सोमवार, 4 अप्रैल 2011

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की जाति

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की जाति
by Udit Raj on 04 अप्रैल 2011 को 15:12 बजे
 नई दिल्ली, 4 अप्रैल, 2011.

डॉ0 उदित राज, रा0 चेयरमैन, अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसवंघ ने कहा कि लोग कहते हुए सुने जा सकते हैं कि भ्रष्टाचार की कोई जाति नहीं होती लेकिन यह सच नहीं है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, श्री के.जी. बालाकृष्णन एवं कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, श्री पी.डी. दिनाकरन के साथ जो हुआ या हो रहा है, उससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भ्रष्टाचार की जाति है। यहां यह मतलब नहीं है कि ये भ्रष्ट हैं या ईमानदार। प्रश्न यह है कि दर्जनों हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के तथाकथित सवर्ण जज भ्रष्टाचार में डूबे हैं, उनके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? के.जी. बालाकृष्णन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गयी और संज्ञान लिया गया। ऐसा अन्यों के मामले में क्यों नहीं?

डॉ0 उदित राज ने आगे कहा कि सन् 2000 में भारत के मुख्य न्यायाधीश, डॉ. ए.एस. आनंद थे। मध्य प्रदेश में जमीन घोटाला हुआ, श्री आनंद अपने प्रभाव का दुरूपयोग करते हुए अपनी पत्नी के माध्यम से झूठा शपथ-पत्र देकर वहां की सरकार से एक करोड़ से ज्यादा मुवावजा उठाया। इन्होंने अपनी जन्मतिथि में भी हेर-फेर किया जिससे देर तक न्यायपालिका में बने रहे।  जिन वकीलों ने उनकी मदद की, उनकी पदोन्नति हुई। वरिष्ठ पत्रकार श्री विनीत नारायण इनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना चाहते थे लेकिन राजनैतिक लोग डर गए। तब उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन, को अपील भेजी, तो उन्होंने इस याचिका को उस समय के कानूनमंत्री, राम जेठमलानी के पास भेजा। उसके बाद जेठमलानी ने डॉ0 आनंद के पास उनकी टिप्पणी के लिए याचिका को अग्रसारित कर दिया। इनकी बचत में अरूण जेटली एवं अटल बिहार वाजपेयी आए और अंत में जेठमलानी को कानूनमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। कितना फर्क है कि एक दलित मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बड़े आराम से भ्रष्टाचार की आवाज उठ रही है और सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका मंजूर कर ली। दूसरी तरफ जब सवर्ण मुख्य न्यायाधीश का मामला आया तो देश के कानूनमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। मामला ठीक उल्टा हुआ, क्योंकि इस्तीफा डॉ0 आनंद को देना चाहिए था। सवर्ण मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आवाज उठाने पर न केवल देश के कानूनमंत्री को जाना पड़ा बल्कि वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण को भूमिगत होना पड़ा। डॉ0 आनंद ने विनीत नारायण के खिलाफ जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय में अवमानना का मुकदमा कायम करवा दिया। चूंकि हिजबुल मुजाहिदीन के निशाने पर विनीत नारायण थे और उन्हें श्रीनगर में रहकर अपनी पैरवी करनी थी, इसलिए ऐसा किया गया। विनीत नारायण के घर और दफ्तर पर छापे भी मारे गए। मजबूर होकर वे देश छोड़कर भाग गए। आज भी डॉ0 आनंद के खिलाफ सारे घोटालों की फाइलें पड़ी हुई हैं और जांच की जाए तो सिद्ध हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के आरोप बिल्कुल सही थे। सवर्ण होने का फायदा कितना है, इससे भी जान सकते हैं कि डॉ0 आनंद को सेवानिवृत्त के बाद भारत के मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। मजे की बात है कि इनकी नियुक्ति डॉ0 ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के समय हुई। 

डॉ0 उदित राज ने बताया कि दूसरे सवर्ण मुख्य न्यायाधीश, श्री वाई.के. सब्बरवाल तो डॉ0 ए.एस. आनंद से भी कहीं आगे भ्रष्टाचार में निकले लेकिन उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका मंजूर नहीं हुई और शान से नौकरी करके सेवानिवृत्त हुए। दिल्ली के बड़े बिल्डरों से साठ-गांठ करके सैकड़ों कॉलोनियांें एवं लाखों दुकानों को सील कर दिया। लाखों लोग भुखमरी के कगार पर आ गए। हजारों मकान तोड़ दिए गए, जो दुकानें सील हुई थी उनको खोलने में बड़ा समय लगा। उसकी वजह से अरबों का रखा हुआ भीतर सामान सड़ गया या जंग लग गया। आवास से ही इनके बेटों ने कंपनी चलायी। सिकंदर रोड, कनॉट प्लेस, जो बहुत पॉश कालौनी है, इनके बेटों ने लगभग 100 करोड़ की सम्पत्ति खरीदी। भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं हुआ है फिर भी यदि मान लिया जाए कि के.जी. बालाकृष्णन ने भ्रष्टाचार किया भी तो क्या यह सब्बरवाल से ज्यादा घातक है। 

