शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

मंथन ;


हाँ!मंडल से हो सकती है कमंडल की काट 

एच एल दुसाध 

सोलहवीं लोकसभा चुनाव बाद जिस तरह मोदी की सुनामी में सामाजिक न्याय की राजनीति जमींदोज हुई है उससे बहुजन समाज के जागरूक लोग उद्भ्रांत हैं.उन्हें समझ में नहीं आ रहा है यह पटरी पर आएगी तो कैसे!.ऐसी निराशाजनक स्थिति में बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद(यू) के नीतीश कुमार के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पक रही है,उससे सम्पूर्ण भारत में सामाजिक न्याय के समर्थकों में नए सिरे से उत्साह का संचार हुआ है.इसमें मुख्य भमिका में हैं लालू प्रसाद यादव,जो नीतीश के संकटमोचक बनकर सामाजिक न्याय की राजनीति की सम्भावना के नए द्वार खोल दिए हैं.
14 जून को बीजेपी से त्रस्त नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की दाव पर लगी साख को बचाने तथा अपने राजनीतिक कैरियर पर आये संकट से उबरने के लिए खुलेआम अपील की कि ,‘लालू प्रसाद जी राज्य सभा में जद(यू)उम्मीदवारों का समर्थन करें ताकि जीतन माझी सरकार को अस्थिर करने की बीजेपी की साजिश नाकाम हो जाय’.जिस नीतीश ने 20 साल पहले लालू की खिलाफत करते हुए अपने राजनीतिक कैरियर को बुलंदी पर पहुँचाया,सोलहवीं लोकसभा चुनाव बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में उन्हें उन्ही के समक्ष झुकने के लिए बाध्य कर दिया.मौका माहौल देखते हुए लालू ने भी उन्हें निराश नहीं किया और 18 जून को उनकी पार्टी के 21 विधायकों ने जद (यू) के दो उम्मीदवारों को अपना समर्थन दे दिया जिससे जीतन सरकार पर आया संकट टल गया.लालू की संकटमोचक भूमिका के आभार तले दबी माझी सरकार ने प्रतिदान स्वरूप 19 जून से 1 जुलाई के बीच भारी प्रशासनिक फेरबदल करने के साथ ही सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को 6 निजी सहायक रखने की स्वीकृति दे दी.इससे सर्वाधिक लाभ लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को मिला.
दरअसल 18 वीं लोकसभा चुनाव में जिस तरह लालू –नीतीश की पार्टी मोदी की सुनामी में उड़ी है,उससे एक दूसरे के निकट आना दोनों की मज़बूरी बन गयी है.दोनों को इस बात का इल्म है कि गत लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्ववाली राजग ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कुल 39 प्रतिशत अर्थात 1.3 करोड़ वोट ही हासिल किये.वहीँ राजग के मुकाबले राजद-कांग्रेस को 1.2 करोड़ और जद यू को 61 लख वोट मिले,जो कुल वोट का 47 प्रतिशत था.अगर राजद-जद (यू) और कांग्रेस-एनसीपी साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो गैर-राजग की सीटें 9 के बजाय 28 होतीं.इस चुनावी गणित को ध्यान में रखकर ही लालू-नीतीश चुनावी तालमेल की ओर बढ़ रहे हैं.उनका यह तालमेल दम तोड़ती सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए कितनी प्रभावी होता है इसका परीक्षण बिहार में निकट भविष्य में अनुष्ठित होने जा रहे 10 विधानसभा उप-चुनाव में हो जाएगा.
लालू-नीतीश की निकटता को लेकर बहुजन समाज के जागरूक लोग अभी से दूरगामी परिणाम का सपना देखने लगे हैं.उनका ख्याल है कि दोनों की बढती एकता यदि सामाजिक न्याय की राजनीति में नई जान फूंकती है तो उसका असर यूपी पर पड़ेगा जिससे सामाजिक न्याय की राजनीति के दिन बहुरने में देर नहीं लगेंगे.सामाजिक न्याय की राजनीति की नई संभावना का द्वारोन्मोचन करने वाले उसी लालू प्रसाद यादव ने एक नई बात कहकर उसकी सम्भावना को और उज्ज्वलतर कर दिया है.
