बुधवार, 19 सितंबर 2012

केंद्रीय विवि में शिक्षकों के 5,362 पद खाली

केंद्रीय विवि में शिक्षकों के 5,362 पद खाली

वाराणसी/शैलेश सिंह
Story Update : Friday, August 24, 2012    12:39 PM
5362 teachers vacancies in central universities
देश के 31 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 5,362 पद खाली पड़े हैं। सबसे अधिक दिल्ली विश्वविद्यालय में 945 और दूसरे नंबर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 914 पद रिक्त हैं। इनमें प्रोफेसर से लेकर असिस्टेंट प्रोफेसर तक के पद शामिल हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सात हजार से अधिक गैर शिक्षण कर्मियों के पद भी भरे जाने हैं। आरटीआई के जरिए यूजीसी से मांगी गई जानकारी में यह तथ्य सामने आया है।

आरटीआई से मिली जानकारी
औरैया जिले के आलोक नगर निवासी महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में यूजीसी ने बताया कि 31 विश्वविद्यालयों में सामान्य वर्ग के 3011, अनुसूचित जाति के 896, अनुसूचित जनजाति के 475, ओबीसी के 822 और शारीरिक विकलांग कोटे के 158 शिक्षक पद खाली पड़े हैं।

डीयू में 945 पद खाली
अगर दिल्ली विश्वविद्यालय की बात करें तो यहां प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के सामान्य वर्ग के 691, अनुसूचित जाति के 64, एससी के 31, ओबीसी के 120 और शारीरिक विकलांग कोटे के 39 पद खाली हैं। इसी प्रकार बीएचयू में सामान्य वर्ग के 375, एससी के 247, एसटी के 150, ओबीसी के 124 तथा शारीरिक विकलांग कोटे के 18 पद रिक्त हैं।

बैकलॉग दूर करना यूनिवर्सिटी की जिम्मेदारी
महेंद्र प्रताप सिंह ने आरटीआई के तहत एक अन्य आवेदन में यूजीसी से पूछा था कि रिक्त पदों पर बहाली क्यों नहीं की जा रही है? इसका यूजीसी ने जवाब दिया कि यह जिम्मेदारी विश्वविद्यालयों की है कि वे बैकलॉग दूर करें। बीएचयू में आरक्षित पदों के बैकलॉग पूरे न होने पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग नाराजगी भी जता चुका है। इस संबंध में बीएचयू के रजिस्ट्रार प्रो. वीके कुमरा का कहना है कि यूजीसी के निर्देशानुसार रिक्त पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है।

प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्त शिक्षक पद
विश्वविद्यालय ------- रिक्त पद
दिल्ली विश्वविद्यालय ------- 945
बीएचयू ------- 914
जेएनयू ------- 268
इग्नू ------- 178
इलाहाबाद विश्वविद्यालय ------- 508
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ------- 298
अंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ ------- 22
सेंट्रल यूनिवर्सिटी पंजाब ------- 96
सेंट्रल यूनिवर्सिटी हिमाचल प्रदेश ------- 117
सेंट्रल यूनिवर्सिटी जम्मू कश्मीर ------- 52

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आप की राय -
Alok Singh, Pratapgarh
सुनकर बड़ी खुसी हुई की प्राथमिक विद्यालयों में आध्यापको की नियुक्ति प्रक्रिया प्रारंभ होने वाली है. लेकिन अभी भी लगता नहीं की यह अभियान सफल होगा. क्योकि सरकार चाहती नहीं है. मायावती नें टी.इ. टी. की प्रक्रिया इसलिए सुरु की थी जिससे की वोट कें लिए धन का इंतजाम हो जाय और हुआ भी वही. मायावती का यह नारा है मुख्यमंत्री बनना हैं और सभी जिलो का नाम बदलना है. बेवजह .
Lajja ram, Pilkhuwa
Bharti kyo nhi ho rhi h.ek or to hm "siksha ka adhikar kanun" bna chuke h or dusri trf bhrti prkriya thpp pdi h. India is grret
Renu Tiwari, Lucknow
नमस्कार उजाला ,, आपकी यह जानकारी सुनकर बहुत दुःख हो रहा है इतने पद रिक्त होते हुए भी शिक्षकों की भारती नहीं की जा रही है ये कैसी सरकारी योजना है बेरोजगारी भत्ता के पट्टे से ऐसे ही कई बेरोजगार बंधे जायेंगे लेकिन उन्हें रोजगार नहीं देंगे यही निति है सर्कार की पद रिक्त रखना भी इनके वोते बैंक को मजबूत करेंगे अगले सत्र के लिए ..वह सर्कार राज है .....

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

समाजवाद बनाम पिछड़ा वर्ग


समाजवाद और पिछड़े वर्ग के अंतःसंबंधो पर एक नया दस्तावेज
पुस्तकः
समाजवाद बनाम पिछड़ा वर्ग
लेखकः
कौशलेन्द्र प्रताप यादव
प्रकाशकः सम्यक प्रकाशन,नई दिल्ली
मूल्य- 75 रु.,पृष्ठ- 112

