रविवार, 12 दिसंबर 2010

आज कल उत्तर प्रदेश में दलित और द्विज सामराज्य है |

(जागरण से साभार)

यूपी के अफसरो पर उठीं निष्पक्षता पर अंगुली

Dec 13, 01:06 am
लखनऊ [नदीम]। एक डीएम को हटाने का आदेश अगर हाईकोर्ट को इस वजह से देना पड़ा कि वह सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के लिए विपक्ष के जिला पंचायत सदस्यों को धमका रहे हैं, निर्वाचन आयोग को एक डीआईजी को चुनावी प्रक्रिया से इस वजह से अलग करना पड़ा कि उनको लेकर यह शिकायत प्राप्त हुई कि वह उम्मीदवार विशेष के 'एजेंट' के रूप में काम कर रहे हैं और एक जिले में उप्र पुलिस को हटाकर केंद्रीय बल की निगरानी में चुनाव कराना पड़ा, तो उप्र के अफसरों की 'भूमिका' पर ज्यादा कुछ कहने को बचा नहीं रह जाता।
उप्र की मुख्य सचिव रह चुकी नीरा यादव के जेल जाने के बाद जब राजनीतिकों और अफसरों के गठजोड़ पर बहस शुरू हुई थी, तो ज्यादातर लोगों की राय थी कि यह घटना कम से कम अफसरों के लिए 'आई ओपनर' [आंख खोलने वाली] साबित होगी, लेकिन पिछले तीन दिनों में हुए ताबड़-तोड़ फैसले बताते हैं कि उप्र के अफसर सबक लेने और सुधरने को तैयार नहीं है। उन्हें 'पार्टी' बनने में ज्यादा मजा आता है और फायदा दिखता है। राजनीतिकों को खुश करने में उन्हें किसी भी सीमा तक जाने में कोई गुरेज नहीं रहता। अगर ऐसा नहीं होता, तो शायद हाईकोर्ट को मथुरा के डीएम को तुरंत हटाने का आदेश न देना पड़ता।
डीएम के ऊपर तो स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है, लेकिन मथुरा के डीएम पर तो आरोप यह है कि वह खुद सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार को जिताने की जुगत में लग गए। डीएम का दबाव कुछ इतना ज्यादा बढ़ गया कि कुछ जिला पंचायत सदस्यों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
मथुरा के डीएम का उदाहरण अकेला नहीं है। देवी पाटन परिक्षेत्र के डीआईजी को चुनावी प्रक्रिया से विरत रहने का आदेश निर्वाचन आयोग को करना पड़ा। यहां के डीआईजी पर भी यही आरोप है कि उनकी भूमिका निष्पक्ष नहीं थी। गोंडा जिले में एक उम्मीदवार विशेष के पक्ष में मतदान के लिए विपक्षी दलों से जुड़े जिला पंचायत सदस्यों को डरा-धमका रहे थे। डीआईजी को लेकर मिली शिकायत के बाद निर्वाचन आयोग ने इसकी जांच कराई। डीआईजी पर लगे इल्जाम प्रथम दृष्टया सही पाए गए। आयोग ने उन्हें तुरंत चुनावी प्रक्रिया से अलग करने का आदेश दिया। बाराबंकी जिले में सत्तारूढ़ दल और प्रशासनिक मशीनरी के गठजोड़ के चलते स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव होने की सम्भावना पर सवालिया निशान लगा तो हाईकोर्ट को यह आदेश देना पड़ा कि इस जिले के चुनाव की प्रक्रिया से स्थानीय पुलिस को तुरंत हटाया जाए और केंद्रीय बल की निगरानी में चुनाव कराया जाए।
आईएएस एसोसिएशन और आईपीएस एसोसिएशन पूरे घटनाक्रम पर खामोशी अख्तियार किए हैं। हालांकि 'आफ द रिकार्ड' कुछ पदाधिकारियों की राय है, अच्छे और बुरे लोग सभी जगह हैं, इसलिए कुछ लोगों के कारण पूरी सेवा के अधिकारियों को आरोपित नहीं किया जा सकता, लेकिन इस सवाल का जवाब उनमें से किसी के पास नहीं कि शीर्ष सेवाओं के अंग होने के अलग ही मायने होते हैं। किसी एक अधिकारी के व्यग्तिगत आचरण से पूरी सरकारी मशीनरी से विश्वास हटता है और इसका जिम्मेदार कौन है?

1 टिप्पणी:

  1. इसके जिम्मेदार हम ही हैं जो व्यवस्था को सुधारने में अपना रोल प्रोपरली प्ले नहीं कर रहे हैं।

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