उन्होंने कुछ दिन पूर्व यह कहकर सनसनी फैला दी कि कमंडल की काट मंडल से ही हो सकता है.उन्होंने मंडलवादी राजनीति को हवा देने के लिए यह मांग भी उठा दिया कि सरकार सरकारी ठेकों और निजी क्षेत्र सहित तमाम विकास योजनाओं में दलित,आदिवासी,पिछड़े,अतिपिछड़ों और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण दे.साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकार संसाधन और तकनीकि जानकारी सुलभ कराये.इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों के समक्ष सड़कों पर उतरने का भी आह्वान कर डाला.उनकी घोषणा जहां राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता पाई वहीँ सोशल मीडिया पर भारी स्वागत हुआ.काबिले गौर है कि लोकसभा चुनाव-2009 में हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इसी तरह 25 जून,2009 को यूपी के हर प्रकार के सरकारी ठेकों में 23 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा किया था.किन्तु उनसे गलती यह हुई कि उन्होंने वह आरक्षण सिर्फ एससी/एसटी के लिए घोषित किया था.शुक्र है कि लालू प्रसाद यादव ने मायावती वाली गलती नहीं दोहराया.खैर!बिहार में लालू प्रसाद यादव ने जो पहलकदमी की है उसे राजनीतिक विश्लेषक जातिवादी राजनीति के नए सिरे से उभार के रूप में देख रहे हैं.बहरहाल हिंदी पट्टी के यूपी-बिहार में लालू प्रसाद यादव की यह पहलकदमी क्या रंग लाती है,यह तो भविष्य के गर्भ में है.किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि शर्तियातौर पर कमंडलवादी राजनीति की काट मंडलवादी राजनीति ही हो सकती है. 
मंडल की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इस दौर में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की जाति चेतना के चलते जहाँ जन्मजात सुविधासंपन्न वर्ग के लोग राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हुए,वहीँ साधारण पृष्ठभूमि से उभरे माया-मुलायम,लालू-पासवान-नीतीश इत्यादि राजनीति में सुपर स्टार की हैसियत का उपभोग करने लगे.मंडल उत्तरकाल में शक्ति के स्रोतों से सदियों से वंचित किये गए लोगों की बेहतरी के लिए कुछ कहना/करना मीडिया द्वारा ‘जातिवाद’के रूप में निन्दित रहा.15 वीं लोकसभा चुनाव के आते-आते जाति चेतना के चलते महाबली बने लोग पीएम बनने के लोभ में ‘जाति-मुक्त’ कहलाने की कसरत करने लगे.इसके तहत वे जहाँ ‘तिलक तराजू...’और ‘भूराबाल ...’जैसे नारों से पल्ला झाड़ने लगे, वहीँ प्रभुजातियों के गरीबों को आरक्षण दिलाने के लिए एक दूसरे से प्रतियोगिता भी करने लगे.उनके इस भावांतरण से खिन्न वंचित जातियों ने 15वीं लोकसभा चुनाव में उनसे मुंह मोड़ लिया.अगर माया-मुलायम-लालू इत्यादि ने उस हार से सबक लेकर सोलहवीं लोकसभा चुनाव में दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यकों इत्यादि के लिए ठेकों के साथ निजी क्षेत्र की नौकरियों,सप्लाई,डीलरशिप इत्यादि समस्त आर्थिक गतिविधियों में ही वाजिब हिस्सेदारी की मांग उठाया होता,केंद्र के सत्ता की बागडोर निश्चय ही कमंडलवादियों के हाथ में नहीं जाती.ऐसे में बहुजन नायक/नायिका यदि नए सिरे से जातिवादी अर्थात मंडलवादी राजनीति को हवा देते हैं,कमंडलवादी राजनीति को जमींदोज होते देर नहीं लगेगी.