भारत में अपने स्थापना काल से ही समाजवादियों को पिछड़ा वर्ग प्रेम जग जाहिर है। इसके ऐतिहासिक कारण रहे हंै। कांग्रेस जहां दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम गठजोड़ को प्राथमिकता देती थी, वहीं दक्षिणपंथी ताकतें सवर्ण वर्चस्व को और मजबूत करना चाहती थीं। समाजवादियों ने इसीलिए पिछड़े वर्ग पर अपना दांव लगाया और ‘‘सोशलिस्टो ने लगाई हांक-पिछड़ा पावैं सौ में साठ’’ की हांक लगाई। मंडल आयोग की रिपोर्ट जिसे पिछडे़ वर्ग की बाइबिल कहा जाता है का गठन प्रथम समाजवादी सरकार में हुआ और इसे लागू भी उस वी0पी0 सिंह की सरकार में किया गया जिसमें समाजवादियों का वर्चस्व था।
इस पुस्तक के लेखक कौशलेन्द्र को पिछड़ा वर्ग आंदोलन का थिंक टैंक कहा जाता है। न केवल अपने लेखन से वरन जगह-जगह पिछड़े वर्ग पर अधिवेशन आयोजित कर वो अपनी सक्रियता बनाये रखते हैं। समाजवाद और पिछड़े वर्ग पर उनके जो लेख इधर राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में आए हैं उसी का संग्रह है यह पुस्तक। इसकी प्रस्तावना प्रख्यात समाजवादी लेखक मस्तराम कपूर ने लिखी है।
पुस्तक का प्रथम लेख लोहिया और अंबेडकर के संबंधों पर है। लोहिया और अंबेडकर के तथाकथित अनुयायियों को यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। उ0प्र0 में लोहिया के तथाकथित अनुयायियों द्वारा अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने की जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हो रही है और दोनों को एक दूसरे से बड़ा बनाने की जो घिनौनी कोशिशंे हो रही हैं,इस दौर में इस लेख की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। लोहिया और अंबेडकर कैसे गठबंधन करके चुनाव लड़ना चाहते थे और कैसे एक राष्ट्रीय दलित-पिछड़ा महाजोट बनाना चाहते थे इस पर यह लेख प्रकाश डालता है। अंबेडकर पर लोहिया की यह टिप्पणी कि ‘‘गांधी के बाद इस देश में अगर कोई महान है तो वो अंबेडकर है’’ और अंबेडकर की यह टिप्पणी कि ‘‘समाजवादियों ने मुझसे गठबंधन करके मुझे राजनैतिक रूप से अछूत होने से बचा लिया’’ इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हालांकि इस पुस्तक में एक से अच्छे दूसरे लेख हंै लेकिन जिस एक लेख के लिए लेखक और यह पुस्तक याद रखी जायेगी वो यही लेख है। इस लेख में लेखक अंत में यह टिप्पणी करके पाठकों को भावुक कर देता है कि ‘‘अफसोस कि लोहिया और अंबेडकर के वारिस ही उनकी वसीयत और विरासत को  संजोकर नहीं रख पाये।’’
लोहिया पर इस पुस्तक में कई लेख है, जो उनके व्यक्तित्व और संघर्ष के कई अनछुए पहलू सामने लाते हंै। ‘‘लोहिया बनाम नेहरू’’ के अपने लेख में नेहरू और लोहिया की विचारधाराओं को सामने रखकर उनकी टकराहट की वजहें भी बताई गई हंै। 1962 के युद्ध में चीन ने जब भारतीय भूभाग के 14500 वर्ग मील पर कब्जा कर लिया तो लोहिया और दूसरे नेताओं ने नेहरू को संसद में घेरा। इस पर नेहरू ने जवाब दिया कि ‘‘चीन ने जिस भूभाग पर कब्जा किया है वह बर्फीला और बंजर है। उसे लेकर हमें ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।’’ इस पर लोहिया ने नेहरू की चुटकी ली कि ‘‘आपकी खोपड़ी भी बंजर है, इसे भी चीन भेज दीजिए।’’ ऐसी न जाने कितनी ऐतिहासिक टिप्पणियां इस पुस्तक में दर्ज हंै जो इसे एक दस्तावेज बनाती हैं। ‘‘लोहिया के विविध रंग’’ नामक अपने लेख में लेखक ने दिखाया है कि लोहिया एक्टिविस्ट होने के अतिरिक्त एक कला मर्मज्ञ भी थे। इसमें लोहिया का नारी विषयक चिंतन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिसमें वो स्त्रि़यों को श्रीमती न कहकर श्री कहते और द्रौपदी को भारतीय इतिहास ही नहीं वरन विश्व इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्त्री घोषित करते हैं।
भारत छोड़ो आंदोलन और अन्य कई किसान आंदोलनों में समाजवादियों की भूमिका का रेखांकन अभी तक नहीं हुआ है। ‘भारत छोड़ो आंदोलन में समाजवादियों का योगदान’ ऐसा ही एक लेख है, जिसमें कौशलेन्द्र का विशद ऐतिहासिक अध्ययन सामने आता है, जिसमें उन्होंने 1942 के आंदोलन में महाराष्ट्र, बिहार,उ0प्र0 और मध्य भारत में समाजवादियों के संघर्ष का गहराई से पड़ताल किया है। ‘कांग्रेस के कब्जे में समाजवाद’ इसी प्रकार का एक अन्य ऐतिहासिक लेख है, जिसमें कांग्रेस को न समझ पाने की दिशाहीनता समाजवादियों की कमजोरी के रूप में उसके स्थापना काल से ही रही है। उल्लेखनीय है कि समाजवादियों के आज तक जितने भी विभाजन हुए हंै चाहे वह अशोक मेहता ने किया हो या चन्द्रशेखर ने, उसके पीछे कांग्रेस का ही मंथरा परामर्श रहा है। इसी क्रम में लेखक वामपंथियों की भी गहरी जांच परख करता है और चुटकी लेते हुए कहता है कि जहां चार वामपंथी रहते है, वहां पांच प्रकार की राय सामने आती है।
उ0प्र0 की नयी बनी अखिलेश की समाजवादी सरकार पर भी पुस्तक में दो-तीन लेख हंै जिसमें उसकी चुनौतियां, पिछड़ा वर्ग आंदोलन को लेकर उससे अपेक्षाएं और कानून व्यवस्था पर उठ रहे सवालों पर एक विमर्श किया गया है।
पुस्तक में प्राकृतिक प्रकोपों पर भी समाजवादी दृष्टिकोण से चर्चा की गई है। इसमें माक्र्स की वो टिप्पणी भी दर्ज है जिसमें वो एंगेल्स से कहते हंै कि ‘‘सभ्यता जब अविवेकपूर्ण ढंग से विकसित होती है तो अपने पीछे रेगिस्तान छोड़ जाती है।’’ यहां एक मर्मांतक टिप्पणी लोहिया की भी है जिसमें वो कहते है कि ‘‘विचारों के अकाल से पड़ता है सूखा।’’
इस पुस्तक में कुछ अन्य पठनीय लेख है-ममता क्यों हैं निर्मम, किन्नर और दरगाहों से उठे मोहब्बत के पैगाम। ममता वाले अपने लेख में लेखक ममता के उलझे चरित्र पर मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रकाश डालता है। इस क्रम में लेखक की दृष्टि जयललिता और मायावती से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी तक जाती है और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि अविवाहित लोग क्यों आदर्शवादी या यूटोपियन ज्यादा होते हंै और कुछ बिन्दुओं पर यथार्थ से कोसांे दूर। ‘दरगाहों से उठे मोहब्बत का पैगाम’ में भारत और पाकिस्तान में फैली महत्वपूर्ण सूफी दरगाहों का उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ भारत-पाक संबंधों पर उनके महत्व को रेखांकित करता है। किन्नरों की त्रासदी पर लेखक ने इतने मार्मिक ढंग से लेखनी चलाई है कि पाठक रोने को मजबूर हो जाता है।
पिछड़ा वर्ग आंदोलन पर मस्तराम कपूर, वासुदेव चैरसिया, प्रो0 चैथीराम यादव, जवाहर लाल नेहरू वि0वि0 के डा0 विवेक कुमार और गुलाबी गैंग की कमांडर सम्पत पाल के साक्षात्कार इस पुस्तक को और भी जीवंत बनाते हंै।
कुल मिलाकर इस पुस्तक में कौशलेन्द्र का लेखक उनके आंदोलनधर्मी चरित्र पर भारी पड़ गया है। इस पुस्तक में लोहिया और अंबेडकर के अंतर्सबंधों के माध्यम से न केवल दलितों-पिछड़ों के विभाजन को पाटने की कोशिश है, वरन भटके हुए समाजवादी आंदोलन पर तंज भी है। हिंदी पट्टी से  कांग्रेस क्यों गायब हो रही है, इसकी एक बड़ी वजह लेखक यह भी बताता है कि कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के साथ हमेशा सौतेला रवैया अपनाया। काका कालेलकर से लेकर मंडल आयोग तक, जाति जनगणना से लेकर पदोन्नति में आरक्षण तक, सब जगह कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग को दरकिनार किया। जांच-परख करते हुए पूरी पुस्तक में लेखक ने बख्शा किसी को नहीं है और सबको बड़ी बेरहमी से लताड़ लगाई है। लेकिन मूलतः एक्टिविस्ट होने के कारण कौशलेन्द्र ने भविष्य के संघर्षों के संकेत भी दिए हंै।
यह पुस्तक इसलिए लम्बे समय तक याद रखी जायेगी क्योंकि इसमें समाजवाद और पिछड़ा वर्ग आंदोलन का न केवल इतिहास दर्ज है वरन् गुमरह लोगों के लिए भविष्य के संघर्षों का संकेत भी।

बुधवार, 5 सितंबर 2012

इसकी क्या जरूरत थी .............



