रविवार, 8 नवंबर 2015

खुला पत्र आदरणीय प्रधानमंत्री जी के नाम !


आदरणीय प्रधानमंत्री जी !

आपने देश को सपना दिखाया, आपके सपने पर देश झूम उठा, लगा ये कोई मसीहा आ गया है जो महँगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी एवं विकास की कोई जादुई छड़ी लेकर आया है जिससे जन के सारे कष्ट ख़त्म कर देगा ।
पर अवाम को क्या पता था कि आप पूरे मुल्क को गुजरात के अजेण्डे पर ले जाने को बेचैन हैं, गुजरात के दबे कुचले लोग, दबंग और मालदार गुजराती, पाटीदार यानी पटेल लोगों की जमात जब देश के बदहाल लोगों की जातिवाद जमात को नहीं समझती है ? यह जातियां जिनके आक्रामक दुर्गुणों से सदियों से संघर्ष कर रही हैं, जिन्होंने इनका हक़ हड़पा हुआ है आप उनके पक्षधर होकर आये हो अब यह इनको पता चल गया है।


चित्र ;डॉ लाल रत्नाकर 

दिल्ली का बुद्धिजीवी तो आपके उस स्वरूप को पहले ही समझ लिया था जिसने आपको दिल्ली के चुनाव में ही ख़ारिज कर दिया था आपके दम्भ को।

बिहार के समाज को सामाजिक समरसतावाद के मार्ग पर लाने वाले लालू ने आपकी आँख फिर खोली है। क्योंकि उन्हें भी जातीवादियों ने कुछ समय तक घेर लिया था जिसपर सजायाफ्ता लालू बना दिया है उनको ! अब शायद ही वे उनके चक्कर में आएं ?

नितीश की कमजोरियों को आपकी पार्टी के लोग बखूबी समझते होंगे जिन्होंने आपको जो फीड बैक दिया होगा उतना ही आकलन कर आप बिहार को समझने में गलती की। जितना मैं आपके विषय में जान पाया हूँ आप नेक भी हैं, इमानदार भी हैं और स्वाभिमानी निरंकुश भी, लेकिन आपकी ये ईमानदारी समाज के उस ईमानदारों से मेल खाती है जो सदियों से ईमानदारी से पक्षपाती रहे है। आपके पक्षपात का भरपूर लाभ देश की 15%आवादी को मिलने का जो रूप दिखने लगा है, वह भारत के प्रधानमंत्री का नहीं हो सकता।


आपने अनेकों लोकप्रिय कार्यक्रमों के बहाने चिटफ़ंड कम्पनियों की तरह देश के ग़रीबों की जेब साफ़ करने का उक्त योजनाएं काम कर रही हैं, जबकि बिदेशों में संचित कालान्तर से फँसा कालाधन की ख़बर तक नहीं दी है अवाम को आपने ।


संभव है आपके हितैषि शहरी वर्ग के लोग हो सकते हैं जिनके लिए स्मार्ट सिटी जैसी योजनाएं बना रहे हैं जो सदियों से देश के अधिकांश संसाधनों के मालिक हैं और होना चाहते हैं, यह काम कांग्रेस ने चुपके से  आप खुल्लम खुल्ला कर रहे हो ? येन केन प्रकारेन शहर तो देश किपुंजी का मोटा हिस्सा वैसे भी हडपे हुए है। पर गॉव को तो आप लूटने का ही प्लान लेकर आये है न । आपके मन में स्मार्ट गाँव क्यों नहीं आता ?

प्रधानमंत्री जी आपने जो मंत्री बनाये हैं ये सारे आपके दुश्मन हैं यही सब तब साबित होंगे जब आप इन्हे आज़ादी देंगे, अगर आप राष्ट्रीय हित में इनका मूल्याँकन करेंगे तो पाएंगे की किस तरह के लोग हैं, रही बात नियति की तो बिहार के चुनाव में भारत के प्रधानमंत्री को सुनते हुये ये लगा ही नहीं कि यह हमारे प्रधानमंत्री बोल रहे हैं। आख़िर लालू यादव के लोगों को भी तो लगना चाहिये था कि उनके प्रधानमंत्री उनके द्वार आये हैं।

आप जिन अपराधियों जातिवादियों के लिये वोट माँगने गये थे वे ही तो बिहार में सरकार बनते, मुख्यमंत्री और मंत्री बनते ? प्रधानमंत्री जी आपका इतनीबार जाना लोगों को रास नहीं आया, आपकी बात और थी आप को जब पीएम बनना था तब लोग आपकी सुन लिये थे।

