रविवार, 26 फ़रवरी 2017

सांस्कृतिक बदलाव और सामाजिक न्याय

सांस्कृतिक बदलाव और सामाजिक न्याय :

हज़ारों वर्षों से भारत जिनसे मुक्त नहीं हो पा रहा है ?

(मनु स्मृति अगर आपको लग रहा है की संसद में जो नाटकीय रोल आप अदा कर रही हो, वह किसी देश की शिक्षामंत्री का नहीं, निहायत वेवकूफ घमंडी "बहु" का तो हो सकता है वास्तव में आप हो तो नाटक या सीरियल वाली ही न ! जिस तरह से महिषसुर प्रकरण पर आप आप अपना बयांन दे रही हो, संयोग से आपको जबाब नहीं दिया जा सका तो इसका यह मतलब नहीं की आप स्वयं "दुर्गा" हो गयीं ! सेक्स वोर्केर(वेश्याएं) हिंदुस्तान की सच्चाई है, पौराणिक काल की और झाँकेंकेंगी तो स्त्रियों की और बुरी हालत इन मनुवादियों ने प्रस्तुत की है विष कन्याएं (विष पुरुष) का संदर्भ कहीं नहीं आता है ! महिषासुर आपको समझ नहीं आएगा क्योंकि आपको दलित,पिछड़ा पुरुष पुरुष नहीं दीखता, स्मृति जी आप उसी दलित, पिछड़े, कुरूप चायवाले प्रधानमंत्री की कैबिनेट की मंत्री हैं जिसके खिलाफ आप पहले भी बोल चुकी हैं, आप आइये अमेठी आपको पता चल जाएगा की महिषासुर असुर है या सुर या किसान का बहादुर नेता, उसके राज्य में भी मनुवादी आहत थे तब जिस वेश्या ने उसके साथ विश्वासघात किया हो (था थीं) उसे आप "दुर्गा" कहकर पूज्यनीय बनाती हैं, वह इन्हे कैसे पूज्य बना सकती या सकता हैं जिसके कुल का वह राजा रहा हो ! 

परम्पराओं के पाखण्ड ने हज़ारों सूरमाओं को नस्नाबूत किया है आप जैसी अपढ़ मंत्री जो उस मास्टरनी सी भी नहीं दिखती जो आजकल स्कूलों में केवल स्वेटर बनाने जाती है, आप जवाहर लाल विश्वविद्यालय को सचमुच "सास कभी बहु थी" से आगे ले जाने की नहीं सोच सकती हो !)


ताकि सनद रहे !
इस बात को तो गारंटी से कह सकता हूँ की अखिलेश जी को "ब्राह्मणवाद" चट गया है ? मुसलमान का वोट बचाने के चक्कर में गठबंधन की मलाई कांग्रेस ले गई और इनके लोग रह गए खाली समाजवादी ?
यह बात तो सही होने जा रही है जिसने भी लिखा है कि "मंडल साहब चिंता इस बात की है जब मालूम था कि भाजपा ध्रुवीकरण पर ही उतरेगा तो उससे निपटने की तैयारी क्यों नही की गयी। अब तो "स्टीव जार्डिंग" और "पीके" दोनो की टीम करोड़ों लेकर काम कर रही है। 
क्या काम किया इनने। 
गैर यादव ओबीसी बुरी तरह से सांप्रदायिक कर दिया गया है। 
बसपा की बुरी हालात हो रही है।" 
और लगभग गैर जाटव / चमार भी सांप्रदायिक हो गया है।
आपको याद् है कभी मुलायम सिंह यादव या कांशीराम ने इस तरह की एजेंसियों का सहयोग चुनाव के लिए लिए थे ?