राज्यसभा में सपा और बसपा सांसदों में हाथापाई

 बुधवार, 5 सितंबर, 2012 को 13:17 IST तक के समाचार
सपा और बसपा आरक्षण के मुद्दे पर आमने सामने खड़े हैं.
सरकारी नौकरियों में प्रमोशन (पदोन्नति) में आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर राज्यसभा के भीतर चलते सत्र के दौरान सांसदों में हाथापाई हो गई है.
राज्यसभा टेलीविजन चैनन में समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल और बहुजन समाज पार्टी के अवतार सिंह के एक दूसरे को धकियाने और गुत्थमगुत्था होने के दृश्य प्रसारित किए गए हैं.
अवतार सिंह सदन के केंद्र की तरफ बढ़ते हुए देखे गए. पर तभी समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल ने आगे बढ़कर दोनों हाथों से उनका रास्ता रोकने की कोशिश की.
इस पर अवतार सिंह उनसे गुत्थमगुत्था होते दिखे.
फिर दोनों स्कूली लड़कों की तरह एक दूसरे को हाथों के जोर से पीछे धकेलते हुए नजर आए.
एक दो सांसद बेमन से बीच बचाव करने आए लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा. सदन के बाकी सभी सदस्य अपनी अपनी सीटों पर बैठे रहे.
ये हाथापाई सदन के पटल पर विधेयक रखे जाने के कुछ ही देर बाद शुरू हो गई.
इसके बाद राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई है.

राजनीति

बसपा के अवतार सिंह समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल की भिड़ंत.
समाजवादी पार्टी ने खुले तौर पर इस विधेयक के विरोध का ऐलान किया है और बहुजन समाज पार्टी इसका समर्थन कर रही है.
इस विधेयक को मंगलवार को कैबिनेट ने मंज़ूर दी थी.
जहाँ देश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण पहले से मौजूद है, वहीं ताजा प्रस्ताव के तहत नौकरी पा चुके अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए पदोन्नति में भी आरक्षण का प्रावधान किया जाएगा.
भारत का सुप्रीम कोर्ट प्रमोशन में आरक्षण को गैरकानूनी ठहरा चुकी है और यदि इसे लागू करना है तो सरकार को इस मामले को संसद में लाकर संसदीय मंजूरी लेनी होगी.
समाजवादी पार्टी कहती है कि सरकार कोयला घोटाले से ध्यान हटाने के लिए इस विधेयक को लाई है.
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कहा है कि अगर सरकार इस प्रस्ताव को संसद के वर्तमान सत्र में पारित नहीं कराती तो ये माना जाएगा कि सरकार गरीबों को ये सुविधा देना नहीं चाहती है.
असल में पूर्व में उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मायावती सरकार ने सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस फैसले को खारिज कर दिया था जिसके बाद केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर विधेयक लाने का फैसला किया है.

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

कांग्रेस ने ओबीसी के लिए भी आरक्षण की मांग की


प्रोन्नति में कोटे को हरी झंडी

Sep 04, 12:31 pm
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। कोयला ब्लॉक आवंटन में चौतरफा घिरी सरकार ने आरक्षण का दांव खेल दिया है। केंद्रीय कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों की प्रोन्नति में भी अनुसूचित जाति [एससी] और अनुसूचित जनजाति [एसटी] को आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल को मंगलवार को हरी झंडी दे दी। सरकार बुधवार को ही इस विधेयक को राज्यसभा से पारित कराने की कोशिश में है। हालांकि सपा के विरोध के कारण आशंकाएं बरकरार हैं।
संविधान के अनुच्छेद 16 [4] में संशोधन किए जाने को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट की मंजूरी मिलते ही राजनीति भी शुरू हो गई है। बसपा प्रमुख मायावती व कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया, लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान समेत एससी/एसटी समुदाय के दूसरे सांसदों ने खुशी जाहिर की है। मायावती ने अपने सांसद सतीशचंद्र मिश्र के साथ राजग नेताओं खासकर भाजपा के सुषमा स्वराज और अरुण जेटली से मिलकर विधेयक को इसी सत्र में पारित कराने के लिए मदद मांगी है। इतना ही नहीं, सपा व गैर एससी/एसटी सांसदों के विरोध को देखते हुए माया ने पिछड़े समुदाय को भी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण का प्रावधान इसी विधेयक में किए जाने की पैरवी कर दी है। संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि सरकार बिल पारित कराने के लिए कटिबद्ध है। बुधवार को राज्यसभा में दोपहर 12 बजे या फिर दो बजे बिल पेश किया जाएगा।
पासवान ने भी कहा कि यह विधेयक पारित होते ही ओबीसी के लिए भी ऐसा ही बिल लाया जाए तथा अगड़ी जातियों के गरीबों के लिए आरक्षण का इंतजाम किया जाए, लेकिन मामला इतना आसान नहीं है। सपा ने विधेयक के विरोध का एलान कर दिया है। सपा प्रवक्ता प्रो. रामगोपाल यादव ने कहा, 'जिस मामले को सुप्रीम कोर्ट चार बार खारिज कर चुका हो, उसे पलटने के लिए संविधान संशोधन का कदम प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। हम पहले भी इसके विरोध में थे। वह अब भी संसद के भीतर और बाहर जारी रहेगा।'
दूसरे दलों में भी इस मुद्दे पर अंदरूनी मतभेद है। माना जा रहा है कि ऐसे दल चुप होकर स्थिति को देखेंगे। भाजपा की परेशानी यह है कि अगर वह कोयला ब्लॉक को लेकर विरोध बरकरार रखती है और संसद बाधित होती है तो ठीकरा उसके सिर फूटेगा। और शांत रहती है तो माना जाएगा कि कोयले पर उनका विरोध खत्म हो गया है। इतना तय है कि पार्टी विधेयक का विरोध नहीं करेगी।
बताते हैं कि संशोधन के बाद संविधान के अनुच्छेद 16 व 335 प्रोन्नति में आरक्षण में बाधा नहीं बनेंगे। इस मामले में 19 अक्टूबर, 2006 को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला निष्प्रभावी हो जाएगा। केंद्रीय नौकरियों में उनके लिए आरक्षण का लाभ प्रोन्नति में तो मिलेगा ही, जबकि राज्यों की नौकरियों में यह उनकी आबादी के लिहाज से परिणामी ज्येष्ठता [कांसीक्वेंशियल सीनियारिटी] के आधार पर प्रोन्नति मिल सकेगी।
प्रोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की शर्ते
1-प्रोन्नति में कांसीक्वेंशियल सीनियारिटी का फायदा [आरक्षण] तभी मिल सकता है, जब एससी/एसटी का समुचित प्रतिनिधित्व न हो।
2-नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के पिछड़ेपन का समुचित डाटा उपलब्ध हो।
3-इससे प्रशासनिक दक्षता न प्रभावित नहीं होती हो।