स्मरण रहे मंडल आयोग की रपट घोषित होते ही बहुजनो में जो ‘जाति चेतना’ का लम्बवत विकास हुआ,’धार्मिक चेतना’ द्वारा उसकी काट के लिए ही संघ परिवार व उसके राजनीतिक संगठन भाजपा ने राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की शुरुआत की .इस आन्दोलन को महान भाजपाई अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वाधीनोत्तर सबसे बड़ा आन्दोलन कहकर प्रशंसा की थी.राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये देश की हजारो करोड़ की सम्पदा और असंख्य लोगों की प्राण-हानि करा कर ही संघ का राजनीतिक एकाधिक बार केंद्र की सत्ता पर कब्ज़ा जमाया.किन्तु जाति चेतना के राजनीतिकरण की काट के लिये जिस भाजपा ने धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण का अभियान चलाया,वह भाजपा धार्मिक चेतना के अभियान को कभी मंद नहीं पड़ने दी.पर,बहुजन नायक/नायिका पीएम बनने की लालच में जाति चेतना के अभियान से दूर हटते गए.अगर संघ के धार्मिक-चेतना अभियान से सबक लेते हुए जाति –चेतना के राजनीतिकरण को बलिष्ठतर करने का निरंतर प्रयास किया होता,आज सत्ता की बागडोर किसी आंबेडकरवादी या लोहियावादी के हाथ में होती.किन्तु देर आये,दुरुस्त आये की नीति अनुसरण करते हुए यदि अब से भी लालू-नीतीश,माया-मुलायम जाति चेतना के राजनीतिकरण में सर्वशक्ति लगाते हैं सदियों के विशेषाधिकारयुक्त और सुविधाभोगी कमंडलवादियों के लिए राज-सत्ता दूर मृग-मरीचका बनकर रह जाएगी.
दिनांक:18 जुलाई,2014..(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.) 

सोमवार, 14 जुलाई 2014

मंथन

भारतीय जनता पार्टी और डॉ. उदित राज

-ईश्वरी प्रसाद

उदित राज ने एलान किया है कि दलित समुदायों के लिए समय आ गया है कि वे भारतीय जनता पार्टी में शरीक होकर अपनी मौलिक स्थिति और मानवीय गरिमा को हासिल करें। यह एक सनसनी खेज घोषणा है। प्रचलित धारणा है कि भाजपा का संवैधानिक आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जिसका लक्ष्य भारत में रूढ़िवादी-ब्राह्मणवादी प्रतिक्रियावादी राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करना है। यह दलित राजनीति के लक्ष्यों के विपरीत है जो श्रम की श्रेष्ठता को स्थापित कर देश के सारी आजादी को सम्मान नागरिकता का दर्जा दिलाना चाहता हैं। इसलिए उदित राज के बयान को देश के ऐतिहासिक अनुभव की पृष्ठिभूमि में मूल्याँकन किया जाना चाहिए। दलितों के संदर्भ में देश को बहुत सारे कड़वे अनुभव हैं पहला, इस देश में दलितों को हजारों वर्षों से उपेक्षित और वंचित रखा गया है।

लेकिन जातिप्रथा आधारित जो घोषणा व्यवस्था कायम की गयी, वह अद्वितीय, स्थायी और कठोरतम है। आज तक इस व्यवस्था को तोड़ने की कोई निर्णायक क्रांति नहीं हुई। इसके खिलाफ होने वाले विद्रोहों को अपने में पचा लेने की भारत की जाति प्रथा में असीम क्षमता हैं। दूसरा, महात्मा ज्योतिबा फूले से चलता आ रहा दलित संघर्ष बाबासाहेब अम्बेदकर और कांशीराम से होता हुआ मायावती तक पहुँचा है। अम्बेदकर का दलित विद्रोह और कांशीराम का बहुजन आज ब्राह्मणवादियों के भरोसे मायावती का दलित हुजूम आगे बढ़ रहा है। दलितों की स्वतंत्र ताकत को मायावती ने समाप्त कर दिया है। 
