बुधवार, 23 मई 2012

मुलायम  सिंह  यादव  समय  की  गति को मापने में कहीं न  कहीं चुक  कर रहे हैं -

कांग्रेस-सपा की नजदीकियों के मायने..

 बुधवार, 23 मई, 2012 को 13:52 IST तक के समाचार
समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव दिल्ली में कांग्रेस की गठबंधन सरकार के तीन साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री के रात्रि भोज में शामिल हुए और कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पूरा सम्मान दिया.
यह दोनों दलों के बीच बनी नई समझदारी का प्रतीक है. लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता इन अटकलों को गलत बता रहें हैं कि समाजवादी पार्टी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में शामिल हो सकती है अथवा वह विवादास्पद आर्थिक कार्यक्रम को संसद में समर्थन दे सकती है.
कांग्रेस पार्टी की तात्कालिक चिंता अगले राष्ट्रपति चुनाव में अपने उम्मीदवार को जिताना है. इसके लिए कांग्रेस को यूपीए के घटक दलों के बाहर से भी समर्थन चाहिए.
इसलिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों से बातचीत कर रही है , भले ही दोनों परस्पर विरोधी हों.
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन सिंह का कहना है कि समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को भरोसा दिलाया है कि वह उसके उम्मीदवार का समर्थन करेगी. सपा ने कांग्रेस नेताओं को केवल यह बताया है कि राष्ट्रपति पद पर वह एक राजनीतिक उम्मीदवार चाहती है, न कि कोई नौकरशाह.
मोहन सिंह के मुताबिक़ कांग्रेस ने अभी यह नहीं बताया है कि उसका उम्मीदवार कौन है.
माना जा सकता है कि सपा को हामिद अंसारी और मीरा कुमार पसंद नही हैं.
राजनीतिक कीमत
राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देना सपा की मजबूरी भी है, क्योंकि सपा भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं खड़ी हो सकती.
तीसरा मोर्चा न तो अस्तित्व में है न अभी कोई संभावना है.
फिर सवाल उठता है कि मुलायम सिंह यादव राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन देने की क्या कीमत वसूलना चाहेंगे?
और कुछ नहीं तो मुलायम चाहेंगे कि केन्द्र सरकार उत्तर प्रदेश में उनके बेटे की सरकार में कोई अड़ंगे न डाले. जितना हो सके वित्तीय सहयोग दे, जिससे सपा लोक सभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति को मजबूत कर ले.
वे यह भी चाह सकते हैं कि केन्द्र सरकार सपा को वित्तीय मदद देने वाले औद्योगिक घरानों को परेशान न करे और हो सके तो कुछ राहत दे दे. कुछ राजनीतिक नियुक्तियों में हिस्सेदारी भी मांग सकते हैं.
यहाँ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी तरफ से कदम बढाते हुए अफसरों को अमेठी और रायबरेली संसदीय क्षेत्रों में विकास कार्यों में मदद करने का संकेत दिया है.
हाल के विधान सभा चुनाव में सपा को इन दोनों जिलों में बड़ी कामयाबी मिली है.
इस कामयाबी से उत्साहित अमेठी और रायबरेली के सपा नेता अगले लोक सभा चुनाव में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ मजबूत उम्मदीवार उतारने की तैयारी कर रहें हैं. ये दोनों हार जाएँ तो उन्हें बहुत खुशी होगी.
जाहिर है कि समाजवादी पार्टी का मूल चरित्र कांग्रेस विरोधी है और मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाना उसका घोषित अगला लक्ष्य है.
इसलिए लोक सभा चुनाव में कांग्रेस और सपा का टकराव तो होना ही है. मगर इसका मतलब यह नहीं कि उसके बाद दोनों दलों में फिर कोई समझदारी नहीं बन सकती. मुलायम सिंह को दोस्ती और दुश्मनी दोनों अच्छी तरह से निभाना आता है.