रविवार, 26 अगस्त 2012

नेता जी के नाम खुला पत्र

माननीय श्री मुलायम सिंह यादव जी
राष्ट्रीय  अध्यक्ष
समाजवादी पार्टी

महोदय,
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का पदोन्नतियों में आरक्षण का मुद्दा काफी गरम है तथा संविधान में संषोधन न करके पुनः पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था करने का प्रयास किया जा रहा है तथा पूर्ण संम्भावना है कि संविधान में संषोधन कर पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था पुनः कर दी जायेगी।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को नियुक्तियों व पदोन्नतियों में आरक्षण प्रारम्भ से ही है ये व्यवस्था प्रथमवार दस वर्ष के लिये की गयी थी परन्तु प्रति दस वर्ष पुनः दस-दस वर्ष करके बढाया जाता रहा है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की पदोन्नति में आरक्षण पर किसी को आपत्ति नहीं रही, पदोन्नति मंे आरक्षण के बावजूद निष्चित अनुपात में उच्च पदों पर अब भी कोटा पूरा नहीं है। पदोन्नतियांे में आरक्षण निष्चित ही होना चाहिए। इसमें किसी को आपत्ति नहीं थी।
समस्या तब उत्पन्न हुई जब कुछ अति महत्वाकांक्षी अधिकारियों ने गलत सलाह देकर पदोन्नतियों में परिणामी लाभ देने का आदेष करा दिया तथा पदोन्नतियों में परिणामी लाभ की व्यवस्था कर दी गयी इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जूनियर अधिकारी भी कई-कई बैच सीनियर से भी आगे जाने लगे तब जाकर पदोन्नतियों में आरक्षण पर भी प्रष्न चिन्ह लग गया जिसको माननीय उच्च न्यायालय ने अवैध ठहराया। बाद में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी पदोन्नतियों में आरक्षण को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अवैध ठहराने की पुष्टि कर दी।
अब संविधान में संषोधन करके पुनः पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए की जा रही है।
पिछड़े वर्गों को नियुक्तियों में भी आरक्षण नहीं था जबकि काका कालेकर आयोग एवं मण्डल आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों की नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था करने की संस्तुति बहुत पहले की गयी थी। सर्वप्रथम उत्तर प्रदेष में वर्ष 1977 में माननीय श्री रामनरेष यादव जी के नेतृत्व में बनी सरकार में 15 प्रतिशत नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। बाद में भारत सरकार ने 27 प्रतिशत नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था की। पिछड़े वर्गों के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की कोई व्यवस्था न उत्तर प्रदेष में है और न भारत सरकार में हंै।
अब क्योंकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए संविधान में संषोधन करके पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था की जा रही है। इसी के साथ पिछड़े वर्गों के लिए भी पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था का प्रष्न उठाया जाना आवष्यक हो गया है। क्योंकि पिछड़े वर्गों की आबादी 55 प्रतिषत से अधिक है परन्तु आरक्षण 27 प्रतिषत ही दिया गया है इस तरह पिछड़ों का राजकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व बहुत कम है। उच्च पदों पर सीधी भर्ती नहीं होती तथा पदोन्नतियोें में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व अत्यंन्त ही कम है। ऐसी परिस्थिति में पिछडे वर्गों का उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व कैसे पूरा हो सकता है। इस बिन्दु पर विचार किया जाना अत्यंन्त आवश्यक है। क्योंकि नये सिरे से पदोन्नतियों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण की व्यवस्था हो रही है। इस संम्बन्ध में मेरा सुझाव है कि पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दी है। अतः पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था पुनः न करके अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के लिए जिनको वर्तमान में नियुक्तियों में अर्थात् सीधी भर्ती में आरक्षण की व्यवस्था है इसी आरक्षण का विस्तार करके सभी पदों पर, चाहे वह सीधी भर्ती से भरे जायें या चाहे पदोन्नति से भरे जायें, लम्बवत् (Vertical/Perpendicular) आरक्षण की व्यवस्था कर दी जाये तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होगी इसका लाभ यह होगा कि सीधी भर्ती में तो 27 प्रतिशत, 21 प्रतिषत व 2 प्रतिषत की भर्ती हो जाती है तो पदोन्नतियों में भी 27 प्रतिषत, 21 प्रतिषत व 2 प्रतिषत की व्यवस्था हो जायेगी। इससे कालान्तर में 27 प्रतिषत, 21 प्रतिषत व 2 प्रतिषत पदों पर आरक्षित वर्गों का अनुपात हो जायेगा। इससे उस विसंगति को भी समाप्त किया जा सकेगा जहां 50 प्रतिषत नियुक्ति सीधी भर्ती से होती है एवं 50 प्रतिषत नियक्तियाँ पदोन्नति से होतीं हैं। वहां पिछड़े वर्गों को सीधी भर्ती मंे 27 प्रतिषत का लाभ मिलता है परन्तु पदोन्नतियों में कोई लाभ न मिलने से 27 प्रतिषत का अनुपात कभी पूरा नहीं हो पाता। कुछ पद शत् प्रतिषत पदोन्नति से ही भरे जाते हैं वहां पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिषत का अनुपात कभी भी पूरा नहीं हो सकता। सभी नियुक्तियांे पर लम्बवत् (Vertical/Perpendicular) आरक्षण का लाभ होने पर शत्प्रतिशत पदोन्नति से भरे जाने वाले पदों पर भी 27 प्रतिषत, 21 प्रतिषत व 2 प्रतिषत का लाभ स्वतः मिलने लगेगा। 
           यहाँ यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि जहां सीधी भर्ती में पिछड़े वर्गों का आरक्षण है वहां पदोन्नति से नियुक्तियों में आरक्षण नहीं है, नियुक्ति दोनों प्रकार के पदों पर होती है। फिर चाहे सीधी भर्ती से हो या पदोन्नति से। पदोन्नति के बाद उच्च पद पर नियुक्ति की जाती है। अतः सीधी भर्ती या पदोन्नति से भर्ती का विचार किये बिना सभी पदों पर नियुक्तियों में लम्बवत् (Vertical/Perpendicular) आरक्षण की व्यवस्था करने का विचार करना अतिआवश्यक है। क्योंकि नये सिरे से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था करने पर विचार किया जाना है उसका विरोध कोई पार्टी नहीं करेगी। परन्तु इसी के साथ पिछड़े वर्गों के लिए सभी स्तर के पदों पर नियुक्तियों में लम्बवत् (Vertical/Perpendicular) आरक्षण की व्यवस्था करने पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।
इस समय हमारा पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व पिछड़े वर्ग का समाज चूक गया तो फिर ऐसा समय कभी नहीं मिलेगा तथा भावी पीढियों हमको सदैव कोसेंगीं। अतः समय है हम जागरूक हों तथा सजग होकर मांग करें। हम कुछ मांग नहीं रहे हैं केवल सभी पदों पर नियुक्तियों में तथा पदोन्नतियों में लम्बवत् (Vertical/Perpendicular) आरक्षण की मांग कर रहे हैं जोकि हमारा हक है।
       आज जरूरत अनुसूचित जातियों के प्रमोशन में आरक्षण का विरोध नहीं बल्कि पिछड़ों के प्रमोशन में में भी आरक्षण की मांग की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो समता मूलक समाज बनाने के बजे विषमता  रहेगी और द्विज सामराज्य प्रभावी रहेगा .
(डॉ.लाल रत्नाकर)


शनिवार, 25 अगस्त 2012

प्रमोशन में आरक्षण

प्रमोशन में आरक्षण पर सरकार के सामने फंसा नया पेच

नई दिल्ली/ब्यूरो
Story Update : Sunday, August 26, 2012    12:41 AM
ag warns govt on Reservation in promotion
अनुसूचित जाति व जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण देने संबंधी विधेयक लाने का वादा कर चुकी केंद्र सरकार के सामने अब नया पेच फंस गया है। केंद्र को उसके ही शीर्ष विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने सलाह दी है कि सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रस्ताव कानूनी तौर पर पुख्ता नहीं है।

