शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

समाजवाद बनाम पिछड़ा वर्ग


समाजवाद और पिछड़े वर्ग के अंतःसंबंधो पर एक नया दस्तावेज
पुस्तकः
समाजवाद बनाम पिछड़ा वर्ग
लेखकः
कौशलेन्द्र प्रताप यादव
प्रकाशकः सम्यक प्रकाशन,नई दिल्ली
मूल्य- 75 रु.,पृष्ठ- 112

भारत में अपने स्थापना काल से ही समाजवादियों को पिछड़ा वर्ग प्रेम जग जाहिर है। इसके ऐतिहासिक कारण रहे हंै। कांग्रेस जहां दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम गठजोड़ को प्राथमिकता देती थी, वहीं दक्षिणपंथी ताकतें सवर्ण वर्चस्व को और मजबूत करना चाहती थीं। समाजवादियों ने इसीलिए पिछड़े वर्ग पर अपना दांव लगाया और ‘‘सोशलिस्टो ने लगाई हांक-पिछड़ा पावैं सौ में साठ’’ की हांक लगाई। मंडल आयोग की रिपोर्ट जिसे पिछडे़ वर्ग की बाइबिल कहा जाता है का गठन प्रथम समाजवादी सरकार में हुआ और इसे लागू भी उस वी0पी0 सिंह की सरकार में किया गया जिसमें समाजवादियों का वर्चस्व था।
इस पुस्तक के लेखक कौशलेन्द्र को पिछड़ा वर्ग आंदोलन का थिंक टैंक कहा जाता है। न केवल अपने लेखन से वरन जगह-जगह पिछड़े वर्ग पर अधिवेशन आयोजित कर वो अपनी सक्रियता बनाये रखते हैं। समाजवाद और पिछड़े वर्ग पर उनके जो लेख इधर राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में आए हैं उसी का संग्रह है यह पुस्तक। इसकी प्रस्तावना प्रख्यात समाजवादी लेखक मस्तराम कपूर ने लिखी है।
पुस्तक का प्रथम लेख लोहिया और अंबेडकर के संबंधों पर है। लोहिया और अंबेडकर के तथाकथित अनुयायियों को यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। उ0प्र0 में लोहिया के तथाकथित अनुयायियों द्वारा अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने की जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हो रही है और दोनों को एक दूसरे से बड़ा बनाने की जो घिनौनी कोशिशंे हो रही हैं,इस दौर में इस लेख की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। लोहिया और अंबेडकर कैसे गठबंधन करके चुनाव लड़ना चाहते थे और कैसे एक राष्ट्रीय दलित-पिछड़ा महाजोट बनाना चाहते थे इस पर यह लेख प्रकाश डालता है। अंबेडकर पर लोहिया की यह टिप्पणी कि ‘‘गांधी के बाद इस देश में अगर कोई महान है तो वो अंबेडकर है’’ और अंबेडकर की यह टिप्पणी कि ‘‘समाजवादियों ने मुझसे गठबंधन करके मुझे राजनैतिक रूप से अछूत होने से बचा लिया’’ इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हालांकि इस पुस्तक में एक से अच्छे दूसरे लेख हंै लेकिन जिस एक लेख के लिए लेखक और यह पुस्तक याद रखी जायेगी वो यही लेख है। इस लेख में लेखक अंत में यह टिप्पणी करके पाठकों को भावुक कर देता है कि ‘‘अफसोस कि लोहिया और अंबेडकर के वारिस ही उनकी वसीयत और विरासत को  संजोकर नहीं रख पाये।’’
लोहिया पर इस पुस्तक में कई लेख है, जो उनके व्यक्तित्व और संघर्ष के कई अनछुए पहलू सामने लाते हंै। ‘‘लोहिया बनाम नेहरू’’ के अपने लेख में नेहरू और लोहिया की विचारधाराओं को सामने रखकर उनकी टकराहट की वजहें भी बताई गई हंै। 1962 के युद्ध में चीन ने जब भारतीय भूभाग के 14500 वर्ग मील पर कब्जा कर लिया तो लोहिया और दूसरे नेताओं ने नेहरू को संसद में घेरा। इस पर नेहरू ने जवाब दिया कि ‘‘चीन ने जिस भूभाग पर कब्जा किया है वह बर्फीला और बंजर है। उसे लेकर हमें ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।’’ इस पर लोहिया ने नेहरू की चुटकी ली कि ‘‘आपकी खोपड़ी भी बंजर है, इसे भी चीन भेज दीजिए।’’ ऐसी न जाने कितनी ऐतिहासिक टिप्पणियां इस पुस्तक में दर्ज हंै जो इसे एक दस्तावेज बनाती हैं। ‘‘लोहिया के विविध रंग’’ नामक अपने लेख में लेखक ने दिखाया है कि लोहिया एक्टिविस्ट होने के अतिरिक्त एक कला मर्मज्ञ भी थे। इसमें लोहिया का नारी विषयक चिंतन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिसमें वो स्त्रि़यों को श्रीमती न कहकर श्री कहते और द्रौपदी को भारतीय इतिहास ही नहीं वरन विश्व इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्त्री घोषित करते हैं।