(राम दत्त जी के विचार हो सकता है सही हों पर राजनितिक जानकर इसको ठीक नहीं कहेंगे, क्योंकि कांग्रेस पार्टी अब भारतीय पार्टी नहीं है यह अंतर्राष्ट्रीय पार्टी हो गयी है अतः अब कांग्रेस से कोई भारतीय कोई उम्मीद करे तो बेमानी ही है - भ्रष्टाचार के मामले पर, महगाई के मामले पर कोई कंट्रोल यह पार्टी या उसकी सरकार लगाने जा रही है तो यह सोचना भी बेवकूफी ही होगी, क्योंकि इसमें लूटेरों ने अच्छे लोगों को किनारे लगा दिया है और इस कांग्रेस की नयी मालकिन की यही इक्षा भी होगी, इसीलिए मेरा मानना है की नेता जी ने कांग्रेस के साथ नजदीकी दिखाकर दूरगामी परिणाम वाला काम  नहीं किये हैं.-डॉ.लाल रत्नाकर)


रविवार, 20 मई 2012

May-19,2012,
11:31 pm

सपा शासन में गुंडा राज कायम

- स्वामी प्रसाद

जौनपुर: बसपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता विधान मण्डल दल स्वामी प्रसाद मौर्य ने प्रदेश की अखिलेश सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सपा शासन में पूरी तौर पर गुंडा राज कायम हो चुका है।
वे शनिवार को स्थानीय डाक बंगले में पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज समस्याओं के मारे लोग दर-बदर भटक रहे हैं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। प्रदेश का नौजवान जो बेरोजगारी भत्ता, टेबलेट व लैपटाप के नाम पर सरकार बनवाकर अब अपने को ठगा महसूस कर रहा है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा बसपा शासन में चालीस हजार करोड़ रुपए घोटाले की बात को निराधार व तथ्यहीन बताया।
मछलीशहर प्रतिनिधि के अनुसार स्थानीय नगर में आयोजित पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि बसपा शासन में गुण्डे-माफिया जेल में थे और बहन-बेटियां निर्भीक होकर घूमती थी जबकि सपा के शासन में ठीक इसका उलटा हो रहा है। सम्मेलन में केराकत, पिण्डरा, मछलीशहर व जफराबाद विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। सम्मेलन में संगठनात्मक ढांचे में सभी वर्गो की हिस्सेदारी सुनिश्चित करके संगठन की मजबूती पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि जोनल कोआर्डिनेटर छट्ठू राम एवं धनपति राम व्रिदोही ने भी पार्टी की नीतियों के तहत चुनावी तैयारी में लग जाने की बात कही। कार्यक्रम संयोजक मछलीशहर लोकसभा प्रभारी बीपी सरोज रहे। इस मौके पर रामचन्द्र गौतम, मेवालाल गौतम, रईस अहमद खां, शिवाजी सिंह, रामफेर गौतम आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
नौपेड़वा प्रतिनिधि के अनुसार बक्शा विकास खण्ड के सुजियामऊ गांव में बसपा नेता तपेश विक्रम मौर्या के आवास पर शनिवार को पार्टी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि प्रदेश की सपा सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। आगामी लोकसभा चुनाव में बसपा ही प्रदेश में एक मात्र विकल्प होगी। इस दौरान जौनपुर लोकसभा प्रभारी एमएलसी प्रभावती पाल, जोनल कोआर्डिनेटर छट्ठू राम, पाणिनी सिंह, डा भोलानाथ मौर्य, अमरजीत गौतम आदि मौजूद रहे। संचालन जिलाध्यक्ष ज्ञान सागर अम्बेडकर ने किया।
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स्वामी प्रसाद मौर्य  ब्रह्मण  राज्य के हिमायती हैं। इन्होने जौनपुर को अपनी जागीर बना रखा है और तमाम पिछड़ों की भावनाओं  के  साथ  मजाक  किया जा रहा है .
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शुक्रवार, 18 मई 2012