पर आप किसकी ओर खडे हैं प्रधानमंत्री जी, यह जनता को दिखने लगा है जो इस अवाम का हक़ खाये हैं, जिन्हें जनता ने सरकार से बाहर खदेड़ दिया था उनकी फ़ौज पर आपकी आपके पिछड़ों दलितों की योजनायें कामयाब नहीं होंगी, अब देर होती जा रही है अन्यथा आपने नेता जी (मुलायम सिंह यादव) से नेह दिखाया वे आपके साथ खडे हो गये नई नई रिस्तेदारी को भी ध्यान नहीं रखा, उन पर परिवारवादी होने का आरोप भी धरा रह गया नई नवेली बहू के दोनों भाई भी तो महगठबंधन से लड़ रहे थे, तब भी वे आपके पक्ष में खडे हुये यह समाजवादी ही कर सकता है प्रधानमंत्री जी ?

बताते हैं जवाहर लाल नेहरू समाजवादियों से घबराते थे, उनकी इज़्ज़त भी करते थे, पर नेहरू जी से बड़े होने के लिये समाजवादियों को डराने की ज़रूरत नहीं है।

प्रधानमंत्री जी ! एक बात और आप हिन्दू राष्ट्र की बात सोचते हों तो उसका सबसे बड़ा नायक पिछड़ा है पर मालिक 15%\3%वाला जातिवादी वर्ग, जिसदिन उसके चंगुल से यह देश मुक्त होगा उस दिन से इसकी तरफ़ कोई नज़र उठाने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन संकट ये है कि जिस धर्म से बुद्ध को हटना पड़ा, महावीर को छोड़ना पड़ा, गुरू नानक को अलग होना पड़ा, उस धर्म से दलित विचलित है, पिछड़ा त्रस्त है उनके साथ आपके पिछड़ा होने को वे कैसे सह पा रहे होंगे।

(बहुत कुछ है पर फिर........................)
*-डॉ लाल रत्नाकर 

रविवार, 1 नवंबर 2015

मायावती ने बसपा प्रदेश कार्यालय पर पत्रकारों से बातचीत में कहा ;

UP: मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन पर मायावती ने उठाए गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि सपा सरकार ने प्रदेश की बिगड़ी कानून-व्यवस्था और ठप विकास कार्यों से ध्यान बंटाने के लिए आठ-नौ मंत्रियों को हटा दिया है।

बसपा प्रदेश कार्यालय पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार कुछ मंत्रियों को हटाकर और कुछ नए को बनाकर जैसे यह दिखाना चाहती है कि इससे कानून-व्यवस्था तुरंत ही सुधर जाएगी, भ्रष्टाचार जड़ से खत्म हो जाएगा।

मायावती ने कहा कि बर्खास्त मंत्रियों का कानून-व्यवस्था से सीधे कोई संबंध नहीं था। गृहमंत्री के नाते बिगड़ी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की है। ऐसे में नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।

दूसरा, यदि इन मंत्रियों में विभाग में कुछ गड़बड़ी या पार्टी विरोधी कार्य किया है तो फिर इसे जनता के बीच खुलासा करना चाहिए। लेकिन सपा ने अब तक ऐसा नहीं किया। इससे लगता है कि दाल में कुछ काला जरूर है।

अब सत्ता में आई तो नहीं बनवाऊंगी पार्क-स्मारक

बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि अब सत्ता मिली तो वे पार्क, स्मारक, संग्रहालय बनवाने और मूर्तियां लगवाने का काम नहीं करेंगी। पूरा ध्यान सूबे के विकास और गुंडो, माफियाओं को जेल भेजने में लगाएंगी।

मायावती ने केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की अखिलेश सरकार पर हमला बोलने के साथ ही 2017 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी सियासी रणनीति का संकेत किया।

मायावती ने कहा कि� उनकी सरकार दलित महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलती है। ऐसे में उनके नाम पर स्मारक, संग्रहालय, मूर्तियां और पार्क बनवाए जाने जरूरी थे जो पिछले शासनकाल में ही पूरा कर लिया गया। अब इसकी जरूरत नहीं रह गई है।

... तो क्या मूर्तिंयों के चलते हारे
मायावती से सवाल पूछा गया कि क्या पार्कों, मूर्तियों के निर्माण को ही वे 2012 के चुनाव में मिली हार की वजह के रूप में देखती हैं, उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की हार का कारण बसपा के खिलाफ भाजपा-कांग्रेस और सपा की अंदरूनी मिलीभगत थी। सभी ने बसपा से घबराकर उसके प्रत्याशियों के खिलाफ अपने वोट ट्रांसफर करा दिए। हालांकि हार के बावजूद उनके वोट बढ़े थे।

