शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

बहस

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राम लला   
बाबा विश्वनाथ और
राहुल बाबा 
डॉ.लाल रत्नाकर

उजरे हुए दयार के नायक और महा नायक 'राम लला' वहीँ बीच वाली गुम्बद के नीचे ही रहेंगे यह फैसला तीन जजों कि बेंच ने दे दिया है, विश्व हिन्दू परिषद् ,निर्मोही अखाडा और मुसलमानों को दे दिया है (इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ पीठ ने गुरुवार को अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया है. तीन जजों की बेंच के बहुमत से आए फ़ैसले में विवादित ज़मीन को हिंदू, मुसलमान और निर्मोही अखाड़े के बीच,
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अब सवाल खड़ा होता है कि बाबा विश्वनाथ का क्या होगा क्या उन पर भी आस्था का कहर बरपेगा कब और कैसे यह सवाल उसी तरह चल रहा है जैसे राहुल बाबा का देश भ्रमण और इस इरादे से कि यह देश कैसा है, स्वर्गीय राजीव जी इस देश कि माटी के साथ मिल गए है क्योंकि जिस महिला ने मानव बम के रूप में अपनी क़ुरबानी दी उसे शायद कांग्रेसियों जितना राजीव जी के बारे में जानकारी नहीं रही होगी नहीं तो वाह शायद आगे आकर इस तरह का काम इन्जाम न करती.
स्वर्गीय  राजीव गाँधी के बारे में जीतनी जानकारी है उससे उनके पायलट होने और पोलिटिशियन होने कि जानकारी तो सार्वजनिक है पर उनका राष्ट्र प्रेम कहीं गाँधी जैसा तो किसी को नहीं खटक रहा होगा, यह सवाल कम से कम उभरकर आया है ऐसा लगभग अब तक कि जानकारी से पता चलता है, राजनीति में इनका आना नेहरू और इंदिरा कि विरासत थी या सचमुच इन्हें राजनीती में रूचि थी यह सब सवाल खोज के हिस्से हो गए है पर जो ज्वलंत है वह है 'राहुल बाबा' का राजनीती का चश्का 'देखने' सुनने से तो नहीं लगता कि इस बाबा में कोई करामाती सोच होगी 'कंग्रेशियों कि लत पड़ गयी है बंशबाद कि जी हुजूरी कि सो अलग बात है पर इनके बश का इतना विशाल देश है सो लगता नहीं कि इनसे संभालने वाला है.
कहते है कि इनकी यूथ टीम है जिसमे इन्ही जैसे लाडले आये है इन्ही कि देखा देखी अन्य दालों के युवा पुत्र पुत्रियों कि राजनीती में आमद इस प्रकार के बहादुर योद्धा आ रहे है जो एक नया 'राजतन्त्र' गढ़ेंगे जिसमे न तो देश कि दशा पर चर्चा होगी और न ही विकास कि कोई दिशा होगी, उधार का सपना होगा और ये जब राज करेंगे तो इनके चहेते देश लूटेंगे नाना प्रकार के तरीके से .

क़ैस ज़ौनपुरी की कविता - मंदिर

कविता.
मंदिर
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मैं अपने रास्‍ते से
जा रहा था
रास्‍ते में देखा
एक मंदिर था
किसी देवी का
लाल रंग से पुती हुई
चुनरी में लिपटी हुई
मैंने सिर झुका लिया
आते-जाते, जहां भी
मंदिर देखता हूं
सिर झुका लेता हूं

लेकिन क्‍या हुआ कि
कुछ लिखा था, जो
मैंने पढ़ लिया
अब जब पढ़ लिया
तो पूरा पढ़ लिया
लिखा था
श्री चौरामाई मंदिर
सुन्‍दरपुर, वाराणसी
अध्‍यक्ष - त्रिभुवन सिंह
कोशाध्‍यक्ष - संजय सिंह
उपाध्‍यक्ष - प्रभाकर दुबे
उपप्रबन्‍धक - अषोक कुमार पटेल
आय-व्‍यय निरीक्षक - मुन्‍ना लाल सिंह
रजिस्‍टर्ड - 841
प्रबन्‍ध समिति
आपका हार्दिक
स्‍वागत करता है.
प्रबन्‍धक - लालचन्‍द प्रसाद

मैंने सोचा
चलो....क्‍या करना है....?
हमें तो बस सिर झुकाना है
मगर सिर झुकाने के बाद
जब सिर उठाया, तो भी
कुछ था, लिखा हुआ
कुछ था, पढ़ने के लिए
स्‍वर्गीय बच्‍चा लाल श्रीवास्‍तव
द्वारा भेंट (ग्रिल)
मतलब, मंदिर का दरवाजा
इन्‍होंने लगवाया था
मुझे तो यही समझ में आया
फिर भी, मैंने अपना ध्‍यान हटाया
सिर्फ चौरामाई को देखा
वहां भी
चौखट पर लिखा था
जय माता दी
जय चौरामाई
और वहीं बगल में
संगमरमर के पत्‍थर पर
खुदाई करके
लिखी गई थी
दानदाताओं की सूची
रामप्रसाद - 101 रुपया
जयदेव सिंह - 290 रुपया
कन्‍हैया लाल - 100 रुपया
.................. - ...................
................... - ..................
.................... - .................
- क़ैस ज़ौनपुरी.
(टीप - कविता में दिए गए स्थान व व्यक्तियों के नाम पूर्णतः काल्पनिक हैं, और किसी जीवित-मृत व्यक्ति से संबंधित नहीं हैं)  







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