पिछड़ा वर्ग आन्दोलन एवं उ0प्र0 सरकार
कौशलेन्द्र प्रताप यादव

प्रत्येक सरकार की कसौटी के पैमाने भी अलग-अलग होते हंै। दल का घोषणा पत्र जिस लोक लुभावन वादों के साथ और जिस वर्ग के वोट से सत्ता में आता है उन्हीं वादों पर सरकार को फेल-पास किया जाता है। मसलन बसपा की सरकार दलितों के लिए क्या कर रही है, इस पर सबकी नजर रहती थी। उसी प्रकार सपा सरकार पिछड़े वर्ग से संबंधित मुददों पर क्या रूख अख्तियार करती है और अपने कार्यकाल में क्या कुछ दे जाती है, इसी कसौटी पर उसको कसा भी जायेगा और यही रूख उसका भविष्य भी तय करेगा।

प्रमोशन  में दलितों को आरक्षण का मुददा सब जगह छाया रहा। लेकिन यह तथ्य कहीं भी प्रकाश में लाने की कोशिश नहीं गई कि 1978 में जिस शासनादेश के तहत दलितों को प्रमोशन में आरक्षण की बात कही गई थी, उसी शासनादेश में अनुसूचित जातियों, जनजातियों के साथ अन्य पिछड़े वर्गों को भी प्रमोशन में आरक्षण की बात कही गई थी। इस शासनादेश के तहत अन्य पिछड़े वर्ग के तीन तेज तर्रार अधिकारियेां को प्रमोशन में आरक्षण भी मिला। लेकिन 30.9.1980 के शासनादेश संख्या 5119/40-1-1-15 (28) 80 के तहत अन्य पिछड़े वर्गों को मिलने वाला प्रमोशन में यह आरक्षण कांग्रेस की सरकार ने समाप्त कर दिया। फिलहाल यह संभव तो नहीं है कि उ0प्र0 सरकार दलितों का आरक्षण खत्म करे और ओ0बी0सी0 को प्रमोशन में आरक्षण दे, लेकिन अब इस मुददे पर ओबीसी संगठन बौखला गए हंै। 27 मई को लखनऊ में आल इंडिया बैकवर्ड इंपलाइज फेडरेशन (आइबेफ) इस मुददे पर एक अधिवेशन करने जा रहा है।

समाजवाद के जनक लोहिया जब ‘‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़े पावैं सौ में साठ’’ नारा देते थे तब वो निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण की वकालत करते थे। दूरदर्शी लोहिया जानते थे कि वक्त बीतने के साथ नौकरियां केवल सरकार के भरोसे नहीं रहेगी। यह भी कम मजे की बात नहीं कि जिस कांग्रेस को मजबूरी में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करनी पड़ी उसी ने देश में उदारीकरण की शुरूआत की। उदारीकरण के फलस्वरूप बहुत कम नौकरियां सरकार के पास बची और निजी क्षेत्र में आरक्षण देना कांग्रेस की कोई मजबूरी नहीं थी। बसपा सरकार ठेकों में भी दलितों को आरक्षण देती थी। सपा सरकार आसानी से यह व्यवस्था पिछड़े वर्ग के लिए कर सकती है।

अखिलेश जी ने बयान दिया है कि उनकी सरकार में न तो कोई स्मारक बनेगा और न ही कोई मूर्ति लगेगी। लेकिन प्रदेश में एक भी पिछड़ा वर्ग शोध केन्द्र नहीं है। जहां पर पिछड़े वर्ग की योजनाओं, जनसंख्या, कर्मचारियों का प्रतिशत, आरक्षण की प्रगति, दूसरे प्रदेशों में चल रही पिछड़े वर्ग की योजनायें, संसद और अन्य राज्यों में पिछड़े वर्ग के सांसदों और विधायकों की स्थिति की नवीनतम जानकारी रखी जा सकी।

उ0प्र0 में गैर सरकारी स्तर पर पिछड़ा वर्ग आंदोलन मृत प्राय है। कभी यहां अर्जक संघ का जीवंत आंदोलन था। रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव और महाराज सिंह भारती इसके प्रेरणापुंज थे। लेकिन अर्जक आंदोलन उ0प्र0 में उसी तरह मर गया जैसे बिहार में त्रिवेणी संघ। मा0 कांशीराम गैर राजनैतिक आंदोलन की महत्ता बखूबी समझते थे। वो कहते थे कि ‘‘कोई समाज राजनीति में कितना आगे जायेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि उसकी गैर राजनैतिक अर्थात सामाजिक जड़े कितनी मजबूत है?’’ देखना होगा कि उ0प्र0 सरकार ऐसे गैर राजनैतिक आंदोलनों को अपने लिए सहायक मानती है कि खतरा ?

