गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

पिछड़ी जातियों के दुखद पहलू !

डॉ.लाल रत्नाकर
जहाँ तक भरोसे का सवाल है, वह पिछड़ी जातियों के भीतर बहुत मजबूती से भरा है, परन्तु उनकी समझ का सवाल आज भी बौना है, पिछड़ी जातियों कि राजनितिक चेतना के आयाम विविधता संजोये हुए है इनमे बौद्धिक समझ और धोखे में बने रहने कि स्थिति बहुत भयावह है, इनके विकास कि दशा और गति जीतनी भी तेज हो जाय पर ये भ्रष्ट जातियों को रोकने कि वजाय उनके अस्त्र के रूप में सामने आते है, यही दुर्भाग्य है कि सदियों कि लडाई को ये चंद लाभ और लोलुपता के कारण उन्ही को मज़बूत करने में लगा देते है |
दूसरी ओर पिछले दिनों महिला आरक्षण को लेकर एक आन्दोलन खड़ा हुआ जिसमें पिछड़ी जातियों कि महिलाओं के अलग से आरक्षण कि मांग उठी जिसे देश के संसद में इन्ही मुद्दों को दबाने के लिए ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया है. आज हमारे सामने जातीय जनगणना का सवाल है जिसके लिए संसद ने कितने विरोध देखे पर यहाँ भी वही हुआ इसे भी उसी तरह दबाने का पूरा यत्न कर दिया गया है.

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जो अब बटबृक्ष बन रहा है।

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