तीसरा, भाजपा की सरकार ने भी दलितों के लिए कुछ नहीं किया। वाजपेयी ने बैंकटैया कमीशन (2002) और भूरिया कमीशन (2004) में गठित किया था। लेकिन इसके सिफारिशों पर कभी अमल नहीं हुआ। भाजपा जब सŸाा में आती है तो शहरों का विकास और परम्परागत समाज पर जोर दिया जाता है। इस तथ्यों के बावजूद भी उदित राज ने बीजेपी में भरोसा जताया है, इसका मुख्य वजह ऐसा लगता है कि ब्राह्मणवादी कारण होना तथा नरेन्द्र मोदी में नये राष्ट्र के निर्माण की संभावना मालूम पड़ रही है। जरूरत है उनके इस घोषणा पर गहराई से विचार हो।
 उदित राज को शुरु से ही कुछ जाति समूहों के सामाजिक जीवन के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने की तमन्ना रही है। इसीलिए उन्होंने सरकारी नौकरी के ऊँचे ओहदे को छोड़कर 2003 में एक ‘इंडियन जस्टिस पार्टी’ की स्थापना की। उन्होंने महसूस किया कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को समाप्त किए बिना देश गौरवशाली नहीं हो सकता। यहाँ के मनीषियों ने ऐसा समाजिक ढाँचा की स्थापना की जिसकी कई विशेषताएं हैं। शारीरिक श्रम की अवहेलना, समाज के क्रिश्चियन मानवीय समूहों को खास व्यवसाय से बाँधना और हर व्यक्ति के सामाजिक स्थान को उसके जन्म से निर्धारित करना। भारत के पारम्परिक जीवन में सड़ रही चीजें बदल सकती है लेकिन उसका ओहदा और व्यवसाय नहीं। दुनिया मे ंअन्याय के अनेक तरीकों का उदाहरण हैं लेकिन भारत के मनीषियों ने जिस सामाजिक व्यवस्था का अनुसंधान किया, वह चिर स्थायी और अ़िद्वतीय है। उदित राज का संकल्प है कि श्रम की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया जाय और यहाँ की पूरी आबादी को लोकतंत्र के तहत समान नागरिकता का दर्जा दिलाया जाय। उनके लक्ष्यों को किसी के भाषा में यों रख सकते हैं-
हम मेहनतकश जग वालों से अब अपना हिस्सा माँगेेगे!!
एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया माँगेगे!!
ऐसे विचार वाले उदित राज के वर्तमान राजनीतिक विचार को इसी परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया जाना चाहिए। कहाँ तक उनका विचार-दलितों को बीजेपी में शामिल कराने में सफल होगा, इस पर चर्चा होनी चाहिए। उदितराज एक देशभक्त है। इनकी देशभक्ति सुधारवादी, मानवतावादी और मेहनतकशवादी है।
 लोकसभा के चुनाव अभियान के दौरान नरेन्द्रमोदी ने अपने राजनीतिक चरित्र का जो प्रदर्शन किया, उससे दलितों और पिछड़ों को एक नये भारत की उम्मीद बनी है। पिछले 70 वर्षों से चलता आ रहा भारत नीचली जातियों के लिए एक झूठा सपना के सिवा कुछ नहीं था। दबे लोगों को एक नया भारत के निर्माण की सम्भावना मोदी के भाषणों में महसूस हुआ है। भारत के विकास के मानचित्र में किसानों द्वारा आत्महत्या, भष्टाचार का अन्तहीन स्वरूप आर्थिक गैरबराबरी का बढ़ता दायरा और काले धन का 5 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में 50 प्रतिशत होना गरीबों और नीचली जातियों के लिए शोषण का औजार बना हैं। मोदी के भाषणों ने दो स्तरों पर दलितों और पिछड़ों को अपनी और आकर्षित किया। पहला,, मोदी स्वयं ही मेहनतकश परिवार से आते हैं। चाय बेचकर जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति दलितों के जीवन से एकाकार हो सकता है। काँग्रेस वालों ने चाय बेचने वाले की यह कहकर खिल्ली उड़ाई कि निचली जाति से आया व्यक्ति प्रधानमंत्री की गद्दी कैसे सम्भाल सकता है। कुछ नेताओं ने उसे नीच कहकर भी संबोधित किया।