पिछड़े वर्ग के पास पत्रिका आंदोलन का भी अभाव है। दरअसल पिछड़ा वर्ग जिन मार्शल जातियों से मिलकर बनता है, वहां चिंतन की गुंजाइश बहुत कम होती है। इसलिए पिछड़े वर्ग के नेतृत्व में जहां-जहां सरकारें बनती है, वो अपने दड़बे से बाहर नहीं निकल पाती और असमय काल-कवलित हो जाती हंै। दलित आंदोलन लघु पत्रिका आंदोलन की उपज था। 2 रुपये से लेकर 20 रुपये तक की दलित पत्रिकायें निकालना दलितों के बीच एक फैशन बन गया था। भले ही ये दस पेज की रही हांे या इनकी प्रसार संख्या पांच सौ से भी कम रही हो, लेकिन अपने प्रभाव क्षेत्र में इन्होंने दलितों में जबरदस्त जनजागरण पैदा किया। इस समय उ0प्र0 में पिछड़े वर्ग की एक मात्र पत्रिका है सोशल ब्रेनवाश। देखना है उ0प्र0 सरकार इसे कैसे प्रोत्साहित करती है।

सपा के सत्ता में आने के बाद अति पिछड़े वर्ग के लोग उफान पर है। ये अपने लिए अलग कोटा और एक अलग आयोग की मांग कर रहे है। दरअसल अति पिछड़े वर्ग का आक्रोश समझने में गैर सपा राजनैतिक दल ज्यादा सफल रहे हंै। राजनाथ सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में आरक्षण को पिछड़ा/अति पिछड़ा में बांटा तो बसपा सरकार अतिपिछड़े वर्ग की कुछ जातियों को थोक के भाव अपने साथ ले गई। इसी प्रकार पिछड़े वर्ग के मुसलमानों यानी पसमांदा मुसलमानों पर सपा अपना स्टैंड क्लीयर नहीं कर पा रही है। उसने समस्त मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग की है। जिसका पसमांदा मुसलमानों की कई तंजीमों ने विरोध किया है। यदि अति पिछड़े वर्ग के साथ पसमांदा मुसलमानों को सपा अपने पाले में खींच ले गई तो यह उसका सबसे बड़ा बेस वोट बैंक होगा।

