मंगलवार, 26 मार्च 2013

प्रसंगवश


प्रसंगवश
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इतिहास से -

".............जिन लोगों ने भी नेता जी को जाना है वह इस बात में यकीं रखते हैं की नेताजी जो कहते हैं वो करते भी हैं,देश के तमाम ऐसे लोग प्रधानमंत्री बने जिनकी जमीनी पकड़ नेताजी के मुकाबले कुछ भी नहीं ." जिन कारणों से नेताजी उन राजनीतिक ऊँचाइयों को नहीं छू पाए जिनकी उनमे क्षमता थी, उसमें उनके सहयोगियों की बहुत बड़ी साजिश भी रही है जैसे - बेनी प्रसाद से ही शुरू करता हूँ एक जमाने में नेताजी के सबसे करीबी हुआ करते थे और इस जोड़ी को लोग उम्मीदों के मशाल के रूप में देखते थे, पर बेनी बाबू अपनी कौम में ही अलोकप्रिय होते गए तब वे जिसका गुस्सा नेता जी पर उतारते फिर रहे हैं। 
दूसरे नंबर पर पंडित जनेश्वर मिश्र को लेता हूँ नेता जी ने उन्हें आजीवन सत्ता के करीब रखा पर वे कभी भी नेता जी को अपने से बड़ा नहीं होने दिए, उलटे अकेले में उनकी जीतनी भर्त्सना / निंदा हो सकती थी करते और करवाते रहे (समाजवादियों की जिस फौज का वह प्रतिनिधित्व करते थे उसमें जातिवादियों की जमात का ही बोलबाला था) पर नेताजी उनका आँख मूँद कर समर्थन करते रहे और मिश्र जी  इस संघर्ष पुरुष के श्रम का प्रसाद वैसे ही खाते रहे जैसे मध्यकाल का द्विज/बुद्धि दान के नाम पर शुद्र का माल उडाता रहा हो ! 
तीसरे नंबर पर भाई अमर सिंह सीधे सादे समाजवादी को जिन रंगारंग दुनिया की सैर करवाई कि ओ आम आदमी से दूर ही नहीं गायब ही हो गया - उन दिनों तो बस यही गीत याद आता था - अजीब दास्तान है ..... ! एक धूर समाजवादी को पूंजीपतियों की पंगत में बैठाने का अंजाम तो भाई अमर सिंह को ही दिया जाना चाहिए अन्यथा इस जमीनी जन नायक को धंधे बाजों की तरह संपत्ति बनाने वालों से क्या मोह। 
तीसरा नेत्र अगर किसी ने खोला तो ओ भाई अमर सिंह ही थे। 
भला हो बहन जी का जिन्होंने इस दलाल की और दलाली की औकात समझी और वो भी दगा दे गयी 'धरती पुत्र' को बहाना था की उनके लठैतों ने सर्किट हाउस में उनके साथ ‘लट्ठमार होली खेल ली थी’ फिर क्या था उनका भी विश्वास डगमगाया और चली गयी ‘राम दरबार में’ वहां उनका अभिनन्दन हुआ और इस सर्किट हॉउस कांड की महानायक बनाकर जलते हुए उत्तर प्रदेश की कुर्सीपर उन्हें विराजमान किया गया। तब भी  भाई अमर सिंह पानी डालने के नाम पर समाजवाद का खून पीते रहे और अपनी धमनियों को मोटी करते रहे जिससे समाजवाद का गला घोंट सकें' और गला घोंटते रहे - राज बब्बर, बेनी वर्मा, आजम खान, सिसकते रहे पर अमर भाई ‘कुतरते रहे’ क्या मजाल कोई बोलने की हिम्मत करे नेता से की ये कठफोरवा की तरह कुतर रहा है नेता जी की नियत को। 
छुटभइयों की क्या बिसात परिवार वालों की भी हिम्मत नहीं थी की भाई अमर सिंह के कर्मों पर कोई उंगली उठा सके। नेताजी को कहाँ पहुंचाकर खुद आराम करने उनदिनों स्वदेश त्याग गए थे भाई अमर सिंह ‘दवाई’का बहाना बनाकर । 
कारण पर मत जाइये ? 
कैसे भागे भाई जी आप सब जानते हैं ! 
लोग आते रहे लोग जाते रहे, लम्बी कहानी है कभी फिर लिखेंगे अभी तो (लिखना थोर समझना ढेर) 
भला हो बहन जी का वो सत्ता में आयीं और पूर्ण बहुमत से। भाई अमर सिंह फिर अपने ‘बिल’ में चले गए, समाजवाद - दलित और द्विज के आगे कमजोर पड़ गया। 