प्रधानमंत्री मोदी की जाति पर दिया बयान

प्रधानमंत्री मोदी की जाति पर दिया बयान
मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी पर दलित, आदिवासी और पिछड़ा विरोधी नीति अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मोदी चुनाव में लाभ लेने के लिए अपने को पिछड़ा बताते हैं। पर, उनके पिछड़े होने की सच्चाई ये है कि वह गुजरात के घांची (तेली) जाति से आते हैं। यह जाति वहां की धनवान वैश्य समाज से आती है।

पहले ये जातियां वहां अपरकास्ट में थीं। पर मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद मोदी ने इसे अपरकास्ट से कटवाकर ओबीसी सूची में डलवा दिया। इस तरह इन्होंने गुजरात की उपेक्षित पिछड़ी जाति के लोगों का हक मारने का भी गलत काम किया। इसी तरह वह दलितों के हितैषी बनने के लिए अंबेडकर और भगवान बुद्ध के रास्ते पर चलने की बात करते हैं। लेकिन उनके सारे काम दलित विरोधी है।

शंकराचार्य बुराइयां दूर कराएं, लोग फिर से बनने लगेंगे हिंदू

मायावती ने कहा है कि वह हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन इसमें वर्ण व्यवस्था में कुछ गंभीर कमियां व बुराईयां हैं जिससे दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जाता है। इसे दूर करना बहुत जरूरी है। मायावती ने कहा कि यदि इन बुराईयों को हिंदू धर्म से दूर कर दिया जाए तो फिर हिंदू धर्म को स्वीकार करने में कोई भी बुराई नहीं है।

बसपा अध्यक्ष ने कहा कि डा. अंबेडकर ने यह सुझाव काफी पहले दिया था पर शंकराचार्यों ने नहीं माना। आखिरकार बाबा साहब को बौद्ध धर्म अपनाना पड़ा। उन्होंने कहा कि वह शंकराचार्यों से फिर मांग करती हैं कि वह हिंदू धर्म में व्याप्त कमियों व बुराईयों को दूर करें तो यह बौद्ध धर्म की तरह पूरी दुनिया में फैल जाएगा। और यदि ये लोग ऐसा कर लेते हैं तो फिर हिंदू धर्म से गए लोग फिर से हिंदू धर्म में वापस आ जाएंगे। हिंदूवादी संगठनों की आबादी भी बढ़ जाएगी जिसके लिए हिंदूवादी विचार-संगोष्ठी व जनजागरण किया करते हैं।

सीबीआई दुरुपयोग से मोदी से किया आगाह

बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की जमकर आलोचना करते हुए चेतावनी दी है कि वह उनके खिलाफ सीबीआई का इस्तेमाल न करे। वरना, इसका उन्हें ही राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ेगा, फायदा उलटा बसपा का ही होगा।

मायावती ने कहा कि विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। एनआरएचएम में पिछले चार सालों में सीबीआई को कोई उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला। अब चुनाव आया है तो फिर सुबूत की बात होने लगी है। उन्होंने कहा कि ऐसा ही 2003 में एनडीए सरकार ने ताज प्रकरण में उनके खिलाफ सीबीआई का दुरुपयोग किया था। तब मुझे सुप्रीमकोर्ट से न्याय मिला।

साथ ही इसके बाद जब 2007 के चुनाव हुए तो बसपा पूर्ण बहुमत में आई। इसलिए मोदी को ध्यान रखना चाहिए कि मायावती के खिलाफ सीबीआई से दुरुपयोग से उनका सपना पूरा होने वाला नहीं है। वह इस तरह के हथकंडों से घबराने वाली नहीं हैं।

चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन लगा सकती है भाजपा

बसपा सुप्रीमो ने कहा कि प्रदेश में यह चर्चा सरगर्म है कि बिहार में भाजपा की सरकार बने या न बने लेकिन वह यूपी में सरकारी मशीनरी अपने हिसाब से चलाने के लिए चुनाव के पहले खराब कानून-व्यवस्था के नाम पर राष्ट्रपति शासन लगा देगी।

मायावती ने कहा कि चुनाव के ऐन पहले ऐसा करने से भी भाजपा को कोई फायदा नहीं होने वाला है। यदि राष्ट्रपति शासन लागू करना था तो सत्ता में आते ही करना चाहिए। यूपी में कानून-व्यवस्था शुरू से ही खराब है।

