सोमवार, 5 जुलाई 2010

गरीबों के रहनुमा थे वीपी सिंह

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चौथी दुनिया से साभार 


अंग्रेजों का जमाना था. उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद तहसील की दो रियासतें थीं, डैया और मांडा. विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म इसी डैया के राजघराने में 25 जून, 1931 को हुआ था. बचपन का लालन-पालन अपनी मां की गोद में यहीं हुआ, लेकिन अपने मूल पिता के परिवार में बालक विश्वनाथ का रहना पांच वर्ष तक ही हुआ. डैया के बगल की रियासत मांडा के राजा थे राजा बहादुर राम गोपाल सिंह. वह नि:संतान थे. अपनी राज परंपरा चलाने के लिए उन्होंने बालक विश्वनाथ को माता-पिता की सहमति से गोद ले लिया. फिर तो विश्वनाथ ने पीछे नहीं देखा. गंभीरता से पठन-पाठन में जुट गए. परिणामस्वरूप हाईस्कूल तक कई विषयों में उत्कृष्टता मिली. बाद में वह बनारस के उदय प्रताप सिंह कॉलेज में पढ़ने आए. वहां अच्छे छात्रों की पंक्ति में थेविश्वनाथ. प्रिंसिपल ने उन्हें प्रिफेक्ट बनाया. तब तक भारत को आज़ादी मिल चुकी थी. विश्वनाथ की मसें भी भींग रही थीं. विश्वनाथ ने छात्रसंघ गठित करने की मांग रखी. अध्यक्ष पद के लिए प्रिंसिपल का एक लाड़ला छात्र खड़ा हुआ. उसे गुमान था कि वह प्रिंसिपल का उम्मीदवार है. प्रतिरोध व्यवस्था में पक्षपात के ख़िला़फ विश्वनाथ के कान खड़े हुए. आजीवन इस्तीफों से मूल्यों को खड़ा करने और गलत का प्रतिरोध करने वाले भावी वी पी सिंह का यही उदय था. बस क्या था, प्रिफेक्ट पद से इस्तीफा दे दिया. यह उनकी ज़िंदगी का पहला इस्तीफा था. समान विचारों के छात्रों ने संघ के अध्यक्ष पद के लिए उन्हें खड़ा कर दिया. युवा कांग्रेस का आग्रह टालकर वह स्वतंत्र उम्मीदवार बने और प्रिंसिपल के उम्मीदवार को हराकर जीत गए. वोट को आकृष्ट करने की क्षमता का यही बुनियादी अनुभव बना वी पी सिंह का. राजनीति इसी अंतराल में उनका विषय बनी. उनके व्यक्तित्व में दो ध्रुव थे. वैज्ञानिक बनने और सामाजिक कार्यों से मान्यता की मंशा थी. चित्रकारी सामाजिक ध्रुव का हिस्सा थी. इन ध्रुवों के बीच कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी. इसी के बीच एक ठोस वी पी सिंह का उदय हुआ. 24 साल वर्ष की आयु में वह राजनीति की तऱफ संयोगवश मुख़ातिब हो गए. यहां भी वोट की राजनीति की कल्पना नहीं थी. 1955 में कांग्रेस के चवन्निया सदस्य बने, 24 साल की उम्र में. कांग्रेस में आने का विचार इतर था, सत्ता में हिस्सेदारी नहीं. अपने इलाक़ेके साधारण आदमी की सुनवाई जो नहीं हो रही थी, वही उनकी राजनीति का कालांतर में केंद्र बनी. वी पी सिंह तन-मन से कांग्रेस की राजनीति में आ गए.


1957 में कठौली गांव के एक भूदान शिविर में अपना एकमात्र फार्म लैंड, 200 एकड़ की उपजाऊ और नहर से जुड़ी भूमि, बिल्कुल सड़क के किनारे वाली भूदान में दे दी. तब विनोबा भावे ने कहा था कि राजपुत्र सिद्धार्थ ने त्याग किया तो संसार का कल्याण हुआ. राजपुत्र विश्वनाथ ने आज जो त्याग किया है, उससे भविष्य में भारत का कल्याण होगा. 1969 के विधानसभा चुनाव में वह सोरांवा विधानसभा सीट से जीतकर विधानसभा पहुंच गए. यहीं से उनका राजनीतिक प्रशिक्षण शुरू हुआ.
