शनिवार, 12 मार्च 2016

चुनौतियों से घिरे अखिलेश

अजय बोस

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अगले हफ्ते अपने कार्यकाल का चार वर्ष पूरा कर लेंगे। उन्होंने 2012 में तेज-तर्रार युवा नेता के रूप में अपनी पारी शुरू की थी, मगर आज वह अपनी ही छाया बनकर रह गए हैं। हाल ही में समाजवादी पार्टी के एक असंतुष्ट नेता ने उन्हें उत्तर प्रदेश के इतिहास का सबसे अक्षम मुख्यमंत्री करार दिया! संभव है कि ऐसा उन्होंने निजी खुन्नस के चलते कहा हो। मगर इसमें संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी के साथ ही प्रदेश के लोगों का इस युवा नेता से मोहभंग हुआ है, जिसमें वे लोग कभी काफी संभावना देख रहे थे।

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी नाकामी उनकी अपनी पार्टी के भीतर ही उनका अधिकारसंपन्न नहीं होना है। चार वर्ष पहले जब उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला था, उसकी तुलना में आज पार्टी गुटों में विभाजित और दिशाहीन दिख रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि उनके पिता और चाचाओं के साथ ही आजम खान जैसे सपा के दिग्गजों ने मुख्यमंत्री को स्वायत्तता के साथ काम करने ही नहीं दिया, ताकि वह सरकार को दूरदर्शिता के साथ चला सकें। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया कि जब-जब उन्होंने कोई नई पहल शुरू करने की कोशिश की, यादव खानदान के वरिष्ठजनों द्वारा बार-बार उन्हें नजरंदाज कर दिया गया या झिड़क दिया गया। कुछ महीने पहले हुआ यह वाकया उनकी स्थिति को बयां करने के लिए काफी है, जब अखिलेश के दो करीबियों-आनंद भदोरिया और सुनील सिंह को उनके चाचा ने पार्टी से निलंबित कर दिया था। इससे मुख्यमंत्री नाराज हो गए और उन्होंने यादव परिवार के गृहनगर सैफई में होने वाले वार्षिक महोत्सव में जाने से इन्कार कर दिया था, और वह तभी माने जब उनके पिता ने हस्तक्षेप कर उन दोनों का निलंबन वापस करवाया।

मुख्यमंत्री को यादव परिवार के सदस्यों के बोझ से उबरने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। परिवार के कम से कम 19 सदस्य सत्ता के निर्वाचित पदों पर या राज्य के प्राधिकरणों में हैं या फिर केंद्रीय स्तर पर कोई न कोई पद संभाल रहे हैं। इस तरह देखा जाए, तो आज मुलायम सिंह यादव का परिवार देश का सबसे बड़ा राजनीतिक खानदान है। परिवार के भीतर की राजनीति और सपा के शासन के दौरान पूरे उत्तर प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह उभर आए सत्ता केंद्रों ने सरकार चलाने के काम को कठिन बना दिया है। सूबे के सियासत पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की टिप्पणी थी, 'युवा नेता ने शुरू में तो काफी कोशिश की, मगर वह जिस राजनीतिक वाहन पर सवार हैं, वह अब उनके नियंत्रण से बाहर हो गया है और उनसे इसकी स्टेयरिंग संभल नहीं रही है।'

स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति अखिलेश यादव की सबसे बड़ी नाकामी है, जिसके कारण उनकी पकड़ कमजोर हुई। सपा के उद्दंड कार्यकर्ताओं ने 2012 में विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली जीत के जश्न में ही निर्दोष लोगों को निशाना बनाया था! हाल ही में पार्टी के एक विधायक के भाई ने सड़क पर झगड़ा किया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। सूबे के ग्रामीण इलाकों में मोटरसाइकिलों और बड़ी गाड़ियों में दंबगों को देखा जा सकता है, जिनकी वजह से निचली जाति वाले, अल्पसंख्यक और महिलाएं शायद ही इतना असुरक्षित महसूस करती हैं। बची-खुची कसर हिंदू कट्टरपंथी गुटों के आक्रामक अभियानों ने कर दी, जिन्हें संघ परिवार के एक गुट का संरक्षण हासिल है। इससे उपजे सांप्रदायिक तनाव ने अखिलेश यादव के प्रशासन को पूरी तरह से बैकफुट पर ला दिया। कहीं-कहीं ऐसी खबरें भी आई हैं कि सांप्रदायिक तनाव की इन घटनाओं को भड़काने में सपा के लोगों का भी हाथ रहा है। दुर्भाग्य से राज्य सरकार अल्पसंख्यक समुदाय में बढ़ती असुरक्षा से बेखबर दिखती है। बल्कि मुजफ्फरनगर के दंगों की जांच करने वाले न्यायिक जांच आयोग ने तो सरकार को क्लीन चिट दे दी है।