शुक्रवार, 5 जून 2015

पिछड़ी जातियों का राजनीतिक दृष्टिकोण ;

डा.लाल रत्नाकर

यदि विश्लेषण किया जाता है तो भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में पिछड़ी जातियों का राजनैतिक शासन काल, बेहद कमज़ोर लचर व अविश्वसनीय दौर कहा जायेगा।जबकि कम समय में यद्यपि दलित नेतृत्व का राजनैतिक शासन काल अधिक प्रभावी व परिवर्तनकारी। इनके कारणों की विवेचना की अनिवार्यता भारतीय राजनीति की बेहद गम्भीर ज़रूरत है, यदि अब तक के सामाजिक पहचान के मानदण्ड पुराने रहे तो अनिवार्यत: आने वाले दिन राजनैतिक सजाता के होंने चाहिये। नागपुर की सामाजिक दृष्टिकोण पर ग़ौर करें तो मोदी का नाटकीय उदय कमोवेश इसी राजनैतिक अवसान का एक प्रयोग मात्र है।
आर्थिक विषमता : इसपर सुषमा वर्मा का यह आलेख देखें।
.................................
 उदारीकरण में पिसती ग्रामीण अर्थव्यवस्था
सुषमा वर्मा|Aug 04, 2014, 12:56PM IST
उदारीकरण में पिसती ग्रामीण अर्थव्यवस्था

