्मति उनका अपना नजरिया हो सकता है पर जो हमने कार्य किया है वह कार्य योजना तैयार कर विद्वत् समूह ( त्ण्क्ण्ब्ण् ) के समक्ष प्रस्तुत की गई थी जिसकी विद्वत् समूह द्वारा संस्तुति की गयी ,उसी कार्य योजना के आधार पर कार्य किया है। हम आपका ध्याान तीसरे परीक्षक महोदय की आपत्तियों की ओर आकर्षित कराना चाहेंगे जो निम्नवत हैं-
उक्त पत्र के साथ प्रेषित पत्र के तारांकित विन्दुओं का सन्दर्भ लें (संलग्नक-3) आपत्तियों के उपरान्त विन्दुवार उत्तर से हम आपको अवगत कराना चाहते हैं जिससे आपत्ति का यथार्थ आपके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगा।

*’1.(संलग्नक-3)
‘‘पंचम अध्याय जो कि ललित कला के योगदान पर है, जो कि आपके शोध विषय से सम्बन्धित है। मेरा ऐसा विचार है कि क्या शोधार्थी को अपने विषय पर आने के लिए चार अध्यायों को पूर्व में भूमिका के रूप में दर्शाना पड़ा।’’

उत्तर-
कृपया शोध के विषय का सन्दर्भ लें यथा ‘‘भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान (स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक)’’ प्रथमतया ‘भारतीय समकालीन कला के विकास’ को तीन अध्यायों में समाहित किया गया है जो शोध के उद्ेश्य और ललित कला अकादमी के औचित्य को प्रतिपादित करता है अतः शोध के दूसरे हिस्से जिसमें ‘ललित कला अकादमी का योगदान’ को बताने के लिए आवश्यक है। इन तीन अध्यायों में किसी तरह का फेर बदल शोध के विषय के प्रभावी स्वरूप को ही परिवर्तित कर देगा अतः तीसरे परीक्षक महोदय की आपत्तियां शोध विषय के सम्पूर्ण स्वरूप को ही निष्प्रभावी बना देंगी। 

*’2.(संलग्नक-3)
इसी प्रकार छः अध्याय में अन्र्तराष्ट््रीय स्तर पर समकालीन कला के स्थान को दर्शाया है।

उत्तर-
कृपया शोध के विषय की प्रासांगिकता देखें जिसमें ललित कला अकादमी का योगदान अन्र्तराष्ट््रीय स्तर पर भारतीय समकालीन कला को ले जाती है ‘‘भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान (स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक)’’ यथा यह अध्याय ललित कला अकादमी के योगदान को ही बताता है। 
अतः तीसरे परीक्षक महोदय की आपत्तियां इसे क्यों चिन्हित करती हैं जबकि यह अध्याय उनकी अवधारणा का समर्थन करता है।

’*3.(संलग्नक-3)
सम्पूर्ण शोध प्रबन्ध भारतीय समकालीन कला पर ज्यादा आधरित है, न कि ललित कला अकादमी के योगदान पर, साथ ही शोधाथर््ी ने अपना दृष्टिकोण भी शोधग्रन्थ में नहीं लिखा, अकादमी के मुख्य कार्य और भी अधिक विस्तृत जानकारी के साथ पुनः प्रस्तुत करना आवश्यक है, साथ में अपना दृष्टिकोण ( थ्पदकपदह ) को भी लिखकर पुनः जमा किया जाये।

उत्तर-
महोदय कृपया शोध के विषय को देखें जिसमें ‘‘भारतीय समकालीन कला के विकास में ललित कला अकादमी का योगदान (स्वतंत्रता उपरान्त से 2007 तक)’’ के अनुरूप कार्य योजना तैयार कर विद्वत् समूह ( त्ण्क्ण्ब्ण् ) के समक्ष प्रस्तुत की, उसी अनुक्रम में पूरा शोध प्रतिपादित किया जिसमें उन सभी विन्दुओं पर समुचित अध्ययन एवं आंकड़े एकत्र किए जिन्हें प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में अनेक विषय विशेषज्ञ का परामर्श लेकर ललित कला अकादमी के योगदान को सम्मिलित किया गया है, आश्चर्य और अविश्वसनीय है तीसरे परीक्षक महोदय की आपत्तियां और अवधारणा लगता है कुछ अलग हो पर मेरे कार्य को उनकी ‘ललित कला अकादमी के योगदान’ की अवधारण पर मूल्यांकित नहीं किया जाना चाहिए। जबकि अन्य दो परीक्षक विषय के अनुरूप मूल्यांकित कर अपनी संस्तुतियां दी है,  अतः तीसरे परीक्षक महोदय के अनुसार ललित कला अकादमी का योगदान और भारतीय समकालीन कला को कम और ज्यादा का मूल्यांकन करना मेरे पूरे विषय के विपरित जाना है। जबकि ललित कला अकादमी के योगदान को विस्तार से शोध ग्रंथ में उल्लिखित किया गया है।
जहां तक इस बिन्दु ‘‘साथ में अपना दृष्टिकोण ( थ्पदकपदह ) को भी लिखकर पुनः जमा किया जाये।’’ पर मैं आपका ध्यान ‘‘उपसंहार’’ की ओर आकृष्ट कराना चाहूंगी जिसे तीसरे परीक्षक महोदय ने मेरा विचार नहीं माना है, महोदय ‘‘उपसंहार’’ ही शोधार्थी का दृष्टिकोण ( थ्पदकपदह ) होती है। 
तीसरे परीक्षक महोदय के प्रतिवेदन प्रपत्र की आपत्तियां उनके अपने मौलिक विचार हो सकते हों परन्तु प्रस्तुत शोध प्रबंध से उनका कोई उचित मूल्यांकन प्रतीत नहीं होता अतएव उनके अनुसार शोध और शोधार्थिनी के कार्य को बिलम्वित ही किया जाना है।