बुजुर्गों का कहना है "ये लौंडे हैं दो के दोनों " इन्हें हर बात में विज्ञापन नज़र आता है, इन्हें कौन बताये यह हिंदुस्तान है। कांग्रेस की बात अलग है वह तो हमेशा इस तरह के प्रयोग करती रही है राजीव गांधी को बड़ी-बड़ी एजेंसीयों चुनाव प्रचार में सहयोग करती थी और जिनके चलते कांग्रेस जमीन से ही उखड़ गई है यह बात अखिलेश जी को किसी ने नहीं बताया ऐसा मुझे प्रतीत होता है क्योंकि ब्राह्मण विरोध की राजनीति प्रचार एजेंसीयों से नहीं हुआ करती क्योंकि दुनिया भर की प्रचार एजेंसीयों ब्राह्मणवाद की संवाहक हैं और यह ब्राह्मणों के लिए ही ज्यादा मुफीद होती हैं।
यहाँ यह कहना उचित होगा कि अभी उत्तर प्रदेश और बिहार में मामूली अंतर नहीं है "पीकेयूआ" नितीश को तो उल्लूएय बना देता लालू जी का भला हो बचा लिए और ससुरा बड़का इन्तज़ामकर होईगवा है, और ई यूपी में बेचारा फस गया है ? अब यहाँ कौनो न तो लालू है और न नितीश ?
भाई शिवपाल जी के बारे में कहा जा रहा की उन्हें हटाने में ऊपर वाली एजेंसीयों का बड़ा हाथ है काहे को कि उनके रहते हैं शायद इतना खेला ना हो पाता इसीलिए पहले उनको ही हटवाया अब ऐसी स्थिति में उनको भी बहन जी में ज्यादा विश्वास नज़र आ रहा है, क्योंकि जिस पी आर कंपनी ने उन्हें खाली करवा दिया उसका श्रेय है "स्टीव जार्डिंग" और "पीके" को ?
तो वह अब कुछ न कुछ तो करेंगे ही ? क्योंकि वे देशी तरीके के नेता हैं और नेता जी का बरदहस्त भी है उन पर ? वैसे न जाने कैसे ये बन जाते हैं सामन्त और इन्हें लगता है देश ही इनका है ? जब अमर सिंह जैसा व्यक्ति मिल गया हो तो यह महत्वाकांक्षा और बलवती हो जाती है कि असली सामन्त यही हैं
जहां तक कांग्रेस के साथ जाने का सवाल है आज तक तो उनसे कोई 'उबरा' नहीं है ? वास्तव में इनका गठजोड़ क्या डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत चरितार्थ तो नहीं करेगा ? क्योंकि डर लग रहा है इससे की जो ये कंपनियां हैं "स्टीव जार्डिंग" और "पीके" क्या पता बीजेपी के लिए भी काम न कर रही हों ? और इन्हें उल्लू बना रही हों ?
भाई सत्या सिंह के बहाने : आजकल बहुत सारे लोग अखिलेश जी के वफादार हो गए हैं और सरकारी एजेंसीयों के बजाए वही लोग मुख्यमंत्री और सरकार के बहुत सारे कामों का प्रचार कर रहे हैं ऐसे ही भाई सत्या सिंह हैं अभी हर जगह उनका लेखन पढ़ने को मिल जाता है और वह केवल सरकार के पाजिटिव पहलू पर ही नजर डालते हैं उसके नेगेटिव पहल उन्हें दिखाई नहीं देते मुझे लगा कि इन के बहाने सरकार के नेगेटिव पहलुओं को इन्हें बताया जाए।
भाई सत्या सिंह आप क्यों नहीं समझते हैं कि भारत जातियों का देश है और यहां जातीय आधार पर ही तमाम तरह की व्यवस्थाएं लागू हैं। जिनमें राजनीति एक अहम हिस्सा होकर जरूरी अंग है।
जब हम जात की बात कर रहे होते हैं तो अखिलेश उससे अछूते नहीं हैं किसने कहा अखिलेश यादव को कि वह जाति की बात ना करें ? जब कि जो लोग उनसे जितने लाभांवित हो रहे हैं उतना ही ज्यादा उन्हें यादव यादव कह कर प्रचारित करते हैं और यही कारण है कि आज उनके साथ अकेले यादव जाति ही खड़ी है और बाकी सारी उनकी जातियां अपना अपना काम करके (लूटपाट करके) चल बनी ? उनको भी यह पता था कि उनके लोग इन्हें वोट नहीं करेंगे इसीलिए जिसको जहां जाना था वहां चला गया है।