 दूसरा, मोदी ने अपने भाषणों में कहा कि आने वाला दशक दलितों और पिछड़ों के लिए सम्भावनाओं से भरा बना होगा। यद्यपि भाजपा के घोषणा पत्र में इस आशय पर कोई जोर नहीं था। दलितों को लगा कि यदि यह प्रधानमंत्री हुआ तो यह भाजपा से हटकर उनके लिए काम करेगा। इसीलिए नारा बुलंद किया ‘अबकी बार, मोदी सरकार’। कुछ भाजपा के नेताओं ने मोदी की लहर को भाजपा लहर बताया, ये गलत था। लोगों में मोदी के प्रति आस्था बनी रही। नतीजतन 272 के लक्ष्य के जगह पार्टी को 282 का आँकड़ा हासिल हुआ। 
 भारत का संविधान निकम्मा साबित हुआ है। संविधान ने अछूतप्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया। इसके पालन के लिए कानून भी बनाए गए हैं। लेकिन यह प्रथा 70 वर्ष के बाद आज भी चल रही है। हर्ष मान्दर ने एक लेख में लिखा है -‘दस राज्यों में ग्रामीण इलाके के ये अछूत प्रथा के अध्ययन के दौरान हमलोगों ने पाया कि आज भी तीन में से एक और कहीं-कहीं तो दो में से एक स्कूल में दलित बच्चों को क्लास में पीछे अलग बैठाने के लिए तथा दूसरी पंक्ति में अलग थाली में खाना खाने के लिए बाध्य किया जाता है। कुछ शिक्षक इन बच्चों से फर्श और शौचालय भी साफ कराते हैं जो ऊँची जाति के बच्चों से नहीं कराये जाता। ’अछूत प्रथा का प्रचलन का आलम यह है कि महाराष्ट्र के शारदा गाँव के 17 वर्ष के दलित बालक की हत्या इसीलिए हुई कि वह ऊँची जाति की एक लड़की से बात करने की हिम्मत की थी। यह संविधान की कमजोरी थी कि उसने अछूतपन को तो गैर कानूनी किया लेकिन जातिप्रथा को अक्षूण्ण रखा, उसे गैर कानूनी घोषित नहीं किया। यह एक धोखा था कि संविधान व्यक्ति और राष्ट्र से सीधा सम्बंध मानता है लेकिन इन दोनों के बीच के जाति प्रथा के चरित्र को छोड़ दिया। इसी के साथ न्याय व्यवस्था के खोखलापन का खुलासा पटना हाईकोर्ट के 16 अप्रैल 2012 के फैसला से होता है। बिहार के जहानाबाद के बयानी टोला मे ं23 दलितों की नृशंश हत्या हुई थी। यह सवर्ण जाति के रणवीर सेना द्वारा हुआ था। इसमें 11 महिलाएँ, 6 बच्चे और 4 जवान मारे गए थे। पटना हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्दोष करार देकर रिहा कर दिया।
 आजाद भारत के कर्ताधर्ता ने भारत के नवनिर्माण की योजना बनायी। इस योजना का नाम समाजवादी रखा गया और लक्ष्य गरीबी दूर कर देश की सारी आबादी को नागरिक बनाना था। इसके लिए प्रचलित सेक्टर को विकास का अग्रदूत बनाया गया और उद्योगों की तरक्की के मारफत देश को पश्चिम के देशांे की तरह जातिविहीन और दरिद्रविहीन करने का सपना संजोया गया। उद्योगपतियों को सभी तरह की सुविधा मिली और कारखाने के मजदूरों को खाद्य पदार्थ की लगातार पूर्ति के लिए हरित क्रांति देश के एक हिस्से में किया गया। इस पार्टी की शासन व्यवस्था ने योजना आधारित विकास का तिरस्कार कर बाजार आधारित आर्थिक विकास को आगे बढाया। सब मिलाकर यह पूरा प्रयास पूँजीवाद को बढ़ाने वाला साबित हुआ है। साथ ही काँग्रेसी सरकार ने आर्थिक नवनिर्माण की सारी प्रक्रिया एक वर्गीय समाज के ढाँचें केा ध्यान में रख कर किया। यह सरासर गलत था। एक बड़ा अर्थशास्त्री प्रो. अशोक रूद्रा ने एक लम्बा लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा कि भारत का सामाजिक धरातल जाति व्यवस्था से बना है और इसकी समाप्ति के अभी कोई आसार नहीं हैं। उन्होंने लिखा है कि यदि यूरोप के इतिहास को जाति व्यवस्था के नजरिये से व्याख्या करें तो यह हास्यास्पद होगा। ठीक उसी तरह भारतीय व्यवस्था को वर्गीय फ्रेमवर्क में समझना गलत होगा। जाति प्रथा और सामन्तवादी प्रथा एक नहीं है। 