अतः महोदय से अनुरोध है कि आप इसका परीक्षण अपने स्तर से कराकर शोधार्थिनी को को न्याय देने की कृपा करें।

सादर।
प्रार्थिनी

सपना तंवर
शोधार्थिनी
एन.166 सेक्टर.12
टीचर कालोनी, प्रताप विहार
गजियाबाद.201001

मा.कुलपति महोदय
मेरी शोध छात्रा सपना तंवर का प्रतिवेदन आपको अग्रसारित करते हुए निवेदन करना है कि इन्होंने जिन विन्दुओं पर आपका ध्यान आकृष्ट किया है वह उचित और सत्य है तीसरे परीक्षक महोदय की आपत्तियां निराधार हैं प्रस्तुत शोध प्रबंध के मूल्यांकन से उनका कोई उचित तथ्य स्थापित होता प्रतीत नहीं हो रहा है अतएव उनके अनुसार शोध और शोधार्थिनी के कार्य को बिलम्वित किया जाना ही प्रतीत हो रहा है।
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप इन्हें न्याय देने की महती कृपा करेंगे।
सादर।

(डा.लाल रत्नाकर)
शोध निर्देशक


पिछड़ों को आबादी के हिसाब से मिले आरक्षण !

Jaunpur | अंतिम अपडेट 3 जुलाई 2013 5:30 AM IST पर

जौनपुर। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष पूर्व विधायक राज नरायण बिंद का जिले में प्रथम आगमन पर भव्य स्वागत किया गया। सदर चुंगी स्थित सपा कार्यालय पर आयोजित समारोह में जिलाध्यक्ष राज बहादुर यादव ने कहा कि पार्टी ने श्री बिंद को पिछड़ा वर्ग आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर बिंद निषाद समाज का सम्मान किया है।
राज नरायण बिंद ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के प्रति आभार जताते हुए कहा कि पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करेंगे। बिंद, निषाद समाज के लोगों को पार्टी से जोड़ने का काम करेंगे। बिंद समाज लोकसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा। समारोह में लोकसभा प्रत्याशी डा. केपी यादव ने कहा कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बिंद समाज के व्यक्ति को जिम्मेदारी देकर पिछड़ा वर्ग का सम्मान किया है। राज नरायण बिंद स्व. फूलन देवी के सपनों को पूरा करेंगे। राज नरायण बिंद ने कहा कि 16 जुलाई को पालीटेक्निक चौराहा स्थित कृषि भवन में बिंद, निषाद समाज का मंडलीय सम्मेलन आयोजित किया गया है। इसमें समाज के हजारों लोग शिरकत करेंगे। इस दौरान पूर्व विधायक लाल बहादुर यादव, उमाशंकर यादव, हिसामुद्दीन, प्यारे लाल निषाद, नंद लाल यादव, श्रवण जायसवाल, गजराज यादव, कृष्ण कुमार, त्रिभुवन यादव, भारत बिंद, निर्मला बिंद, राजेश कुमार, कलीम अहमद, दीपक सिंह, पूनम मौर्य, विक्रम मौर्य, रिजवान हैदर, सुनील श्रीवास्तव, संतोष मौर्य, सुभाष चंद्र पाल, आशीष कुमार पाल आदि मौजूद थे। संचालन महासचिव श्याम बहादुर पाल ने किया। बदलापुर गेस्ट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में राज नरायण बिंद ने कहा कि पिछली बसपा सरकार ने पिछड़ों, अति पिछड़ों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया। पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण दिया गया लेकिन अब आबादी 60 फीसदी हो गई। हम गुजारिश करेंगे कि आबादी के हिसाब से पिछड़ों को आरक्षण दिया जाए। यहां सपा कार्यकर्तांओं ने स्वागत किया। इस दौरान पूर्व विधायक उमाशंकर यादव, जिलाध्यक्ष राज बहादुर यादव, सुशील श्रीवास्तव, जयनाथ यादव, सालिकराम, महेंद्र यादव, ओम प्रकाश, रामजीत यादव, सभाजीत, अभयराज यादव, राजेश बिंद, चंद्रभान बिंद, राम अधार, अच्छे लाल, कैलाश मौर्य, इंद्रजीत यादव, उमापति पांडेय, नीरज दुबे, कामता सिंह, यदुवंश सिंह, कामता सिंह, डा. सुधांशु दुबे, वीरेंद्र दुबे आदि मौजूद थे।
उधर, बिंद निषाद जागरण समिति के तत्वाधान में चौकिया स्थित हाल में राज नरायण बिंद का स्वागत किया गया। इस दौरान मोतीलाल बिंद, अच्छे लाल, मूलचंद्र, ठाकुर प्रसाद निषाद, रवींद्र बिंद, राधेश्याम, सुरेश कुमार, राम नरायन, निरंजन, अर्जुन, सभाजीत, हरिहर, अनिल बिंद, बिहारी आदि मौजूद थे। संचालन अच्छे लाल बिंद ने किया।
पिछड़ी जातियों की समस्याएं
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अब इनको सुनिए -
दरअसल नंदी को पिछड़ों दलितों में ही भ्रष्टाचार दिखाई देता है . इसमें इनका दोष भी नहीं है। ये जिस संस्कृति और समाज से आते हैं वहां अपने भ्रष्ट 'भ्रष्ट' नज़र नहीं आते, इनके यहाँ भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार नहीं बल्कि शिष्टाचार है . अतः इन्हें पिछड़े और दलित भ्रष्ट नज़र आ रहे हैं .-
डॉ.लाल रत्नाकर 
पिछड़ों पर आशीष नंदी के बयान से मचा बवाल