बहन जी ने सदियों की गुलामी का नामों निशाँ मिटाने का संकल्प लिया, पुराने घावों को यादकर इतिहास रचना आरम्भ किया 'राम-मंदिर' के बजाय उन्होंने आंबेडकर,फुले, कांशीराम और अपने स्मारक बनवाने आरम्भ किये जिसे रोकने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत तक ने हस्तक्षेप किया पर इतिहास बनता गया और इतिहास की तरह द्विज देखता रहा ‘जिन्हें इतिहास बनाना आता है उन्हें दौलत की कमी नहीं पड़ती’ इस इतिहास रचने की प्रक्रिया में जो भी गलत हुआ उसपर विचार सदियाँ करेंगी अभी तो इतिहास के लिए काम हो रहा था. मिडिया, बुद्धिजीवी, द्विजद्रोह और सामन्तिओ को सत्ता पर कब्जे की प्रक्रिया के डर ने झकझोर दिया। ये जुट गए भाई अमर सिंह की तरह भितरघात में और जैसे उस समय के प्रायोजित  भ्रष्टाचार की आंधी में नेता जी की सरकार चली गयी थी वैसे ही 2012 मे इतिहास रचने की प्रक्रिया रूक गयी। पर अभी खत्म नहीं हुयी है, इतिहास तो इतिहास ही है कभी रूक जाता है कभी बनने लगता है। 
पर नेताजी मान रहे हैं अब सीनियर्स की ही राजनिती नहीं रही तो उन्हें शायद यह याद नहीं है कि जब वे राजनिती में आये थे तब वे भी युवा थे पर आज के जैसे युवा नहीं, इंदिराजी भी महिला थीं और युवा नेत्री भी, उनके विरोध/समर्थन का एक बड़ा कारण यह भी था कि वह नेहरू जी  की पुत्री थीं और बहुत से अनुभवी कांग्रेसियों से उन्हें आगे ले जाया जा रहा था, तब भी इंदिरा जी को बड़ा किया जा रहा था देश को नहीं । संयोग से अब भी वही हो रहा है बिलकुल निराले ढंग से । 
इस होली पर राहुल जी (राहुल सांकृत्यायन) याद आ रहे हैं - उनकी दो पुस्तकें 1. तुम्हारी क्षय हो 2.घुमक्कड शास्त्र . अकारण नहीं याद आ रही हैं उन्होंने उसमें कहा है - पहली किताब में वह लिखते हैं ‘जब जब पिछड़े या शुद्र सत्ता की तरफ बढ़ते नजर आते हैं तब तब ऊँची जातियों के लोग लोग देश बेच देते हैं या विदेशियों को सौंप देते हैं।(कांग्रेसी इस पुस्तक को जरूर पढ़ें) दूसरी में लिखते हैं घर से निकलों जो और मिलेंगे वो भी अपने होते जायेंगे। 
आज हम इन दोनों बातों को यहाँ प्रसंगवश लाये हैं क्योंकि होली के अवसर पर यदि हम इस सच को स्वीकार कर पायेंगे की देश सबका है हमारा ही नहीं तभी हर आदमी इसे बनाने का प्रयास करेगा। 
नेताजी की चिंता कभी यह नहीं रही कि फला ने कितना दगा दिया/किया, पर उन्हें हमेशा यह याद रहता है की किसने क्या किया है। कहते हैं की नेताजी लोग जरा कान के कच्चे होते हैं पर मैं ऐसा नहीं मानता, क्योंकि जब तक नेता जी के कान तक सच जाएगा नहीं तब तक झूठे नाना प्रकार के प्रचार ही करते रहेगें।(कितने लोग है जो सच कहने की हिम्मत करते हैं) उनके इस बयां में भी वही सच्चाई है की ‘अब भविष्य गठबंधन सरकार का ही है-मुलायम। 
पर इस गठबंधन में होगा कौन ? 
दरअसल कितनी बड़ी विडम्बना है कि जब पिछड़ा बन रहा होगा तब दलित अलग हो जाएगा/कर दिया जाएगा, जब दलित बन रहा होगा तब पिछड़ा अलग हो जाएगा/कर दिया जाएगा, --------------- 
जब सपा और बसपा कांग्रेस को समर्थन दे रहे हों चाहे जिन भी कारणों से, ऐसी कौन सी बिडम्बना है जो ये खुद की सरकार गठबंधन से नहीं चला सकते।
इनकी इन हरकतों में गाँवों  के किस्से दृष्टिगोचर होते हैं, जहाँ एक 'लम्पट सा ........' आदमी इन्हें लड़ा रहा होता है।

बुरा न मानें  ‘होली’ है। 

डा. लाल रत्नाकर

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