शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

जब मिडिया दुश्मन बन जाये !

डॉ.लाल रत्नाकर
श्याम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के प्रांतीय सेवा के अधिकारी है, और ख्यातिलब्ध सूटर है कई बार देश विदेश में प्रदेश एवं देश का नाम रोशन कर चुके है, जब इनको राष्ट्रमंडल खेलों में आधिकारिक कार्य दिया गया तो तमाम लोगों के पेट में दर्द हो गया है जिसकी आंच से तमाम रिपोर्टर जल रहे है. पर उन्हें सारे भ्रष्टाचार एक अधिकारी को सरकारें तहस नहस करने के लिए कैसे फसाती है, यह इनके मामले में देखा जा सकता है.
श्याम सिंह यादव तेज तर्रार अधिकारी है जिससे समय समय पर कई राजनेताओं यथा अमर सिंह , कई ब्यूरोक्रेट जिन्हें वह दुखते रहते है, स्वभाव से खुश मिजाज़ यादव जी बहुत जल्दी किसी पर भी बहुत जल्दी अपने व्यक्तित्व से मान मोह लेते है , पर इनका प्रभावशाली व्यक्तित्व कम लोगों को ज्यादा दिनों तक संभाल पाते है या उनसे संभलता है .   
"ये बुद्धीजीवी, राजनेता, नामचीन खिलाड़ी और मीडिया आईपीएल पर अब क्यों आंसू बहा रहे है. उस समय ये आंखों पर पट्टी बांध कर क्यों बैठे हुए थे जब टीवी पर खुलेआम खिलाड़ियों की बोलियाँ लगाई जा रही थीं. उस समय नहीं दिखाई दे रहा था कि यह खेल नहीं बल्कि पैसे बनाने का खेल शुरू हो रहा है. पर लगता यह है कि सत्ता की केंद्र संसद ही इंडियन पार्लियामेंट लिमिटेड कंपनी बनकर विदेशियों की तरह राज करते हुए अपनी हुकूमत चला रही है. महँगाई कम नहीं कर रही है, टैक्स पर टैक्स लगा रही है. वह देश के विकास की बात को लेकर, सरकारी कर्मचारियों को छठवाँ वेतन आयोग के सिफारिशों के समान वेतन देकर और ग़रीबों को मनरेगा के जरिए पैसा देकर, इस तरह लोग सरकार पर आश्रित हो रहे हैं. सरकार इस खेल में मगन है. इसका फ़ायदा उठाकर पैसे वाले, अभिनेता और नेताओं ने मिलकर इंडियन पैसा बनाओ लिमिटेड (आईपीएल) का गठन किया. इसी लालच में थरूर को जाना पड़ा लेकिन और लोग भी जाते दिख रहे हैं. ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि सरकार मीडिया और आयकर विभाग पहले क्यों नहीं चेता. इसमें सबसे ज्यादा मूर्ख तो आम जनता बनी जो क्रिकेट को धर्म के रूप में देख रही है. उसकी इस कमजोरी का फ़ायदा आईपीएल ने उठाया. थरूर के बाद अब मोदी की बारी और फिर सरकार की बारी. पर लगता है कि मीडिया की बारी कभी नहीं आने वाली है. आईपीएल कांड से हर्षद मेहता की याद ताजा हो रही है. लेकिन अफ़सोस है कि कुछ समय बाद ये बातें हवा हो जाएंगी."

हिम्मत सिंह भाटी
-बी बी सी हिंदी से साभार     
यही कारण है की यह देश अगर हम इनसे आगे बढ़ते है और उनको याद करते है जिनकी वजह से यह सब हो रहा उसमे सर्वाधिक पिछड़े राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों,पत्रकारों तथा सामाजिक आन्दोलन चलाने वाले लोगों का हाथ है. यथा हम यह कह सकते है की सामाजिक न्याय के जिन पुरोधाओं के चलते सामाजिक बदलाव का दौर शुरू हुआ था क्या उनके बताये रास्ते को कोई अख्तियार किया   यदि नहीं तो क्यों ? यह एक जटिल सवाल है जिसका जवाब देने से पहले सारे  पिछड़े राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवियों,पत्रकारों तथा सामाजिक आन्दोलन चलाने वाले लोगों को अपना दामन देखना होगा, एक दूसरे पर हमला बोलने के सिवा किया ही क्या है हमारे कर्ण धारों ने, न ही उन्होंने कोई नीति बनाई और न ही ऐसे स्कूल बनाये जहाँ से पिछड़ों के विकास के मार्ग प्रशस्त हो सके , उन्ही धाराओं के सहारे उन्ही के बताये रास्तों से उन्ही की देखा रेख में बदलाव की कामना करना तड़पती दोपहरी में तारे देखने जैसा ही है.
 यह खबर जो नीचे संलग्न है उसी का परिणाम है -  

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