विश्व बैंक की प्रबंध निदेशक क्रिस्टीना लेगार्ड ने हाल ही में रहस्योद्घाटन किया है कि भारत के अरबपतियों की दौलत पिछले 15 बरस में बढ़कर 12 गुना हो गई है। गौरतलब है कि यह वही दौर है जब भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुए चंद साल ही हुए थे। उदारीकरण के दो दशक बाद शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच का फासला लगातार बढ़ता ही नहीं जा रहा बल्कि शहर फल-फूल रहे हैं तो गांव पिस रहे हैं। क्रिस्टीना के अनुसार इन मुट्ठीभर अमीरों के पास इतना पैसा है, जिससे पूरे देश की गरीबी को एक नहीं, दो बार मिटाया जा सकता है।
लेगार्ड की इस बात से पुष्टि होती है कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अपनाने का लाभ चुनिंदा अमीरों को ही मिला है, गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है तथा देश की अधिकांश संपत्ति चुनिंदा अरबपतियों की मुट्ठी में सिमटती जा रही है। नेशनल सेंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबों और अमीरों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है।
खर्चे और उपभोग के आधार पर किये गए अध्ययन में पाया गया है कि वर्ष 2000 और 2012 के बीच ग्रामीण इलाकों में रईसों के खर्चे में 60 फीसदी इजाफा हुआ जबकि गरीबों का खर्च केवल 30 प्रतिशत बढ़ा। इस दौरान शहरी इलाकों में धनवान और निर्धन के व्यय में क्रमश: 63 और 33 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। जहां वर्ष 2000 में एक अमीर आदमी का खर्च गरीब के मुकाबले 12 गुना था वहीं अब यह बढ़कर 15 गुना हो गया है।
आज शहरों के मुकाबले गांवों में महंगाई की मार ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार दाल, सब्जी, फल, तेल, दूध, चीनी और कपड़ों की कीमत देहाती इलाकों में कहीं ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में गरीबी की रेखा से नीचे जीने को मजबूर लोगों की संख्या भी अधिक है। इसका अर्थ तो यही हुआ कि आज शहरों के मुकाबले गांवों में रहने वालों की हालत कहीं दयनीय है।
वैश्वीकरण और खुली अर्थव्यवस्था की डगर पकड़ने के बाद हर कीमत पर विकास की सनक का मूल्य देश की अधिसंख्यक आबादी को चुकाना पड़ रहा है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए विकास का ऐसा मॉडल अपनाया गया है जिसमें रोजगार वृद्धि की कोई गुंजाइश नहीं है। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमृत्‍य सेन और ज्यों द्रेंज की पुस्तक 'इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन' से देश के विकास के दावों और पैमानों को गंभीर चुनौती मिलती है।
खुली और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का मोटा सिद्धांत है कि यदि गरीबों का भला करना है तो देश की आर्थिक विकास दर ऊंची रखो। इस सिद्धांत के अनुसार जब विकास तेजी से होगा तो समृद्धि आएगी और गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय जगत में आज केवल आर्थिक विकास के पैमाने को अपनाने का चलन खारिज किया जा चुका है।
किसी देश की खुशहाली नापने के लिए अब मानव विकास सूचकांक तथा भूख सूचकांक जैसे मापदंड अपनाए जा रहे हैं और इन दोनों पैमानों पर हमारे देश की हालत दयनीय है। देश में पिछले 17 वर्ष में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अधिकांश आत्महत्याओं का कारण कर्ज है जिसे चुकाने में किसान असमर्थ हैं। आज खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। इसी कारण 42 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। लेकिन विकल्प न होने के कारण वे जमीन जोतने को मजबूर है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007-2012 के बीच करीब सवा तीन करोड़ किसान अपनी जमीन और घर-बार बेचकर शहरों में आये। कोई हुनर न होने के कारण उनमें से ज्यादातर को निर्माण क्षेत्र में मजदूरी या दिहाड़ी करनी पड़ी। वर्ष 2005-2009 के दौरान जब देश की आर्थिक विकास दर आठ-नौ फीसदी की दर से कुलांचे मार रही थी। तब भी 1.4 करोड़ किसानों ने खेती छोड़ी।
इसका अर्थ यही हुआ कि आर्थिक विकास का फायदा किसानों को नहीं मिला और न ही वहां रहने वाली आबादी की आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ। अर्थशास्त्रियों के अनुसार गांवों से शहरों की ओर पलायन आर्थिक विकास और तरक्की का सूचक होता है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत की आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी, लेकिन हमारे शहरीकरण की प्रक्रिया पेचीदा है।
यह सर्वमान्य सत्य है कि बेहतर रोजगार की तलाश में ही आदमी गांव से शहर आता है, पर नौकरी न मिलने या धंधा न जमने पर वही आदमी गांव लौटने को मजबूर हो जाता है। हमारा विकास का मॉडल रोजगार विहीन है। इसमें नई नौकरियों की गुंजाइश बहुत कम है। इसी कारण सन् 2012-2014 के बीच डेढ़ करोड़ लोग शहर छोड़कर गांव लौटने को मजबूर हुए। 
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 58.2 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर थी जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान महज 14.1 प्रतिशत था। इसका यह भी अर्थ है कि आधी से अधिक जनसंख्या की आमदनी बहुत कम है। दूसरी तरफ शहरों में रहने वाले चंद लोगों ने सारी आय और संपत्ति पर कब्जा जमा रखा है। पिछले एक दशक में सरकार ने जन-कल्याणकारी योजनाओं को 110 खरब रुपए की सब्सिडी दी।
अकेले ईंधन पर वर्ष 2013 में 1.30 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई, लेकिन संपन्‍न बीस फीसदी तबके को गरीब बीस प्रतिशत आबादी के मुकाबले छह गुना ज्यादा सब्सिडी मिली। एक उदाहरण से यह बात बेहतर समझी जा सकती है। सरकार एक लीटर डीजल पर नौ रुपए की सब्सिडी देती है, लेकिन इस सस्ते डीजल की 40 प्रतिशत खपत महंगी निजी कारों, उद्योगों, जनरेटरों आदि में होती है।
गरीब किसान के हिस्से बहुत कम डीजल आता है। दूसरी तरफ बड़े उद्योगों और कॉरपोरेट घरानों द्वारा लिए जाने वाले अरबों रुपए के कर्जे का कड़वा सच है। सन् 2013 तक सार्वजनिक बैंकों से लिया 12 खरब रुपए का कर्जा उद्योगों ने नहीं चुकाया। ऋण न चुकाने वालों की जमात में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनका नाम अरबपतियों की सूची में शामिल है।
अमृत्‍य सेन के अनुसार 'मार्किट मेनिया' के लोभ और ' मार्किट फोबिया' के भय से निकले बिना देश का कल्याण असंभव है। भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य मूल मुद्दे हैं और इन्हें मुहैया कराना हर सरकार की पहली जिम्मेदारी है। जो सरकार इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पाती उसका सत्ता में बने रहना कठिन होता है।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और अर्थव्‍यवस्‍था से जुड़े मामलाें की जानकार हैं।

गुरुवार, 14 मई 2015

चन्द्र भूषण जी की पोस्ट

एकात्म मानवतावाद

कुछ विद्वान मित्रों का मानना है कि भाजपा की तरफ आम लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है और वह इसलिए कि उन लोगों के मन में उनमें  हिंदू होने का म...