उन्होंने सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि इस विषय पर कोई भी कानून लाते समय सतर्कता बरती जाए। इस तरह के कानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, जबकि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश की ओर से पदोन्नति में आरक्षण देने के कानून को निरस्त कर चुका है।

वाहनवती की ओर से यह राय कार्मिक मंत्रालय को भेजी गई है। हाल ही में सरकार ने टिकाऊ संशोधन कर एससी/एसटी को प्रमोशन में आरक्षण का भरोसा राजनीतिक दलों को दिलाया था। वाहनवती ने सरकार को इस मुद्दे पर सावधानी से कदम बढ़ाने की नसीहत देते हुए कहा है कि संशोधन के लिए प्रस्तावित कदम मजबूत होने चाहिए क्योंकि नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर लोग अदालत में इसे चुनौती देंगे।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर सरकार को इस मुद्दे के सभी पहलुओं से अवगत कराते हुए पेचीदगियों की जानकारी भी दी है। सर्वोच्च अदालत ने 28 अप्रैल को पूर्व की मायावती सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी को दिए गए प्रमोशन में आरक्षण को निरस्त कर दिया था। इसी के बाद केंद्र सरकार ने इस आरक्षण के संबंध में संशोधन लाने को कहा था। हाल ही में इस मसले पर सर्वदलीय बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने रुख साफ करते हुए कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए सरकार टिकाऊ विधेयक लेकर आएगी।

विरोध में है सपा
समाजवादी पार्टी प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में है। उसका कहना है कि इससे सामाजिक भेदभाव बढ़ेगा।

भाजपा का रुख साफ नहीं
इस मुद्दे पर दुविधा में पड़ी भाजपा ने अपना रुख अब तक खुलकर जाहिर नहीं किया है। उसकी आशंका है कि प्रमोशन में आरक्षण को समर्थन पर उसका सबसे खास वोट बैंक सवर्ण नाराज हो जाएंगे, जबकि विरोध करने पर अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग।

सरकार ने किया वादा
सरकार ने हाल ही में राजनीतिक दलों को भरोसा दिलाया है कि उसने सभी कानूनी पहलुओं की जांच करने के बाद एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण मुहैया करने को लेकर संविधान में संशोधन करने का समर्थन किया है।

एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण मुहैया कराने के लिए प्रस्तावित कदम पर्याप्त रूप से मजबूत होना चाहिए क्योंकि इसे अदालत में चुनौती दिए जाने की प्रबल संभावनाएं है।
जीई वाहनवती, अटॉर्नी जनरल

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

जाटों को राज्य की सूचि से भी हटा देना चाहिए-
obcofindia

जाटों को केंद्र में आरक्षण दे सरकार

Aug 18, 02:06 am
कंकरखेड़ा : संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने शुक्रवार को रोहटा रोड स्थित बाबा भवन में कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया। समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ. एचपी सिंह परिहार ने कहा कि जाट बिरादरी पिछले कई सालों से केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग कर रही है। सात राज्यों में राज्य स्तर पर आरक्षण मिला हुआ है, लेकिन केंद्र स्तर पर राजस्थान के अलावा किसी अन्य राज्य को आरक्षण नहीं मिला।
उन्होंने कहा कि जाटों ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व रालोद के गठबंधन को इसी आश्वासन पर सहयोग दिया था कि जाटों को केंद्र में आरक्षण दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समिति के सुप्रीम काउंसिल के उपाध्यक्ष डीएम वर्मा ने कहा कि कुछ बिरादरी जाट आरक्षण का विरोध कर रही हैं। समिति के मुख्य संरक्षक चौ. ब्रह्मापाल सिंह एडवोकेट ने कहा कि संगठन को शक्तिशाली बनाना और विधिक रूप से मजबूत रखना सबका कर्तव्य हैं। वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चौ. ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा कि संगठन को मजबूती से अपना पक्ष आयोग और सरकार के समक्ष रखना है, उसके लिए आंदोलन को गति देना आवश्यक हो गया है। जिले में संगठनात्मक गतिविधिया तेज करने की जिम्मेदारी चौ. हरपाल सिंह गेझा व महानगर संयोजक की जिम्मेदारी चौ. रविंद्र मलिक को सौंपी गई। अध्यक्षता पूर्व अपर आयुक्त डीएम वर्मा ने व संचालन हरवीर सिंह सुमन ने किया। कर्नल एसएस धूम, राजीव चौधरी, रणसिंह, उदयवीर सिंह मलिक, चौ. कदम सिंह, जयवीर सिंह, धर्मवीर सिंह, देवकुमार सुनील बालियान आदि शामिल रहे।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

अहम् फैसला



पेट्रोल पंप आवंटन में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण

नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
Story Update : Friday, July 20, 2012    8:52 PM
27 percent reservation to OBCs in Petrol pump allotment
पेट्रोल पंप आवंटन की मौजूदा प्रक्रिया में सरकार ने अहम बदलाव का निर्णय लिया है। अब रिटेल आउटलेट (आरओ) डीलरशिप के आवंटन में ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 27 फीसदी आरक्षण होगा। इसके अलावा चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी रोकने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने लकी ड्रॉ के जरिए पेट्रोल पंप आवंटन संपन्न करने की योजना बनाई है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इससे रिटेल आउटलेट के डीलरशिप में पारदर्शिता आ सकेगा। मंत्रालय ने पिछड़े वर्ग को आर्थिक मदद के लिए यह निर्णय लिया है। आरक्षण के कारण नई प्रक्रिया में उन्हें डीलरशिप पाने में वरीयता मिल सकेगी। मालूम हो कि फिलहाल रिटेल आउटलेट डीलरशिप में 22 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए, 5 फीसदी शहीदों की विधवाओं और 5 फीसदी सेना के सेवानिवृत्त जवानों को लिए है। अब ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देकर इस सूची शामिल कर लिया गया है।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

