रविवार, 7 फ़रवरी 2016

समाजवादी कार्यकर्ता की बेचैनी !



समाजवादी कार्यकर्ता की बेचैनी-------------!

ब्लाक प्रमुख चुनाव आज...



मेरे गांव के प्रत्याशी श्री सतेंद्र पाल सिंह जी द्वारा मेरे श्रीमती उषा चौहान का समर्थन करने पर जान से मारने की धमकियों का दौर शुरू.....

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जनाब ! यह लोकतन्त्र है, 
वोट तन्त्र है,यहां सिर्फ सेवा,समर्पण,सदाशयता,प्रेम,करुणा का महत्व होना चाहिए लेकिन स्थितियां कितनी विद्रूप हो गयी हैं कि इस लोकतन्त्र में गुंडई,माफियागर्दी,धन,धमकी ने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर लिया है।

मेरे ब्लॉक रामपुर कारखाना में जो मेरे गांव डुमरी में स्थित है,प्रमुख पद के दो प्रत्याशी हैं।एक सपा समर्थित श्री सतेंद्र पाल सिंह जी जो विगत 15 वर्ष से मेरे ब्लाक की प्रमुखी चला रहे हैं (इसके पूर्व 12 वर्ष ग्राम प्रधान रहे,इन्हें हराके मेरी पत्नी ने 2000 में प्रधानी छीनी) और मेरे गांव के एवं मेरे घर के ठीक सामने के हैं।ये कभी समाजवादी पार्टी को वोट नही दिए हैं तथा सदैव से मेरे भी धुर विरोधी रहे हैं दूसरी प्रत्याशी सपा की बागी श्रीमती उषा चौहान जी हैं,ये भी सपाई नही रही हैं क्योकि इनके भसुर श्री राजाराम चौहान जी विगत 2012 का विधान सभा चुनाव बसपा से लड़ चुके हैं और बसपा के चौहान समाज के मण्डल कोआर्डिनेटर रह चुके हैं पर बीडीसी चुनाव के पूर्व इन्होंने सपा ज्वाइन कर झंडा लगा लिया था और जिले पर उम्मीदवारी हेतु एकमात्र आवेदन भी किया था।

आज 7 फ़रवरी 2016 को मतदान होना है।जीत-हार जिसकी हो पर सबल लोग धमकियों का दौर शुरू कर दिए हैं। मेरे गांव के प्रत्याशी श्री सतेंद्र पाल सिंह जी वैसे तो मुझे पिछले 1995 से ही मार रहे हैं। मेरे मामा और जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष श्री रामप्यारे यादव जी से एक दशक पूर्व इन्होंने कहा था कि चन्द्रभूषण को तो जब चाहूँगा तब ए के 47 से तड़तडा दूंगा,मतलब मैं तो उनकी मर्जी पर जिन्दा हूँ।अब फिर उन्होंने कहना शुरू किया है कि चन्द्रभूषणा को मारना पड़ेगा। 05 फ़रवरी को उन्होंने किसी को फोन पर बात करते हुए कहा कि "अब चन्द्रभूषणा को मारना पड़ेगा।"मेरे भांजे सोनू यादव ने इसे सुनकर मुझे फोन किया कि मामा आप कहाँ हैं तो मैंने कहा कि मैं तो राष्ट्रीय सहारा अख़बार के दफ्तर में देवरिया हूँ,तो उसने पूरा वाकया बताया।मेरे साले और पत्नी ने भी ऐसी धमकी भरी बातो को सुना और मुझे बताया।06 फ़रवरी की रात में तो गजब हो गया,दलित बस्ती की अत्यंत गरीब दो महिलाएं रात के पौने 9 बजे मेरे घर पुक्का फार के रोते हुए हाथ में डंडा लिए आ धमकीं और रोते हुए बोलीं कि अभी बोलेरो गाड़ी से टेलहु सिंह पुत्र उदयप्रताप सिंह यह कहते हुए जा रहे थे कि" कल चन्द्रभूषण को गोली मार दिया जायेगा।सतेंद्र पाल सिंह ने बिहार से गुंडे बुला लिया है और कल गोली चलेगी।"दोनों दलित समाज की मेरी शुभेच्छु महिलाये रो रही थीं और मैं हंस रहा था।मैंने उन्हें समझाया कि देखिये सबको मरना है,कोई अमर नही है।आपलोगो का मुझे इतना स्नेह है,पर गड्ढे में पैर पड़ जाय, हार्ट अटैक हो जाय या और कोई बात हो जाय तो भी तो किसी की मौत हो सकती है।हमे मौत से घबड़ाना नही चाहिए।डर के रोज-रोज मरने से तो बढ़िया है सतेंद्र पाल जी की गोली से एक ही दिन में बहादुरी के साथ मरना।