और आप अब छाती पीटते रहिये की अखिलेश जी ने जाती के आधार पर कुछ नहीं किया बल्कि सर्वजातीय बने रहे उनके इस प्रयास से कितना बदलाव हुआ है क्या कोई आंकड़ा है आपके पास ? इससे ना तो जातिवाद रुकने वाला है और न जातीय पहचान घटने वाली है ? क्या उन का प्रयास निरर्थक नहीं हुआ।
आश्चर्य होता है कि समाजवादी पार्टी ने जहाँ सारे मानदंडों को तोड़ते हुए पारिवारिक राजनीति में कदम रखा ? पिता ने अपने राजनीति के अनुभवहीन (समाजवादी राजनीती और सामजिक न्याय की अवधाराणा के सम्बन्ध में) पुत्र को प्रदेश की राजनीति का मुखिया बनाया ? जिसकी बार-बार प्रामाणिकता उन्होंने 5 वर्षों के शासन में वह स्वयं बीच-बीच में करते रहे हैं ! जिसको आप किसी भी तरह से भले देखें ? लेकिन नेता जी को इस बात का भान था कि उनका पुत्र उनकी बनाई हुई राजनीति को कहां ले जा रहा है इसको हम जिस रूप में भी देखें लेकिन नेताजी ने कई रूपों में देखा है। आपको याद होगा कि हमारे मुख्यमंत्री जी बिना असली चाचा के सरकार के आरंभिक दिनों में परेशान रहते थे और नाना प्रकार से अमर सिंह की याद उन्हें सताती रहती थी।
जब उनको अमर सिंह की असलियत पता चली तो फिर वह उनसे दूर होने का उपक्रम किए लेकिन इसका नुकसान यह हुआ कि उनका पूरा परिवार अमर सिंह के साथ चला गया और अपने अकेले बच गए ऐसा लगता है कि अमर का होना और ना होना कितना प्रभावी रहा यह हिसाब अलग से लगाना होगा क्योंकि अमर सिंह को यह अभिमान था कि उनके बगैर समाजवाद का कोई मायने नहीं होता और उन्होंने जो आदतें समाजवादियों में डाली वह इतिहास बन गई।
इस बात का तो हमलोगों को भी दिल ही दिल में बहुत खराब लगती थी की अमर सिंह जैसे व्यक्ति ने जमीन से जुड़े हुए लीडर को फाइव स्टार का शौकीन बना दिया था और पिछले पर में ही आम आदमी से उनका मिलना दूभर हो गया था और इस बात का बहुत दर्द पूरी अवाम को है !
एक ऐसा युवा जिसके सिंहासनारोहण के लिए उस समय फेसबुक पर हम भी लिख रहे थे और पूरी अपेक्षा थी कि पूरा समाज इसको बहुत ही बौद्धिक और वैचारिक तथा पौष्टिक तरीके से लेगा ? लेकिन हुआ क्या यह युवा 5 वर्षों तक सवर्णों के पीछे लगा रहा जैसे सत्ता उन्होंने ही इन्हें दी हो। जब की सच्चाई यह थी कि हाथी की मालकिन उसे अवाम नाराज थी उसे हटाना था इसलिए नेताजी को बहुमत मिला था और उन्होंने यह दायित्व अपने पुत्र को देकर पृष्ठभूमि में चले गए थे।
दूसरी और यह भी देखना है कि माननीय नेता जी स्वास्थ्य की दृष्टि से कितने भी उम्र के लिहाज से कमजोर या विक्षिप्त हो गए हैं। लेकिन पिता तो इन्हीं के हैं, चाचा तो इन्हीं के हैं, प्रोफेसर रामगोपाल यादव जी इन्हीं के हैं, पूरा परिवार इन्हीं का है, किस से अलग होकर यह जनता को संदेश दे रहे हैं ?
क्या यह सब उन विदेशी कंपनियों के कहने पर किया जा रहा है जो इनके भी लिए काम करती हैं, और इनके दुश्मनों के लिए भी काम करती हैं। स्वाभाविक है उनको जहां से ज्यादा पैसा मिलेगा उसके लिए ज्यादा काम करेंगे और उनके लू पोल अलग से बता भी देंगे ? दुनिया में सारी व्यापारी कंपनियां इसी तरह की होती हैं इनका कोई ईमान नहीं होता केवल और केवल उनका धर्म ही लाभ का होता है जिसके लिए वह काम करती हैं।