सामाजिक परिवर्तन


सामाजिक परिवर्तन लायें लड़कियां: राष्ट्रपति

Updated on: Wed, 02 Nov 2011 08:36 PM 
Teach girls martial arts for protection: President
सामाजिक परिवर्तन लायें लड़कियां: राष्ट्रपति
लखनऊ [जागरण ब्यूरो]। तीन सदियों में अपने गौरवशाली इतिहास में महिलाओं की शिक्षा और उत्थान के असंख्य पन्नों को संजोये ईसाबेला थॉबर्न [आइटी] कॉलेज में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का बुधवार को पदार्पण यहां की छात्राओं के लिए यादगार लम्हा बन गया। जब राष्ट्रपति एशिया के पहले महिला क्रिश्चियन कॉलेज की होनहार छात्राओं से रूबरू हुयीं तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच इस यादगार लम्हे का साक्षी बनने के लिए वक्त भी ठहर गया था।
कॉलेज की स्थापना के 125 वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने छात्राओं को शिक्षित होकर न सिर्फ महिलाओं के प्रति भेदभाव बरतने वाली सामाजिक कुरीतियों की मुखालिफत करने की नसीहत दी बल्कि उनसे सामाजिक परिवर्तन का सूत्रधार बनने का भी आह्वान किया।
शैक्षिक यात्रा के साथ राष्ट्रपति ने प्रतीकस्वरूप 125 लाइटों से सुसज्जित दीपमाला को प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारम्भ किया।
समारोह में उपस्थित छात्राओं और देश-विदेश से आये अतिथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा किसी देश की सामाजिक स्थिति का आकलन वहां की महिलाओं को हासिल दर्जे और हैसियत से किया जाता है।
महिलाओं की शिक्षा का उनकी तरक्की और आर्थिक स्वावलंबन से सीधा रिश्ता रहा है। यह भी कड़वा सच है कि शिक्षित महिलाओं की सफलताओं के किस्सों के बीच अशिक्षा व सुविधाओं से वंचित होने की चर्चाएं भी प्राय: सुनने को मिलती हैं।
यह विडंबना ही है कि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के असंभव को संभव कर दिखाने ने के बावजूद आज भी देश में बहुसंख्य महिलाएं लिंग भेद व सामाजिक कुरीतियों का शिकार हैं।
उन्होंने कॉलेज की युवा छात्राओं से इन सामाजिक कुरीतियों से लड़ने तथा इनका शिकार महिलाओं की मदद करने का आह्वान किया। छात्राओं को तरक्की में साझेदार बनने की नसीहत देते हुए उन्होंने कामकाजी महिलाओं के समक्ष बच्चों के पालन-पोषण, घरेलू और पेशेवर जिंदगियों में सामंजस्य और रिश्तों पर पड़ने वाले उनके प्रभावों जैसी चुनौतियों के प्रति भी सचेत किया। कॉलेज की स्थापना के 125 वर्ष पूरे होने की स्मृति में उन्होंने शिलापट का अनावरण भी किया।
अपने संबोधन में राज्यपाल बीएल जोशी ने कॉलेज को उसकी उपलब्धियों के लिए साधुवाद दिया। राज्यपाल ने कॉलेज की इतिहास पुस्तिका और पूर्व छात्राओं के संस्मरणों के संकलन का विमोचन भी किया।
इससे पहले कॉलेज की प्रधानाचार्या डॉ.ईएस चा‌र्ल्स ने कॉलेज के इतिहास और यहां पढ़कर विभिन्न क्षेत्रों में शोहरत हासिल करने वाली नामचीन पूर्व छात्राओं का उल्लेख किया।
अपने उद्घाटन भाषण में कॉलेज की सोसाइटी के अध्यक्ष बिशप तारानाथ सागर ने राष्ट्रपति से देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबों के उत्थान के क्षेत्रों में काम कर रहे ईसाई मिशनरी व अल्पसंख्यकों की हिफाजत के लिए सरकार की ओर से उचित कदम उठाने का अनुरोध किया।
इस मौके पर भारत के चीफ पोस्ट मास्टर जनरल कर्नल कमलेश चंद्रा ने आइटी कॉलेज पर जारी डाक टिकट का अनावरण कर राष्ट्रपति को एल्बम भी भेंट किया। कार्यक्रम में नगर विकास मंत्री नकुल दुबे भी उपस्थित थे।
जूडो-कराटे सीखें लड़कियां
कॉलेज की छात्राओं से मुखातिब राष्ट्रपति ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर भी अपने सरोकार जताएं। खुद को अपराधियों से बचाने के लिए उन्होंने लड़कियों को जूडो-कराटे सीखने की नसीहत दी। यह कहते हुए कि आत्मरक्षा ही महिलाओं की सुरक्षा का सबसे कारगर तरीका है।
उन्होंने कहा यह चिंता का विषय है कि 21वीं सदी में परिवारीजन अपनी महिला सदस्यों की सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद रहते हैं। कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाओं को इस समस्या से निपटने के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
लड़कियों को पढ़ायें, हर गली में मिलेंगे फरिश्ते
समारोह में राष्ट्रपति के उद्बोधन से पहले राज्यपाल ने छात्राओं को संबोधित किया। उन्होंने लखनऊ की शान में एक शेर सुनाया जिसकी आखिरी पंक्ति यूं थी कि इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं।
छात्राओं से रूबरू हुयीं राष्ट्रपति ने भी महिला शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया। भाषण के अंत में उन्होंने राज्यपाल के सुनाये गए शेर की आखिरी पंक्ति का जिक्र करते हुए कहा कि सारी लड़कियों को पढ़ाइये, हर गली में आपको फरिश्ते मिल जाएंगे। राष्ट्रपति का यह कहना था कि पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

बुधवार, 13 जून 2012

केंद्र सरकार को झटका


अल्पसंख्यक आरक्षण: हाईकोर्ट के फैसले पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

 बुधवार, 13 जून, 2012 को 12:43 IST तक के समाचार
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग से 4.5 प्रतिशत आरक्षण को संविधान और कानून के हिसाब से सही नहीं बताया है
सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़े वर्गों के 27 प्रतिशत आरक्षण में से धार्मिक अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था को खारिज करने वाले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से केंद्र सरकार को झटका लगा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 27 प्रतिशत आरक्षण में से ही अल्पसंख्यकों के लिए इस वर्ष जनवरी से 4.5 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का सरकार का फैसला प्रथम दृष्टया संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नजर नहीं आता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग की तरह, अल्पसंख्यकों के लिए अलग से 4.5 प्रतिशत आरक्षण किसी कानून के हिसाब से भी नहीं मुनासिब नहीं लगता है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अन्य पिछड़ा वर्गों के छात्रों को आईआईटी में अब 443 सीटें और मिलेंगी जिन्हें 4.5 प्रतिशत आरक्षण की बुनियाद पर अल्पसंख्यकों के लिए अलग रख दिया गया था.
आईआईटी संस्थानों में प्रवेश के लिए काउंसलिंग का बुधवार को आखिरी दिन है.

शुक्रवार, 1 जून 2012

बिहार में फिर शुरू हो सकता है खूनी संघर्ष!


ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या, बिहार में फिर शुरू हो सकता है खूनी संघर्ष!
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:01-06-12 05:00 PM
Last Updated:01-06-12 05:27 PM
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रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद बिहार में एक बार फिर से खूनी संघर्ष शुरू होने की आशंका घिरने लगी है। आरा जिले में मुखिया की हत्या के बाद 80 के दशक में जो खूनी खेल ठाकुर और नक्सलियों में शुरु होकर 90 तक चला था, उस जातीय युद्ध के बीज अब फिर से पकने लगे हैं।
राज्य में 90 के दशक में हुए कई नरसंहारों में रणवीर सेना का हाथ माना जाता है। हाल ही में ब्रह्मेश्वर सिंह को बथानी टोला नरसंहार मामले में बाइज्जत बरी कर दिया गया था। हालांकि हाई कोर्ट के इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई भी थी।
जानकारों का कहना है कि ब्रह्मेश्वर की हत्या बथानी में किए गए नरसंहार का बदला है। ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया बिहार का जाना माना नाम है और वो रणवीर सेना के कारण चर्चा में आए थे। कई संगीन अपराधों में शामिल सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह हाल ही में जेल से रिहा हुये थे।
जेल से निकलने के साथ ही किसानों के लिए एक संगठन की स्थापना भी की थी जो किसानों के हित के लिए संघर्ष करता। लेकिन मुखिया की हत्या की इस घटना के बाद से ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं फिर से बिहार में खूनी संघर्ष का दौर ना शुरू हो जाए।
उधर बथानी नरसंहार में बरी किए जाने के खिलाफ माले भी लगातार धरना प्रदर्शन कर रहा था। आरा में पिछले 26 मई से धरना पर बैठे माले के पूर्व विधायक सुदामा प्रसाद को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। पुलिस ने ये कदम उनकी सुरक्षा के कारण उठाया है।
जानिए आखिर कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया!
बिहार की जातिगत लड़ाइयों का एक चर्चित चेहरा थे ब्रह्मेश्वर मुखिया। बिहार राज्य में एक वक्त ऐसा आया जब नक्सली संगठनों और बड़े किसानों के बीच खूनी लड़ाई का दौर चल पड़ा। इस दौरान ही ब्रह्मेश्वर मुखिया ने अपने नेतृत्व में अपनी एक सेना बनाई थी।
सितंबर 1994 में ब्रह्मेश्वर मुखिया के नेतृत्व में जो सगंठन बना उसे रणवीर सेना का नाम दिया गया। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने ऊंची जाति के जमींदारों की प्राइवेट आर्मी रणवीर सेना की शुरुआत की थी।
1994 से लेकर 2002 तक करीब 250 लोगों की हत्या के 22 मुकदमें का मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया को सबूतों के अभाव में कुछ दिन पहले ही जमानत दी गई थी।
ब्रह्मेश्वर मुखिया पर सबसे पहले अपने ही गांव खोपिरा में रक्तपात करने का आरोप लगा था। उसके बाद 2002 तक तकरीबन 22 बार दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतारने का आरोप लगाया गया।
इन आरोपों को जांच के लिए लिए जो अमीरदास आयोग बनी थी उसे जनवरी 2006 में भंग कर दिया गया था। अमीरदास आयोग का गठन तत्कालीन राजद सरकार ने रणवीर सेना पर लगे आरोपों की जांच करने के लिए किया था।
बिहार में ब्रह्मेश्वर मुखिया ने वर्ष 1994 के अंत में रणवीर सेना का गठन किया था। इस सेना पर 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा में पहली बार कहर बरपाने का आरोप लगा।
आरोप था कि इस दिन ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौजूदगी में रणवीर सेना ने 5 दलितों की हत्या कर दी थी। इसके करीब 3 महीने बाद रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के ही उदवंतनगर प्रखंड सरथुआं गांव में 25 जुलाई 1995 को 6 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
7 फरवरी 1996 को रणवीर सेना ने एक बार फिर भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के चांदी गांव में हमला कर 4 लोगों की हत्या कर दी। इसके बाद 9 मार्च 1996 को भोजपुर के सहार प्रखंड के पतलपुरा में 3, 22 अप्रैल 1996 को सहार प्रखंड के ही नोनउर नामक गांव में रणवीर सेना ने 5 लोगों की हत्या कर दी। 29 अप्रैल 1995 से लेकर 25 मई 1996 तक के बीच रणवीर सेना ने कुल 38 लोगों की हत्या कर दी।
11 जुलाई 1996 के दिन रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के ही बथानी टोला नामक दलितों और पिछड़ों की बस्ती पर हमला बोलकर 21 लोगों की गर्दन रेतकर हत्या कर दी।
वर्ष 1997 में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के बाहर कदम रखा और 31 जनवरी 1997 को जहानाबाद के मखदूमपुर प्रखंड के माछिल गांव में 4 दलितों की हत्या कर दी। इस घटना के बाद रणवीर सेना ने पटना जिले के बिक्रम प्रखंड के हैबसपुर नामक गांव में 10 लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को रणवीर सेना ने 26 मार्च 1997 को अंजाम दिया।
रणवीर सेना ने 31 दिसंबर 1997 को रणवीर सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मणपुर-बाथे नामक गांव में एक साथ 59 लोगों की निर्मम हत्या कर दी। यह बिहार में हुआ अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है।
25 जनवरी 1999 को रणवीर सेना ने जहानाबाद में एक और बड़े नरसंहार को अंजाम दिया। जहानाबाद के अरवल प्रखंड के शंकरबिगहा नामक गांव में 23 लोगों की हत्या कर दी गई।
इसके बाद 10 फरवरी 1999 को जहानाबाद के नारायणपुर में 12, 21 अप्रैल 1999 को गया जिले के बेलागंज प्रखंड के सिंदानी नामक गांव में 12, 28 मार्च 2000 को भोजपुर के सोनबरसा में 3, नोखा प्रखंड के पंचपोखरी में 3 और 16 जून 2000 को रणवीर सेना ने औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में 33 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी, इसमें 20 महिलाएं, 4 बच्चे और केवल 9 वयस्क पुरुष थे।
ब्रह्मेश्वर मुखिया के जिस्म पर हमलावरों ने दागी 40 गोलियां
नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान
First Published:01-06-12 03:04 PM
Last Updated:01-06-12 05:01 PM
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बिहार में रणवीर सेना के संस्थापक माने जाने वाले ब्रह्मेश्वर मुखिया की अज्ञात हमलावरों ने शुक्रवार तड़के गोली मारकर हत्या कर दी। वे सुबह चार बजे टहलने के लिए निकले थे, तभी पहले से घात लगाए अज्ञात अपराधियों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। अपराधियों ने उनके शरीर में लगभग 40 गोलियां दागी और फरार हो गए।

हत्या के बाद से आरा में रणवीर सेना समर्थकों ने जमकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया है। जगह-जगह आगजनी और तोड़फोड़ की सूचना है। आरा के कतिरा थाना क्षेत्र में जहां पर मुखिया की हत्या हुई है वहां पर स्थित हरिजन छात्रावास में आग लगा दी गई है।
इसके अलावा सर्किट हाउस में भी आगजनी और तोड़फोड़ की सूचना है। आरा प्रशासन ने हालात को काबू में रखने के लिए कर्फ्यू लगा दिया है। उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी किए गए हैं। लेकिन इसका कुछ खास असर नहीं दिख रहा है। पूरे बिहार में अलर्ट घोषित कर दिया गया है।
लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान ने रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की निंदा करते हुए शुक्रवार को इस घटना की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
     
