शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

मंथन ;


हाँ!मंडल से हो सकती है कमंडल की काट 

एच एल दुसाध 

सोलहवीं लोकसभा चुनाव बाद जिस तरह मोदी की सुनामी में सामाजिक न्याय की राजनीति जमींदोज हुई है उससे बहुजन समाज के जागरूक लोग उद्भ्रांत हैं.उन्हें समझ में नहीं आ रहा है यह पटरी पर आएगी तो कैसे!.ऐसी निराशाजनक स्थिति में बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद(यू) के नीतीश कुमार के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पक रही है,उससे सम्पूर्ण भारत में सामाजिक न्याय के समर्थकों में नए सिरे से उत्साह का संचार हुआ है.इसमें मुख्य भमिका में हैं लालू प्रसाद यादव,जो नीतीश के संकटमोचक बनकर सामाजिक न्याय की राजनीति की सम्भावना के नए द्वार खोल दिए हैं.
14 जून को बीजेपी से त्रस्त नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की दाव पर लगी साख को बचाने तथा अपने राजनीतिक कैरियर पर आये संकट से उबरने के लिए खुलेआम अपील की कि ,‘लालू प्रसाद जी राज्य सभा में जद(यू)उम्मीदवारों का समर्थन करें ताकि जीतन माझी सरकार को अस्थिर करने की बीजेपी की साजिश नाकाम हो जाय’.जिस नीतीश ने 20 साल पहले लालू की खिलाफत करते हुए अपने राजनीतिक कैरियर को बुलंदी पर पहुँचाया,सोलहवीं लोकसभा चुनाव बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में उन्हें उन्ही के समक्ष झुकने के लिए बाध्य कर दिया.मौका माहौल देखते हुए लालू ने भी उन्हें निराश नहीं किया और 18 जून को उनकी पार्टी के 21 विधायकों ने जद (यू) के दो उम्मीदवारों को अपना समर्थन दे दिया जिससे जीतन सरकार पर आया संकट टल गया.लालू की संकटमोचक भूमिका के आभार तले दबी माझी सरकार ने प्रतिदान स्वरूप 19 जून से 1 जुलाई के बीच भारी प्रशासनिक फेरबदल करने के साथ ही सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को 6 निजी सहायक रखने की स्वीकृति दे दी.इससे सर्वाधिक लाभ लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को मिला.
दरअसल 18 वीं लोकसभा चुनाव में जिस तरह लालू –नीतीश की पार्टी मोदी की सुनामी में उड़ी है,उससे एक दूसरे के निकट आना दोनों की मज़बूरी बन गयी है.दोनों को इस बात का इल्म है कि गत लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्ववाली राजग ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कुल 39 प्रतिशत अर्थात 1.3 करोड़ वोट ही हासिल किये.वहीँ राजग के मुकाबले राजद-कांग्रेस को 1.2 करोड़ और जद यू को 61 लख वोट मिले,जो कुल वोट का 47 प्रतिशत था.अगर राजद-जद (यू) और कांग्रेस-एनसीपी साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो गैर-राजग की सीटें 9 के बजाय 28 होतीं.इस चुनावी गणित को ध्यान में रखकर ही लालू-नीतीश चुनावी तालमेल की ओर बढ़ रहे हैं.उनका यह तालमेल दम तोड़ती सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए कितनी प्रभावी होता है इसका परीक्षण बिहार में निकट भविष्य में अनुष्ठित होने जा रहे 10 विधानसभा उप-चुनाव में हो जाएगा.
लालू-नीतीश की निकटता को लेकर बहुजन समाज के जागरूक लोग अभी से दूरगामी परिणाम का सपना देखने लगे हैं.उनका ख्याल है कि दोनों की बढती एकता यदि सामाजिक न्याय की राजनीति में नई जान फूंकती है तो उसका असर यूपी पर पड़ेगा जिससे सामाजिक न्याय की राजनीति के दिन बहुरने में देर नहीं लगेंगे.सामाजिक न्याय की राजनीति की नई संभावना का द्वारोन्मोचन करने वाले उसी लालू प्रसाद यादव ने एक नई बात कहकर उसकी सम्भावना को और उज्ज्वलतर कर दिया है.
उन्होंने कुछ दिन पूर्व यह कहकर सनसनी फैला दी कि कमंडल की काट मंडल से ही हो सकता है.उन्होंने मंडलवादी राजनीति को हवा देने के लिए यह मांग भी उठा दिया कि सरकार सरकारी ठेकों और निजी क्षेत्र सहित तमाम विकास योजनाओं में दलित,आदिवासी,पिछड़े,अतिपिछड़ों और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण दे.साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकार संसाधन और तकनीकि जानकारी सुलभ कराये.इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों के समक्ष सड़कों पर उतरने का भी आह्वान कर डाला.उनकी घोषणा जहां राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता पाई वहीँ सोशल मीडिया पर भारी स्वागत हुआ.