डॉ0 उदित राज ने कहा कि ग़ाजियाबाद प्राविडेंट फंड के मुख्य आरोपी एवं गवाह को जेल में मार दिया गया। क्यों नहीं उस पर कोई बड़ा हंगामा हुआ? यहां तक कि तमाम हाई कोर्ट के जज जो इस मामले में लिप्त हैं, सीबीआई अदालत में पेश ही नहीं होते। इस घोटाले में सुप्रीम कोर्ट के उस समय के जज तरून चटर्जी का नाम आया था। क्यों नहीं उस समय उनके खिलाफ कोई सक्रियता मीडिया से लेकर सरकार में हुई। कर्नाटक हाई कोर्ट के दलित ईसाई मुख्य न्यायाधीश, श्री पी.डी. दिनाकरन चिल्लाते रहे कि जिस जमीन को लेकर विवाद है, उसकी जांच की जाए तब उनके खिलाफ बार एसोसिएशन, मीडिया एवं जज कार्यवाही करंे। उनकी एक न सुनी गयी और अंत में उनको सजा मिल गयी। उनसे काम छीन लिया गया। यह अपने आपमें एक बड़ी सजा थी और उसके बाद उनको दूसरे हाई कोर्ट में भेज दिया गया। यदि मान लिया जाए कि इन्होंने जमीन के मामले में भ्रष्टाचार किया तो अपना पक्ष रखने का मौका तो इन्हें देना चाहिए था। यदि ये दलित न होते तो शायद इनके साथ ऐसा व्यवहार न होता। क्या हुआ, उस राजस्थान के जज के खिलाफ, जिसने दलित महिला भंवरी देवी के बलात्कार के मामले में कहा था कि सवर्ण ऐसा कर ही नहीं सकते? राजस्थान में सुशीला नागर, दलित जज, के साथ उनके वरिष्ठ गलत कृत्य करना चाहते थे, जब वे सफल नहीं हुए तो उल्टे सुशीला नागर को ही दंड भोगना पड़ा। इनकी पदोन्नति रोकी गयी और गलत स्थानों पर बार-बार तैनात किया गया। इसका विरोध करने के लिए इनके प्रगतिशील पति, ए.के. जैन, जो स्वयं जज थे, वे इस्तीफा देकर सार्वजनिक जीवन में आए। इस तरह से हजारों भ्रष्टाचार के मामले सवर्ण जजों के खिलाफ मिल जाएंगें लेकिन जैसा के.जी. बालाकृष्णन एवं पी.डी. दिनाकरन के साथ कथित भ्रष्टाचार के मामले में बार एसोसिएशन, मीडिया, सरकार एवं न्यायपालिका ने सक्रियता दिखाई, वैसा अन्यों के मामलों में क्यों नहीं होता? भ्रष्टाचार के दोहरे मानदंड क्यों? 

सुप्रीम कोर्ट में अब तक सैकड़ों जज नियुक्त एवं सेवानिवृत्त हो गए, अब तक उनमें से केवल तीन दलित जज हो सके। इसी तरह से हजारों जज हाई कोर्ट में नियुक्त हुए, उसमें से कुछ ही दलित एवं पिछड़े समाज से हुए। जो भी हुए उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में फंसाने की कोशिश की गयी।  जज बनने के लिए कोई परीक्षा नहीं देनी पड़ती। देश की इतनी बड़ी संस्था में पहुंचने के लिए काबिलियत का कोई भी मापदंड निर्धारित नहीं है। बस इतना ही है कि कौन किसका रिश्तेदार है? कौन समीकरण बैठाने में चतुर और चालाक है? कभी-कभार ही योग्यता के आधार पर जज की नियुक्ति होती है, जिसकी खुद ही योग्यता की जांच-पड़ताल न हो, वह यहां बैठकर क्या फैसला देगा? यही कारण है कि आज करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। 
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C. L. Maurya

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