क्रीमीलेयर को लेकर पिछड़े वर्ग के चिंतक अपना विरोध जताते रहे हंै। अभी सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में दलितों का आरक्षण समाप्त किया तो इस निर्णय को निष्प्रभावी करनेके लिए संसद में विशेष प्रस्ताव पारित करने की तैयारी चल रही है। पिछड़े वर्ग को आरक्षण में क्रीमीलेयर भी सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था है। किन्तु उसे हटाने की कोई मुहिम अभी तक नहीं की गई। उ0प्र0 के सपा सांसद क्रीमीलेयर को हटाने के लिए विधान सभा से एक प्रस्ताव पारित करा सकते है या ससंद के किसी भी सदन में इस आशय का एक प्रस्ताव रख सकते है।
अभी उ0प्र0 का जो मंत्रिमंडल है उसमें पिछड़े वर्ग का चेहरा नहीं झलक रहा है। सपा के पितृ-पुरूष चैधरी चरण सिंह का अजगर (अजीर-जाट-गूजर-राजपूत) फार्मूला भी इसमें गायब है। मंडल आयोग लागू होने के बावजूद केन्द्र सरकार की नौकरियों में पिछड़े वर्ग की भागीदारी केवल 6 प्रतिशत है। उ0प्र0 में भी पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला है, लेकिन यहां भी उसे 10 प्रतिशत ही प्रतिनिधित्व प्राप्त है। आरक्षण मिलने के बवजूद पिछड़े वर्ग के साथ केन्द्र और राज्य स्तर पर यह अन्याय क्यों है रहा है, इस पर सपा सरकार को जमकर स्टैंड लेना होगा। ओबीसी के जो पद रिक्त पड़े हैं, उसे लेकर सपा को जबरदस्त भर्ती अभियान चलाना पड़ेगा तभी पिछड़े वर्ग को आरक्षण के अनुपात में नौकरियां मिल सकेगी।
उ0प्र0 में ओबीसी के छा़त्रों के लिए छात्रावास की अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। जिले में यदि 200 छात्रों के लिए भी एक छात्रावास बना दिया जाये तोा ये पिछड़ा वर्ग आंदोलन के एक चेतना केन्द्र हो सकते हैं और साथ ही पिछड़ा वर्ग का एक कैडर तैयार हो सकेगा। दलित छात्रों के लिए शोध हेतु केन्द्र सरकार राजीव गांधी फेलोशिप देती है। उ0प्र0सरकार को ऐसी ही एक योजना ओबीसी छात्रों के लिए शुरू करनी चाहिये।

चूंकि उ0प्र0 सरकार पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, अतः दलित स्मारकों को लेकर उसका स्टैंड प्रदेश में दलितों-पिछड़ों के रिश्ते तय करेगा। यह गौरतलब है कि इस बार सपा ने अनुसूचित जाति के सुरक्षित 89 सीटों में 54 सीटे जीती है। यह सपा पर दलितों का नया एतबार है। सपा के आदर्श लोहिया खुद अंबेडकर के बहुत बड़े प्रशंसक थे। जब उन्होंने बिहार के रामलखन चंदापुरी के साथ मिलकर पिछड़े वर्ग को गोलबंद किया तो पिछड़े वर्ग के साथ दलितों के गठबंधन का सपना देखा। यह सपना लिये लोहिया अंबेडकर के पास पहुंचे और एक सार्वजनिक बयान दिया कि ‘‘गांधी के निधन के बाद यदि कोई महान है तो अंबेडकर है और जाति विनाश अभियान की आशा के केन्द्र है।’’ इसके बाद लोहिया और अंबेडकर की मुलाकातें बढ़ चलीं लेकिन बाबा साहब अंबेडकर का इसी समय असमय निधन हो गया और लोहिया का दलित-पिछड़ा गठबंधन का स्वप्न अधूरा रह गया।

आज का जो सामाजिक परिदृश्य है और देश जिस प्रकार जाति मुक्त भारत की ओर बढ़ रहा है, उसमें जातीय और वर्गीय आंदालनों की गुंजाइश बहुत कम रह गई हंै। इसीलिए मंडल के प्रोडक्ट नीतीश कुमार को मंडल की राजनीति छोड़कर विकास और सुशासन का लबादा ओढ़ना पड़ता है, उ0प्र0 में बहन जी को बहुजन से सर्वजन की यात्रा करनी पड़ती है, गुजरात में महानतम संघी नरेन्द्र मोदी को सदभावना यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन चतुर राजनेता वही है जो सब कुछ करते हुए, सबको खुश रखते हुए अपना बेस वोट बैंक मजबूत रख सके। इसी बिंदु पर अखिलेश जी की भी कड़ी अग्नि परीक्षा होगी। 
अंत में एक बात और। हो सकता है कि अखिलेश जी अपने को पिछड़े वर्ग का नेता न मानते हों, लेकिन पिछड़ा वर्ग उनसे उम्मीद जरूर करता है।

परिचयः 
लेखक आॅल इंडिया बैकवर्ड इंपलाइज फेडरेशन के राष्ट््रीय अध्यक्ष हैं। 
पता हैः टी-6,महादेवपुरम,मंडावर रोड,बिजनौर,उ0प्र0

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