काबिले गौर है कि लोकसभा चुनाव-2009 में हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इसी तरह 25 जून,2009 को यूपी के हर प्रकार के सरकारी ठेकों में 23 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा किया था.किन्तु उनसे गलती यह हुई कि उन्होंने वह आरक्षण सिर्फ एससी/एसटी के लिए घोषित किया था.शुक्र है कि लालू प्रसाद यादव ने मायावती वाली गलती नहीं दोहराया.खैर!बिहार में लालू प्रसाद यादव ने जो पहलकदमी की है उसे राजनीतिक विश्लेषक जातिवादी राजनीति के नए सिरे से उभार के रूप में देख रहे हैं.बहरहाल हिंदी पट्टी के यूपी-बिहार में लालू प्रसाद यादव की यह पहलकदमी क्या रंग लाती है,यह तो भविष्य के गर्भ में है.किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि शर्तियातौर पर कमंडलवादी राजनीति की काट मंडलवादी राजनीति ही हो सकती है. 
मंडल की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इस दौर में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की जाति चेतना के चलते जहाँ जन्मजात सुविधासंपन्न वर्ग के लोग राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हुए,वहीँ साधारण पृष्ठभूमि से उभरे माया-मुलायम,लालू-पासवान-नीतीश इत्यादि राजनीति में सुपर स्टार की हैसियत का उपभोग करने लगे.मंडल उत्तरकाल में शक्ति के स्रोतों से सदियों से वंचित किये गए लोगों की बेहतरी के लिए कुछ कहना/करना मीडिया द्वारा ‘जातिवाद’के रूप में निन्दित रहा.15 वीं लोकसभा चुनाव के आते-आते जाति चेतना के चलते महाबली बने लोग पीएम बनने के लोभ में ‘जाति-मुक्त’ कहलाने की कसरत करने लगे.इसके तहत वे जहाँ ‘तिलक तराजू...’और ‘भूराबाल ...’जैसे नारों से पल्ला झाड़ने लगे, वहीँ प्रभुजातियों के गरीबों को आरक्षण दिलाने के लिए एक दूसरे से प्रतियोगिता भी करने लगे.उनके इस भावांतरण से खिन्न वंचित जातियों ने 15वीं लोकसभा चुनाव में उनसे मुंह मोड़ लिया.अगर माया-मुलायम-लालू इत्यादि ने उस हार से सबक लेकर सोलहवीं लोकसभा चुनाव में दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यकों इत्यादि के लिए ठेकों के साथ निजी क्षेत्र की नौकरियों,सप्लाई,डीलरशिप इत्यादि समस्त आर्थिक गतिविधियों में ही वाजिब हिस्सेदारी की मांग उठाया होता,केंद्र के सत्ता की बागडोर निश्चय ही कमंडलवादियों के हाथ में नहीं जाती.ऐसे में बहुजन नायक/नायिका यदि नए सिरे से जातिवादी अर्थात मंडलवादी राजनीति को हवा देते हैं,कमंडलवादी राजनीति को जमींदोज होते देर नहीं लगेगी.
स्मरण रहे मंडल आयोग की रपट घोषित होते ही बहुजनो में जो ‘जाति चेतना’ का लम्बवत विकास हुआ,’धार्मिक चेतना’ द्वारा उसकी काट के लिए ही संघ परिवार व उसके राजनीतिक संगठन भाजपा ने राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की शुरुआत की .इस आन्दोलन को महान भाजपाई अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वाधीनोत्तर सबसे बड़ा आन्दोलन कहकर प्रशंसा की थी.राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये देश की हजारो करोड़ की सम्पदा और असंख्य लोगों की प्राण-हानि करा कर ही संघ का राजनीतिक एकाधिक बार केंद्र की सत्ता पर कब्ज़ा जमाया.किन्तु जाति चेतना के राजनीतिकरण की काट के लिये जिस भाजपा ने धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण का अभियान चलाया,वह भाजपा धार्मिक चेतना के अभियान को कभी मंद नहीं पड़ने दी.पर,बहुजन नायक/नायिका पीएम बनने की लालच में जाति चेतना के अभियान से दूर हटते गए.अगर संघ के धार्मिक-चेतना अभियान से सबक लेते हुए जाति –चेतना के राजनीतिकरण को बलिष्ठतर करने का निरंतर प्रयास किया होता,आज सत्ता की बागडोर किसी आंबेडकरवादी या लोहियावादी के हाथ में होती.किन्तु देर आये,दुरुस्त आये की नीति अनुसरण करते हुए यदि अब से भी लालू-नीतीश,माया-मुलायम जाति चेतना के राजनीतिकरण में सर्वशक्ति लगाते हैं सदियों के विशेषाधिकारयुक्त और सुविधाभोगी कमंडलवादियों के लिए राज-सत्ता दूर मृग-मरीचका बनकर रह जाएगी.
दिनांक:18 जुलाई,2014..(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.) 

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