रविवार, 22 अप्रैल 2018

मुठभेड़

समकालीन सामाजिक सरोकारों से आहत मन को सत्य की सियाही से झकझोरने का माद्दा मेरे कवि मित्र परम स्नेही आ. बी.आर. विप्लवी की कलम से-
डॉ.लाल रत्नाकर
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ऑखों में धूल झोंक के बहुजन विकास में 
कातिल ने कहा जान वो डालेगा लाश में
दलितों को घेर लेने को हिन्दू की खोल में
आम्बेडकर को लाए हैं भगवा लिबास में
यजमान पुजारी बने तो दान कौन दे
होती है दोस्ती कहीं घोड़े और घास में
मन मरजी संविधान का होता है मुताला
गिरवी है लोकतन्त्र महाजन के पास में
परजीवियों ने पेय बताया है खून को
कहते हैं सोमरस है धरम की गिलास में
है मीडिया रपट कि वे मुठभेड़ में मरे
निकले थे घर को छोड़ अम्न की तलाश में
बोलो भी विप्लवी कि है पाबन्दी प्यास पे
वर्ना खामोशी मारेगी पानी की आस में ।
मुताला=व्याख्या
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-बी0 आर0 विप्लवी

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