पासवान ने कहा कि ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की सीबीआई से जांच होनी चाहिए। उनकी हत्या की घटना निंदनीय है। लोकतंत्र में हिंसा को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
बिहार की जातिगत लड़ाइयों का एक चर्चित चेहरा थे ब्रह्मेश्वर मुखिया। बिहार राज्य में एक वक्त ऐसा आया जब नक्सली संगठनों और बड़े किसानों के बीच खूनी लड़ाई का दौर चल पड़ा। इस दौरान ही ब्रह्मेश्वर मुखिया ने अपने नेतृत्व में अपनी एक सेना बनाई थी।
सितंबर 1994 में ब्रह्मेश्वर मुखिया के नेतृत्व में जो सगंठन बना उसे रणवीर सेना का नाम दिया गया। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने ऊंची जाति के जमींदारों की प्राइवेट आर्मी रणवीर सेना की शुरुआत की थी।
1994 से लेकर 2002 तक करीब 250 लोगों की हत्या के 22 मुकदमें का मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया को सबूतों के अभाव में कुछ दिन पहले ही जमानत दी गई थी।
ब्रह्मेश्वर मुखिया पर सबसे पहले अपने ही गांव खोपिरा में रक्तपात करने का आरोप लगा था। उसके बाद 2002 तक तकरीबन 22 बार दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतारने का आरोप लगाया गया।
इन आरोपों को जांच के लिए लिए जो अमीरदास आयोग बनी थी उसे जनवरी 2006 में भंग कर दिया गया था। अमीरदास आयोग का गठन तत्कालीन राजद सरकार ने रणवीर सेना पर लगे आरोपों की जांच करने के लिए किया था।
बिहार में ब्रह्मेश्वर मुखिया ने वर्ष 1994 के अंत में रणवीर सेना का गठन किया था। इस सेना पर 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा में पहली बार कहर बरपाने का आरोप लगा।
आरोप था कि इस दिन ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौजूदगी में रणवीर सेना ने 5 दलितों की हत्या कर दी थी। इसके करीब 3 महीने बाद रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के ही उदवंतनगर प्रखंड सरथुआं गांव में 25 जुलाई 1995 को 6 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
7 फरवरी 1996 को रणवीर सेना ने एक बार फिर भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के चांदी गांव में हमला कर 4 लोगों की हत्या कर दी। इसके बाद 9 मार्च 1996 को भोजपुर के सहार प्रखंड के पतलपुरा में 3, 22 अप्रैल 1996 को सहार प्रखंड के ही नोनउर नामक गांव में रणवीर सेना ने 5 लोगों की हत्या कर दी। 29 अप्रैल 1995 से लेकर 25 मई 1996 तक के बीच रणवीर सेना ने कुल 38 लोगों की हत्या कर दी।
11 जुलाई 1996 के दिन रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के ही बथानी टोला नामक दलितों और पिछड़ों की बस्ती पर हमला बोलकर 21 लोगों की गर्दन रेतकर हत्या कर दी।
वर्ष 1997 में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के बाहर कदम रखा और 31 जनवरी 1997 को जहानाबाद के मखदूमपुर प्रखंड के माछिल गांव में 4 दलितों की हत्या कर दी। इस घटना के बाद रणवीर सेना ने पटना जिले के बिक्रम प्रखंड के हैबसपुर नामक गांव में 10 लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को रणवीर सेना ने 26 मार्च 1997 को अंजाम दिया।
रणवीर सेना ने 31 दिसंबर 1997 को रणवीर सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मणपुर-बाथे नामक गांव में एक साथ 59 लोगों की निर्मम हत्या कर दी। यह बिहार में हुआ अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है।
25 जनवरी 1999 को रणवीर सेना ने जहानाबाद में एक और बड़े नरसंहार को अंजाम दिया। जहानाबाद के अरवल प्रखंड के शंकरबिगहा नामक गांव में 23 लोगों की हत्या कर दी गई।
इसके बाद 10 फरवरी 1999 को जहानाबाद के नारायणपुर में 12, 21 अप्रैल 1999 को गया जिले के बेलागंज प्रखंड के सिंदानी नामक गांव में 12, 28 मार्च 2000 को भोजपुर के सोनबरसा में 3, नोखा प्रखंड के पंचपोखरी में 3 और 16 जून 2000 को रणवीर सेना ने औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में 33 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी, इसमें 20 महिलाएं, 4 बच्चे और केवल 9 वयस्क पुरुष थे।
गौरतलब है कि ब्रह्मेश्वर पर राज्य सरकार ने पांच लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। उसे 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्जीबिशन रोड से गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया। करीब नौ वर्ष बाद ब्रह्मेश्वर 10 जुलाई 2011 को न्यायालय के आदेश के बाद जेल से बाहर आया।
जेल से बाहर आने के बाद पांच मई 2012 को ब्रह्मेश्वर ने भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से एक संगठन बनाया और कहा कि अब वह किसानों की हित की लड़ाई एक बार फिर लड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि ब्रह्मेश्वर के साक्ष्य के अभाव में अधिकांश मामलों में बरी हो जाने के बाद वर्तमान सरकार पर भी उसकी मदद करने का आरोप लगने लगा था।
जातीय संघर्ष का प्रमुख नाम था ब्रह्मेश्वर मुखिया
पटना, एजेंसी
First Published:01-06-12 02:28 PM
Last Updated:01-06-12 04:37 PM
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बिहार में रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ब्रह्मेश्वर मुखिया का नाम जातीय संघर्ष में प्रमुखता से लिया जाता है। ब्रह्मेश्वर की शुक्रवार सुबह चार बजे आरा जिले के कतिरा मुहल्ले में अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
रणवीर सेना ऊंची जातियों का संगठन माना जाता रहा है। बिहार में जातीय संघर्ष के दौर में ऊंची जाति के लोगों ने अपने हितों की लड़ाई लड़ने के लिए सितम्बर 1994 में ब्रह्मेश्वर मुखिया के नेतृत्व में रणवीर सेना का गठन आरा के पेलाउर गांव में किया था। धीरे-धीरे इस संगठन का वर्चस्व भोजपुर, बक्सर, औरंगाबाद, गया, भभुआ, पटना सहित कई जिलों में हो गया।
बिहार में कई नरसंहारों में रणवीर सेना का हाथ माना जाता रहा है। ब्रह्मेश्वर के नेतृत्व वाली इस सेना पर पहली बार 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा गांव में पांच दलितों की हत्या का आरोप लगा। कालांतर में इस संगठन की खूनी भिड़ंत नक्सली संगठनों से होने लगी। बाद में राज्य सरकार ने इस संगठन को प्रतिबंधित कर दिया गया।
नब्बे के दशक में बिहार के कई जिलों में नरसंहार का दौर प्रारंभ हुआ था, जिसमें सबसे बड़ा दिसंबर 1997 में हुआ जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार था। इसमें 58 दलितों की हत्या कर दी गई थी।
गौरतलब है कि इस मामले में न्यायालय ने 18 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, जबकि ब्रह्मेश्वर साक्ष्य के अभाव में बरी हो गया।
बिहार में करीब 277 लोगों की हत्या से सम्बंधित 22 अलग-अलग नरसंहारों में मुखिया को आरोपी बनाया गया था, जिसमें धीरे-धीरे कर 16 मामलों में उसे साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। जबकि छह अन्य मामलों में वह जमानत पर था। हाल ही में ब्रह्मेश्वर को बथानी टोला नरसंहार में बरी किया गया था।
गौरतलब है कि ब्रह्मेश्वर पर राज्य सरकार ने पांच लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। उसे 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्जीबिशन रोड से गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया। करीब नौ वर्ष बाद ब्रह्मेश्वर 10 जुलाई 2011 को न्यायालय के आदेश के बाद जेल से बाहर आया।
जेल से बाहर आने के बाद पांच मई 2012 को ब्रह्मेश्वर ने भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से एक संगठन बनाया और कहा कि अब वह किसानों की हित की लड़ाई एक बार फिर लड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि ब्रह्मेश्वर के साक्ष्य के अभाव में अधिकांश मामलों में बरी हो जाने के बाद वर्तमान सरकार पर भी उसकी मदद करने का आरोप लगने लगा था।
पासवान की मांग, ब्रह्मेश्वर हत्याकांड की हो CBI जांच
पटना, एजेंसी
First Published:01-06-12 02:23 PM
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लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान ने रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की निंदा करते हुए शुक्रवार को इस घटना की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
     
पासवान ने कहा कि ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की सीबीआई से जांच होनी चाहिए। उनकी हत्या की घटना निंदनीय है। लोकतंत्र में हिंसा को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
     
उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के सुशासन में विधि व्यवस्था में लगातार गिरावट आती जा रही है। आपराधिक घटनाओं की संख्या में लगातार बढ रही है इसलिए विधि व्यवस्था खराब होने को लेकर मुख्यमंत्री को अपने पद से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। पुलिस मुख्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर घटनाओं की संख्या में बढोतरी की बात स्वीकार की गयी है।
     
पासवान ने लचर कानून व्यवस्था और अपराधियों के बढते हौसले को लेकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हालात सामान्य होने पर मैं मतक के परिजनों को सांत्वना देने के लिए ब्रह्मेश्वर मुखिया के घर पर जाउंगा।

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