विधायक के रूप में 1974 तक का कार्यकाल बचा था, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें 1971 का लोकसभा चुनाव फूलपुर क्षेत्र से लड़ना पड़ा. इसमें उन्होंने जनेश्वर मिश्र जैसे तपे-तपाए समाजवादी नेता को पछाड़ा था. वह राजनीति के मानचित्र पर आ गए थे. 10 अक्टूबर, 1976 को इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में व्यापार के उपमंत्री बना दिए गए. जहां वह दिसंबर 1976 तक रहे. आपातकाल की समाप्ति के बाद जनवरी 1977 में नए चुनाव की घोषणा हुई. उन्हें फूलपुर से चुनाव लड़ना पड़ा. आपातकाल की ज़्यादती का फल उस चुनाव में कांग्रेसियों को भोगना पड़ा. इंदिरा भी हारीं, वीपी भी. सत्ता बदल गई. केंद्र में पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकार का आगमन हुआ. कांग्रेस के लोग इंदिरा को छोड़ रहे थे. वीपी ने इंदिरा का साथ न छोड़ने का निर्णय लिया. जनता शासनकाल में इंदिरा गिरफ़्तार हुईं. विरोध में कांग्रेसियों का जेल भरो अभियान शुरू हुआ. वह दिल्ली कोर्ट में पेश हुईं तो उस प्रदर्शन में वीपी भी थे. उन्होंने इलाहाबाद में तीन बार जेल भरो अभियान चलाया. नैनी जेल में बंद किए गए. यह आज़ाद भारत में वीपी की पहली जेल यात्रा थी. जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी की केंद्र में वापसी हुई. वीपी इस बार इलाहाबाद सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे, लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें जगह नहीं मिली. लोकसभा सदस्य बने छह माह भी नहीं हुए थे कि एक दिन इंदिरा गांधी का बुलावा आया और उन्होंने पार्टी प्रमुख के सामने वीपी को बताया कि आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. अपना मंत्रिमंडल बनाइए. वीपी ने इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया. वह मंत्रिमंडल गठन में गुटों से परे रहे. उन्होंने ख़ुद को छोटा नहीं बनाया, व्यापक राजनीति शुरू की. पहला मुद्दा था दलितों-पिछड़ों का. उन्होंने पिछड़े वर्ग के एक वकील को हाईकोर्ट का जज बनाया. राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए मंडल कमीशन की स़िफारिशों को लागू किया. फिर आई डकैतों की समस्या. इसके लिए वीपी अपनी कुर्सी तक को जोख़िम में डालने से नहीं चूके. उन्होंने अफसरों को अपना इस्तीफा देने तक की धमकी दी. एक मुठभेड़ में थानेदार, सिपाही मारा गया तो मुख्यमंत्री ख़ुद उन्हें कंधा देने पहुंचे. शहादत की यह इज़्ज़त थी. पुलिस का मनोबल बढ़ा. डकैत घिरने लगे. इससे वीपी को ख़ूब राष्ट्रीय प्रचार और यश मिला. इसी बीच वीपी जिंदवारी क्षेत्र से विधानसभा के लिए भी चुने गए. वीपी के बड़े भाई चंद्रशेखर सिंह एक दिन डकैतों द्वारा ग़लतफहमी में मारे गए. उन्हीं दिनों मुलायम सिंह यादव ने आरोप लागाया कि वीपी के निर्देश पर डकैतों के नाम पर पिछड़े मारे जा रहे हैं. इससे वीपी को बड़ा क्षोभ हुआ. बिना किसी से परामर्श लिए वीपी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इस तरह वीपी जून 1980 से जून 1982 तक स़िर्फ दो साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. वह अब कांग्रेस की राजनीति का अपरिहार्य हिस्सा हो चुके थे. जुलाई 1983 में वह राज्यसभा के सदस्य बने. यहां वह अप्रैल 1988 तक रहे. फिर केंद्र में 29 जनवरी, 1983 से सितंबर 1984 तक वाणिज्य मंत्री रहे. आपूर्ति मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला. सितंबर 1984 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने. दिसंबर 1984 से जनवरी 1987 तक भारत सरकार के वित्त मंत्री रहे. इंदिरा गांधी की असामयिक मौत के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. उन्होंने भी वीपी को वित्त मंत्री बनाया. वीपी ने महसूस किया कि इस व्यवस्था में केवल धनपतियों की चलती है. उन्होंने पूंजीवादी, काले धनपतियों और कर चोरों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंक दिया. वह वित्त से रक्षा मंत्री बना दिए गए. बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने बोफोर्स सौदे मेंदलाली के मद्दे को उठाया और सत्ता के चरित्र का पर्दाफाश कर दिया. तब तक प्रधानमंत्री राजीव गांधी से उनका मतभेद काफी बढ़ चुका था. उन्होंने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उन्हें नहीं मालूम था कि जनता उनके नेतृत्व का इंतज़ार कर रही है. मुजफ़्फरनगर के किसान सम्मेलन में लाखों की भीड़ को देखकर पता चल गया कि देश की जनता उन्हें अपना नेता मान चुकी है. 19 जुलाई, 1987 को वीपी कांग्रेस से निकाल दिए गए. वीपी ने जनमोर्चा का गठन किया. इसी बीच अमिताभ बच्चन के इस्तीफे से ख़ाली हुई इलाहाबाद सीट से वीपी ने निर्दलीय लड़कर कांग्रेस के सुनील शास्त्री को सवा लाख वोटों के अंतर से हरा दिया. वीपी के प्रयास से व्यापक विपक्षी एकता बनी. सात प्रमुख विपक्षी दलों को मिलाकर एक राष्ट्रीय मोर्चा तैयार हुआ. राजीव सरकार को भ्रष्टाचार, महंगाई समेत कई मुद्दों पर घेरना शुरू हो गया. बोफोर्स मुद्दा अग्रणी बना. लोकसभा चुनाव जनवरी, 1990 में होना चाहिए था, लेकिन राजीव गांधी ने नवंबर, 1989 में ही चुनाव कराने का निर्णय ले लिया. वीपी को पूरे देश में चुनावों का संचालन देखना पड़ा. कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ, कहीं रक्तपात भी नहीं हुआ. केवल जनता की इच्छा थी कि सत्ता और विकास आम आदमी के दरवाज़े तक जाए. इसलिए जनता ने उस चुनाव में कांग्रेस को सत्ताच्युत कर दिया. राष्ट्रीय मोर्चा पूर्ण बहुमत में आया. वीपी के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने दो दिसंबर, 1989 को अपना कार्यभार संभाल लिया. चौधरी देवीलाल उप प्रधानमंत्री बनाए गए. राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार तो बन गई, पर उसमें घटकवाद जारी रहा. मेहम कांड को लेकर देवीलाल नाराज़ रहने लगे तो चंद्रशेखर का भी वीपी से दुराव जारी रहा. फिर भी जिन मुद्दों पर सरकार बनी थी, वीपी ने सब पर अमल किया. सबसे चौंकाने वाली बात उनके द्वारा सात अगस्त, 1990 को मंडल कमीशन की स़िफारिशों को लागू करने की घोषणा थी. वीपी का यह निर्णय भारतीय इतिहास में वंचितों के उत्थान के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ.
जब सामाजिक जीवन विचार केंद्रित, सार्थक परिवर्तन-परिचालित न हो, जनांदोलन रहित हो जाए, ताक़तवर लोगों की सरपरस्ती के तहत ही जीने की मजबूरी हो, लोकतंत्र के विकास के लिए न कोई आकांक्षा हो और न तैयारी, व्यापक असमानता, कुव्यवस्था एवं बेरोज़गारी ही संरचना का चरित्र हो जाए, राजनीति का अकेला अर्थ हो जाए सत्ता के ज़रिए धन का संग्रह, तो वैसे समय में वीपी सिंह जैसे इतिहास पुरुष की याद आनी स्वाभाविक है, जो आज हमारे बीच नहीं हैं.
मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने से नाराज़ भाजपा ने राम जन्मभूमि मामले को लेकर सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. वीपी ने विवाद को सुलझाने के लिए कई बैठकें बुलाईं, लेकिन नतीजा स़िफर रहा. आख़िरकार भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार अल्पमत में आ गई और सात नवंबर, 1990 को वीपी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इसी बीच कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए जनता दल से 25 सांसदों को लेकर अलग हुए गुट के नेता चंद्रशेखर को समर्थन देने की घोषणा कर दी. कांग्रेस समेत कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए. इस्तीफा देने के बाद भी वीपी के क़दम नहीं रुके. वह पूरे देश में घूम-घूमकर जनता के हितों के लिए संघर्ष करते रहे. इस दौरान जनता दल कई बार टूटा. धीरे-धीरे दलगत राजनीति से वीपी का मोहभंग होता गया और जुलाई 1993 में उन्होंने पार्टी संसदीय दल के नेता पद से त्यागपत्र दे दिया. कुछ महीने बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता भी छोड़ दी. दलगत राजनीति से बाहर आए तो जनचेतना मंच से जनसंघर्ष की शुरुआत की. दिल्ली की 30 हज़ार आबादी वाली वजीरपुर झुग्गी बस्ती को उजाड़ने के लिए सरकार ने बुलडोज़र चलाने की कोशिश की तो वह यह कहते हुए बुलडोज़र के सामने खड़े हो गए कि अगर सरकार सभी अनाधिकृत फार्म हाउसों को भी ढहा दे तो हम इन झुग्गी बस्तियों को उजाड़ने से नहीं रोकेंगे. बाध्य होकर सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा. इस प्रकार झुग्गी झोपड़ी वालों की समस्या को वीपी ने एक राष्ट्रीय परिघटना बना दिया. तब तक वीपी गुर्दे और कैंसर जैसी कई बीमारियों से घिर गए थे. धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य गिरता गया, पर ज़िंदगी ने हार नहीं मानी. शैय्या पर वह कविताएं लिखते रहे, चित्र बनाते रहे. मौत के नीम अंधेरे में उन्होंने संबंधों, सरोकारों और मुसीबतों पर कविताएं लिखीं. वीपी का जाना हुआ बिल्कुल चुपचाप.

  1. 26-27 नवंबर 2008 को पूरा देश मुंबई आतंकी हमले से सहमा था. डॉक्टर दोपहर में रूटीन चेकअप में आए. उन्हें देखते ही वीपी बोल पड़े, डॉक्टर, मुझे आज़ाद कर दो. सचमुच पांच मिनट बाद यानी एक बजकर 55 मिनट पर उनकी धड़कन ठहर गई. आज़ाद हो गए. ज़िंदगी को सलाम करके चले गए. परीक्षित का अंत हो गया. इस प्रकार वीपी जबसे राजनीति में आए, केंद्र में रहे. कांग्रेस की राजनीति में तो एक विश्वासपात्र की तरह रहे ही, उनके चरित्र की छाप बाहर भी फैलती गई. जब भ्रष्टाचार के मुद्दे का शंखनाद किया तो जन-लहर के प्रणेता बन गए. उनका नक्षत्रीय उत्थान हुआ. इसके पहले भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोज़गारी का मुद्दा जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति का कारण बना, जिस पर संपूर्ण भारत आपातकाल की स्मृतियों से एकजुट हुआ. वीपी का मुद्दा भी भ्रष्टाचार था और संस्थागत स्वरूपों का क्षरण. जयप्रकाश की क्रांतिकारी पहल में ब हुत से युवा नेता शामिल हुए, पर वे क्रांति के आदर्शों पर क़ायम न रहकर, सत्ताकामिता के शिकार हो गए. वीपी कीविद्रोही जमात में उस समय की विपक्षी राजनीति और असंतुष्ट नेता थे, जो कुचक्रों के चलते मुख्यधारा से छिटकते चले गए. वीपी ने युवा वर्ग को ही नहीं, संपूर्ण जनता को गोलबंद किया. ऐसी जन लहर कभी भारतीय राजनीति में नहीं आई थी, जबकि मुद्दा और व्यक्तित्व दोनों जनता की नज़र में प्रधान होकर भविष्य का सपना बन जाए. व्यापक लोकतंत्रीय जनहित में इस सपने को भुनाना नहीं, उतारना ही वीपी की असली छाप को समझने का सबब है.

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