 पहला भारत में और दूसरा यूरोप में पाया जाता है। भारत के कर्णधारों ने इस देश के नवनिर्माण का रास्ता वर्गीय समाज के फ्रेम में पूँजीवादी व्यवस्था के मारफत ढूंढना चाहा जो गलत था। जातीय साम्राज्य के उपेक्षित समूहों को समान नागरिक बनाने के लिए निम्न प्रकार की संस्था और नीति की जरूरत होती है। सवर्ण जातियों की सŸाा पर एकाधिकार ने यह नहीं होने दिया। डॉ. अम्बेदकर जाति प्रथा को समाप्त करना चाहते थे, कांशी राम ने दलितों की पहचान और गरिमा के लिए जाति प्रथा की मजबूती पर जोर दिया था। विकास योजना का दलित विरोध होना लाजिमी है।
 दलितों द्वारा समान नागरिक का दर्जा हासिल करने के भारत की समसामयिक परिस्थिति में दो बातों पर ध्यान देने की जरूरत हैं। पहला, दलितों का कोई ऐसा राजनीतिक संगठन जो इसके सदस्यों को एक सूत्र में बाँधकर अपनी खोयी हुई मानवीय गरिमा और नागरिक अधिकार के लिए निर्णायक संघर्ष के लिए एक जूट हो, ऐसा अभी सामने नहीं है। स्वार्थी दलित नेता यह नहीं कर सकते हैं। दूसरा, आज देश की पूरी राजनीति सिद्धांत विहीन है। इतिहास का अन्त तो नहीं हुआ है लेकिन भारत के तथाकथित प्रगतिशील लोग वर्गीय आंदोलन के मारफत दलितों के लिए समान नागरिकता का दर्जा नहीं दिला सकते हैं। इन परिस्थितियों में उदित राज का यह सूझाव कि दलितों को भाजपा में शामिल होना चाहिए, सकारात्मक सोच मालूम पड़ता है। पिछले 70 वर्षों के दौरान किसी पार्टी ने सामाजिक समता के लिए उपयुक्त योजना का पालन नहीं किया। शुरूआती दौर में काँग्रेस ने समाजवाद के नाम पर दलितों और पिछड़ों को धोखा दिया। बाद के दिनों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को गरीबों के खिलाफ किया है। समान नागरिक का स्तर दिलाने के लिए दलितों को न केवल बराबर का वोटिंग अधिकार चाहिए बल्कि आर्थिक और सामाजिक बराबरी भी चाहिए। काँग्रेस और भाजपा दो ही राष्ट्रीय पार्टियाँ है, इसीलिए भाजपा पर खास कर मोदी जैसे नेता के नेतृत्व में दलितों के पक्ष में भरोसा करना उपयुक्त है। उदितराज की यह राजनीतिक समसामयिक संदर्भ में ठीक है, अब निर्भर करता है कि मोदी किस हद तक अपने वादे को सफल बनाने में भाजपा को अपनी ओर राजी करते हैं। इस पर तुरत कोई प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं।