भारतीय लोग किसी एजेंसी के इशारे पर काम ना कर के अपने मन के मुताबिक काम करते हैं और समाज ऐसा है जो इमोशन पर भी काम करता है, और इन्होंने पुरे पिछड़ों का इमोशन, दलितों का इमोशन, केवल और केवल सवर्णों की खुशी के लिए कुर्बान कर दिया है।
इन्होंने सारे पुरस्कार केवल और केवल उन्ही लोगों को दिए हैं जो उसके पात्र ही नहीं थे। आज वोट का दौर है वह एक भी आदमी इन को वोट नहीं कर रहा है, जिसको इन्होंने लाभान्वित किया है और यह सम्मान पाने की न ही उसकी हैसियत थी। इन्होंने सब कुछ बांट दिया उनको जो इनके कभी नहीं हो सकते यही नहीं तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपति प्राध्यापक केवल और केवल एक जाती जो हमेशा से धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार में लिप्त रही है जिसे ब्राह्मण के नाम से जाना जाता है को दिया है आज वही इनकी सबसे ज्यादा विरोधी हैं और इन्हें भ्रम और वहकाने में कामयाब हुए हैं।
वे क्यों किसी का और प्रभावित करें मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूं, जिन्होंने उनके शासन में जमकर के सत्ता का लाभ लिया है ? और मंत्री तक के पद तक संभाला है । कैईयों को तो इन्होंने इसी बीच निकाला है और कईयों को निकालने का मन बनाए होंगे पर आगे क्या करेंगे इसका कोई अंदाजा नहीं है। इन के बहुत सारे सलाहकार इन के हित के लिए नहीं अपने हित के लिए आगे पीछे लगे रहे जिससे सत्ता का लाभ तो लिया है। लेकिन सामाजिक रुप से राजनीतिक रुप से और भविष्य की राजनीति के लिए इन को कमजोर कर दिया गलत दिशा में डाल दिया इन्हीं सारी चीजों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में किस तरह की राजनीति आगे आएगी उसकी पूर्व पीठिका इस बार का चुनाव तय करने जा रहा है।
यही तो पूंजीवादी सिस्टम चाहता था और इन्होंने यही किया है मुझे पूरा याद है कि कभी भी नेता जी ने किसी भी एजेंसी का सहारा ले कर के अपना चुनाव नहीं लड़ा था बल्कि जनता का विश्वास किया था और जनता ने उनका साथ दिया था जनता जानती थी कि उनका प्रतिनिधि कम से कम ईमानदार तो है ।
आज जिस विकास की बात करते आप थक नहीं रहे हो उस विकास से वर्तमान राजनीति का कोई लेना देना नहीं है मैंने पहले भी लिखा है यह विकास पर ही राजनीति होती तो शीला दीक्षित ने जितना विकास दिल्ली भी किया था उसके बाद जो चुनाव हुए थे उसमें वह स्वयं हार गई थी इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा क्योंकि विकास के लिए दिल्ली जैसा पढ़ा लिखा और वह दिल्ली जिस पर केवल और केवल पढ़ी-लिखी आवाम रहती हो उसमें शीला के साथ ऐसा व्यवहार किया हो मेरे मित्र मुझे यह जानकर सुनकर और जांच कर पता चल रहा है कि बहुजन राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान इस समय होने जा रहा है ।
देश में इसका बड़ा नुकसान हो चुका है देश के सारे बहुजन नायक उस महान पार्टी के अंग हो चुके हैं जो केंद्र की सत्ता में विराजमान है जिसका उद्देश्य ही बहुजन समाज का शोषण और विनाश करना है आप अगर इससे कहीं से असहमत हो तो हमें जरूर बताएं हम आपका जवाब देने के लिए तत्पर होंगे। 
डा.लाल रत्नाकर

साधुवाद

जय समाजवाद।






































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