 शनिवार, 26 जनवरी, 2013 को 17:28 IST तक के समाचार
आशीष नंदी
आशीष नंदी का कहना है कि वे अपने बयान पर क़ायम हैं
जयपुर साहित्य उत्सव में राजनीतिक आलोचक आशीष नंदी ने भ्रष्टाचार पर एक विवादित बयान देते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार करने वाले ज्यादातर लोग अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के होते हैं.
बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ का कहना है कि आशीष नंदी के इस बयान के बाद दौसा से निर्दलीय सांसद किरोड़ीलाल मीणा ने आयोजन स्थल पर पहुंचकर हंगामा करके अपना विरोध दर्ज कराया है.

जयपुर साहित्य उत्सव में परिचर्चा के दौरान आशीष नंदी ने कहा, ''ज्यादातर भ्रष्ट लोग ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के होते हैं.''इस मामले में एक व्यक्ति की शिकायत के बाद पुलिस ने आशीष नंदी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.
उन्होंने कहा, ''जब तक ऐसा होता रहेगा, भारत के लोग भुगतते रहेंगे.''

बयान पर क़ायम

"आप किसी गरीब आदमी को पकड़ लेते हैं जो 20 रूपये के लिए टिकट की कालाबाज़ारी कर रहा होता है और कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है लेकिन अमीर लोग करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार कर जाते हैं और पकड़ में नहीं आते हैं."
आशीष नंदी
आशीष नंदी ने बाद में कहा कि वह अपने बयान पर क़ायम हैं और अपने खिलाफ किसी भी तरह की पुलिस कार्रवाई के लिए तैयार हैं.
आशीष नंदी का कहना है कि उनके बयान को गलत परिप्रेक्ष्य में समझा गया है.
परिचर्चा में मौजूद कुछ पत्रकारों समेत श्रोताओं में से भी ज्यादातर लोगों ने नंदी के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है.
लेकिन नंदी ने बाद में सफाई देते हुए कहा, ''आप किसी गरीब आदमी को पकड़ लेते हैं जो 20 रूपये के लिए टिकट की कालाबाज़ारी कर रहा होता है और कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है लेकिन अमीर लोग करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार कर जाते हैं और पकड़ में नहीं आते हैं.''
वहीं परिचर्चा के पहले हिस्से में 'विचारों का गणतंत्र' विषय के आलोक में भारतीय गणतंत्र पर चर्चा करते हुए लेखक और पत्रकार तरुण तेजपाल ने कहा कि भ्रष्टाचार हर वर्ग, हर तबके में है.
तरुण तेजपाल ने नाराज़गी जाहिर करते हुए मीडिया पर आरोप लगाया है कि आशीष नंदी के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है.
आशीष नंदी के कथित बयान के विरोध में मायावती बहुजन समाजपार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है, ''पार्टी मांग करती है कि इस मामले में राजस्थान सरकार को तुरंत उनके खिलाफ एससी-एसटी एक्ट और अन्य सख्त कानूनी धाराओं में तहत कार्रवाई सुनिश्चित करके जल्द से जेल भेज देना चाहिए.''

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