कानून-व्यवस्था की बदहाली के अलावा अखिलेश यादव सरकार पर किसानों की हताशा बढ़ाने का भी आरोप है, क्योंकि सूखा प्रभावित जिलों में उसकी ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। पारंपरिक रूप से पिछड़े बुंदलेखंड क्षेत्र की स्थिति और बदतर हो गई है, जिसकी वजह से वहां के किसानों की आत्महत्या की खबरें आई हैं। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान भी परेशान हैं, जबकि पहले इस क्षेत्र को संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। गन्ने के दाम पिछले कई वर्षों से नहीं बढ़ाए गए हैं, जिससे किसानों की नाराजगी बढ़ गई है। दिलचस्प यह है कि भारतीय किसान यूनियन और भारतीय किसान आंदोलन जैसे संगठन बसपा सुप्रीमो मायावती की पिछली सरकार को याद कर रहे हैं, जब हर वर्ष गन्ने के दाम में बढ़ोतरी की जा रही थी और चीनी मिलें व्यवस्थित ढंग से काम कर रही थीं।

अब जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा के महत्वपूर्ण चुनाव को सिर्फ एक वर्ष रह गए हैं, मुख्यमंत्री अखिलेश और उनकी पार्टी के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर मायावती के उभरने की चुनौती है, जो लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को मिली अपमानजनक पराजय का बदला लेना चाहती हैं, तो दूसरी ओर आक्रमक तरीके से भाजपा किसी भी तरह यह चुनाव जीतना चाहती है, क्योंकि इनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। एक-एक दिन बीतने के साथ ही यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सपा अखिलेश यादव के प्रशासनिक रिकॉर्ड पर बहुत निर्भर नहीं है। बल्कि इसके बजाय अटकलें तो यह हैं कि वह भाजपा के साथ किसी तरह का तालमेल कर सकती है, ताकि ध्रुवीकरण होने से दोनों को लाभ हो। मगर इसमें एक बड़ा खतरा यह है कि इससे मुख्यमंत्री की छवि को और नुकसान होगा।

वरिष्ठ पत्रकार एवं बहनजी-ए पॉलिटिकल बायोग्राफी के लेखक

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व-तर्ज ए अवाम !

इसके साथ उत्तर प्रदेश की अवाम भी कुछ सोचती है जनाब !
परिवार की पहचान और घमासान का जो परिदृश्य नेताजी ने पैदा कर दिया है वह वास्तव में समाजवादी राजनीती का नहीं पारिवारिक राजनीती का मुखौटा है, मौजूदा मुख्यमंत्री के चयन में जो स्थितियां परिस्थितियां थीं कमोवेश वही स्थितियां आज भी हैं, बल्कि ठीक से देखा जाय तो वह उस परिवार की सियासी जंग की तरह मौजूद ही नहीं हैं गहरी साजिशों के मकड़जाल से घिरी हुयी हैं, वर्चस्व की लड़ाई में प्रदेश कहीं और छूट रहा है जबकि आपसी खीच में कार्यकर्ताओं की बहुत ही दयनीय स्थिति हो गयी है, सत्ता के गलियारों में जहाँ इस परिवार के बहुतेरे सदस्यों का मूल्याङ्कन होता है उसमें अलग अलग मोहरे अलग अलग तरह से चिन्हित होते हैं या हो रहे हैं ? जबकि यह वह दौर है जब पार्टी को सशक्त, समृद्ध और मज़बूत नेतृत्व का आधार लेकर उभारना चाहिए था ? लेकिन हुआ इसके उलट है, इस बीच के विभिन्न चुनाओं में पार्टी की सफलता को लोकप्रियता से देखा जाना दिवा स्वप्न देखने जैसा है ! 








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