भारत छोड़ो आंदोलन और अन्य कई किसान आंदोलनों में समाजवादियों की भूमिका का रेखांकन अभी तक नहीं हुआ है। ‘भारत छोड़ो आंदोलन में समाजवादियों का योगदान’ ऐसा ही एक लेख है, जिसमें कौशलेन्द्र का विशद ऐतिहासिक अध्ययन सामने आता है, जिसमें उन्होंने 1942 के आंदोलन में महाराष्ट्र, बिहार,उ0प्र0 और मध्य भारत में समाजवादियों के संघर्ष का गहराई से पड़ताल किया है। ‘कांग्रेस के कब्जे में समाजवाद’ इसी प्रकार का एक अन्य ऐतिहासिक लेख है, जिसमें कांग्रेस को न समझ पाने की दिशाहीनता समाजवादियों की कमजोरी के रूप में उसके स्थापना काल से ही रही है। उल्लेखनीय है कि समाजवादियों के आज तक जितने भी विभाजन हुए हंै चाहे वह अशोक मेहता ने किया हो या चन्द्रशेखर ने, उसके पीछे कांग्रेस का ही मंथरा परामर्श रहा है। इसी क्रम में लेखक वामपंथियों की भी गहरी जांच परख करता है और चुटकी लेते हुए कहता है कि जहां चार वामपंथी रहते है, वहां पांच प्रकार की राय सामने आती है।
उ0प्र0 की नयी बनी अखिलेश की समाजवादी सरकार पर भी पुस्तक में दो-तीन लेख हंै जिसमें उसकी चुनौतियां, पिछड़ा वर्ग आंदोलन को लेकर उससे अपेक्षाएं और कानून व्यवस्था पर उठ रहे सवालों पर एक विमर्श किया गया है।
पुस्तक में प्राकृतिक प्रकोपों पर भी समाजवादी दृष्टिकोण से चर्चा की गई है। इसमें माक्र्स की वो टिप्पणी भी दर्ज है जिसमें वो एंगेल्स से कहते हंै कि ‘‘सभ्यता जब अविवेकपूर्ण ढंग से विकसित होती है तो अपने पीछे रेगिस्तान छोड़ जाती है।’’ यहां एक मर्मांतक टिप्पणी लोहिया की भी है जिसमें वो कहते है कि ‘‘विचारों के अकाल से पड़ता है सूखा।’’
इस पुस्तक में कुछ अन्य पठनीय लेख है-ममता क्यों हैं निर्मम, किन्नर और दरगाहों से उठे मोहब्बत के पैगाम। ममता वाले अपने लेख में लेखक ममता के उलझे चरित्र पर मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रकाश डालता है। इस क्रम में लेखक की दृष्टि जयललिता और मायावती से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी तक जाती है और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि अविवाहित लोग क्यों आदर्शवादी या यूटोपियन ज्यादा होते हंै और कुछ बिन्दुओं पर यथार्थ से कोसांे दूर। ‘दरगाहों से उठे मोहब्बत का पैगाम’ में भारत और पाकिस्तान में फैली महत्वपूर्ण सूफी दरगाहों का उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ भारत-पाक संबंधों पर उनके महत्व को रेखांकित करता है। किन्नरों की त्रासदी पर लेखक ने इतने मार्मिक ढंग से लेखनी चलाई है कि पाठक रोने को मजबूर हो जाता है।
पिछड़ा वर्ग आंदोलन पर मस्तराम कपूर, वासुदेव चैरसिया, प्रो0 चैथीराम यादव, जवाहर लाल नेहरू वि0वि0 के डा0 विवेक कुमार और गुलाबी गैंग की कमांडर सम्पत पाल के साक्षात्कार इस पुस्तक को और भी जीवंत बनाते हंै।
कुल मिलाकर इस पुस्तक में कौशलेन्द्र का लेखक उनके आंदोलनधर्मी चरित्र पर भारी पड़ गया है। इस पुस्तक में लोहिया और अंबेडकर के अंतर्सबंधों के माध्यम से न केवल दलितों-पिछड़ों के विभाजन को पाटने की कोशिश है, वरन भटके हुए समाजवादी आंदोलन पर तंज भी है। हिंदी पट्टी से  कांग्रेस क्यों गायब हो रही है, इसकी एक बड़ी वजह लेखक यह भी बताता है कि कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के साथ हमेशा सौतेला रवैया अपनाया। काका कालेलकर से लेकर मंडल आयोग तक, जाति जनगणना से लेकर पदोन्नति में आरक्षण तक, सब जगह कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग को दरकिनार किया। जांच-परख करते हुए पूरी पुस्तक में लेखक ने बख्शा किसी को नहीं है और सबको बड़ी बेरहमी से लताड़ लगाई है। लेकिन मूलतः एक्टिविस्ट होने के कारण कौशलेन्द्र ने भविष्य के संघर्षों के संकेत भी दिए हंै।
यह पुस्तक इसलिए लम्बे समय तक याद रखी जायेगी क्योंकि इसमें समाजवाद और पिछड़ा वर्ग आंदोलन का न केवल इतिहास दर्ज है वरन् गुमरह लोगों के लिए भविष्य के संघर्षों का संकेत भी।

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