21 वीं शताब्दी दलितों के लिए अधिक नाजूक होने वाला है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला, भारत की योजना है कि वह विश्व व्यवस्था में उŸारोŸार शरीक होता जाए। ऐसा करने से देश के विकास का ध्यान दलितों और गरीबों से हटकर बाहरी सम्पर्क में लगेगा। दूसरा, चारों ओर से जोर पड़ रहा है कि भारत जोरों से औद्योगिक विकास करे और दूसरे देशों की पूँजी का स्वागत करें। इसका मतलब है कि भारत पूँजीवादी व्यवस्था को सुदृढ करे। ऐसे में दलितों के पूर्णनिर्माण के लिए जिन संस्थाओं और नीतियों की जरूरत होगी, उसकी अनदेखी होगी। सामान्यतः यह माना जाता है कि आर्थिक विकास से लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन अनुभव बतलाता है कि दोनों का सहयोग हर परिस्थिति में सामाजिक न्याय लाने में एकसाथ काम नहीं करता है। थोमस पीकेटी ने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘सौवीं शदीं में पूँजी’ में लिखा है कि ‘सही लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की अपनी-अपनी अलग संस्थाओं की जरूरत होती है। न तो बाजार व्यवस्था, न सिर्फ संसद और न ही दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाएं’ सामाजिक न्याय की स्थापना कर सकती है। 
 अभी तक जितने सलाह नयी सरकार को मिल रहे हैं, वह पूँजी बढ़ाने और उत्पादन में इसे लगाने सम्बंधी है, मजदूरों, खासकर मेहनतकश जातियों का क्या होगा, इसकी कोई चिंता नहीं है। पिछली हजारों वर्षों का इतिहास है कि जाति प्रथा को नष्ट करने का कोई निर्णायक संघर्ष नहीं हुआ। आजाद भारत का अनुभव है कि दलित संगठन अकेले दलितों और पिछड़ों को समान नागरिकता का दर्जा नहीं दिला सकता है। क्योंकि इसके साथ आर्थिक गैर बराबरी को दूर करने का शर्त है। आगे आने वाले दिनों में आर्थिक गैर बराबरी बढ़ेगी और विकास का लाभ मेहनतकशों (मजदूरों) को न जाकर पूँजीधारकों को जाएगा। ऐसी परिस्थिति में यह उचित है कि दलित समूह मोदी जैसे भाजपा के नेता के साथ अपना सहयोग बढ़ाये।
 नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत के इतिहास का एक नया मोड़ है। यह एक अप्रत्याशित घटना है। इसे नरेन्द्र मोदी ने अकेला सम्पन्न किया है। यद्यपि पार्टी की घोषणा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस चुनाव में मोदी ने अपने राजनीति के तहत एक लहर पैदा किया जिसको मोदी लहर कहते हैं। चुनाव का सर्वेक्षण करने वालों ने यह स्पष्ट एलान किया था कि कि लोगों का उत्साह मोदी के प्रधानमंत्री के सिवा दूसरा नहीं था। इसी परिप्रेक्ष्य में महात्मा गाँधी के पोता गोपाल कृष्ण गाँधी ने जो मोदी के विरोधी थे-मोदी को एक खुला पत्र में लिखा कि आपके लिए यह एक ऐतिहासिक विजय है जिसे देखकर दुनिया आश्चर्य चकित रह गई है। आपकी पार्टी के लोग भले न चाहे पर आपने जो प्रतिज्ञा लिया है, उसे अब पूरा करे। आपके मददगार आपके वादे को पूरा होते देखना चाहेंगे। आप संकल्प में महराणा प्रताप बने और शासन के कार्य में अकबर बने। यदि आपके लिए आवश्यक है तो आप अपने दिल में सावरकर रहे लेकिन दिमाग से अम्बेदकर रहे।’ देखना है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ब्राह्मणवादी एजेंडा को आगे बढ़ाती है या दलितों, पिछड़ों और गरीबों को समान नागरिकता का हैसियत दिलाने के लिए कठोर और प्रभावी नीतियों को लागू करने में सफल होती है। अगर दलितों को समान नागरिक बनाने की दिशा मे ंउनका प्रयास रहा तो उदित राज का यह संकल्प कि दलितों को भाजपा में आना चाहिए, सही साबित होगा।

एकात्म मानवतावाद

कुछ विद्वान मित्रों का मानना है कि भाजपा की तरफ आम लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है और वह इसलिए कि उन लोगों के मन में उनमें  हिंदू होने का म...