कितना समय असहिष्णु होता जा रहा है। हमने देखा है कि समाजवादी दल के राजनारायण जी जैसे नेता बनारस में चुनाव लड़ते वक्त कांग्रेस के पण्डित कमलापति त्रिपाठी जी को दिन भर खूब खरी-खोटी कहते थे और शाम होते ही अपनी खटारा जीप त्रिपाठी जी के कार्यालय पर लेकर पँहुच जाते थे।कमला पति जी पूछते थे कि क्या बात है राजनारायण जी, तो वे कहते थे कि गाड़ी का खर्च चाहिए तभी तो कल आपके विरुद्ध भाषण करूँगा। कमला पति जी अपने विपक्षी प्रत्याशी को आदर सहित चन्दा देकर उन्हें विदा करते थे।

नाई नन्दकिशोर जी की आत्मकथा पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने लिखा है कि वे नेहरू जी के दामाद और इंदिरा जी के पति श्री फिरोज गांधी जी के विरुद्ध सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे । लोहिया जी ने नारा दिया था कि "जमाई के विरुद्ध नाई।"नन्दकिशोर जी के ही पत्र का जबाब लोहिया जी ने लिखा है जो "एक शूद्र के नाम लोहिया का पत्र"नाम से छप चुका है।नन्दकिशोर जी ने लिखा है कि वे सायकिल से अपना प्रचार करते थे और फिरोज गांधी जी के लिए पूरी सत्ता लगी थी।फिरोज गांधी जी सरकारी मेहमान थे क्योकि प्रधानमन्त्री के दामाद थे वहीं वे एक मामूली हजाम सोशलिस्ट वर्कर। वे लिखते हैं कि हम दोनों लोग आमने-सामने लड़ रहे थे लेकिन फिरोज गांधी जी रोजाना नन्दकिशोर जी को रात में ढुँढवा कर बुलवाते थे और साथ में चाय पिलाते थे। चाय खुद इंदिरा जी बनाती थीं । एक यह भी लोकतांत्रिक चरित्र था और एक हमारे भाई सतेंद्र पाल सिंह जी का लोकतांत्रिक चरित्र है कि वे मुझे विगत 20-22 वर्ष से रोजाना मारते हैं?

भाई सतेंद्र पाल जी ! मैं आपसे 1995 में हारा था,2000,2005 में जीता था पर हार और जीत को एक समान लिया। आप भी कुछ ऐसा ही बनिए। यदि पुराने जीवन से बाहर नही निकल पा रहे हैं तो सुकून नही रहेगा। पुरानी आपराधिक केंचुल उतार फेंकिए,लोगो से बिना काम के भी स्नेहपूर्वक मिलिए, बदले की भावना न रखिये,जिसने वोट दिया उसका भी भला, जिसने वोट नही दिया उसका भी भला का विचार आत्मसात करिये। माना कि आप आपराधिक जगत के सितारे रहे हो पर कोई अजर-अमर नही है अंतर केवल इतना है कि मैं 47 की उम्र में मारा जाऊं और आप 80-90 तक जी लो,पर मरना तो साश्वत सत्य है।

खैर भाई सतेंद्र पाल सिंह जी! डरने से बेहतर मरना है और बेशक आप मार देना पर मेरा संघर्ष जारी रहेगा।

*चंद्रभूषण सिंह यादव 

(इसे क्या कहियेगा इसमें समाजवादी पार्टी के नुमाइंदे और चापलूसों की जिस जमात से अवाम के उन होनहार और ईमानदार लोगों को लड़ना हो कैसे लड़ेंगे ?)

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